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गुरुवार, 7 मार्च 2013

फागुनी अहसास को जगाता एक कविता संग्रह!

सुनीता शानू जी के नए कविता -संग्रह 'मन पखेरू उड़ चला फिर ' की मानार्थ प्रति मिली तो शीर्षक ने मन में बहुत उमड़ घुमड़ मचाया। अभी तक तो प्राण पखेरू का रूढ़ प्रयोग हिन्दी में दुखद संदर्भों में  आया है मगर यहाँ  मन पखेरू के उड़ने के सर्वथा नए प्रयोग ने चौका सा दिया . यहाँ मन का पखेरू शरीर के प्रतिबंधों से दूर उन्मुक्त विचरण के लिए उड़ चला है .बंधनों से चिर आजादी का यह भाव और इस नए बिम्ब प्रयोग को स्वीकार करने में कोई असहजता संग्रह को पढ़ने के  बाद  नहीं बची थी  . किताबों की समीक्षार्थ/ मानार्थ प्रतियाँ मिलने पर मैं उन्हें आदतन तुरंत नहीं पढता बल्कि अपनी स्टडी मेज या फिर ड्राईंग/लिविंग कक्ष की मेज (यहाँ राबर्ट्सगंज में टू इन वन या इन आल इन वन ही कहिये ) पर छोड़ कई दिन निहारता रहता हूँ . फिर बहुत ही अहतराम से उठा पढने में मुब्तिला हो उठता हूँ . अभी कल ही संग्रह की अंतिम कविता तक पहुंचा  हूँ .

कविता संग्रह बहुत ही मौके से मिला है मुझे -फागुनी बयारों के बीच फागुनी कविताओं ने कहर ही ढा दिया है समझिये :-) .मैंने अपने मन को गहरे स्पर्श कर गयी एक कविता को फेसबुक पर भी शेयर किया . देखिये मैं हिन्दी साहित्य का मनई तो हूँ नहीं तो मुझे समीक्षा कर्म वगैरह आता नहीं और उसके प्रतिमानों और अनुशासनों से सर्वथा अनभिज्ञ भी  हूँ इसलिए इसे कृति की समीक्षा न माना जाय .यह एक सुहृद के प्रति मेरी कृतज्ञता ज्ञापन का बस विनम्र उपक्रम भर है -सुनीता शानू जी से विगत वर्ष मेरी भेंट  लखनऊ के ब्लॉगर परिकल्पना दशक सम्मान में हुयी थी -उनकी विनम्रता, सहजता,सरलता ने क्षणों में ही अपरिचय की औपचारिकताओं को छू मंतर कर दिया था . तब मुझे यह बिल्कुल भान नहीं था कि मैं एक उदीयमान प्रतिभाशाली कवयित्री के चंद घंटों के सानिध्य में मैं हूँ-वे दिल्ली लौटीं और फिर उनकी स्मृति उनकी फागुनी कविताओं के साथ सहसा लौट आयी हैं .
मन पखेरू का मूल स्वर उन्मुक्तता/जड़ बंधनों से आज़ादी का तो हैं मगर डोर को पूरी तरह से स्वच्छंद छोड़ देने की हिमायती भी कवयित्री नहीं है। उनकी कविता डोर की अंतिम पंक्तियां यही तो कहती हैं - 'सच है डोर से बंधी होती तो पूरा न सही होता उसका भी अपना एक आकाश' ...संग्रह की आख़िरी कई कविताओं ने ख़ास प्रभावित किया जो  मेरी अपनी पसंद है -कवयित्री या प्रकाशक/सम्पादक ने कविताओं के चयन क्रम को अपने ढंग से रखा होगा . आनंद कृष्ण जी की इस पुस्तक से सम्बन्धित समीक्षा संग्रह के शुरू में ही है और यह इतनी सम्पूर्ण है कि उसके बाद किसी के लिए भी समीक्षा के लिए कुछ  बचता ही नहीं . उन्हें इस संग्रह  की कविताओं में एक संभावनाशील कवयित्री की पदचाप सुनायी दी है और मैं उनसे सहमत हुए बिना नहीं रह सकता . सुनीता जी ने प्रेम की सघन अनुभूतियों की ही अभिव्यक्ति नहीं की है बल्कि कई सामाजिक विडंबनाओं को भी सटीक उकेरा है -इस लिहाज से कन्यादान, ऐ कामवाली,माँ   रचनाएं बहुत सशक्त बन पडी है . संग्रह की सबसे बड़ी खासियत है कविताओं का अपने पाठकों से सहज संवाद -इन कविताओं में अमूर्तता नहीं है,निर्वैयक्तिकता नहीं है.  जीवन के पल प्रतिपल के अनुभवों से लबरेज हैं ये कवितायें!
 कृति 
हिन्द -युग्म ने बहुत सलीके से और एक स्लीक लुक के साथ इस कविता संग्रह को प्रकाशित किया है -प्रशंसा के मेरे दो शब्द प्रकाशक के लिए भी हैं। मुझे एक लम्बे समय बाद एक कविता संग्रह ऐसा मिला है जिसकी अधिकाँश कविताओं ने मुझसे सहज संवाद किया है। अंत में वो फेसबुक वाली कविता आपको पढ़ाना चाहता हूँ-

