शनिवार, 25 अगस्त 2012

फुल इंटरटेनमेंट पैकेज 'प्रीक्वेल' फिलम 'एक था टाईगर'


एक रूमानी अहसास है यह फिल्म. प्यार होना कतई कोई टेढ़ी खीर नहीं है .यह सरे राह चलते चलते ऐसे ही यूं भी /ही हो जाता है ...केवल एक छोटी सी चहलकदमी साथ साथ और टाईगर (सलमान खान ) तथा जोया (कटरीना कैफ ) एक दूसरे को दिल दे बैठे ...दर्शकों को यह रील पर नहीं सहजता से घटता प्रसंग लगता है और शायद इसके लिए उन्हें दोनों सितारों की नजदीकियों की ख़बरों के द्वारा कंडीशन किया जाता रहा है .दोनो किरदार अपने अपने देशों (भारत पाकिस्तान ) की मानी जानी ख़ुफ़िया एजेंसियों  के नुमायिंदे हैं -रा और आई एस आई ...पहले इस बात से बेखबर ..अब प्यार तो दीवाना है, पगला है यह सब कहाँ देखता है ...."साले टाईगर को एक पाकिस्तानी जासूस ही मिली थी प्यार करने को " यह तात्क्षणिक उदगार होते हैं रा के मुखिया के ......दोनो अपने अपने देश -दायित्वों को छोड़ भाग चलते हैं .....और आज तक भाग ही रहे हैं ..देश दर देश शहर दर शहर .....और दोनो देशों की  ख़ुफ़िया एजेंसियां उनके पीछे पडी हैं ..फिल्म का यह अंतहीन अंत निश्चिय ही इसके सीक्वेल को प्लान करके गढ़ा गया है हालांकि निर्माता निर्देशक इस संभावना से इन्कार कर रहे हैं ..

फिल्म के लोकेशन,चित्रांकन लाजवाब है ... कटरीना बला की खूबसूरत लगी हैं और अब तो उन्हें अदाकारी भी आ गयी है -उनके चेहरे के भाव कहानी की मांग को एकदम सटीक तरीके से पूरा करते हैं ..उनके कई स्टंट सीन लगता तो नहीं कि उन्होंने किये होंगे मगर फिल्म देखते वक्त यह भी नहीं लगता कि उन्होंने नहीं किये होंगे ...और मार धाढ और विध्वंस के सीन भी बहुत जीवंत हैं और हालीवुड फिल्मों की प्रतीति कराते हैं...रोमांटिक दृश्य बहुत ही सहज और साफ़ सुथरे और दिल को छू लेने वाले हैं ....एक दृश्य में टाईगर जोया को उल्कों की बरसात(मीटियार शावर)  का दृश्य दिखाता  है जो  बहुत ही नयनाभिराम है . फिल्म के एक प्रोफ़ेसर का किरदार यद्यपि अल्पावधि  के लिए है मगर प्रोफ़ेसर -स्टीरियोटाईप के बहु प्रचारित जुमले को बारीकी से  दृश्यांकित करते हैं .......
फिल्म की कहानी नहीं बता रहा क्योकि  अपनी ओर से यह सिफारिश है आप यह फिलम  देख सकते हैं ...पारिवारिक फिल्म है -बच्चों कच्चों के साथ किसी दिन थियेटर- माल में जाने का पूरा मौका है ....और कहानी में भी रुमान का रंग छाया हुआ है और मार धाड, धर -पकड़ की तो पूरी ग़दर ही मची है फिल्म में ..पहला हाफ तो इतना कसा हुआ है कि इंटरवल होने पर दर्शक चौकते हैं ...हाँ इंटरवल के बाद बस कुछ मिनटों के लिए कहीं कहीं फिल्म झोल खाती है मगर फिर तुरत फुरत संभलती भी है ....गाने मुझे तो कोई नहीं भाए..मगर इस तरह के फिल्मों में गाने वाने ज्यादा मायने नहीं रखते ....थ्रिलर और लव स्टोरी का उम्दा ब्लेंड है यह फिल्म ....प्रेम महिमामंडित हुआ है -देश और फर्ज भी प्रेम के आगे कुर्बान है -यह मुद्दा तनिक विचारणीय तो है मगर यह फिल्म है भाई -हकीकत नहीं और हकीकत में भी तो क्या इससे कम हुआ है कभी -फिल्म ने बड़ी चतुराई से दोनो देशों के कुछ हवा में तैरते ऐसे ही एकाध किस्से को थीम बनाया है जो कुछ समय पहले सुर्खियों में थे -एक पाकिस्तानी नागरिक ऐसी ही फ़रियाद लेकर भारत में दर दर भटक रही थी .....
फिल्म के मुताबिक़ जासूसी  दुनिया के असली किरदारों के बीच बहुत कुछ ऐसा घटता है जो चर्चा का विषय नहीं बनता ...रा के कौन लोग हैं और आई एस आई के कौन चेहरे हैं हम कहाँ देख पाते हैं? जबकि वे अपने आस पास ही किसी न किसी नागरिक -पड़ोसी, पात्रों के रूप में मौजूद होते हैं -हाँ उनकी एक अलग दुनिया है जो हमें नहीं दिखती जिसके बस एक पहलू को इस फिल्म के जरिये उजागर किया गया है ......तो कब देख रहे हैं सपरिवार यह फिल्म आप? वैसे तो मैंने अकेले ही निपटा दी है ...मगर घर की फरमाईश बनी हुयी है ..अब सलमान के फैन घर घर हैं न ..और हर उम्र के भी :-( इस बात की भी फिल्म में चुटकी ली गयी है .....और सलमान ने अब तक शादी क्यों नहीं की इसकी भी .......

