Wednesday, 17 March 2010

आओ ब्लागवाणी पर पसंद- नापसंद खेलें!

अपने नए कलेवर में ब्लोगवाणी रूप रंग और सौन्दर्य की इन्द्रधनुषी छटा बिखेर रही है. कई नए आकर्षण इससे आ जुड़े हैं .इन्ही में एक पसंद नापसंद  का भी विकल्प है -मतलब आपको  फ्रीडम  है कि किसी भी पोस्ट को उसके आपत्तिजनक कंटेंट के कारण  आप उसके लिए अपनी आपत्ति नापसंद के तौर पर व्यक्त कर सकते हैं -नापसंद के आप्शन पर चटका लगा सकते हैं . यह एक उदात्त  सोच का  नतीजा है और   हिन्दी ब्लागजगत में लोकतांत्रिक सोच को बढ़ावा देने का एक कारण -एक मौका भी .मगर जैसा कि हम भारतवर्षी महान करते आये हैं दीगर सेवा -सुविधाओं की तरह   इस सहृदयता से सुलभ कराये गए सेवा की भी ऐसी  की तैसी करने पर जुट गए हैं .

आज ही अवधिया जी की ब्लोगवाणी पर पसंद कैसे बढ़ाएं के व्यंग लेख पर पॉँच नापसंद अभी तक आ चुके हैं.मैंने विगत दिनों से इस आप्शन के उपयोग और दुरूपयोग पर अपनी नजर रखी है और अपने कुछ प्रेक्षण आपसे साझा करने चाहता हूँ .पहले निष्कर्ष ही बता दूं -इस सुविधा का दुरूपयोग हो रहा है जो हमें आत्मविश्लेषण करने को मजबूर कर   रहा है कि शायद  अभी हम इस स्वतंत्रता के उपभोग के लिए परिपक्व नहीं हुए है .भला क्यों ? शुरू शुरू में मैंने मार्क किया कि केवल कुछ लोगों की पोस्ट पर नापसंद का चटका लग रहा है -पाबला जी ,अजय झा और यह खाकसार किसी एक सज्जन के टार्गेट पर रहे .जैसे ही पोस्ट ब्लोगवाणी के हाट स्तम्भ पर आई  नहीं की ये लो नापसंद -मतलब यहाँ भी निजी खुन्नस -पोस्ट के कंटेंट से कोई मतलब नहीं .अब खुन्नस का बदला अगर खुन्नस से हो तो लो बन गयी ब्लागवाणी गंदे खेल का मैदान -गाँव में इसी को कहते हैं -"न खेलब  न खेलई देब बस खेलवई बिगाड़ब"-मतलब खेल भावना से विपरीत जाकर केवल नंगई का प्रदर्शन -एक सुविधा और सौजन्यता  का निर्लज्ज उपहास! अब दूसरा मामला देखिये जो और भी रोचक रहा -यह देखा गया कि किसकी पोस्ट नंबर वन पर पहुँच रही है तो झट से नापसंद  का चटका लगाकर उसकी बढ़त को रोक रखा गया ताकि उसके ठीक नीचे के एक दो पावदान पीछे के पसंद की पोस्ट टाप पर पहुँच सके! अब इसके पीछे वहीं लोग हो सकते हैं न जो हमेशा टाप पर दिखना चाहते हों हर कीमत पर  -हुक ,आर बाई क्रुक ! वो कहते हैं न कि प्यार और युद्ध में सब जायज है -अब ब्लोगवाणी टीम कितनी ही नेक भावना से इस निःशुल्क सेवा को बरकरार करने में जुटी हो हमारे में से कितने लोगों को यह प्यार का या युद्ध / निपटने का मैदान ही नजर आता है -सुबह शाम लोटा उठाये चल दिए -झाडा फिर, वापस! अब किसी खास को क्या दोष ,यह तो हमारी सार्वजनिक सोच ही है गंदगी फैलाना और अपने चारो ओर गन्दगी फैलाए रहना .

