बुधवार, 27 जनवरी 2010

अगले कुछ दिन मेरे लिए मेरे लिए बहुत हेक्टिक होने वाले हैं!

आज से पॉँच दिनों के लिए लखनऊ निकल रहा हूँ -एक शुभ कार्य के लिए .जब यह पोस्ट प्रकाशित होगी मैं लखनऊ पहुँच चुका रहूँगा और लखनऊ के ब्लागरान के डिस्पोजल पर होऊंगा .अगले पॉँच दिन तो ब्लागिंग बंद ही रहेगी ....काम का बोझ जो रहेगा. हाँ एक दिन ब्लॉगर मीत भी जुटेगें ही शामे  अवध 'मीट' में ! संयोजन मित्र ज़ाकिर अली रजनीश करेगें !संभवतः ३० जनवरी को शामे अवध एक बार और गुलजार होगी..... ब्लागमय हो उठेगी.

मैं एक परियोजना जो मेरे मन  की उपज है पर भी अवध रिसर्च फाउन्डेशन से बात करूंगा -वह है राम वन गमन पथ पुनरुद्धार परियोजना .याद है ,अटल जी के समय में एक स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना का सूत्रपात हुआ था जो आज भी प्रगति पर है .मगर मुझे इन  राजनयिकों की सूझ पर भी तरस  आता है कि ये इस धर्म प्राण देश में धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अपने चरित नायको की स्मृति में राम वन गमन पथ पुनरुद्धार जैसी परियोजना या फिर भव्य  राम पथ का निर्माण करने का संकल्प क्यों नहीं लेते . भारत का बच्चा बच्चा श्रीराम के लिए आज भी सब कुछ न्योछावर कर देगा ..वोट तो वोट एक ठोस काम भी हो जायेगा -अपने सांस्कृतिक धरोहरों का अनुरक्षण होगा सो अलग.  .

अभी युनिवेर्सिटी ग्रांट्स कमीशन ने एक ऐसी ही परियोजना पर अपनी मुहर लगाई है "ऐ स्टडी ऑफ़ ग्रोथ एंड डेवेलोपमेंट ऑफ़ रेलिजस टूरिज्म इन नार्थ इंडिया विथ स्पेशल रिफरेन्स टू प्लेसेज ऑफ़ रामायण " .यह अध्ययन डॉ भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय द्वारा इंस्टीच्यूट आफ टूरिज्म एंड होटल मनेजमेंट /डिपार्टमेंट के सहयोग से किया जायेगा .मेरा कहना है कि उसके उपरान्त राम पथ का सही निर्धारण  हो जाने के बाद एक भव्य पथ भी बने जो एक बार फिर उत्तर से  दक्षिण तक भारत का सांस्कृतिक सेत बन्धु बने और अपने एक गौरवमयी अतीत की याद दिलाये . इस पर विस्तार से फिर कभी मगर अभी तो इतना ही कि मेरे अगले  दिनों की दिनचर्या में यह मुद्दा भी शामिल होगा .

मंसूबे तो और भी बहुत हैं मगर कुछ के लिए मनाही जारी हो चुकी है गृह विभाग और ब्लोगर वर्ल्ड से भी ..तो उनकी चर्चा  भी क्या करना .अगले कुछ  दिन मेरे लिए मेरे लिए बहुत हेक्टिक होने वाले हैं .

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

आमिर को पद्म भूषण और महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जी को मात्र पद्म श्री?




                                                      क्या अपना सम्मान खो रहे हैं पद्म सम्मान ?
वैसे मैंने तो आज  इस मनो- बीमारी से रोकथाम के लिए  अंतर्जाल अवकाश / ब्रह्मचर्य (व्रत) ले रखा था मगर शाम  आते आते  यह टूट  गया  है -ब्रह्मचर्य में शायद इसका टूटना ही  सदैव अन्तर्निहित   है .मगर बात इससे भी ज्यादा गंभीर है .कभी कभी अभिव्यक्ति के सरोकार ऐसे होते हैं कि ऐसे व्रतों का टूट जाना ही ठीक है .आज के अख़बारों में पद्म पुरस्कार/सम्मानों की घोषणा हुई है और मन व्यथित हो गया है .आमिर को पद्म भूषण और महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री जी  को मात्र पद्म श्री ?...और उन्होंने इसे यह कहकर ठुकरा दिया है कि यह उनका सम्मान नहीं बल्कि अपमान है .यह उन्होंने बिलकुल उचित ही  किया है .वैसे अगर वे इस सम्मान  को स्वीकार कर लेते तो यह सम्मान खुद सम्मानित हो उठता .मगर लगता है अब भारत का यह श्रेष्ठ सम्मान खुद अपना सम्मान खो चुका  है .

आखिर इस सम्मान के मानदंड क्या हैं ? क्या यह सचमुच राष्ट्रीय सम्मान के मापदंड पर खरा रह गया है ? ऐसा लगता है पद्म सम्मान अब राष्ट्रीय नहीं महज सरकारी सम्मान रह गये हैं .अँधा बांटे  रेवड़ी सरीखा ही. जिस पर सरकार ,पी एम ओ , कृपालु हो  उसने झटक लिया सम्मान -देश में काबिल योग्यतम चिकित्सक को कौन ढूंढें ,चलो प्रधान मंत्री का आपरेशन करने वाले को ही एक पद्म थमा दिया जाय . आश्चर्य है कि खोजने से भी भारत रत्न नहीं मिल रहे हैं -जबकि पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी वहीं है -चिराग तले अन्धेरा .आखिर क्या वे भारत रत्न के योग्य नहीं हैं ? क्या इसलिए कि वे कांग्रेसी नहीं हैं ? भारत में बहुत कम ऐसे होगें जिन्हें वास्तव में भारत के इस रत्न को "भारत रत्न " देना आपत्तिजनक लगे बाकी तो सब इस निर्णय को सर माथे रखेगें. कितना विवेकहीन है पद्म पुरस्कारों का निर्णय ! अब आमिर को पद्म विभूषण और रेखा को मात्र पद्म श्री ? क्या आधार है भैया इसका ? क्या आमिर रेखा से ज्यादा श्रेष्ठ  हैं ? उन्हें पद्म भूषण और रेखा को पद्म श्री से तो ऐसा ही लगता है -लेकिन क्या सिने प्रेमियों को भी यह निर्णय गले उतरता है ? समान और सम्माननीय प्रतिभाओं के साथ यह भेद भाव क्यों ? कहीं आमिर को  कांग्रेस पार्टी के  प्रचार तंत्र का ब्रांड अम्बेसडर बनाने की तो मंशा नही है ?

मुझे बराबर लगता रहा है कि पद्म पुरस्कार का भी तीव्र राजनीतिकरण होता गया है .कोई सुस्पष्ट और पारदर्शी चयन  प्रणाली नहीं रह गयी है .बस कुछ  योग्य लोगों के साथ तमाम अयोग्यों को इस  सम्मान (? )  की फेहरिस्त   में जोड़ लिया जाता है -यह भी ध्यान नहीं रखा जाता है कि किसे कौन सा सम्मान दिया जा रहा है .महाकवि शास्त्री जी के शिष्यों तक को पद्म श्री न जाने कब का मिल चुका और आज जब उन्हें पद्म समान दिए जाने की बात भी होती है तो आमिर को उनके ऊपर रख दिया जाता है .अब वे किसी पुरस्कार के मोहताज तो नहीं रहे मगर कम से कम उन्हें अपमानित तो मत करो महानुभावों!

अमेरिका में रह रहे अनिवासी भारतीय होटल व्यवसायी संत सिंह चटवाल सिंह को भी पद्म से विभूषित कर दिया गया . पहले ही घोषित अनिवासी भारतीय  नोबेल विजेता डॉ रामकृष्णन को अब सम्मानित करके आप क्या सन्देश देना चाहते हैं ?आज इस मुद्दे पर अपनी पीड़ा  आपसे बांटने को मन  हो आया और इन पुरस्कारों के चयन पर कम से कम एक उंगली मेरी भी उठे इस खातिर आज का अंतर्जाल ब्रहमचर्य  तोड़ कर यहाँ हाजिर हुआ हूँ! आप बताईये क्या आपके मन  में यह मुद्दा नहीं कौधा ?

सोमवार, 25 जनवरी 2010

कहीं यही तो सोम नही है?(वैदिक बूटी सोम ,सोमरस और सोमपान-2 ).....

सोम की सबसे प्रबल दावेदारी Robert Gordon Wasson द्वारा एक मशरूम के लिए की गयी जिन्होंने अमैनिटा मस्कैरिया को इसका सबसे उपयुक्त प्रत्याशी माना  .इसके बारे मे उन्होने बडे विस्तार से अपनी एक पुस्तक ,"Soma: Divine Mushroom of Immortality" मे लिखा है  .मशरूम की कुछ बेशकीमती प्रजातियों को सूअरों की मदद से जमीन के भीतर से खोद कर निकाला जाता है .मैं चौक सा गया जब अथर्ववेद में एक जगह सोम के बारे में मैंने  यह पढ़ा ," तुम्हे सूअरों ने खोद कर निकाला " .तो क्या कोई मशरूम ही तो सोम नहीं है ?इस पर हम विस्तार से आगे लिखेगें.

अमैनिटा मस्कैरिया:सोम की प्रबल दावेदारी 
मगर बहुतों को मशरूमों वाली वासन की बात कुछ हजम नही हुयी ,और एक आपत्तिजनक बात भी उन्होने वैदिक ऋचाओं के गलत [?]उद्धरण से कह डाली थी कि सोमा अनुष्ठान आयोजनों मे पुरोहितों के मूत्र का पान कर भी अनुयायी सोमरस का आनंद उठाते थे ,यह बात ऋग्वेद के गंभीर अध्येताओं को स्वीकार्य नही हुई  .फिर बात आयी गयी हो गयी .दूसरी प्रबल दावेदारी पेगैनम हर्मला नामक वनस्पति के लिए की गयी. मगर यह बात भी कुछ जमी नही और एक नया नाम उछाला गया -एफेड्रा का, जिसे आज भी आश्चर्यजनक रुप से ईरानी /फारसी लोगो मे होम [सोम?] के नाम से ही जाना जाता है .नेपाल मे इसे सोमलता के नाम से जाना जाता है .मगर भारत के अधिकांश हिस्सों मे यह कुदरती तौर पर नही पाया जाता .कुछ लोगों को आपत्ति है कि इसका प्रभाव वैसा नही है जैसा कि वेदों मे सोमपान  के लिए वर्णित है .हाँ यह ऐड्रीनलीन  सरीखे हारमोन का प्रभाव अवश्य उत्पन्न करता है .लिहाजा  असली सोम की खोज जारी रही और एक नयी दावेदारी हाल मे हुई है.