खामोशी
आँखों ने आँखों से
कह दिया सब कुछ
मगर जुबां खामोश रही

जब दिल ने
दिल की सुनी आवाज
धड़कन खामोश रही
तुम्हारे प्यार की
खुशबू से तृप्त
उठती गिरती साँसे देख
पलकें खामोश रहीं
कृतिकार 
और वहां मेरा कमेन्ट था- सारे पहरेदार या तो मौकाए वारदात पर सोये रहे या गुनाह के खामोश भागीदार हुए। :-)  सुनीता शानू जी को उनके प्रथम कविता संग्रह के प्रकाशन पर बहुत बहुत बधाई!

शुक्रवार, 15 जून 2012

ग़ज़ल गायकी के लीजेंड का यूँ चले जाना...


यह तब की बात है जब मैं एक स्नातक छात्र था .यानी १९७६ के आस पास .मेरे चाचा जी उन्ही दिनों फेलोशिप पर जर्मनी जा रहे थे तो एक पैनासोनिक का टेप रिकार्डर घर पर दे गए जिसे उन्होंने दिल्ली में खरीदा था .उन दिनों टेपरिकार्डर गाँव के लिए एक अजूबा था .अब टेपरिकार्डर जैसा आवाज का एक अजूबा और नया 'बाईस्कोप' मिल जाय तो फिर क्या कहना ..गवईं लोगों की आवाजें टेप की जातीं और फिर उनको सुना देने पर वे भौचक रह जाते ..रेडिओ एक कोने में उपेक्षित हो गया और टेप रिकार्डर की करामातें चल पडीं ..उन्ही दिनों पिता जी मेहदी हसन की चंद चुनिन्दा ग़ज़लों का पालीडोर कंपनी का ओरिजिनल कैसेट घर ले आये थे ..और दिन रात वह बजता था .....मैं उससे बेफिक्र था .मुझे मेहदी हसन के बारे में कुछ पता नहीं था ..
पिता जी ने सबसे पहले इस अजीम शख्सियत और पाकिस्तानी फनकार से मेरा परिचय कराया था ..पकिस्तान में कुछ अच्छा भी हो सकता है उसकी यह पहली मिसाल थी ...पिता जी ने कहा कि देखो मेहदी हसन कितने अलग अंदाज़ में दिले नादां तुझे हुआ क्या है गाते हैं. मैंने मिर्ज़ा ग़ालिब की यह ग़ज़ल दूसरे फनकारों को गाते हुए सुनी थी .मेहदी हसन की आवाज़ में यह बिलकुल अलग क्लासिकी तरीके से गाई हुयी लगी .....और सच बताऊँ पहली बार तो ख़राब सा लगा मेहदी साहब से यह ग़ज़ल सुनना ..मगर ज्यों ज्यों सुनता गया ..उसकी तासीर गहन होती गई और आज तो यह ग़ज़ल किसी और की गाई अच्छी ही नहीं लगती ..
आगे तो मेहदी साहब जैसे जीवन का एक हिस्सा ही बनते गए .. जैसे एक मजेदार  याद है जब मैं मुम्बई में दो सालाना विभागीय ट्रेनिंग पर था तो वहां पहली बार सांख्यिकी पर एक पूरे पेपर की तैयारी करनी थी ..मुझे सांख्यिकी के सिद्धांत मेहदी हसन साहब की ग़ज़लों की तासीर लिए लगते थे ...और मैंने उनकी ऐसी ब्लेंडिंग तैयार की कि उधर सांख्यिकी के  कोई चैप्टर पर पढाई चलती तो उस्ताद की कोई न कोई ग़ज़ल पार्श्व में बजती रहती थी और साथी मुझे इनका दीवाना सिरफिरा क्या क्या न कहते थे -आखिर में जब नतीजा आया तो सैद्धांतिक सांख्यिकी में मुझे सर्वोच्च स्थान मिला था ..आप भी यह फार्मूला अपना सकते हैं :)

