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मंगलवार, 26 मार्च 2013

क्या खाली पीली होली ?

क्या खाली पीली होली ?
नहीं नहीं
खा ली और पी ली होली
क्या खा ली क्या पी ली
भांग खा ली और ठंडई पी ली
बस इत्ती सी होली?
नहीं नहीं
ली थोड़ी गुलाल
मुंह पर उनके मल ली
नेह के रंग भिगोली
कर तन मन रंग रंगीली
खुशियों से ली भर झोली
बस हो ली होली
 याद आयी
बहुत  घर की होली 

बुधवार, 13 मार्च 2013

होली की उपाधियाँ ही उपाधियाँ: कोई भी चुन लें :-)

ब्लॉग जगत में होली की सुगबुगाहट शुरू हो गयी है .नाम ले ले कर उपाधियाँ बांटी जा रही है . हम भी कभी इस तरह की कल्पनाशील सृजनात्मकता दिखा कर लोगों की वाहवाही तो कम गालियाँ ज्यादा बटोरते थे। कई मित्रों से जो मन मुटाव हुआ तो लम्बे  अरसे बाद काफी मान मनौवल के बाद ही मामला सुलट पाया . इसलिए हम अब इस जोखिम के काम को लेकर उदासीन हो चले हैं। मगर ब्लॉग जगत की इस नयी सुगबुगाहट के बाद सुषुप्त पड़ चली मसखरी फिर जोर मार रही है . 

मगर ना बाबा ना ..नाम के साथ तो मैं कोई उपाधि जोड़ना नहीं चाहता। मुझे याद है इंटर मीडिएट के दौरान मेरा एक मित्र उसे मिली उपाधि को लेकर अच्छा ख़ासा नाराज हो गया .उपाधि थी -देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर . अब वो गधा मेरे  पीछे ही पड़ गया कि वह कौन सा गंभीर घाव पैदा करता है .उसे लाख समझाता  कि यार यह तो मुहावरा भर है  मगर वो माने तब ना,उसे तो  तो बस यही सवाल करते रहने की जैसे सनक सी हो गयी थी . जब मैं इलाहाबाद युनिवर्सिटी के ताराचंद छात्रावास में था तो होली के अवसर पर एक मित्र के लिए जो टाईटल चुना गया वह था -"दमित इच्छाओं के मसीहा" ..इतना बुरा मान गया वह कि हमारी बोल चाल भी बंद हो गयी . अब ब्लॉग जगत में तो कितने मित्रों ने तो पहले से ही बोलचाल बंद कर दी है और अब अगरचे मैं कोई होली की उपाधि किसी के साथ चेंप या सटा  दी तो जुलुम ही हो जाएगा -तो भैया ऐसी रिस्क लेने को मेरी हिम्मत नहीं है .

होली की उपाधि देने की परम्परा बड़ी पुरानी  है, और यह  पढ़े लिखे लोगों का एक शगल है -होली के अवसर पर हंसी मजाक करने का बस -इसे दिल पर लेने की बात ही नहीं होनी चाहिए .मगर यह भी सही है कि प्रायः उपाधि देने वाले का निजी मूल्यांकन किसी के बारे में काफी भावनिष्ठ हो जाता है -उपाधि पाने वाले को चोट सी लगती  है कि अरे लोग मेरे बारे में ऐसा सोचते हैं,जबकि मैं तो ऐसा नहीं , लोग कहें भले न कई बार उपाधियाँ लोगों को चुभ जाती हैं -मगर फिर भी उचित तो यही है कि इन्हें गंभीरता से न लिया जाय ,बस हल्के  फुल्के ही लिया जाय . अभी ब्लॉग जगत में कुछ और उपाधियाँ नामचीन ब्लागरों से और आने वाली हैं ऐसी अन्दर की खबर मुझे मिली है और मैं मानसिक रूप से खुद को उन्हें हंसी खुशी स्वीकार करने के लिए तैयार कर रहा हूँ और आपसे भी यही  गुजारिश है .वैसे कभी कभी दूसरों की निगाहों से खुद का मूल्यांकन  जरुर करना चाहिए!