पुराणोक्त सोम के लिए यह नयी दावेदारी -यार -त्सा - गम्बू - एक फन्फूद [कवक] और एक किस्म के मोथ [पतंगे] का मिश्रित रुप है.तिब्बती बोल चाल मे यार त्सा गम्बू का मतलब है 'जाड़े मे कीडा और गर्मी मे पौधा ' .यह एक रोचक मामला है. होता यह है कि एक मोथ [पतंगा ]गर्मियों मे पहाडों पर अंडे देता है जिससे निकले भुनगे तरह तरह की वनस्पतियों की नरम जड़ों से अपना पोषण लेते हैं .इतनी ऊंचाई पर और कोई शरण न होने के कारण जाड़े से बचाव के उपक्रम मे ये भूमिगत हो जाते हैं और तभी इनमे से कुछ हतभाग्य एक फफूंद  प्रजाति की चपेट मे आ जाते है जो अब इन भुनगों से अपना पोषण लेते हैं .जाड़े भर यह परजीवी फफूंद   और अब तक मृत भुनगा जमीन के भीतर पड़े रहते हैं और मई माह तक बर्फ पिघलने के साथ ही फफूंद  की नयी कोपल मृत भुनगे के सिरसे फूटती है -यह विचित्र जीव -वनस्पति समन्वय ही स्थानीय लोगो के लिए यार सा गम्बू है .


यार सा   गैम्बू : सोम की नई दावेदारी


यार सा गम्बू से ही अब् व्यापारिक स्तर पर एक रसायन -कारडीसेप्स  का उत्पादन शुरू हो गया है जो बल-ओज ,पुरुसत्त्व और खिलाडियों की स्टेमिना बढाने मे कारगर है - इसकी कीमत प्रति किलो १.५ लाख है .यह तिब्बत और उत्तरांचल की पहाडियों खास कर पिथौरागढ़ मे मिल रहा है और अब तो इसकी कालाबाजारी भी हो रही है .कहीं यही तो सोम नही है ?खैर जो भी हो लगता यही है कि सोम की यह खोज अभी भी थमी नहीं है ............

रविवार, 24 जनवरी 2010

इस 'अदा' पर आखिर न हो जाय कौन फिदा .....(चिट्ठाकार चर्चा -२४)

आखिर सब्र का बाँध   आज  टूट ही गया .गए दिनों से ही यह सोच मन  पर तारी /भारी हो रही थी कि इस चिट्ठाकार यानि   स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा' को अपने इस ब्लॉग स्तम्भ में कब आहूत करुँ .आज उस विचार यज्ञ  में  समिधा की पूर्णाहुति हुई उन्ही की एक कविता से -मुलाहजा फरमाएं -


                                                                  स्वप्न मंजूषा 'शैल'


                                                                एक और अहल्या ....

 निस्तब्ध रात्रि की नीरवता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?
अरुणिमा की उज्ज्वलता सी पडी हूँ
कब आओगे ?
सघन वन की स्तब्धता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?
चन्द्र किरण की स्निग्धता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?
स्वप्न की स्वप्निलता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?
क्षितिज की अधीरता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?
सागर की गंभीरता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?
प्रार्थना की पवित्रता सी पड़ी हूँ
कब आओगे
हे राम ! तुमने एक अहल्या तो बचा लिया
एक और धरा की विवशता सी पड़ी हूँ
कब आओगे ?
 इस कविता से  मुझे वह आवश्यक स्फुरण  मिल गया जो चिट्ठाकार चर्चा के लिए जरूरी होता आया है .मैंने स्वप्न मंजूषा शैल की अप्रतिम प्रतिभा को उनकी कुछ उन कविताओं से पहचाना था जिनमें पौराणिक /मिथकीय पात्रों का चरित्र चित्रण  विशिष्ट वैयक्तिक स्टाईल में था और उन संदर्भों से जुड़े थे कुछ यक्ष प्रश्न  जो उनके द्वारा उठाये (उछाले नहीं !) गए थे-मिथक प्रसंग मुझे  सदैव  ललचाते है इसलिए मेरा उन कविताओं की ओर आकर्षित होना सहज ही था ..मुझे उन कविताओं में  एक विशिष्ट सा साहित्यिक बोध और मौलिकता का अहसास हुआ और मैंने  बाल वृद्ध अबला सबला और प्रबला तक  को भी प्रोत्साहित करने की अपनी स्वभावगत मजबूरी (जी हाँ, मैंने अपनी यह मजबूरी देर ही सही अब स्वीकार कर ली है ,आई कांट हेल्प इट ) के चलते उन्हें वैसी कविताओं के और प्रणयन तथा संग्रह प्रकाशन के लिए उत्साहित किया.वे तात्कालिक तौर पर उत्साहित दिखीं भी .मगर तब मैं यह तो जानता नहीं था कि वे एक बहुमुखी प्रतिभा की धनी व्यक्तित्व है इसलिए  वे जल्दी ही  दूसरे विषयों ,मधुर संगीत ,कविता पाठ  (निसंदेह वे समीर लाल जी  से बेहतर गाती हैं )  जैसे और भी सृजनात्मक कार्यों में व्यस्त  हो गयीं. हाँ ,इनके गायन और अल्पना वर्मा जी (हमारी वुड बी चिट्ठाकार मेहमान ) के गायन में कौन बाजी मारेगा -यह हम एक गुण ग्राहक श्रोता मंडल बनाकर निर्णय करेगें ,ऐसा मैंने कई बार सोचा है और इसलिए किसे नियमित सुना जाय इसे मुद्दे को अभी स्थगित कर रखा है .यह प्रतियोगिता  तब होगी जब दोनों जनों का एक साथ  भारत भूमि पर पदार्पण का मणि कांचन संयोग बनेगा और उन्हें निराला की 'राम की शक्ति पूजा ' को संगीत बद्ध करने और गाने का सम्मान  अता किया जायेगा .उस श्रोता मंडल के मुख्य श्रोता गिरिजेश जी होगें ,अन्य सदस्यों में हिमांशु ,अमरेन्द्र और मेरे अनुज मनोज भी होगें. मैं भी तन्मय होकर फ्लोर मैनेजर रहूँगा ही. फिर फैसला होगा -तब तक मैंने ब्लॉगजगत के किसी भी के स्वर श्रवण को मुल्तवी कर रखा है .

मुझे जब इस प्रतिभाशाली रचनाकार की मिथक -कवितायेँ लम्बे समय तक फिर नहीं  दिखीं तब मैं इसके /इनके प्रति थोडा उदासीन हो गया और इसी बीच मुझे अपने नायिका भेद श्रृंखला के लिए कुछ चित्रांकन की जरूरत आन पडी.... तो उदीयमान  ब्लॉगर वाणी शर्मा ने मुझे इन्ही के नाम की सिफारिश कर दी  .....मेरी दुविधा मुखर हुई -क्या वे कर सकेगीं ? वाणी जी एकदम कांफिडेंट -हाँ बिलकुल . फिर मेरा नियमित चैट शुरू हुआ इस जहीन व्यक्तित्व  से ....मैंने अपने जीवन के पचास से एकाधिक वर्षों के मृदु कम -कटु अधिक अनुभवों के आधार पर स्वप्न जी को आगाह किया कि मामला बहुत महीन भावों का है और हमें इस प्रोजेक्ट को प्रोफेसनली लेना है -यह कहकर दरअसल मैं खुद अपने कतिपय भावुकता जन्य आशंकाओं का लफडा -निवारण कर निश्चिंत हो जाना चाहता था .मगर हर्ष मिश्रित अनुभव यह हुआ कि स्वप्न जी ऐसे रचनात्मक प्रयासों को हैंडल करने में पूरी परिपक्व दिखीं और एक  प्रोफेसनल नियमितता  के साथ अपनी घोर व्यस्तताओं के बावजूद भी  मुझे यथावश्यक चित्रों को उपलब्ध   कराती रहीं -और मेरे नायिका भेद श्रृंखला के सकुशल पूरी होने में बराबर की सहयोगिता निभायी. कौन इस अहैतुक औदार्य के लिए तैयार होगा ?-और वह भी कोई भारतीय मना नारी ? इंगित विषय के लौकिक/अलौकिक  निहितार्थों के बावजूद भी ? मैं और मेरे कुछ मित्र (ईर्ष्यावश नाम नहीं दे रहा हूँ !)  इसलिए ही स्वप्न जी को 'मर्दानी ' नारी मानते हैं -और इस अभिव्यक्ति पर नारीवादी हो हल्ला  मचायें तो मचाएं!स्वप्न जी में लेश मात्र की रूग्ण  स्त्रैणता नहीं है ,भारतीय 'नारीत्व' का कोई  विह्वल दारुण्य  नहीं है ,दुहाई नहीं है  ..और और सबसे बढ़कर, नारीवाद को लेकर कोई व्यामोहित  आग्रह भी  नहीं हैं .वे बस अकादमीयता-श्रेष्ठ आदमीयता की प्रेमी हैं. 

आज फिर उनकी एक कविता में एक अभिशप्त मिथकीय नारी पात्र  बिलकुल एक नई भाव भूमि के साथ दिखी तो फिर  मैं अपने  चिट्ठाकार चर्चा स्तम्भ लेखन को रोक नहीं पाया -हिमांशु की कविताओं पर भी इसे भारी बता डाला जिससे  हिमांशु की काव्य प्रतिभा की एक फैन ब्लागर को  इत्तिफाक नहीं है . (हे भाई हिमांशु ,कहीं आप न बुरा मान लें!आप सचमुच अतुलनीय हैं अब किसी की बखान  के लिए आप के स्थापित प्रतिमान को तो लाघना ही होगा ) .

क्या लिखूं क्या छोड़ दूं ?  ...जीवन में घोर संघर्ष कर वे वतन से सात समुद्र पार गयीं हैं ,सेल्फ मेड हैं .दुनिया जहान के विशद  और विविध अनुभवों की थाती लिए हैं वे.....महज पांच माह में उन्होंने ब्लागिंग में अपना एक ठीहा बना लिया है -सही अर्थों में एक ब्लॉगर हैं -एक नियमित ब्लॉगर -कम से कम एक पोस्ट रोज इनकी आ  जाती है -गजब की औद्योगिकता है इनके लेखन में मगर मजाल क्या कि क्वालिटी में कोई फर्क आये .सभी समरस, कुछ तो सोमरस सरीखी भी .चित्रों का उनका चयन और संकलन तो बस ऐसा कि उन पर बस न्योछावर हुआ जा सकता है .कुछ पर तो हम भी मर मिटने से जरा सा ही बचे ...बच गए यही राहत है .कुछ अनुभवहीन मित्र तो बच भी नहीं पाए . आयिए   इस जहीन और जोरदार ब्लॉगर  को स्टैंडिंग ओवेशन दें -तालियों की गूँज /अनुगूंज से स्वागत करें! 

शनिवार, 23 जनवरी 2010

तस्मै सोमाय हविषा विधेम! (वैदिक बूटी सोम ,सोमरस और सोमपान ).....

सच है यह नई बोतल में पुरानी शराब ही है .हाँ पैकिंग और लेबलिंग में कुछ फ़र्क दिखेगा ,क्योंकि  ज़माना इसी का है . तो पहले थोड़ी आकर्षक पैकिंग और लेबलिंग हो जाय ,फिर तो वही पुराना सोमरस ही  है आकंठ पान के लिए .