नापसंद का विकल्प ब्लोगवाणी टीम ने अपनी उस उदात्त सोच के तहत दिया होगा जिसमें आपसी  वैमनस्य बढ़ाने वाली पोस्टें ,साम्प्रदायिक सोच को दर्शाने वाली पोस्ट पर अमन चैन और दैनिक जीवन में गुणवता के हिमायती लोग अपनी प्रतिक्रिया  को मुखर कर सकें -मगर यहाँ तो खेल ही दूसरा शुरू हो गया -मानो लोगों को अपनी आपसी खुन्नस और श्रेष्ठता  साबित करने का सहसा ही एक  'ईश्वरीय   प्रद्द्त्त " वरदान /उपहार मिल गया हो .और लोगो ने खेल खेलना शुरू कर दिया .वैमनस्य और आपसी असहिष्णुता  का खेल -बन्दर के हाथ में उस्तरा मिलेगा तो वह ऐसा ही तो कुछ करेगा ! 

क्या ब्लोगवाणी टीम को यह विकल्प बंद कर देना चाहिए ? मगर कब तक ? कब यह ब्लॉगजगत परिपक्व होगा ? होगा भी या नहीं  ? आईये विचारें और ब्लोगवाणी टीम को भी एक पुनर्विचार का अवसर दें !

और तब तक हे भाई साहब ..अरे अरे आप से ही कह रहा हूँ -उधर  कहाँ देख रहे हैं ,हाँ हाँ आपसे ही -लगाओ न नापसंदगी पर एक चटका ...मगर इस बार   जरा प्यार से भाई  जान -हाँ नहीं तो (हाँ नहीं तो-शब्द -भाव सौजन्य स्वप्न मंजूषा शैल ) .

53 comments:

Udan Tashtari said...

आपका आदेश है तो लगाते हैं/.

tarannum said...

mr mishra
i am not agree with you. personally i feel for these people pasand -napasnd matters a lot.therefore they ask there friends to do so.not agree with me ?
than see last 3 days.
but for real reader its at all not imp.real reader wants some good content when he/she opens computer he wants some good to read not who says what or when or what is this and all those game.
mr pabla is jusr doing samaj seva for bloggers he is not writing any post .

बी एस पाबला said...

ब्लॉगवाणी पसंद पर जो हंगामा होता रहा था, उससे निज़ात पाने ही यह नापसंद लाया गया। यह कोई अनोखा काम भी नहीं है। आंग्ल भाषा की प्रसिद्ध ब्लॉग डायरेक्ट्रियों में यह विकल्प खूब चल रहा है। वहाँ भी चिंताएँ होती रह्ती हैं।

अंतर केवल इतना है कि वहाँ कारण स्पष्ट रहता है। यहाँ तो बिना पढ़े ही ब्लॉग पोस्ट को नापसंद या पसंद कर दिया जाता है।

प्रिंट मीडिया वाले ब्लॉग पर लगातार कई सप्ताह पर नापसंदगी झलकती रही। जबकि उसमें मेरा व्यक्तिगत कुछ भी नहीं था सिवाय मेहनत के। पोस्ट में अखबार का नाम, ब्लॉगर का नाम, ब्लॉग का नाम ही रहता है वह भी हर पोस्ट में अलग-अलग

अब कोई बताए कि नापंसद किसे किया जा रहा? अखबार को? ब्लॉगर को? ब्लॉग को? मेरे प्रयास को? या खुद ऐसी कतरनों को एक स्थान पर रखे जाने वाली पूरी परिकल्पना को?

अब यह बात अलग है कि नापसंद दर्ज़ करने वाला थक गया मैं नहीं थका

हा हा

बी एस पाबला

Bhavesh (भावेश ) said...

अरविन्द जी, व्यर्थ टांग खिचाई की ये ही आदत है जो आज हमें विकसित होने से रोक रही है. कहते है जिसके पास जो होगा वो ही उसे दे पायेगा. आज अम्बानी के पास अरबो डॉलर है तभी तो वो किसी को अरब डॉलर दे सकता है. वैसे ही जिन लोगो में कुंठा, हीन भावना भरी पड़ी है वे गंदगी ही करेंगे. वे कही भी कुछ अच्छा कैसे होने दें सकते है. यूँ समझ लीजिये कि कीचड़ जहाँ भी होगा वहां बदबू ही फैलाएगा. कुछ सकारात्मक करने की बजाये, इस तरह की घटिया हरकत करने वाले ये लोग समाज के कीचड़ ही है

tarannum said...

one more thing there are only four five people who does"nt have anything to write so on every second or third day they will write about all this nonrevelent issues one of them is mr avadhiya.