मेहदी हसन सरीखे फनकार को सुनने समझने पसंद करने का एक प्रोटोकोल है .उनकी आवाज़ और अंदाज़ तथा हुनर की बारीकियों को पसंद करने के लिए उनकी गायकी में तनिक समय जाया करना होगा ..उसे शुरू शुरू में पेशेंस के साथ / सकून से सुनना होगा -यह एक सीखने का सबब है .एक क्लास है जहां आपको मन लगाना है .आप पायेगें धीरे धीरे आप इनकी गायकी में रूचि लेने लगे हैं और फिर यह तासीर बढ़ती ही जायेगी ...मेहदी हसन को पसंद करने के लिए पहले आपके मस्तिष्क के कुछ तंतुओं को संवेदित होना होगा अगर वह इलाका पूरी तरह निष्क्रिय ही न हो गया हो .. :) और इसमें शुरुआती समय लग सकता है .मगर फिर आपको इसकी तलब लगनी शुरू हो जायेगी ...दुनिया में कितने ही नशे हैं उसमें एक प्यारा सा नशा है ग़ज़लों का और उसमें भी अगर आप मेहदी हसन को पसंद करते हैं तो आप एक अलग क्लास के व्यक्ति हैं . उनसा दूजा कोई नहीं है . दुनिया का बड़ा सा बड़ा ग़ज़ल गायक मेहदी हसन को शीश झुकाता रहा है .वे ग़ज़ल गायिकी के लीजेंड बन गए .

एक और बात है जो मेहदी हसन की गायकी के करीब हमें ला सकती है .यह है दिल का साफ़ होना ,बिना छक्का पंजा के और चालाक दुनियादारी से दूर होना ..वे भी ऐसे ही थे निष्कपट ,सहज सरल और विनम्र ...हर वक्त दुनियादारी में डूबे व्यक्ति के लिए कहाँ शेरो सुखन और वह भी मेहदी हसन की गायकी? इसके लिए निष्कपटता तो मानों एक अनिवार्य शर्त है ..मैंने खुद पाया है जिन्हें मेहदी हसन पसंद हैं वे बहुत सीधे सरल लोग हैं और एक ख़ास तरह की संवेदनशीलता लिए हुए हैं . यह एक अलग सा विशिष्ट ग्रुप ही है जिसे आप मेहदी हसन फैन ग्रुप कह सकते हैं .

वह पहला कैसेट जिसने मुझे इस अजीम हस्ती से मिलाया था 
मुझे ३६ साल पहले घर में आये उस कैसेट जो आज भी मेरे संग्रह का एक नायब आईटम है की एक एक ग़ज़ल के हर्फ़ दर हर्फ़ याद हैं ..उनके साथ जिए जीवन के कितने ख़ास पल छिन भी जैसे तरोताजा से हैं . चाहे खुशी के पल हों या गम के ये गज़लें मुझे एक सा आनंदित करती रहीं हैं .....दिल की बात लबों पर लाकर अब तक हम दुःख सहते हैं ...अर्जे नियाज़ इश्क के काबिल नहीं रहा .....मग्घन बात पहेली जैसी .....दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है ......क्यूं दामने हस्ती तक बढ़ने दिया हाथों को ....और भूली बिसरी चंद उमीदें चंद फ़साने याद आये .....यह आख़िरी वाली तो जब भी सुनता हूँ पूरा अतीत ही मानों सामने आ साकार हो उठता है ...इसके बाद की तो उनकी कितनी और गज़लें आयीं और दिल दिमाग पर कब्ज़ा करती चली गयीं .....
रंजिश ही सही .... मुझे तुम नज़र से गिरा तो रहे हो......बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी ......गुलों में रंग भरे ....इन सभी की एक सूची नजरिया वाले ब्लॉगर ने भी दी है -वे भी मेहदी साहब के दीवाने रहे हैं .....तीन दशकों के एक लम्बे साथ के बाद मेहदी हसन साहब का जाना दुखी कर गया है मगर तसल्ली यही है कि उनकी गज़लें उनकी दिलकश आवाज़ आज भी हमारी एक बेशकीमती धरोहर है .....ऐसी शख्सियतें कहाँ फ़ना होती है वह तो हमारे अहसासों हमारी चेतना में मानो पैबस्त रहती है जैसे बस गर्दन झुकाई और देख ली सूरत यार की .....अमर हैं मेहदी हसन साहब!