पैकिंग और लेबलिंग हमारे आदि पुरखों ने जब प्रकृति को उसकी सम्पूर्णता में निहारा तो स्तब्ध सा हो रहा -जल नभ थल बिजली पहाड़ मेघ वर्षा आंधी तूफ़ान-घबराया सा वह घबराया सा लगा कुतूहल करने -कस्मै देवाय हविषा विधेम ?  यानि किस देवता का पूजन स्तवन करे वह? कोई एक तो हो ? उसने सब के सामने शीश झुकाना शुरू किया और इस क्रम में उसने एक चमत्कारिक जडी -बूटी को भी सर नवाया -तस्मै सोमाय हविषा विधेम! -आओं हम उसी सोम  का पूजन स्तवन करें ! किस सोम का ? आईये जाने तो -

  ऋग्वेद का एक पूरा (नवम) मंडल  इस रहस्यमयी औषधि /बूटी जडी /लता (????) को समर्पित है .   इस एक वनस्पति को देवता का दर्जा दे दिया गया है जहाँ इसकी प्रशंसा मे अनेक सूक्तियां कही गयी हैं.इसकी स्तुति मे बताया गया है कि कैसे इसके उपभोग से देवताओं के राजा इन्द्र मे इतनी ताकत आ जाती है कि वे असुरों की बड़ी से बड़ी सेना को भी परास्त कर देते हैं .सब देवता सोमरस के दीवाने हैं .इसके आकंठ पान के लिए अनुभवीऔर प्रशिक्षित ब्राह्मणों के द्वारा सोम अनुष्ठान का भी विधान वर्णित है ,मजे की बात है कि ईरानी धर्मग्रन्थ अवेस्ता मे यही सोम ,होम उच्चारित होता है .हम आज भी होम करते हैं और देवताओं को सोमरस की परम्परा मे कोई पेय अर्पित करते हैं -पंचगव्य आदि .मगर सोमरस वाली बात इसमे कहाँ ? आख़िर हम सोमरस का ही अर्पण/वितरण  आज के होम आदि अनुष्ठानों मे क्यों  नही करते ? मगर  हमे मालूम तो हो कि यह सोम है कौन सी बला (निवारिणी) बूटी ?  यह संशय रामायण युग मे भी है - राम-लक्ष्मन की प्राण रक्षा के लिए हनुमान हिमालय तक जाकर भी सोम (जो रामायण मे मृत संजीवनी के नाम से वर्णित है ) को जब नही पहचान पाते तो पूरा पर्वत ही उखाड़ लातेहैं।
ऐसी काव्य गाथा है! 


मशहूर ब्रितानी लेखक आल्दुअस हक्सले ने अपनी विश्व प्रसिद्ध कृति ब्रेव न्यू वर्ल्ड मे सोम का जमकर उल्लेख किया है -उपन्यास के पात्र तनाव टालने के लिए दनादन सोमा टैबलेट खाते हैं -मतलब सोमरस की परम्परा मे ही सोम टिकिया भी हक्सले के कल्पना लोक मे आ चुकी थी .उपन्यास के पढ़ने के साथ ही मैंने भी सोम बूटी की खोज करीब दो दशक पहले शुरू कर दी थी ,मगर अभी भी कामयाबी नही मिली है .आप मे से क्या कोई मेहरबानी कर मेरी मदद करेंगे? इधर कुछ और तथ्य प्रकाश में आये हैं जिन्हें मैं आपके साथ बाँटना चाहता हूँ .काश मुझे सोम कलश ही मिल जाता तो आप मित्रों में बाँट बाँट  कर मन  मुदित होता -यह देव दुर्लभ पेय जो है ! 


अध्ययनों से पता चलता है कि वैदिक काल के बाद यानी ईसा  के काफी पहले ही इस बूटी /वनस्पति की पहचान मुश्किल होती गयी .ऐसा भी कहा जाता है कि सोम[होम] अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मणों ने इसकी जानकारी आम लोगो को नही दी ,उसे अपने तक ही सीमित रखा और कालांतर मे ऐसे  अनुष्ठानी ब्राह्मणों की पीढी /परम्परा के लुप्त होने के साथ ही सोम की पह्चान भी मुश्किल होती  गयी .सोम को न पहचान पाने की विवशता की झलक रामायण युग मे भी है -हनुमान दो बार हिमालय जाते हैं ,एक बार राम और लक्ष्मण दोनो की मूर्छा पर और एक बार केवल लक्ष्मण की मूर्छा पर ,मगरसोम की पहचान न होने पर पूरा पर्वत ही उखाड़ लाते हैं: दोनो बार -लंका के सुषेण वैद्य ही असली सोम की पहचान कर पाते हैं यानी आम नर वानर इसकी पहचान मे असमर्थ हैं [वाल्मीकि रामायण,युद्धकाण्ड,७४ एवं १०१ वां सर्ग] सोम ही संजीवनी बूटी है यह ऋग्वेद के नवें 'सोम मंडल ' मे वर्णित सोम के गुणों से सहज ही समझा जा सकता है .


सोम अद्भुत स्फूर्तिदायक ,ओज वर्द्धक  तथा घावों को पलक झपकते ही भरने की क्षमता वाला है ,साथ ही अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति कराने वाला है .सोम के डंठलों को पत्थरों से कूट पीस कर तथा भेंड के ऊन की छननी से छान कर प्राप्त किये जाने वाले सोमरस के लिए इन्द्र,अग्नि ही नही और भी वैदिक देवता लालायित रहते हैं ,तभी तो पूरे विधान से होम [सोम] अनुष्ठान मे पुरोहित सबसे पहले इन देवताओं को सोमरस अर्पित करते थे , बाद मे प्रसाद के तौर पर लेकर खुद स्वयम भी तृप्त हो जाते थे .कहीं आज के 'होम'  भी  उसी परम्परा के स्मृति शेष तो नहीं  हैं?  पर आज तो सोमरस की जगह पंचामृत ने ले ली है जो सोम की प्रतीति भर है.कुछ परवर्ती  प्राचीन धर्मग्रंथों मे देवताओं को सोम न अर्पित कर पाने की विवशता स्वरुप वैकल्पिक पदार्थ अर्पित करने की  ग्लानि और क्षमा याचना की सूक्तियाँ भी हैं ।



मगर जिज्ञासु मानव के क्या कहने जिसने मानवता को सोम कलश अर्पित करने की ठान रखी है और उसकी खोज
मधु ,ईख के रस ,भांग ,गांजा ,अफीम,जिन्सेंग जैसे पादप कंदों -बिदारी कंद सरीखे आयुर्वेदिक औषधियों से कुछ खुम्बियो [मशरूमों ] तक आ पहुँची है.

 

क्रमशः  
 

बुधवार, 20 जनवरी 2010

वेटिंग लिस्ट वाले बैठे हैं ,तत्काल सेवा वाले चले जा रहे ....

बनारस का कल का तापक्रम ३.५  डिग्री तक ढुलक आया  ,इस हाड कपाऊँ ठण्ड में ३५ लोग अकाल मृत्य का वरण कर लिए . मित्रगण मुझे बसंत उत्सव पर आमंत्रित कर रहे हैं .उन्हें कह दिया भाई अभी तो ठण्ड के मारे बुरा हाल है कुछ राहत मिलेगी तो बसंत सेना का भी स्वागत करूँगा ..सुबह रजाई में ही दुबका  हुआ था कि मेरे लगोटिया यार और परिवारी चिकित्सक जार्जियन डॉ .राम आशीष वर्मा जी का फोन आ  गया. बस मित्र का हाल चाल पूंछने .कहने लगे मैं अपना बी पी जरा रोज चेक कराऊँ -मैं घबडाया -
"..मैं... मैं ..ठीक हूँ डाक्टर साहब ..बिलकुल ठीक हूँ ...हाँ ठण्ड बहुत लग रही है ..
.".इसलिए ही कह रहा हूँ " उन्होंने जोर दे कर कहा.
"ठण्ड और बी पी में भी  कोई सम्बन्ध है क्या डाक्टर साहब ? " मैं थोडा खीझा  ..
" ...कई लोग बिना टिकट कटाए चल दे रहे हैं .....इसलिए सावधानी जरूरी है ." कहते हुए वे हँस पड़े..
"मतलब?' ......मैं समझ नहीं पाया था इस बात का मर्म ...
"मतलब ये कि जाड़े में ही अधिकांश हर्ट अटैक और ब्रेन हैमरेज और उसके चलते लकवा /फालिज की घटनाएँ हो रही है और लोग बिना डाक्टर के पास आये.... मतलब  बिना  टिकट  कटा कर ही चल दे रहे हैं ...."

मुझे हंसी आ  गयी ..इस बात में भे डाक्टर साहब को हास्य सूझ रहा था ..यह एक भारतीय ही कर सकता है शायद ..जन्म  और  मृत्यु इन दोनों विपरीत मामलो  के लिए    भी मुक्त हास्य  यहीं भारत मे ही संभव है ....वे हँसते हंसाते मुझे यह पते की बात बता देंना चाहते थे कि मैं स्वास्थ्य के प्रति इस ठण्ड के मौसम में खास सतर्क रहूँ .और बी पी नियमित चैक कराता रहूँ . मनोज ने उन्हें  शायद बताया  है कि मैं इन दिनों ब्लागिंग में ज्यादा मुब्तिला रहता हूँ ..इसलिए भी  वे मेरे बी पी को लेकर  चिंतित हो उठे थे और आपने मनोविनोदी स्टाईल में मुझे आगाह करने को  फोन कर दिया था .

मैं उस समय तो उनकी टिकट कटाने के बात का उसी मनोविनोदी लहजे में जवाब नहीं दे सका था मगर बाद में कुछ बाते दिमाग में कुलबुलाने लगीं .डाक्टर साहब को चिंता थी उन लोगों की जो बिना टिकट कटाए ही परमधाम तक चले जा रहे हैं -मतलब अचानक बिना किसी तैयारी और पूर्व सूचना के ....अब डाक्टर साहब को मैं क्या बताता ........मैं अपने गाँव के ही कई ऐसे बूढ पुरनियों को देख रहा हूँ जो पिछले दस सालों से परमधाम एक्सप्रेस का टिकट कटाए हुए  सूर्य के उत्तरायण होनेका हर वर्ष इंतज़ार करते हैं मगर उनका टिकट ही कन्फर्म नही हो पा  रहा है . वे जाने को तन मन से तैयार हैं ..मैं जब भी उनसे मिलता हूँ यही कहते हैं ,'बचवा दौअववा यिहूँ सलिया नाई लयिग हमै  ..छोड़ दिहिस फिर एक साल नरक भोगे बिदा  ....." यही बात वे पिछले कई साल से कह रहे हैं और मैं उन्हें हर बार दिलासा देता हूँ कि नहीं अभी तो आप बिलकुल स्वस्थ दिखते हैं ..और आपके चाहने  से क्या होता है ,जब बुलावा आएगा तभी तो जाईयेगा ! और वे मेरी बात को सुनते हुए अविश्वास भरी नजरो से मुझे  देखते हैं ..मानो यह जज करना चाहते हों कि मैं सच कह रहा हूँ या झूंठ -अब मैं चूकि सच्चे मन  से उनके दीर्घायु वाली बात कहता हूँ इसलिए वे आश्वस्त होकर अगले वर्ष का इंतज़ार शुरू कर  कर देते हैं .