ताऊ रामपुरिया said...

आपका आदेश है तो अभी जाकर एक नापसंद का चटका लगा देता हूं. आप भी क्या याद रखेंगे कि इतना आज्ञाकारी ताऊ मिला है.:)

वैसे जब ब्लागवाणी ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की है तो आजकल सूचना का अधिकार भी है.

अगर सभी को वहां यह दिखता रहे कि किसने पसंद किया और किसने नापसंद किया तो इस कष्ट से बहुत कुछ छुटकारा मिल सकेगा, और मामा मारीचों और सुर्पणखांओं से बहुत कुछ निजात मिल सकेगी.

रामराम.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप चाहें तो दस या सौ आईडी रजिस्टर कराएँ और दिन भर पसंद नापसंद करें। कित्ता बढ़िया तो खेल है, आप क्यों परेशान हैं। आप के पास कोई और काम न हो तो आप भी खेलें।

अल्पना वर्मा said...

अग्रीग्रेटरों को देखना बंद कर दिजीये.
सारी समस्या का समाधान यही है.
'ना नौ मन तेल होगा ना राधा नाचेगी.'
[सही मुहावरा फिट किया है या नहीं?]

जी.के. अवधिया said...

"कुछ लोगों की पोस्ट पर नापसंद का चटका लग रहा है -पाबला जी ,अजय झा और यह खाकसार"

यही देखकर लगता है कि लोग पोस्ट को नहीं ब्लोगर को ही नापसंद कर रहे हैं।

ताऊ रामपुरिया said...

आपका आदेश है तो अभी जाकर एक नापसंद का चटका लगा देता हूं. आप भी क्या याद रखेंगे कि इतना आज्ञाकारी ताऊ मिला है.:)

वैसे जब ब्लागवाणी ने लोकतांत्रिक व्यवस्था की है तो आजकल सूचना का अधिकार भी है.

अगर सभी को वहां यह दिखता रहे कि किसने पसंद किया और किसने नापसंद किया तो इस कष्ट से बहुत कुछ छुटकारा मिल सकेगा, और मामा मारीचों और सुर्पणखांओं से बहुत कुछ निजात मिल सकेगी.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया said...

लो जी ब्लागवाणी की आपकी पोस्ट पर पहले ही २ नापसंद लगी है, हमने एक भी नही लगाई. बल्कि गल्ती से पसंद पर लगा दी जो ५ से बढकर ६ हो गई...:)

रामराम.

Shiv Kumar Mishra said...

ब्लागवाणी पर नापसंद के आप्शन का दुरपयोग हो रहा है. असल में नापसंद का आप्शन शायद लेखन के स्तर को दर्शाने के लिए लगाया था लेकिन इसका उपयोग/दुरपयोग/सदपयोग लोग व्यक्तिगत तौर पर कर रहे हैं जो बिलकुल गलत है.

मुझे लगता है पसंद और नापसंद के आप्शन के बिना भी काम चल सकता है.

Kajal Kumar said...

नापसंदगी के चलते बेनामियों की पौबारह :)

PD said...

आज कोई श्लोक नहीं है सबसे नीचे?

शरद कोकास said...

आपका कथन सही है अभी हम स्वतंत्रता के उपभोग के लिये परिपक्व नहीं हुए हैं । यह उसी तरह है जिस तरह मतदान के समय वोट न देने का अधिकार । वहाँ जाकर आप अपने अधिकार के अंतर्गत अपनी नापसन्द दर्ज़ करा सकते हैं कि आप वोट क्यों नहीं देना चाहते हालाँकि ऐसा कोई नहीं करता ।

Anil Pusadkar said...

अपने बस के बाहर की चीज़ है ये पसंद और नापसंद।अवधिया जी से एक बार पूछा था मगर चटका लगाने मे सफ़ल नही हो पाये।बस पढ लेते है और कमेण्ट करके ही पसंद बता देते हैं।नापसंद वाला मामला तो अपने समझ से परे है।

Arvind Mishra said...