बुधवार, 13 जून 2012

ग़ज़ल के बादशाह को आख़िरी सलाम


मेहदी हसन साहब का इंतकाल हो गया है .और इसी के  साथ ग़ज़ल गायकी के एक युग का अंत भी .यह समाचार मेरे लिए जैसे स्तब्ध  करने वाला रहा . वे मेरे सबसे पसंदीदा ग़ज़ल गायक रहे हैं ...उनको आख़िरी सलाम कहते हुए मन दुखी है .मैं उनके स्वास्थ्य को लेकर पहले से ही चिंतित था . और आज यह दुखभरा समाचार आ गया .
क्वचिदन्यतोपि पर स्मृति -शेष 


 एक श्रद्धांजलि: स्वप्नदर्शी   
संतोष त्रिवेदी की श्रद्धांजलि 
कबाड़ खाना पर शोक -श्रद्धांजलि 
नज़रिया पर शोकांजलि 
रविवार पर पुण्य स्मरण 
अवधी के अरघान पर यह आयोजन 
चाँद  पुखराज का पुण्य स्मरण 
एक ज़िद्दी धुन की शोक श्रद्धांजलि 
उनकी इस ग़ज़ल के साथ ग़ज़ल के इस बादशाह को अंतिम विदाई .....

शनिवार, 24 मार्च 2012

चिट्ठाकार चर्चा की नीरवता को तोड़तीं अमृता तन्मय!

बहुत दिन बीते चिट्ठाकार चर्चा में  किसी सुधी  चिट्ठाकार की चर्चा नहीं हो पाई ..एक नीरवता सी छाई रही है यहाँ...यह नीरवता अकारण  नहीं है ...एक तो शायद वह शुरुआती उमंग रोमांच नहीं रहा ब्लागिंग का -अर्थशास्त्र के ला आफ डिमनिशिंग रिटर्न की भांति इस विधा की अब वह शुरुआती चाहना नहीं रही और कुछ इस  टैब्बू से मैं आशंकित रहा जिसमें एक मोहतरमा बलागर  ने सरे आम मुझे यह कह डाला  था कि मैं जिसे भी चिट्ठाकार चर्चा में शामिल करता हूँ उससे मेरे सम्बन्ध ख़राब हो जाते हैं -मुझे भी हैरत हुयी जब मैंने सिंहावलोकन में आंशिक रूप से इस बात को सच पाया . मैं इतना ही कहूँगा कि मानव जीवन ,भावनाएं और व्यवहार बहुआयामी और बहुत जटिल हैं ...अब किसी की प्रोफाईल को सम्मिलित करने का मतलब यह भी नहीं कि उसके साथ मेरा कोई सप्तपदी का अनुबंध हो गया और मैं आजीवन उससे बड़ा ही उदारतापूर्ण, सहिष्णु सम्बन्ध बनाए ही रखूँ ...और सारी बात का ठीकरा मेरे ही सर पर फोड़ दिया जाय यह भी कहाँ का न्याय है ....दूजे यह बात भी है कि कुछ ऐसे भी मित्रगण रहे हैं जिनसे मेरे टाप के और गहन सम्बन्ध रहे मगर उन्हें मैं अन्यान्य कारणों से अपने इस प्रिय स्तम्भ में नहीं ले पाया हूँ -कुछ तो ब्लागजगत को भी छोड़ चुके हैं और इस धरा पर कहाँ हैं अब यह भी नहीं मालूम -गुमनामी की अंधियारे में खो गए ..और मुझे बच्चन जी की यह सीख याद कराते रहते हैं,जो बीत गयी से बात गयी ...और नीड़ का  निर्माण फिर फिर .....ओह प्रस्तावना इत्ती लम्बी क्यों हो रही है ..लाजिमी है इतना दिन का अंतराल रहा है जो ...मगर आज उस अंतराल की पूरी भरपाई करने ब्लागजगत की एक खालिस कवयित्री आयी हैं ....अमृता तन्मय....