मगर लगता है इन दिनों परम धाम में भी तत्काल सेवा  शुरू हो गयी है -वेटिंग कन्फर्म  ही  नहीं हो रही है कुछ लोग बाग तत्काल सेवा का लाभ लेकर परम धाम को चल दे रहे हैं -डाक्टर साहब ऐसे लोगों की ही ओर इशारा कर रहे थे....क्या करियेगा यह ठण्ड ही ऐसी है ...इसमें कहीं जाने वाने की जरूरत नहीं है और न ही हिम्मत है -तत्काल सेवा किस लिए है ? जरूरी होगा तो नियोक्ता खुद ही तत्काल सुविधा से बुला भेजेगा .

तब तक मैं आराम करता हूँ ,रजाई में दुबकता हूँ  ..मानव ऊष्मा का उपभोग करते हुए रात काटने के लिए .अगर जरूरत पडी तो .कल बी  पी भी चैक करा लूँगा!
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सोमवार, 18 जनवरी 2010

अपनी जड़ों को जानने की छटपटाहट आखिर किसे नहीं होती ?

अपनी जड़ों को जानने की  छटपटाहट की एक बानगी यहाँ देखी जा सकती है. हमारा उदगम कहाँ  हुआ ? हम कौन हैं और कहाँ से आये? किसी भी जिज्ञासु मन को ये सवाल  मथते  हैं तो यह सहज है .मगर ऐसे अंतर्द्वंद्व  बहुत व्यग्र  भी करते हैं -इसलिए ही 'सबसे भले वे मूढ़ जिन्हें न व्यापहि जगत गति ....' खुद पर तरस आता है कि  हम उस कटेगरी के मूढ़ न हुए ...होते तो दिन रात  की राहत तो होती .मैं इतिहास का विद्यार्थी नहीं रहा मगर जो रहे हैं उनकी इन विषयों में अरुचि देखकर खुद के  इतिहास 'विद ' न होने का मलाल भी नही  है .मेरी शिक्षा दीक्षा चूंकि विज्ञान पद्धति में है इसलिए सामान्य (निर्गमनात्मक ) तर्क  ,विश्लेषण का सहारा लेकर भारतीय परिप्रेक्ष्य की अब तक की कुछ बेतरह उलझी गुत्थियों को सुलझाने का मैं भी बाल प्रयास करता रहा हूँ -यह बात दीगर है कि जितना एक सिरा सुलझाता  रहता हूँ दूसरा उलझता जाता है और बार बार के प्रयासों के बाद भी कुछ  हासिल नहीं हो पाता .ऐसी ही एक गुत्थी है सैन्धव सभ्यता और आर्यों का उनसे सम्बन्ध. 

सैन्धव -आर्य गुत्थी को सुलझाने की दिशा में मेरे पास जो नवीनतम तथ्य है वह है जीनोग्राफी अध्ययन -जिसके सहारे मनुष्य के आदि प्रवासों की जानकारी और भ्रमण पथ की खोज बीन चल रही है .मैंने अपनी खुद की जीनोग्राफी कराई तो पता लगा कि मेरे और ईरानियों के जीन में बहुत साम्य है . ईरानियों के धरम ग्रन्थ अवेस्ता और हमारे ऋग्वेद में अद्भुत साम्य है .लेकिन अभी हम जीनोग्रैफी की ही बात करें .इस अध्ययन से यह पुष्ट हो चुका है कि भारत  भूमि पर पहला अफ्रीकी मानवी जत्था केरल के समुद्र तट की ओर से  आया था ,३५ -४० हजार वर्ष पहले .मान्यता है कि इसके पहले यह धरती मानवों से रहित थी (कुछ मेरी व्यक्तिगत शंकाएं है यहाँ मगर मैं मौन होता हूँ इसलिए कि मेरे पास इसके उलट कोई प्रमाण नहीं है फिलहाल .) स्पष्ट है ये पहले आदि वासी थे भारत भूमि के .....और हजारो  साल बेधड़क निर्द्वंद्व यहाँ घूमते रहे ,अक्षत संसाधनों का उपभोग करते रहे.

३०- ३५ हजार साल मनुष्य सरीखी मेधा के लिए बहुत है ....मेरी जोरदार अनुभूति है कि यही काले  मूलस्थानी हमारी अग्रतर सभ्यताओं के आदि जनक हैं .एक सुदीर्घ कालावधि में  ये दक्षिण तक  ही सीमित तो नहीं रहे होगें -दायें और ऊपर भी फैले होगें -दायीं ओर तो ये आस्ट्रेलिया तक जा पहुंचे ...जीन प्रमाण मौजूद हैं  .ऊपर उत्तर भारत को भी इन्होने आबाद किया ही होगा .बहुत समय था उनके पास , अथाह संसाधन ,फुरसत का समय .....हिम युग से भी यह भू क्षेत्र उतना संतप्त नहीं था ....लिहाजा कुछ ऐसा हुआ कि एक सांस्कृतिक  विकास  की निर्झरिणी सिन्धु नदी के आस पास बह चली होगी ..तब  तक के जैवीय विकास से  अलग हट कर कोई १५-२० हजार वर्ष पहले ! बुद्धिजीवियों, क्या यह सैन्धव सभ्यता थी ? 




यहाँ तक तो ठीक है .मुश्किल इसके आगे है .क्या ये लोग राज्य विस्तार हेतु आगे बढे? मतलब ऊपर की ओर अपना साम्राज्य विस्तार करने या कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि दस हजार वर्ष पहले  हिमयुग का संघात कम होने पर युरेशियाई उन मानव समूहों का दस्ता जो पहले ही अफ्रीका के थल मार्ग से वहां ऊपर तक पहुँच चुका था आगे बढा ? या  हमारे ये मूल उत्तर (आदि)वासी आगे बढे हों या फिर और भी उत्तर से आया  दस्ता इनकी ओर बढा हो -एकजोरदार भिडंत / मुठभेड़ हुई होगी!बुद्धिजीवियों,क्या यही तो देवासुर संग्राम की स्मृति  शेष/मिथक   मुठभेड़ नहीं है ? क्या  कैस्पियन सागर तो समुद्र मंथन का स्थल नहीं बना ? ये 'वाईल्ड ईमैनिजेशन ' ही हैं -कहिये कि प्राक्कल्पना मात्र ! मगर हाँ एक ढांचा जरूर रूपाकार  हो सकता है, अगर हम बिखरी कड़ियों को जोड़ते रहें ..शायद तस्वीर साफ़ होती जाय .....निश्चित रूप से भारत भूमि आज की भौगोलिक सीमाओं में नहीं सीमित हुई थी ....मगर यह सही है कि यह ऊपरी भूभाग ही  "रक्त  मिश्रण"- वस्तुतः जीन मिश्रण  की एक बड़ी जीती जागती मैदानी प्रयोगशाला बनती रही . आगे भी यहाँ  मुठभेड़ें जारी रहीं .मगर यहाँ से ही संस्कृति और उसके अवयवों -साहित्य, ज्ञान आदि सभी का प्रसार ईरान अरब यूनान आदि तक होता रहा है .कौन नहीं ,शक, हूंड, चंगेज खान हर किसी की टोली यहाँ आती रही और अपना जीन समावेशन करती  रही है -अब तक के जेनेटिक अध्ययन  यही बताते हैं .

अब कुछ और 'वाईल्ड ईमैजिनेशन' -राम रावण युद्ध! यहाँ के विशुद्ध रक्ती आदि मूल स्थानियों से मिश्रित वर्णी "आर्य ' लोगों की मुठभेड़ जो दक्षिण में जाकर संपन्न हुई ...राम का सावला होना मिश्रित जीन अभिव्यक्ति का द्योतक है .लक्ष्मण  गोरे इंगित हुए हैं.रावण के बाद सम्राट राम हैं जो धुर दक्षिण तक जाने में सफल हो पाए  .रावण -महा विशाल कज्जल गिरि जैसा ! वह काले रंग का मूलस्थानी है मगर वेदों का ज्ञाता ,महापंडित -बिलकुल शुद्ध रक्त वाला . मूल सैन्धव सभ्यता का प्रतिनिधि  . कोई आश्चर्य नहीं वह उत्तर से ही दक्षिण तक जाकर पहला अखिल भारतीय साम्राज्य  स्थापित कर पाया हो और कालांतर में उत्तर तक आ आ कर लोगों से टैक्स आदि लेता रहा हो . इसलिए लोकमन में अपनी अत्याचारी अनाचारी छवि बनाता  चला गया हो .....राक्षस बन गया हो . रक्ष संस्कृति का अग्रदूत .....

शंकर तो खैर धुर उत्तर के ही हैं शुद्ध रक्त वाले -कर्पूर गौरम .....राम उनके सरंक्षण में हैं और रावण भी .अनेक पुराख्यान इस संभावना की पुष्टि में हैं .बाद का महाभारत तो उत्तर के ही कुनबों में लड़ा गया ....
आईये एक और अंतर्मंथन करें ....शायद धुंधलका कुछ स्पष्ट हो सके ........और हाँ मेरी बातें बचकानी लगती हों तो विज्ञजन मेरी इस अनाधिकार चेष्ठा को मुस्कुरा कर उपेक्षित कर दें पर एक और महाभारत को  जन्म न दें प्लीज ..हम पहले से ही काफी संतप्त हैं .....

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

कटी भी और लुटी भी नहीं ..कैसी किस्मत है इस पतंग की?

कल बनारस में भी जमकर पतंगबाजी हुई .वो मारा , ये काटा ,वो पकड़ा जैसी आदिम सी किलकारियों और हुन्करणों से वातावरण गुंजायमान होता रहा और मुझे भी बचपन की यादों में बार बार सराबोर करता रहा .मगर वे उल्लास और उमंग  की यादें  नहीं थीं, कुछ कारुणिक थीं  ....कारुणिक इसलिए कि मैं बचपन में कभी  भी पतंग उड़ा पाने में कामयाब नहीं हो पाया था ..और हर बार की मकर संक्रांति मेरी  उस असफलता ग्रंथि को कुरेद कर आहत कर जाती है .वैसे उस बाल्य पराजय के पीछे उन हिदायतों का भी बहुत बड़ा योगदान था जो पुच्छल्ले की तरह हमेशा मेरे साथ लगी रहती थीं कि अच्छे बच्चे (प्रकारांतर से अच्छे घर के बच्चे ) पतंग वतंग नहीं   उड़ाते ...लेकिन मैं आज समझता हूँ ऐसी निषेधात्मकता बच्चों में एक तरह से हीनता बोध को ही जन्म देती हैं .उनके आत्मविश्वास को क्षीण करती है . पतंगबाजी निश्चित ही एक व्यसन है और उस स्तर तक की संलिप्तता को अवश्य संयमित किया जाना चाहिए -मगर इन स्वयंस्फूर्त खेलों का  पूर्ण निषेध कतई उचित नहीं है .बचपन के कुछ ऐसे ही अवसर आत्मविश्वास की नींव  डालते हैं  और जीवन भर के आत्मविश्वास को  डावाडोल  भी कर जाते हैं . अब  यह तो मैं नहीं कहूँगा कि पतंग न उड़ा  पाने की असफलता को जीवन के उत्तरवर्ती तमाम "परफार्मेंस की असफलताओं " से जोड़ा जाय .मगर बाल मनोविज्ञान के विकास और कालांतर के जीवन  में इन घटनाओं के  प्रभावों से इनकार  भी नहीं किया जा सकता .