21 टिप्‍पणियां:

  1. @संजय: अद्भुत साम्य है हर मामले में दोनों में! :-)

    उत्तर देंहटाएं
  2. सिफारिश की तामील की जायेगी . ख़ूबसूरत ख़यालात..

    उत्तर देंहटाएं
  3. कल ही कहीं पढ़ा था -- बकवास है . सलमान तो वैसे भी हमें बचकाना सा लगता है . लेकिन कैटरिना --अवश्य देखने लायक है .
    अब आपने सिफारिश की है तो हम भी देख पाएंगे .

    उत्तर देंहटाएं
  4. हम तो पहला दिन पहला शो देख आये थे.पिछले हफ्ते .
    मैं ने अपनी पोस्ट में दो पंक्तियाँ लिखी भी हैं इस फिल्म के बारे में .
    सल्लू मियां और केट की फिल्म है यहाँ तो लोग दीवाने हैं इन दोनों के ..फिल्म जैसी भी हो चलती ही है.
    फिल्म में लोकेशन
    अच्छी हैं.

    बाकि सुना है एक भारतीय जासूस और पाकिस्तानी लड़की के इश्क की सच्ची कहानी है लेकिन उनका सहक तो यह है कि उनका अंजाम फिल्म वाला नहीं हुआ था.भारतीय जासूस पाकिस्तानी जेल में प्रताड़ित किया गया और मारा गया .[ऐसा अंतर्जाल पर ही पढ़ा है]
    मुझे तो पकड़म - पकडाई का खेल ज्यादा लगी फिल्म.
    केटरीना का भागना-कूदना फाँदना मतलब एक्शन अधिक था ..सलमान से ये सब अब होता नहीं है उन्होएँ खुद स्वीकारा है.फिर भी उन्हें एक्शन करते देखना बुरा नहीं है.टाइम पास फिल्म है .. कहानी में न कोई सेंस नहीं है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. @टिप्पणी में आखिरी पंक्ति को कृपया पढ़ें ...कहानी में कोई सेंस नहीं है

    उत्तर देंहटाएं
  6. .एक दृश्य में टाईगर जोया को उल्कों की बरसात(मीटियार शावर) का दृश्य दिखाता है जो बहुत ही नयनाभिराम है . फिल्म के एक प्रोफ़ेसर का किरदार यद्यपि अल्पावधि के लिए है मगर प्रोफ़ेसर -स्टीरियोटाईप के बहु प्रचारित जुमले को बारीकी से दृश्यांकित करते हैं .......बढ़िया समीक्षा संतुलित आयाम लिए ....सलमान आखिर सलमान हैं दबंग उनका शीर्ष था ,कृपया उल्काओं (धूमकेतु के टुकड़ों )कर लें,शुद्ध रूप लिखने की उतावली में कई मर्तबा सबसे छूट जाता है .वैसे उल्काओं की बरसात के लिए एक शब्द उल्कापात भी प्रयुक्त होता है हिमपात की तरह .शुक्रिया भाईसाहब बहुत दिनों के बाद इधर का रुख किये अच्छा लगा .आते रहिए ....इधर अभी काइरोप्रेक्टिक ज़ारी रहेगा ....टाइगर शुद्ध रूप है ......

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुन्दर समीक्षा किन्तु अभिनय में उनके बीच का अंतर झलकता है .जो खटकता भी है .

    उत्तर देंहटाएं
  8. सलमान सीरीज की पिछली कुछ फिल्मों से थोड़ी तो बेहतर ही थी ये, शेष अल्पना जी की राय से भी सहमत हूँ.

    उत्तर देंहटाएं
  9. हमें तो ठीक ठाक ही लगी ... कुछ कुछ बोरियत है इंटरवल से पहले ... कुल मिला के देखि तो ही ठीक नहीं तो भी ठीक ....

    उत्तर देंहटाएं
  10. हमें तो फ़िल्म उतनी अच्छी नहीं लगी जितनी कि बाजार में तारीफ़ की जा रही है, इस पर तो गैंग्स ऑफ़ वासौपुर बहुत भारी है ।

    उत्तर देंहटाएं
  11. आपकी सिफारिश है तो ये फिल्म भी देख लेंगे !

    वैसे संजय मो सम कौन को बताये गये अद्भुत साम्य का डिटेल्स दर्ज करें तो हम भी जान जायें !

    उत्तर देंहटाएं
  12. हमारी टिप्पणी गायब हो गई,

    हमने कहा था कि हमें तो फ़िल्म पसंद नहीं आई, विषय तो संपूर्ण काल्पनिक है और ऐसे उज्ज्ड़ पड़ोसी के विषय को लेकर बनाई गई फ़िल्म बिल्कुल पसंद नहीं आई ।

    यहाँ प्रेम नहीं गोली होनी चाहिये । अगर बाद में गोली मारी जाती तो ज्यादा हिट होती यह फ़िल्म ।

    उत्तर देंहटाएं
  13. माने फिलिम कटरीना के लिए देखी जाए :)

    उत्तर देंहटाएं
  14. @ विवेक जी,

    इस पर तो गैंग्स ऑफ़ वासौपुर बहुत भारी है


    सहमत हूँ,


    @अभिषेक जी,

    @माने फिलिम कटरीना के लिए देखी जाए :)

    आपसे भी सहमत :)

    उत्तर देंहटाएं

यदि आपको लगता है कि आपको इस पोस्ट पर कुछ कहना है तो बहुमूल्य विचारों से अवश्य अवगत कराएं-आपकी प्रतिक्रिया का सदैव स्वागत है !

मेरी ब्लॉग सूची

ब्लॉग आर्काइव