@पी डी: आज कोई श्लोक नहीं है सबसे नीचे?
फिर लगाईये न इसी पर चौथा चटका नापसंद का भाई पी डी! हा हा

tarannum ,well said ,at least your views reflect a clear stand -thanks !

rashmi ravija said...

मुझे तो किसी ने मुबारकबाद दी, कि लो, आप मशहूर हो गयीं....नापसंद का चटका आपकी पोस्ट पर भी लग गया...वह भी मेरी 'काम वाली बाइयों' की पोस्ट पर...और जब वह अखबार में छपी तो पाबला जी के ब्लॉग वाली पोस्ट पर भी....
कोई फर्क नहीं पड़ता , जो पोस्ट टॉप पर पहुँच जाती है उसे पढ़ तो अवश्य लेते हैं सब...पर कितना याद रखते हैं...यह महत्वपूर्ण है. और जब पूरे समाज में ही यह मानसिकता व्याप्त है तो हम ब्लॉगजगत में इस से दीगर की उम्मीद कैसे करें...

P.N. Subramanian said...

चलिए हम भी चटका लगा ही देते हैं. पता तो चलेगा नहीं

खुशदीप सहगल said...

अरे डॉक्टर साहब,
संभल कर, आपसे खार रखने वाले कहीं ये गीत गाना ही न शुरू कर दें...

जो तुमको हो पसंद, वही बात करेंगे,
तुम दिन को अगर रात कहो तो रात कहेंगे...

जय हिंद...

Dr. Smt. ajit gupta said...

जो व्‍यक्ति वैचारिक परिपक्‍व होते हैं वे लेखक बनते हैं लेकिन लेखक बनते ही वे अपरिपक्‍व जैसा व्‍यवहार करने लगते हैं। क्‍यों‍कि अब उन्‍हें अपना लिखा सर्वश्रेष्‍ठ लगने लगता है और दूसरे का निकृष्‍ट। इतनी सारी चाहते जाग जाती है कि उसकी कल्‍पना स्‍थानीय पुरस्‍कारों से लेकर नोबल तक जा पहुंचती है और फिर वह सारी ही तिकड़में लगाने में जुट जाता है। लेकिन यहाँ ब्‍लाग जगत में कई ऐसे लेखक भी मुझे मिले हैं जिनकी पोस्‍ट को देखते ही पढ़ने का मन करता है। जिनमें से एक नाम समीरजी का भी है। कई हैं ऐसे नाम जिनकी पोस्‍ट को देखते ही पढ़ने का मन करता है। इसलिए यहाँ अच्‍छे भी लोग हैं जिनकी पोस्‍ट स्‍वाभाविक रूप से पहले पायदान तक आती है और कुछ ऐसे भी होंगे तो जुगाड़ से एक दो पायदान ऊंचे पहुंच जाते हैं। बस इतना ही।

DR. ANWER JAMAL said...

nice post.

राज भाटिय़ा said...

पसंद ओर नापसंद अरे यह तो खाम्खा का एक पंगा है, बस इस का कोई लाभ हो तो बताओ.... मेने तो आज तक कभी भी इस बटन ओर या जो भी हो वहा चटका कभी नही लगाया, पसंद नही तो साफ़ साफ़ टिपण्णी मे लिख दिया पसंद है तो भी लिख दिया

Mithilesh dubey said...

Sir ji mai aapse puri tarah se sahmat hun, hal ye hai ki maine kuch dino pahle ek kavita likha tha , uspar bhi kisi do char napasand ke chatke laga diye the, maera to ye kahan hai napsnad ka option ho , lekin aisa ho ki napasand karne wale ka nam jaroor ho , jisase jawab talab kiya ja sake

shikha varshney said...

चलिए लगा देते हैं आप कह रहे हैं तो ...वैसे हमारी भी कुछ पोस्ट नवाजी जा चुकी हैं इनसे :).क्या फरक पड़ता है.

अभिषेक ओझा said...

there is no such thing as bad publicity !

उम्दा सोच said...