अब ऐसा बचपन और कैशोर्य भी क्या कि पतंग की पेंगें न बढ सकें और उनकी  डोरें न डाली /खींची जा सकें -मुझे  याद है कि उन दिनों जब  हम पतंग संधान में असफल होकर  भी  किशोरावस्था की दहलीज तक आ गए थे तभी एक महान साहित्य सामने से गुजरा था -गुलशन नंदा की " कटी पतंग " जो हिन्दी के लुगदी  साहित्य ( घटिया किस्म की  लुगदी से तैयार कागज़ पर छपने वाला साहित्य ) के इतिहास में एक मील का पत्थर बन गया था ...किताब तो मैंने नहीं पढी मगर उसकी चर्चाओं से ही मन  भर जाता रहा ...जल्दी ही एक फ़िल्म भी बन गयी इस थीम पर ..वही कटी  पतंग ...अब ये गाना भी क्या उसी फ़िल्म  का ही तो नहीं है ? ..ना कोई तरंग है .ना कोई उमंग है ..मेरी जिन्दगी भी क्या बस एक .कटी पतंग है  ! मुझे तो लगता है कटी पतंग का हिन्दी साहित्य और लालित्य में योगदान विश्व के किसी भी अन्य  भाषा के साहित्य में दुर्लभ है .कितने ही किशोरों -युवाओं के व्यक्तित्व और चरित्र निर्माण में इस साहित्य ने अभूतपूर्व योगदान दिया है -मतलब मेरे समकालीन लगभग सभी ब्लॉगरान  इस साहित्य के अवगाहन से निश्चित ही उपकृत हुए हैं , मैं थोडा कम ही उपकृत हो पाया क्योंकि मुझे जासूसी उपन्यासों का चस्का था और  रूमानी उपन्यास फूटी कौड़ी नहीं सुहाते थे -हो सकता है कि इसकी जड़ें मेरी पतंग न उड़ा पाने की असफलता से जुडी रही हो .यह वही दौर था जब कुछ प्रेमी जोड़ें  गृहत्याग कर जाते थे और इन घटनाओं के भाष्यकार यह कह पड़ते थे कि  यह सब बस  कटी पतंग साहित्य की ही देन  है .लो एक और बेचारी लडकी कहीं कटी पतंग न बन जाय. अब पतंग और कटी पतंग  साहित्य से एक 'कुलीन परिवार' के मेरे जैसे किशोर का कोई ख़ास नाता न बन पाने के करण मेरी यह समझ में ही नहीं आता था कि आखिर मानव जिन्दगी का कटी पतंग से तुलना का अर्थ क्या है ? शायद पिता जी ने भी तभी भांप लिया था कि मुझमें साहित्यिक समझ बिलकुल शून्य है और इसलिए उन्होंने मुझे विज्ञान में दाखिला दिला दिया .मगर विडम्बना यह रही  कि विज्ञान में  दाखिले के बाद से ही  मुझमें वह साहित्यक समझ न जाने कहाँ से आने लगी जो कटी पतंग और मानव जिन्दगी के अंतर्सम्बंधों/रूपकों   को जोडती थी. और दुर्भाग्य से यह सिलसिला तब से थमा नहीं और आज भी रह रह मुझे आपने बाल्य और किशोर जीवन की गैर जीवन्तता की कचोट भरी याद दिलाता रहता है .

अब कल ही देखिये कि मुझे रास्ते में एक कटी मगर बिना लुटी पतंग दिख गयी और मन  फिर से खिन्न होकर इनके साहित्यिक  निहितार्थों को ढूँढने लगा .एक तो बिचारी कटी पतंग और तिस पर भी दुर्भाग्य यह कि वह लुटी भी नहीं .सहसा मन  हुआ कि जा कर मैं खुद उठा लूँ -मगर फिर बचपन का निषेध हठात भारी हो आया मन पर .....अच्छे बच्चे ...कदम अकस्मात रुक गए ! मैं यह सोचने  लग गया कि गुलशनी साहित्य में तो इस अवस्था का जिक्र नहीं है ..बस कटी पतंग तक की ही नियति वर्णित है वहां ..मगर यहाँ  तो कटने के बाद भी नियति की क्रूरता बरकरार है -बिचारी कट भी गयी और किसी हाथों का सहारा भी नहीं मिला इसको -कैसी हतभाग्य है यह ? लुटी ही नहीं ! अगर लुट भी गयी होती तो कम से कम एक /कुछ सहारा तो मिल गया होता ....कटी भी और लुटी भी नहीं ..कैसी किस्मत है इस पतंग की ! मन  अवसाद ग्रस्त हो चला...इससे तो लाख गुना अच्छी पतंगें वे हैं जो न कटती हैं और न लुटती हैं बस एक डोर से ही बंधी रह जाती हैं . मन में साहित्य के कई ऐसे ही रूप और उपमा विधान कौंधते रहे ....और मैं वापस घर की ओर लौट पड़ा ..

                                                       यादें, कुछ बचपन की कुछ पचपन की 
..
अब सोचता हूँ कि उस अनलुटी पतंग को मैं ही उठा लिया होता .. अनलुटी   थी इसलिए फटी चुथीं भी कहाँ  थी !  ...न जाने अब  किसकी हाथों में पड़ जाय .. जब अनलुटी  रह गयी है तो उसका चार्म तो अभी भी  बरकरार ही है ....और अब तो मैं बच्चा भी नहीं रहा और न ही कोई रोकने वाला कि .
अच्छे बच्चे ऐसा नहीं करते ......

रविवार, 10 जनवरी 2010

सुर असुर का झमेला ,हल्की होती जेब -ब्लागिंग जो भी न कराये ....

कडाके की ठण्ड पड़ रही है इधर इस  पूर्वांचल में भी .....देवताओं के लिए घर में ही आधुनिक सुरा -ब्रांड, ब्रांडी को कंठस्थ करने के वाजिब बहाने का मौसम है यह ...सुर असुर की पिछली पोस्ट पर अनुराग जी ने हड़का लिया कि कुछ पढ़ वढ   कर लिखा करिए -बात लग गयी ....घरेलू  बजट के लिए  'ईयरमार्क' रूपयों में से घरनी को बिना बताये चुपके से १ हजार निकाल कर (आगे देखा जायेगा... ) कल पहुँच ही तो गया बनारस की चौक स्थित इंडोलोजी पर मशहूर किताबों की मोतीलाल बनारसीदास की दूकान पर -तीन किताबें खरीद ही तो ली  ! आर्थर एंटोनी मैकडोनेल की   'अ वैदिक रीडर फार स्टुडेंट्स '(आक्सफोर्ड प्रकाशन ) ,डॉ राजबली पाण्डेय की हिन्दू धर्मकोश  (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान ) और  डॉ उषा पुरी विद्यावाचस्पति की भारतीय मिथक कोश. (नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली )

....और इस सप्ताहांत के एकांतवास  में जुट गया इन किताबों का अवगाहन करने -खासकर सुर असुर की उत्पत्ति  और उनके सुरापान आदि प्रसंगों के प्रामाणिक संदर्भ खोजने ,और जितना पढता गया मामला सुलझने के बजाय  उलझता ही गया है. ईरानियों/पारसियों  के धर्मग्रन्थ अवेस्ता और भारतीय ऋग्वेद में बहुत समानता है जिसके आधार पर मैकडोनेल भारत में आये आर्यों का  उदगम  इरान को मानते है -अपनी उक्त पुस्तक में उन्होंने बहुत सी रोचक बातों का इशारा किया है -उन्होंने राक्षसों के बारे में लिखा है कि उनकी दो कोटियाँ वर्णित हुई हैं -एक देवलोक (आकाशीय ) देवताओं की दुश्मन है तो दूसरी धरती वासियों मतलब मनुष्य की .देवताओं के दुश्मनों को  असुर भी कहा  गया है . अवेस्ता में ये असुर जो अहुर (स  को ह का संबोधन !) कहे गए हैं अलौकिक प्राणी ( डिवायिन बीइंग ) हैं -स्पष्ट है धरती का न होने के कारण ही ये अलौकिक है .जब हम दैव प्रकोप कहते हैं तो शायद इशारा इन असुरों की ओर भी होता हो .अब जो निचली श्रेणी के असुर हैं उनमें राक्षस ,यातुधान (जातुधान ) और सबसे क्रूरकर्मी  पिशाच रहे हैं जो नरमांस खाने वाले हैं -रामयुग के राक्षसों में ऋषि मुनियों के मांस भक्षी यही राक्षस थे जिनका समूल नाश श्री राम ने किया ,ज्ञात हो राम आर्य वंश के प्रतिनिधि हैं .   एक लम्बे चले युद्ध में कही भारत भूमि के मूल निवासियों जिन्हें अनार्य ,दस्यु ,दास तक कहा गया है और जो काले थे   (आश्चर्य है राम भी सावले हैं ) के  समूल नाश का उपक्रम तो   नहीं  किया गया था ? .ये तथ्य जितना तो समाधान नहीं देते उससे कहीं अधिक प्रश्न उठा देते हैं ..बहरहाल यह चर्चा फिर कभी ....
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बात सुरापान की चल रही थी .इस पर डॉ. राजबली पाण्डेय ने भी रामायण से ही एक श्लोक का उद्धरण दिया  है -
सुराप्रति ग्रहाद देवाः सुरा इत्यभि विश्रुताः 
अप्रतिग्रहणात्तस्या दैतेयाश्चासुरा  स्मृताः
अर्थात सुरा =मादक  तत्वों का उपयोग करने के कारण देवता लोग सुर कहलाये ,किन्तु ऐसा न  करने से दैतेय  लोग असुर कहलाये .
यहाँ भी देखिये -
असुरास्तेन दैतेयाः सुरास्तेनादिते : सुताः
हृष्टाः प्रमुदिताश्चासन वारूणीग्रहणात सुराः

सुरा से रहित होने के कारण ही दैत्य " असुर " कहलाये
और सुरा सेवन के कारण ही अदिति के पुत्रों को सुर संज्ञा मिली
वारूणी (सुरा की देवी ) को ग्रहण करने से देवता हर्ष से उत्फुल्ल एवं आनंदमय  हो गए
बालकाण्ड पञ्चचत्वारिन्शः  ...सर्गः ,श्लोक ३८ ,
गीता प्रेस
देवों के शत्रु होने के कारण असुरों को दुष्ट दैत्य कहा गया मगर सामान्यतः वे दुष्ट नहीं थे .वे विद्याधरों की कोटि में भी आते थे   -परम विद्वान् शुक्राचार्य उनके गुरु थे  जो विद्वता में देवताओं के गुरु बृहस्पति से किसी भी तरह कमतर नहीं थे. भगवान् कृष्ण ने गीता में खुद को कविनाम उसना कविः कहा है -यानि कवियों में मैं शुक्राचार्य हूँ ,बृहस्पति नहीं! हाँ असुर रहस्यमयी पेय सोम जो केवल धार्मिक अनुष्ठानों में पिया जाता था और सुरा जो अन्न के किण्वन से बनती  थी का सेवन नहीं करते थे.कुछ और भले पीते रहे हों .ये पेय केवल सुर यानि देवताओं  के लिए ही संरक्षित था . इंद्र तो सोमपान करके इतने ओजस्वी हो जाते थे कि भयानक दैत्यों का संहार कर डालते थे.सबसे भयंकर वृत्रासुर का संहार उन्होंने सोमपान करके ही किया था .मगर आश्चर्य है कि इंद्र  अवेस्ता में देव /दैत्य /दानव (demon) रूप में वर्णित  है -हमारे यहाँ देवताओं का राजा होकर भी इंद्र को नीच कर्मों में लिप्त दिखलाया  गया है -रामचरित मानस में राम के मुंह से इंद्र को कुत्ता तक कहा गया  है .कृष्ण से तो इनकी तकरार ही हुई है  .जाहिर है राम और कृष्ण के धुर विरोधी भी हैं इंद्र . कहीं हमारे ग्रंथों में इंद्र के इस दानवी स्वरुप की प्रच्छाया अवेस्ता से तो नहीं आई है ? अवेस्ता में वर्णित दैत्यतुल्य इंद्र कैसे परवर्ती देश काल ,भारत भूमि में देवताओं के राजा बन बैठे यह एक पहेली से कम नहीं है जिसमें मनुष्य के इतिहास पुराण की कोई लुप्त कड़ी आज भी उत्खनन की बाट जोह रही है .....