मेरे मन में भी कई उपाधियाँ तैर रही हैं -सुषुप्त सा  शरारती किशोर जाग सा गया है .  उपाधियाँ ही उपाधियाँ हैं आप लोग खुद अपने मन से स्वयंवर कर लें -चुन लें इनमें से-मुझे इनके साथ नाम नहीं देना है .
सनम बेवफा , फौलादी शख्सियत के नाम बड़े और दर्शन छोटे  , मेरे तो पिया परमेश्वर दूजो न कोई,दोस्त दोस्त ना रहा , इतने पास न आना अगर चाहते हो मुझे पाना ,मुझे  पता है औकात सभी की ,हमाम में मैं ही नहीं सभी नंगें हैं , हम तो दिल दे चुके सनम .दाल भात में मूसल चंद ,मैं हूँ इक  चिर विरही , परमारथ के कारने साधुन धरा शरीर ,कोई मेरी भी तो सुनो , सलाह ले लो भाई सलाह ले लो , मुझे  छपास रोग लगा रे , मैं तो प्रेम दीवानी ,आजा मेरी प्यास बुझा जा ...जवानी बीती जाय रे ....अब अंत में क्या ख़ाक मुसल्मा होंगें?, मेरा जूता है जापानी पतलून लखनवीं ,घर में  तो पिया, मगर दिल किसी और को दिया, मैं हूँ परदेश  मगर दिलवर है उस देश , नादान बालमा, विरही सौतन आदि आदि .दोस्तों से गुजारिश है वे अपना भी योगदान कर सकते हैं ,उनका नाम गुप्त रखा जाएगा!    ......ये सभी  पर्सनालिटी  ट्रेट यही अपने ब्लॉग जगत में भी है -अपनी पसंद की आप खुद चुन लो और मुझे मत कोसिएगा ....
आप सभी को होली की ..नहीं नहीं अभी वक्त है -होली की शुभकामनाओं के लिए थोड़ा और इंतज़ार करिए-हाँ फागुन चकाचक बीते !

मंगलवार, 2 मार्च 2010

गाँव में होली मनाई और खींच लाये कुछ चित्र !....

 माता जी के निर्देशन में गुंझिया निर्माण  गृह उद्योग
हर बार की तरह इस बार की होली मैंने सपरिवार गांवं में मनाई -यह बात दीगर है कि पिछले बार की तरह इस बार भी छुट्टी बीतने से पहले ही वापस मुख्यालय    यानि  बनारस बुला  लिया गया -मगर खैरियत है .हाँ, कुछ चित्र हैं मेरे साथ जिन्हें मैं आपके साथ साझा कर रहा  हूँ -गांवं की होली भी कई चरणों में होती है -होलिका दहन से रंग खेलने ,अबीर गुलाल लगाने से लेकर भांग की घोटाई और ठंडई की पिलाई तक और बीच बीच में कुछ मनसायन -गायन वादन भी!मुझे याद है वसंत पंचमी के दिन गाँव के छोर पर स्थापित किये  जाने वाले रेंड (अरंड ) के पेड़ पर जहां रंग खेलने के दिन के पूर्व की रात में होलिका दहन होता है हम लोग खांचे -दौरे भर भर कर पत्तियाँ , खर पतवार बटोर बटोर कर लाते थे और एक भव्य होलिका दहन की तैयारी करते थे.....इस बार तो रात में हम जब बाल गोपालों और बड़े  बुजुर्गों के साथ वहां पहुंचे तो पूर्णिमा की रात होने के बावजूद भी वह स्थल ही  नहीं मिला जहां रेड का स्थापित होना बताया जा रहा था -बहरहाल एक स्थल को चिह्नित कर गाँव से पुआल, सरपत ,ईख की सूखी पत्तियाँ मंगाकर रखी गयी -होलिका दहन के लिए -बच्चों को मैंने अपने दिनों की याद दिला कर कोसा कि पुरुषों का पुरुषत्व भले ही ख़त्म होता जा रहा हो तुम लोगों का बचपना कहाँ चला गया है,पत्तियाँ ही बटोर कर रखते  -बहरहाल इस डांट फटकार का नतीजा शायद  अगले वर्ष देखने को मिले .
गुझिया और किसिम किसिम की  होली -खाद्य सामग्री -शहर में  सीखें ,गांवं में बनाएं