मान्यवर एक चटखा मेरा भी स्वीकार करे !

Mired Mirage said...

मुझे लगता है कि आप नाहक परेशान हो रहे हैं। एक निन्दक या यह कहिए खुन्दकी से आप परेशान हो गए किन्तु अनेक पसन्द करने वालों की भी सोचिए।
हम सबको यह विचार करना चाहिए कि नापसन्द का उपयोग क्या ऐसी पोस्ट्स के लिए करें जो समाज में वैमनस्य फैलाती हैं, दूसरों के धर्म, नस्ल आदि को बुरा भला कहना ही अपना कर्त्तव्य मानते हैं या फिर उनकी पूरी तरह से उपेक्षा करनी चाहिए। शायद नापसन्द का उपयोग भी उन्हें यह सांत्वना देगा कि इतने लोगों ने उन्हें पढ़ा और वे हमारी उपेक्षा को अपनी आदत के अनुसार हमारी घृणा मानकर चलेंगे और पहले से भी अधिक खुन्दक में और भी अधिक घृणा फैलाने के काम में लग जाएँगे। इसलिए शायद पूर्ण उपेक्षा ही इलाज है।
घुघूती बासूती

PD said...

इसे हुकुम माने क्या? :)

डॉ. मनोज मिश्र said...

हमको कोई फर्क नहीं पड़ता-कोई पसंद करे या नापसंद ,क्या फर्क पड़ने वाला है....

मिहिरभोज said...

भई हम तो ब्लोग वाणी से प्रसन्न हैं....और तरन्नुम जी से समहत

Jandunia said...

पसंद-नापसंद की चिंता छोड़िए। सुविधाओं का उपयोग किया जाए। यही बेहतर है।

Nitish Raj said...

अरविंद जी पहले तो लोग पढ़ते ही बहुत ज्यादा थे कि टिप्पणियों का अकाल रहा करता था अब एक नई बात (नापसंद की)और सामने आगई। मेरा मानना तो ये है कि कुछ ये जरूर देखते हैं कि कितनी पसंद हुई पर कुछ सिर्फ ये देखते हैं कि कितना पढ़ा गया या कितनी टिप्पणियां हैं और सबसे खास बात कि टिप्पणियों में क्या है ये ही सबसे अहम है।

अजय कुमार झा said...

हा हा हा ....मामला कोई भी हो अपन हर जगह पपलू की तर्फ़ फ़िट हो ही जाते हैं ....अरे सर मारिए गोली इस पसंद नापसंद को ....यहां सबको पता है कि कौन किसको पसंद करता है ....मैंने कौन किसको कहा है ..कौन किसकी पोस्ट को नहीं ...ध्यान दिया जाए ....
अजय कुमार झा

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

मैं तो बहुत दिनों से उस तरफ़ जाता ही नहीं। कौन बे-सिर-पैर के आँकड़ों में उलझे?

वैसे भी जो लिस्ट मेरी ‘शानदार’ पोस्टों को शामिल कर पाने में विफल रही उसकी विश्वसनीयता के बारे में मैं व्यक्तिगत रूप से संदेह तो कर ही सकता हूँ :) :) :D

ललित शर्मा said...

हमारे ब्लागपर भी कुछ दिन
तक नापसंद का रोग लगा था।
लेकिन अब मौसम को
देखते हुए-रोग थम गया है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

सूरज को दिया दिखाने की ज़रुरत है क्या? लता मंगेशकर को फटेहाल खान कव्वाल पुरस्कार की कौनो ज़रुरत नाही है.

RC Mishra said...

बाकी सब ठीक है, तरन्नुम की अंग्रेजी जबर्दस्त है :)

विनोद कुमार पांडेय said...

नापसंद अब पोस्ट करने वाले व्यक्ति को फोकस में रख कर की जाती है ना कि पोस्ट पर..ऐसा मैने कई बात देखा आप बिल्कुल सही कह रहे हैं...यहाँ नापसंद का मतलब बस व्यक्तिगत खुन्नस है...बाकी निर्णय तो ब्लॉगवानी के उपर निर्भर है..

आभा said...