कहाँ सोमपान और कहाँ अब की ये सुराएँ? कौन लगाएगा हाथ इन्हें ? ?


पोस्ट लम्बी हो चुकी है ,बाकी चर्चा फिर कभी ........

शनिवार, 9 जनवरी 2010

.....और ये हैं , युवा चिट्ठा चर्चाकार पंकज मिश्रा (चिट्ठाकार चर्चा )

अब तो जेहन में चिट्ठाकार चर्चा के लिए कई नामचीन नाम मन  में उभरते रहते हैं ,मगर अब दुविधा या धर्मसंकट कह लीजिये यह फैसला अंतिम रूप से नहीं हो पाता कि उन संज्ञा स्वरुप सर्वनामों में से किसे तत्काल चुन लूं किसे छोड़ दूं? वही आदिम दुविधा कि कस्मै देवाय हविषा विधेम ? कुछ तो बार बार मनाही करते रहते हैं ,भाई साहब /अरविन्द जी /सुनिए जी  मेरी चर्चा कहीं मत कर दीजिएगा  ...और उनके वाजिब तर्क होते हैं इस निषेध के ...कुछ आत्म प्रचार नहीं चाहते ,कुछ को डर होता है कि कहीं ये महानुभाव उन बातों को न कह दे जिन्हें किसी भावुक से कमजोर (?)  से क्षणों में इनसे कहा  गया था ...और ब्लॉग जगत चौक पड़े कि यह गोपनीय बात तो केवल मुझे पता थी इनकी या अमुक अमुक ब्लॉगर की ...अच्छा तो ये महानुभाव भी जानते हैं यह सब   ....मतलब डबल क्रास(अब इतना भी विश्वास नहीं रहा  मुझमें !).. कुछ  का कहना है कि इस स्तम्भ के चिट्ठाकार से मैं खुद जो अपनी तुलनात्मक व्याख्या करने  लगता  हूँ (क्या सचमुच ?)वह स्टाईल ठीक/पसंद  नहीं लगती है उन्हें!

और मैं अनिर्णय की स्थिति में पहुंच  जाता हूँ -ऐसे ही निर्णय अनिर्णय के दौर से गुजरते हुए अचानक एक नाम कौंध उठा ...पंकज मिश्र ..मतलब बगल में छोरा ..नगर में ढिढोरा ....जी हाँ अपने युवा हिन्दी चिट्ठाकार ..और अहसास रिश्तों के बनने बिगड़ने का ,ब्लॉग के स्वामी और ताऊ की शिष्य परम्परा के एक हजारवें एक शिष्य! इनका एक अंगरेजी ब्लॉग भी है.
पंकज मिश्र उन अनेक युवा (नारी समाहित ) आई सी टी एक्सपर्ट समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनके मन  में  जीवन  में कुछ कर गुजरने का जज्बा है ,उनके सामने बड़ी कठिनाईयां है ,सामाजिक और पेशागत दोनों तरह की, मगर वे हार मानने  वालों में से नहीं है ...एक न एक दिन यह जालिम ज़माना इनके अवदानों को पहचानेगा और उसे मान्यता  देगा ही ...या वे खुद अपनी मान्यताये चुन ही  लेगें ..देर सबेर ...किसी संजय दत्त से कमतर नहीं ...


जिस समुदाय की नुमायन्दगी पंकज करते हैं वह  उत्साह और ऊर्जा से लबरेज वह जमात है जिनसे आज का हिन्दी ब्लागजगत भी धन्य हो रहा है ...और सच कहूं तो प्रकारांतर से हिन्दी भाषा और साहित्य भी धन्य हो रहा  है ...इन टेक्नोलोजी विशेषज्ञों का व्याकरणीय भाषाई ज्ञान भाषा  पंडितों(यहाँ  कौन और कितने हैं ? ) जैसा तो नहीं है पर अपनी बात कहने की पूरी क्षमता है इनमें  ...और वे जो भी  कहते हैं बेलौस कहते हैं -शायद इसलिए भी कि वे उन पुरायटों के मानिंद नहीं है जिन्हें दुनियादारी आ चुकी है और जो मन  माफिक, जैसा माहौल  देखते हैं वैसा ही बोलते हैं (आखिर कर दी खुद से न तुलना ?) ..मेरे वे प्रिय दोस्त सच ही  कहते हैं ....सचमुच  यह बुरी आदत है  मुझमें ! अब चूंकि इनका मन  साफ़ है इसलिए इनमें उचित अनुचित का विवेक अभी जागृत है -कहीं कुछ भी अनुचित सा होते या ज्यादती होती देखते हैं तो फिरंट हो जाते हैं ....मगर पंकज मिश्र ने तो महीनों धैर्य रखा ....आप सब को शायद पता नहीं है ये करीब दो बरसों तक लगातार हिन्दी के  ब्लॉग पढ़ते आ  रहे थे ..किस ब्लॉग और ब्लॉगर को नहीं जानते ये ...वो क्या कहते हैं न ..सब के आई पी नंबर तक इनकी वेब डायरी में मौजूद है ...मतलब राम झरोखे बैठ कर सबका मुजरा लेत वाली कहावत इन्होने पूरी तरह यहाँ  चरितार्थ किया ..बीच बीच में मुझे बताते भी रहते ,भाई साहब, यह आपने देखा ..वो देखा ..यह तो ठीक नहीं है या फलाने की दादागीरी तो अब नाकाबिले बर्दाश्त हो चली है ...और मैं बार बार इनसे कहता कि भाई दूर से तमाशा मत देखिये ..यहाँ आईये और सक्रिय होईये ....और ये महानुभाव सलाह तो मुझसे लेते रहे और प्रेरणा ताऊ से पाते रहे और एक दिन अवतरित हो ही गए ब्लागजगत में ..उस दिन मौसम जरूर सुहावना ही रहा होगा ....इनकी जन्म कुण्डली से गत्यात्मक ज्योतिष वाली संगीता जी बता सकती है उस दिन के मौसम के बारे में ...मैं मानकर चलता  हूँ वह दिन ही रहा होगा और सुहावना भी ......

महानुभाव अवतरित भी हुए तो सीधे चिट्ठाचर्चा लेकर ...सहसा तो मुझे एक गवईं कहावत याद हो आई -बिच्छी क मन्त्र न जानई और कीरा (सांप ) क बिल  में उंगली डालई ....मगर इन्होने तो पूरे अजगर के मुंह में या कहिये कि कालिया नाग के मुंह में अंगुली ही नहीं पूरी हथेली डाल दी थी ...मैं स्तब्ध  सा ,चमत्कृत सा यह नई बाल कृष्ण लीला देखने तटष्ठ हो लिया(मतलब यमुना तट पर पहुँच लिया ) ...ब्लॉग यमुना तीरे अब एक  कलयुगी कालिया मर्दन शुरू हो चुका था ..जिसका केवल  आंखमूदें विनयावनत हो पूजन स्तवन किया जा सकता था जो मैं बदस्तूर कर रहा हूँ ...चिट्ठा चर्चा की मोनोपोली टूटी ....जो एक ऐतिहासिक क्षण था ....और जो अकल्पनीय सा लग रहा था उसे छोटू उस्ताद ने कर दिखाया ....यह  अभ्युत्थानाय धर्मस्य का ही यह एक और प्रगटन था .....और हिन्दी ब्लॉग जगत में साम्यवाद की घोषणा रूपी   लहर का प्रस्फुटन .....ईहाँ न  पक्षपात कछू राखऊ की स्थापना ....स्थापित हो चुके चिट्ठाचर्चा में आ चुकी समयानुकूल बुरायियों के विरुद्ध एक प्रतिक्रया स्वरुप चर्चा हिन्दी चिट्ठो की का अभ्युदय हुआ और लोगों ने इसे हाथो हाथ लिया .....यह पंकज मिश्रा का ब्लागजगत में धमाकेदार आगमन था ....

पंकज  संवेदन शील है मगर  रिएक्टिव भी हैं  -एक वह वृत्ति जिसे स्थापित समाज हिकारत की नजर से देखता है -बच्चू अभी जुमा जुमा कुछ साल ही हुए दुनिया में आये और ऐसा मिजाज ? चलो आगे सब आंटे दाल का भाव मालूम हो जायेगा ...मगर वो कहते हैं न ...लीक छोड़ तीनो चले शायर सिंह सपूत ..तो आज के अपने चिट्ठाकार चर्चा के नायक इसी परम्परा के हैं और कोई भी मुगालते में न रहे ..वे एकला चलो रे के भी अनुयायी हैं ...वे वो हैं  जिसकी चर्चा भी इन दिनों ब्लॉग जगत में अन्यत्र चल रही है -सिंहों के नहीं लेहड़े ....कुछ ऐसे ही शेरे दिल हैं पंकज ..आईये उनका स्वागत करें ..

.पर्दा उठता है ...........






गुरुवार, 7 जनवरी 2010

मन का ट्रांसप्लांट!