होलिका में आग लगाने के पहले कबीर बोलने की परम्परा है जिस  पर पहले लिख चुका हूँ (सिफारिश है ,समय हो तो जरूर पढ़ लें ).दरअसल होलिका  दहन के पूर्व  कबीर बोलने की  परम्परा ही गाँवों की वह सार्वजनिक यौन  उन्मुखीकरण / यौन विषयक  ओपेन शिक्षण -स्थल है जहाँ किशोरावस्था की देहरी पर बस पहुँच रहे बच्चों को यौनिकता की ओर इशारा कर  मानो जता  दिया जाता है कि मानव जीवन में यौनिकता का भी एक अहम् रोल है -और इसके प्रति अनावश्यक शील संकोच कुंठाओं को जन्म दे सकता  है! तो कबीर में गाँव के प्रमुख लोगों ,जोड़ों से जोड़ते हुए यौनिक उद्भावनाएँ गीतों के जरिये खुल्लम खुल्ला व्यक्त होती हैं -और गाँव के दलित तक को भी पूरी छूट  मिलती है कि वे गांवं के कथित संभ्रांत और उच्च वर्ग के लोगों के यौन जीवन में ताक झाँक कर मनचाही फंतासियाँ कह बोल सकें -प्रगटतः तो यह सब  "अश्लील" सा लगता है और हम आज भी कबीर  सुनने में  शील संकोच से गड से जाते हैं -निःशब्द हो उठते हैं मगर वहां उपस्थित बच्चों -किशोरों को देख अपना अतीत भी याद आ  जाता है कि किस तरह बड़े बूढों के  सामने ही सुने गए 'कबीरों' के चलते   अगले कुछ दिनों तक हम उनसे   नजरें चुराते फिरते थे-पर इस सार्वजनिक व्यवस्था के प्रति एक आभार बोध भी है कि हमें यौनिक विषयों की जुगुप्सा यहीं से प्राप्त हुई -और इसके चलते भी बहुत कुछ सहज सामान्य  सा रहा कालांतर के जीवन में -यहाँ उन 'अश्लील' उद्धरणों को तो नहीं दिया  जा सकता -यह तो "सुनतै बनत बतावत नाहीं "जैसा अनुभव ही है!  इस बार कबीर गाने वाले भी कोई ख़ास नहीं रहे -अपने जमाने के बिज्जल चमार की याद आई जो होलिका दहन के लिए ५०० मीटर  दूर पर स्थित अपने घर से निकलते ही कबीरा स र र र र र की तान छेड़ देते और बिना उनके आये होलिका   नहीं जलती थी ....हाँ होलिका के जल जाने के बाद सब कुछ सुस्वप्न /दुस्वप्न सा हो जाता था -बात आई गयी हो जाती थी ..फिर कोई किसी को कबीर नहीं  बोल सकता था ....मेरी भी इच्छा ब्लागजगत के कुछ ऐठू -तुनक मिजाज मगर प्यारे  से लोगों को कबीर बोलने की हो आई है मगर होलिका तो जल चुकी ..चलिए अगली बार .....हा हा ...

 एक घूमंतू गायक टोली 

दूसरे दिन  बच्चों के साथ हुडदंग भी किया -नतीजतन आज भी शरीर का पोर पोर दुःख रहा है .हमने गीत गायन की बैठकी में भी भाग लिया -मनोज के निर्देशन में होली -चैता  गायकी का एक जज्बा यहाँ  देख सकते हैं .ठंडई पीया और थोडा भांग भी खाई -नशा नहीं हुआ -कौन जाने भांग ही  नकली  न रही हो!... और  फिर बैतलवा शाख पर यानि बनारस  वापस आ चुका हूँ!
होलिका जलने के पहले और नीचे जलने पर .....

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

बालम मोर गदेलवा -एक एडल्ट पोस्ट (गदेलों की तांक झाँक वर्जित है)