यह नापंसन्द का चटका तो अपनी अपनी भावना है क्या किया जाए इसका पर लीजिए ,मैंने भी सात से आठ किया ..

हिमांशु । Himanshu said...

"अरे सर मारिए गोली इस पसंद नापसंद को ...."
(टिप्पणी सौजन्य : अजय कुमार झा )

RaniVishal said...

वास्तविकता को सही शब्दों में बयां किया है आपने, लेकिन अगर एक अच्छे कंटेंट की पोस्ट पर अगर एक भी नापसंदगी का चटका लग जाता है तो ...जाहिर ही है की वो सिवाय वैमनस्य के कुछ नहीं और सच्ची कला इस तरह के हथकंडो से फिर भी नहीं छुप सकती ! वेसे ताउजी का आइडिया इम्प्लीमेंट हो जाए तो सही तस्वीर सामने आजाएगी !!

बी एस पाबला said...

RC Mishra जी ने टिप्पणी की !!
सब ठीक तो है ?

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

सचमुच, पसंद/नपसंद को लोगों ने खेल ही बना दिया है। यह सचमुच दुखद है।

manu said...

nice

zeal said...

I wonder why you guys have created an option like "chatka". Many have stooped to begging for chatka.Alas !

As far as "napasand ka chatka" , Its really something stupid and propagating negative thinking among bloggers and polluting their beautiful thoughts.

In my humble opinion, such options should be banned. Let the readers be natural while reading. Readers liking are obvious by their comments. Then whats the need of so called Chatka?

By the way..."Lage raho munna bhai".....oops...I mean lage rahiye Arvind ji.

Divya

Arvind Mishra said...

Hi Divya,
thanks for this chaste comment!
I like your writing and the way you put your views in spontaneous English!
But who you are? I like people with nice ideas !

zeal said...

Arvind ji,

You asked- "Who are you Divya?"

I really started thinking who i am? Whats my introduction? Am i the same that i have been a couple of months ago?

I keep changing. As change is the only thing which is constant on earth.

I love moving ahead with innovative ideas and great challenges. I welcome changes coming my way.

Who is Divya?...Indeed a beautiful lady , who is a doctor by profession and married to a GEM of a person named Sameer (Pyar se 'Sam')

Who is ZEAL ?....Zeal is Divya's identity. Brutally honest and fearless lady. Interacting with likeminded people and discovering human behaviour is her passion.

Now don't say..."Self praise is no recommendation"

Smiles.

Arvind Mishra said...

Its fine Divya,
SO you have a philosophical inclination bent up of mind too...I feared initially that it might be a faux pas to ask hitherto unknown a persona to reveal his/her identity but even then I could not contain my curiosity -It could make any one impatient,the mere thought that some one is following landestinely -and that too a lady and a beautiful one!
Good wishes to you and your hubby -Sam!
You may be any body but certainly a friend and by no means a foe who abounds in every nook and corner and even in the blogosphere !

प्रवीण पाण्डेय said...

किसी की पसन्द या नापसन्द को कितनी गम्भीरता से लिया जाये, इसका निर्णय कौन करेगा ?

zeal said...

Rest assured Arvind ji, zeal is friendship personified (not at all an exaggeration).

Why you were hesitant in asking for introduction? Never hesitate in knowing people. Be fearless in all your endeavors.

Honesty and fearlessness will lead you to true success.

I am not a blogger. Reading human mind is my passion, this propels me to go through blogs and the following comments. Some are mere flatterers, some are just courteous and too polite. Some are honest in their comments. Some people really give valuable comments.

Honestly speaking comments attract me more than blogs. I gain knowledge through blogs but my passion of reading human mind is quenched by reading comments.


Flattery and cowardice is an unforgivable crime in Blog-Jagat .

Pardon my ignorance. After all i am also an ignorant mortal.

To err is human...but to err is my hobby. Because its the only way i learn.

By the way , thanks for the best wishes....I badly need it after erring .

Smiles.

Arvind Mishra said...

@thanks and best wishes my Anon friend!
(I was hesitant for one more reason that quest for your identity wont bear any result! Some sort of a wild goose chase only . Anyway(s) just be in touch please -your writings are mesmerizing!

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

शिव मिश्रा जी से सहमत...

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