न जाने क्यूं नए वर्ष की पूर्व संध्यां से मन  बहुत क्लांत ,खिन्न खिन्न सा है -बेबस, व्यग्र और अधीर सा -गुस्साया हुआ सब पर और खुद पर भी. सुबह ही अचानक एक ब्लॉग मित्र से चैट पर ही कह बैठा -मैं निजात चाहता हूँ इस बेहूदे मन से जो इन दिनों हर वक्त भुनभुनाया हुआ है परायों से ही नहीं अपनों से भी -क्या इसका ट्रांसप्लांट नहीं कराया  जा सकता ? मित्र भौचक! हा हा हा .दैया रे! अब क्या मन  का भी ट्रांसप्लांट होगा ?क्यूं  नहीं ? अगर मन  ऐसा सोच सकता है तो ऐसा हो भी सकता है. आखिर मैं सोचता  हूँ तो इसका मतलब ही  है कि मैं हूँ ,मेरा वजूद है. तो अगर मन ऐसा सोचता है कि उसका ट्रांसप्लांट हो सकता है तो क्यूं नहीं हो सकता -चलिए आज नहीं तो कल होगा और कल नहीं तो परसों होगा ,परसों नहीं तो नरसों..होगा जरूर -आखिर ययाति ने जब अपने बेटे से जवानी उधार ले ली और खूब जीभर कर जवानी जी भी ली तो यह भी  तो  कुछ ऐसा ही मामला है. अब जब भेजा तंग करने लगे तो उसे गोली थोड़े ही मार दी जायेगी -खालिस और भोंडे बालीवुड   स्टाईल में-गोली मारो भेजे में भेजा तंग करता है -हाऊ फुलिश! ये कोई  मानवीय तरीका है समस्या से निजात का ..हाँ मन  जब बहुत उधम करे तो दुष्ट का ट्रांसप्लांट ही क्यूं  न करा लो. मुफीद ,निरापद तरीका लगे हैं यह मुझे !

मगर फिर किसका मन ट्रांसप्लांट के लिए निरापद होगा ? शर्तियाँ किसी मासूम से बच्चे का ..मगर मैं वो लेने सा रहा ,अब इतना स्वार्थी और अमानवीय भी नहीं है मेरा मन  कि किसी मासूम का भविष्य ही खराब हो जाय .फिर किसी नारी का ? चल सकता है क्योंकि कहते हैं नारियों का मन बहुत सुकोमल होता है -यहाँ ब्लागजगत में भी कईं हैं न  -बिलकुल सच्ची -नो पन -आपकी कसम. हाँ नारीवादी मन न हो -बहुत डर लगता है ऐसे मन का और न जाने मेरे तन का भी वह क्या हाल कर डाले ....मगर ऐसी मनफेक कौन होगी नारी यहाँ सभी तो मुझसे खार खाए बैठी हैं -भला  वे क्यों देने लगी अपना मन  मुझे -कुछ पा  जायं ठांव कुठाँव तो भुरकुस बना डालें मेरे मन तन का -तो वहां से पूरी ना  उम्मीदी ही है ...फिर पुरुष मनों पर मन  जाता है तो कई नादान दिखते हैं और कई दानेदार भी हैं .वे देने को भी तैयार हो सकते हैं मगर मेरा मन ही उनका ट्रांसप्लांट नहीं चाहता दुष्ट -सहसा ही श्रेष्टता बोध से ग्रस्त हो उठता है -कहता है जो भी हैं उनसे तो मैं खुद ही हर हाल में अच्छा हूँ .तब आखिर हे दुष्ट तुम्हे कैसा मन  चाहिए जल्दी से बोल और मेरी जिन्दगी को और नारकीय मत बना!

तूने मुझे कहाँ फंसा दिया ..न ब्लोगिंग छोड़ने दे रहा है और न वह करने जो करने मैं यहाँ आया था ..जहां हरी घांसे हैं वहां कोई घास नहीं डाल रहा ...जहां बियाबान है वहां गधे तू जाना नहीं चाहता. आखिर क्या चाहता है तू बोल दे आज -सुना है इस ब्लागजगत में बहुत सहृदय भी हैं तेरी मनसा पूरी कर देगें -अपना मन  देकर तेरा पीछा तुझसे छुडा देगें -पर बेअक्ल तूं कहा जायेगा ? तुझ सड़े गले गलीज को तो कोई लेने को तैयार नहीं होगा.  चलो अपने किसी वैज्ञानिक मित्र से बात करते हूँ वे तुम्हे तबतक किसी जीवन दायक घोल में रखेगें जब तक तूं फिर तरोताजा ,नया सा नहीं हो जाता जैसा तूं चालीस वर्ष पहले हुआ करता था -उमंगों ,चाहतों से लबरेज .दुनिया को बदल डालने के जज्बे से भरा हुआ -प्राणी  मात्र से प्रेम की आकांक्षा लिए हुए ...
अब तो तू बिलकुल दुष्ट हो चुका है -सारा ब्लागजगत भी तुझे शरारती मान चुका है -इसलिए अब तूं छोड़ साथ मेरा और यह सोच किसके मन से तुझे ट्रांसप्लांट करुँ -जल्दी कर ,ढूंढ ढांढ बता दे -फिर उससे निगोशिएट किया जाय -हो सकता है बात बन ही जाय .

सोमवार, 4 जनवरी 2010

कौन बताएगा पहली लाईन का अर्थ .......समर शेष है!

 कौन बताएगा पहली लाईन का अर्थ .......
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

कितनी अच्छी बात है दिनकर समग्र की चर्चा हो रही है दिनकर विशेषज्ञों द्वारा ब्लागजगत में ...मैंने तो  कहीं दिनकर की उक्त  बहुउद्धृत  पंक्ति ही फिर से उद्धृत कर दी थी -कई बार कह चुका हूँ ,फिर दुहराता  हूँ कि साहित्य  की मेरी समझ अधकचरी है और ज्ञान पल्लवग्राही -मैं साहित्य के अलिफ़ बे का भी विद्यार्थी नहीं हो पाया और यह दुःख मुझे जीवन भर सालता रहेगा.बस विद्वानों की सोहबत का दुर्व्यसन न जाने से कहाँ से छूत सा लग गया मुझे ...बहरहाल ....

 मैंने तो  दूसरी पंक्ति को ही साभिप्राय उद्धृत  करना चाहा था मगर पहली लाईन भी काफी अर्थबोधक है इसलिए उसे भी साथ ले लेने का लोभ छोड़ नहीं पाया .यानी यह लाईन -
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध!
मगर इसका अर्थ क्या है ? यह दिनकर विशेषज्ञ ही बता सकते हैं अपने बूते का तो नहीं .इसलिए दिनकर व्याख्यान पर ये टिप्पणी चेप आया हूँ -
"अब लगे हाथ  दिनकर स्पेशलिष्ट पहली वाली लाईन का मतलब भी  बता दें ....
तो शागिर्दगी कर लूँगा नहीं तो ...अब खुदैं फैसला कर लें अपने बारे में अब कुंजी वुन्जी मत देखियेगा भाई लोग.... यह ब्रीच आफ ट्रस्ट नहीं ब्लाग्वर्ल्ड में ..(..शागिर्दगी का मतलब जीवन भर टिप्पणी करता रहूँगा ऐसे विद्वान् की पोस्ट   पर जो इसका सटीक अर्थ बता देगा -मूल टिप्पणी में नहीं है यह वाक्य . )
नीचे क  सरल लाईन क व्याख्याकार और भाष्यकार कौनो कम नहीं हैं ,यानी बहुत हैं
मगर असली तेजाबी परीक्षा त  ई लाईन में है -
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध!"

-पूरी कविता पढनी चाहें तो यहाँ मौजूद है .तो भैया कौनो है सरस्वती क लाल या दिनकर साहित्य विद्वान् जो इस दिनकरी ढाई आखर का अर्थ बता दे .....
मुझे इंतज़ार रहेगा .......

रविवार, 3 जनवरी 2010

असुर हैं वे जो सुरापान नहीं करते!

पहले यह अनुरोध : इस आलेख को पढने के पहले कृपया यह और यह  आलेख पढ़ कर आईये -थोडा समय देना  होगा  जिज्ञासु जनों को ...
तस्लीम पर जाकिर ने यह वैज्ञानिक सलाह क्या दी कुछ बिचारे सकते में आ  गए ...अवसाद में डूबते भये! और तत्काल मेरी परदुखकातरता जागृत हुई -ये दुष्ट इंस्टिंक्ट अक्सर लफड़े में फंसाती है मुझे .....मन ढाढस बढ़ाने को हो आया उन सभी कातर जनों  की , जिन बिचारों  की ये वैज्ञानिक गण अक्सर अपनी ऊँट पटांग सलाहों से  ऐसी की तैसी करते रहते हैं ....अब ये भी कोई सीख है कि ठंडक में सुरापान न करो -अरे इस ठंडक में आखिर तन को गरम करने का सात्विक तरीका है क्या ? पुरातन नुस्खा है - सुरा ......और शराब....अब  सुरा तो नहीं छूट सकती ....और  तिवारी जी वाला तरीका कितना असात्विक है न ?.....और अनैतिक भी ..कहाँ कहाँ के कैसे कैसे लोग छिः ..... न जान न पहचान ....अब ऐसे थोड़े ही ..उबकाई भी आती है ..और तीसरा आप्शन शराब ,.....न बाबा  न ये भी फालतू की चीज  है ,हाथ नहीं लगाते....और मैं चिंतन ग्रस्त हो गया ....

किसी ने कहा कि आप नाहक ही पचड़े में पड़ते हैं ...कोयले की दलाली में अक्सर हाथ काले हो जाते हैं... हर मामले में टांग मत अडाया कीजिये -अपने नादान दोस्तों के चक्कर में कितना बदनाम होगें -यी जाकिर भाई को आप क्यों इतना तवज्जो  दे रहे हैं -तस्लीम पर उनकी उस पोस्ट को जरा इस्लाम के नजरिये से तो देखिये -एक छुपे अजेंडे के रूप में वे शराब को न छूने की हिदायत ही तो दे रहे हैं और वह भी वैज्ञानिकों के हवाले से ....मैं स्तब्ध ..क्या क्या सोच जाते हैं लोग ..मगर एक बात पर मुझे ज़ाकिर पर गुस्सा भी आई -लोगों के जीवन के बेहतर क्षणों में  आखिर वाट लगाने का उनका क्या हक़ बनता है ? इस जाड़े पाले में अब लोगों से  एक सात्विक व्यसन को  भी छीन लिया जाय -बात कुछ बनी नहीं! मैंने उन्हें फोन करके अपनी नाराजगी व्यक्त  कर दी .....समीरलाल  जी भी कुछ कह गये हैं.. जरूरी भी हैं  यह ..बच्चे ज्यादा उधम मचायें  तो डांटना जरूरी है -दो बच्चे बिचारे  कहीं और डांट दिए गए हैं ....  और दो दिन से बिना दाना पानी मुंह गिराए उदास से बैठे हैं ....विज्ञ जन समझ गए होगें !

बहरहाल बात मुद्दे की कर ली जाय, भूमिका लम्बी हो गयी .ज़ाकिर की पोस्ट पर अपने गिरिजेश भैया जाकर टीप आये कि मैं कौनो शोध कर रहा हूँ ....सुरा पर ..अब कर तो नहीं रहा था मगर ऊ उकसाए तो आज इतवार का लाभ उठाते हुए कर ही डाला ..... मालूम हुआ कि सचमुच असुर हैं वे जो सुरापान नहीं करते! और सुर वे जो सुरापान करते हैं ! अब इतना तो समझता ही होगा यह बाल...जगत (ओह सारी ये जीभ भी ....जाड़े में लड़बड़ा  सी रही है ) मतलब ब्लॉग जगत  कि सुर माने देवता और असुर माने राक्षस ....तो जो सुरापान (मतलब उत्कृष्ट मादक पेय, हौली वाली गुटखा नहीं ) करे वो देवता है और जो उसे (पाए)  बिना रह जाय वह राक्षस....हाँ यह प्रामाणिक ज्ञान है जो शोध के उपरान्त हासिल हुआ है ....और आप से साझा किये बिना नहीं रहा जा रहा...स्रोत है वाल्मीकि रामायण ......बालकाण्ड का पैतालीसवां सर्ग .....श्लोक संख्या ३६ से ३८ ,प्रसंग समुद्र मंथन.