मनोज के फागुनी पोड्कास्टों की  बयार के मदमस्त झोकें में  ब्लागजगत झूमने लगा है -ज्ञानदत्त जी तो फगुआ के बजाय कजरी गाने लग गए हैं -और बड़े मिसिर जी को भी शिद्दत से याद किया है उन्होंने जोडीदार बनने के लिए . हाजिर साहब जी . किसी ने जिज्ञासा भी  की है कि गदेलवा माने क्या होता है ? मनोज ने बताया बच्चा होता है गदेलवा . तरसे जियरा मोर बालम मोर गदेलवा -ये लाईन है जो नायिका गहरी  अनुभूतियों और आक्रोश   के साथ कहती हुई पाई जाती है -न जाने किससे किससे कहती जाती है बेचारी! मुझसे तो नहीं कहा अब तक !उसकी बेबसी ,उसकी अतृप्ति देखी नहीं जाती -मगर क्या इसलिए कि उसका बालम  गदेला है ? जी गदेला तो है मगर क्या वह  उम्र से गदेला है -बस यहीं झोल है और समझ का फेर  है -अरे नायिका तो है पूर्ण यौवन सम्पन्न और काम केलि /क्रीडा में पूरी दक्ष मगर बालम मिल  गया है निरा बुद्धू ,बकलोल ,निपट अनाडी -ससुरा कुछ समुझतै नहीं है -अब सलज्ज नारी संकोच से भी  बिचारी नायिका उबर नहीं पा रही है -अब क्या कहे और बताये भी तो क्या क्या ,पिय को कैसे अपने मदन आग्रहों और स्थलों की जानकारी देकर अग्र केलि के रहस्यों को समझाए -वह बुडबक तो बस ठेठ ही तरीका अपनाता है बार बार ,कोई परिष्कृत कार्य विधि नहीं है उसके पास -बुडबक कुछ समझता ही नहीं है नारी मन  को ....आखिर कशमकश और खीझ इन शब्दों में फूट ही पड़ती है -तरसै जियरा मोर बालम  , मोर गदेलवा!

मगर सावधान ये विचार भी तो किसी  रंगीले पुरुष के ही  हैं जो वह नायिका के जरिये कह रहा है -मतलब यह एक तरह  से /प्रकारांतर से वह उन तमाम काम कला प्रवीण मर्दों को खुला आमंत्रण दे रहा है -अरे भाई लोगों ,इस नायिका की पीड़ा तुममे से ही कोई दूर कर दो न -मेरी भव बाधा हरो  राधा नागर सोय की ही तर्ज पर कोई तो आगे बढ़ो -और अर्ह मर्दों की टोली कल्पनाओं में उड़ने लग जाती है -मस्त बहारे होली की मानों उन कल्पनाओं में पंख लगा देती हैं -और उद्दीपित और उद्वेलित कथित नायिका के संग संग उनकी  भव बाधाओं को पार करने में लग जाता है मर्दों का सदल बल .जैसे इस फाग को सुन सुनाकर भैया चचा लोग मदमस्त होने लग गए हैं और ब्लॉग होली शुरू हो चुकी है -फलाने फलानी के संग और फलानी फलाने के संग होली खेलने लग भी गए हैं -यहाँ बुडबक बालम हो तो तनिक भी फिक्र  न करें - ब्लाग नायिकाओं ! अगर तुम्हारा मन  अभी भी किसी से नहीं बिंध पाया है तो सलाहकार सेवा यहाँ उपलब्ध है -जो कोई यह कहे कि उसे होली अच्छी न लागे  है तो समझिये उसके मन  माफिक का गबरू गैर गदेला नायक अभी नहीं मिल पाया है उसे ......आप अपनी अर्जी दे सकते हैं मगर  आपको गदेला न होने का सार्टीफिकेट मिल गया हो तभी -यह ताऊ साब बाँट रहे हैं तुरंत अप्लाई  कर ही दीजिये -महफूज भाई आप तो इस बार लाईन में लग कर ले ही लो -मुझे बालवुड की कुछ तारिकाओं ने बताया है कि आप अभी गदेलवा की श्रेणी में  ही है भाई! नाम मैं उजागर कर दूंगा! 

और हाँ कुछ जोड़े भूमिगत भी हो गए हैं उनका पता आप यहाँ से लगा सकते हैं .नायिका ने तड से भांप लिया कि अमुक ब्लॉगर तो दिखता गदेलवा है मगर हैं नहीं तो इसका परीक्षण करने दोनों जने यानि जोडियाँ भूमिगत हो चुकी हैं  -और कुबरी संग जूझें रामलला का मंजर साकार होने लग गए हैं - यहाँ नहीं भाई असली संसार में -इसलिए ज़रा आस  पास चौकन्ना होकर देखिये कौन कौन गायब है ? 


आप सभी को होली की रंगारंग शुभकामनाएं!



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