विश्वामित्र राम लक्ष्मण को कुछ वेद पुराण सुना रहे हैं और उसी के तहत समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों के बारे बताते हुए कहते हैं ....
असुरास्तेंन दैतेयाः   सुरास्तेनादितेह सुताः 
हृष्टा: प्रमुदिताश्चासन वारुणीग्रह्नात सुराः (३८)
('सुरा से रहित होने के कारण ही दैत्य 'असुर ' कहलाये 
और सुरा-सेवन के कारण ही अदिति के पुत्रों की 'सुर' संज्ञा हुई.
वारुणी को   ग्रहण करने से देवतालोग हर्ष से उत्फुल्ल एवं आनंदमग्न हो गए )

इसके पहले और बाद के दो श्लोकों में समुद्रमंथन से वरुण की कन्या वारुणी "जो सुरा की अभिमानिनी देवी थी"
के प्रगट होने और दैत्यों द्वारा उसे ग्रहण न करने और देवों द्वारा इन अनिनद्य सुन्दरी को ग्रहण करने का उल्लेख है....
तो अब हमें कोई रोके टोके न..... हम सुर हैं,देवता है और  धरती के सुर -भूसुर अर्थात ब्राह्मण तो बेरोक टोक सुरापान करे -हमारा शास्त्र  इसकी खुली  अनुमति देता है .यह वृत्तांत भी संदर्भित किया जाता है -बिना पढ़े मत कहीं और जाईयेगा.






शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

टिप्पणियों का जलजला और एक माडरेटर का धर्मसंकट ...

सबसे पहले आप सभी मित्रों को ,सुधी पाठकों को नववर्ष की मंगल कामनाएं! यह वर्ष आप सभी के लिए और हिन्दी ब्लॉग जगत के लिए नव हर्ष ,नव उत्कर्ष ,नित नव विमर्श लेकर आये! मगर क्या नव वर्ष सचममुच एकदम  से पूरा खलास ही हो गया ?-बोले तो डेड इंड! मथुरा कलौनी जी का विचार कुछ और हैं!अपने ब्लॉग कच्चा चिट्ठा पर वे लिखते हैं-
"सब लोग पीछे देख रहे हैं। लेखा जोखा कर रहे हैं कि इस गुजरते साल में क्या क्या हुआ। कौन सी फिल्म हिट रही। कौन सी हीरोइन सेक्सी रही। यह सब हमें ऐसे बताया जा रहा है जैसे कि दिसंबर के जाते न जाते उस हीरोइन की सेक्स अपील समाप्त हो जायेगी। तो हमने भी साहब पीछे देखना शुरू किया......"(आगे आप वहीं पढ़ लें!.)..गया वर्ष भी एक तरह का हैंग ओवर होता है जो यकबयक नहीं धीरे  धीरे जाता है ...कभी कभी तो ऐसा भी गुजर जाता है कुछ कि यह लम्बे समय तक टीसता जाता है ,स्मृति  कोशाओं में रच बस सा जाता है जैसे किसी परम मित्र का किया गया विश्वासघात ,किसी की स्तब्ध कर देने वाली कृतघ्नता ..कहाँ जल्दी भूलती हैं सब -ऐसी दुखद यादों ,समय के घावों के लिए भी चाहिए किसी का स्नेहिल सानिध्य ,घाव पूज जाए ऐसा आत्मीय संस्पर्श .....या फिर कोई ऐसा अभिन्न जिससे दुःख का साझा किया जा सके ....ऐसा किसी का न मिलना भी एक बड़ा दुःख है .. कासे कहूं पीर जिया की माई रे ......मगर हम ब्लॉगर तो बहुत खुशनसीब हैं ,यहाँ कोई न कोई ही नहीं बहुतेरे हैं  जो दुःख दर्द बाँट सकते  है -बिना किसी 'सेकेण्ड थाट' के,बिना किसी प्रत्युपकार की भावना के ....और मुझे ऐसा ही अनुभव हुआ और जबरदस्त हुआ. मैंने व्यग्र और अपमानित क्या महसूस किया मित्रगण आ गए ढाढस देने ,दुःख बाटने -यह सचमुच एक नई दुनिया के वजूद का अहसास दिलाने वाला है -यह पुरानी दुनिया सरीखा नहीं है जहाँ संवेदनाएं तेजी से लुप्त हो रही हैं ,भाईचारा मिट रहा है .....किसी को दूसरे के दुखदर्द से कोई मतलब नहीं रह गया है -मगर यह नई दुनिया तो बिलकुल बदली बदली सी है -शायद नए और पुराने का फ़र्क भी यही है ....इस नई दुनिया का रोमांच तो बस अनुभव ही किया जा सकता है ,पूरी तरह  शायद शब्दों में व्यक्त करना  संभव भी नहीं है ....

मगर इस दुनिया में भी हैं तो उसी दुनिया से  आये लोग ..तो अभी भी कुछ पुरानापन सा भी तारी है ...और पुरानी आदते भीं हैं जो जायेगीं मगर गए साल की तरह नहीं, बस जाते जाते जायेगीं. ...यहाँ  भी है फालतू संकोच ,कुछ कुछ नवाबी नफासत ,कुछ श्रेष्ठता बोध ,व्यामोह जनित  भाव विह्वलता ,अनावश्यक तटस्थता , परले दर्जे की निहसन्गता, हेकड़ी दिखाता हीनता बोध ,सनसनीखेजप्रियता ,थोड़ी टुच्चई ,थोड़ी लुच्चई भी ..और यह सहज है -यह  हमारी पुरानी दुनिया का प्रतिविम्बन है.इन सब वृत्तियों की झलक आपको इस ब्लॉग की ठीक पिछली पोस्ट की टिप्पणियों में मिल जायेगीं .और उसी अनुभव ने मुझे यह पोस्ट लिखने  को मानो विवश सा कर दिया है -

यह पिछले वर्ष का हैंगोवर सरीखा सा ही कुछ है! मैंने थोडा अपमान क्या  महसूस किया , मित्रों की ऐसी गलबहियां मिली कि दुख दर्द जाता रहा - भावनाओं का आवेग टिप्पणियों के रूप में ऐसा घनघोर बरसता रहा कि मुझे एकाध बार लगा जैसे मैं कोई उस खाली रूट का स्टेशन मास्टर होऊँ जहां किसी अन्य रूट  पर दुर्घटना के चलते सारी ट्रैफिक मोड दी गयी हो और  दनादन ट्रेने धडधडाती चली आ  रही हैं  -किसे हरी झंडी दिखाऊं  और किसे लाल -एकाध बार लगा कि यह विवेक भी जाता रहा है इस प्रेशर के चलते ....लगा कि अब बड़ी दुर्घटना हुई या तब और निर्णय भी तुरंत ही लेना था क्योंकि पीछे का ट्रैफिक ठांठे मार रहा था ....उसी क्षण वो कहावत भी याद आई कि मासूम दोस्त से दानेदार दुश्मन अच्छा होता है. बात अपने मासूम मित्र महफूज की है जिनसे अभी जुमा जुमा चंद रोज की दोस्ती  है मगर लगे है बन्दा यारो का यार है ...उनकी अकेले २३ टिप्पणियाँ डिलीट की मैंने .....बाप रे क्या थीं वे ,पूरी की  पूरी  न्यूट्रान बम ....ऐसी है नादाँ दोस्तों की सोहबत .....मेरे बाबा जी अक्सर कहते थे....बच्चों की दोस्ती ढेलों की सनसनाहट ....मगर फिर भी नाज है महफूज आप पर मुझे ..यदि इतनी टिप्पणियाँ मैंने किसी नामचीन की मिटाई होती तो बन्दा  तूं तूं मैं मैं पर उत्तर आता ...,मगर बच्चू ने उफ़ तक नहीं कि ...वैसे उफ़ तो शायद समीर भाई और आदरणीय ज्ञानदत्त जी सर ने भी न की हो जिनकी टिप्पणियाँ भी मैंने न चाहते हए भी जी कड़ा कर डिलीट किया और केवल इसलिए कि समीर जी ने टिप्पणी  के नाम पर केवल एक आह्वान चेप दिया था जो इन दिनों वे सार्थक रूप से चहुँ ओर ज्ञापित कर  रहे हैं  और ज्ञानदत्त  जी ने सुमन टाईप 'नाईस' लिख कर प्रकरण से अपनी निहसंगता दिखला दी  थी ..अब यह क्या कहना  पड़ेगा कि जब बड़ों से नीर क्षीर करने की अपेक्षा  हो तो वे केवल मानसरोवर के तट से ही वापस क्यों हो लें ? यह तो वही दृश्य हुआ जब विदेशी आक्रान्ता भारत भूमि पर आक्रमण दर आक्रमण कर रहे थे तो महात्मा बुद्ध के अनुयायी बुद्धम शरणं गच्छ का नारा लगाते तटस्थ हो वन विचरण करने लग गए थे -किसी भी सरोकार से कटे,बिलकुल  अलग थलग -ऐसे में तो भारत को गुलाम बन ही जाना  था .और दुर्भाग्य से वह  बना भी......कुछ रोमांच प्रेमी मुझसे चैट कर , ईमेल भेज शाबाशी देने में लग गए कि अरे वाह आपकी तो टी आर पी बढी  जा रही है ......वह कितना दुखद क्षण था मेरे लिये ....यह टिप्पणियों की भूख क्या इतनी टुच्ची हो गयी है ? हम गलत सही मौके का विवेक खो बैठे हैं ? क्या ब्लागजगत में रहने का मतलब केवल टिप्पणियाँ पाना रह गया है ?

जागो ब्लागरों जागो ......इक दूसरे ज्ञान जी की जितनी टिप्पणियाँ प्रकाशित हुईं है उससे थोडा ही कम रिजेक्ट भी -कारण उन्होंने मेरे दुःख के साथ खुद के दुःख का तादात्म्य बना  लिया था ! आज सोचता हूँ अगर उस दिन माडरेशन न हुआ रहता तो क्या होता -सोच कर ही रूहं सी कांप जाती है! मगर मैं प्रकाशित सभी टिप्पणियों को एक सहज स्वयंस्फूर्त प्रवाह मानता हूँ और इस दृष्टि  से उचित भी -हमें उन कारणों को देखना होगा कि टिप्पणियों का वह सैलाब, वह जलजला आखिर आया क्यों ?
और हम कई छोटे बड़े भाई बंधुओं ,मित्रों से साग्रह अनुरोध करते हैं कि कृपाकर वे न्यायाधीश न बने ...ब्लागजगत का कोई न्यायाधीश अभी चुना नहीं गया और न्याय ही देखना हो तो आईये पुरानी दुनियां में वहां एक न्याय व्यवस्था पहले से ही वजूद में है ....यहाँ कौन कितना अच्छा है कौन कितना बुरा ? ढिढोरा पीटने की  क्या जरूरत है ...?..

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