मगर किंचित संकोच भी है कि चिट्ठाचर्चा में इस चिट्ठा -कवयित्री को शामिल करने की सहमति/अनुमति उनसे नहीं ले पाया ....क्योकि उनसे संपर्क का कोई सूत्र नहीं मिला ..उनका ब्लॉगर  परिचय पृष्ठ केवल उनका नाम बताता है और वह भी शायद उनका काव्य नाम है ,वास्तविक नहीं ..फिर उनका जेंडर फीमेल बताता  है और लोकेशन पटना, इण्डिया बताता है ...आशा है ये विवरण सही हैं ...उन्हें चिट्ठाकार चर्चा  में लेने का एक  गूढार्थ भी है -अब चूंकि उनसे कोई खतो किताबत,चर्चा परिचर्चा नहीं है इसलिए सम्बन्ध खराब होने की संभावना भी नहीं है ...और यह भी कि इस तरह मेरे इस स्तम्भ से जुडा टैब्बू ख़त्म हो जाय सो इस कवयित्री का यहाँ शामिल होना  एक शुभकारी टोटका -अनुष्ठान भी है ....

मेरी हे कवयित्री कविता आपने पढी होगी ..उससे दीगर अगर कुछ कवयित्रियाँ यहाँ है तो उनमें एक अमृता तन्मय भी है ...इनकी कविताओं में मैंने श्रृंगार  वियोग से अलग का फ्लेवर पाया है और वह इनके काव्यकर्म को एक पृथक पहचान देता है -आध्यात्मिक भाव का संस्पर्श  ...और प्रकृति के कई बिम्बों को लेकर भावाभिव्यक्ति! उनकी यह ताजी कविता, बस  कोई   पढ़ते ही मन में सहसा ही कौंधा कि क्यों न मैं इस काव्य कर्म प्रवीण कवयित्री का सादर आह्वान यहाँ अपने इस लम्बे समय से नीरवता ओढ़े स्तम्भ में करूं.. आलोच्य कविता में एक बहुव्यापी रिक्तता की ओर कविमन संकेत करता है -मतलब कहीं न कहीं कोई, कुछ सूक्ष्म सी  अपूर्णता है जो सम्पूर्णता के, समुच्चय के सुख की चरमता को हठात रोके हुए हैं  ..अगर वह सूक्ष्म अपूर्णता पूरी हो जाय तो बस बात ही बन जाय ..यह एक अकेली कविता ही कवयित्री के काव्य कर्म को  एक समादृत स्थान दिलाने में समर्थ है -इसमें भाव प्रवणता तो है ही मगर शिल्प और साहत्यिक बोध के आधार पर भी यह एक अद्भुत और लम्बे समय तक याद रखी जाने वाली कविता है .....

मेरे पूर्व के चिट्ठाकार चर्चा में व्यक्तित्व निरूपण को एक अनिवार्य घटक के रूप में लिया जाता रहा है ..मैंने स्वीकार किया है कि चिट्ठाकार चर्चा की अभ्यर्थता में मात्र कृतित्व ही नहीं व्यक्तित्व का  समावेश मेरे लिए अपरिहार्य रहा है ...मगर आज की चिट्ठाकार चर्चा इस अर्थ में भी अपवाद है ..मुझे कवयित्री के व्यक्तित्व का कुछ अता पता नहीं ...मात्र किसी के रचना कर्म से उसके व्यक्तित्व का निरूपण एक जोखिम भरा  काम है और ऐसा कोई जोखिम उठाने का कोई मतलब भी नहीं ...एक आशंका  भी रहती है कि महान कवि कवयित्रियों में कृतित्व और व्यक्तित्व का साम्य प्रायः  नहीं पाया गया है ....और ऐसी कोई प्रत्याशा भी शायद अनौचित्यपूर्ण है ....वो देशी कहावत है न -आम खाने से मतलब होना चाहिए आम के  पेड़ से नहीं!

अमृता तन्मय को मैंने चिट्ठा कवि लिखा है -मतलब वे ब्लागजगत में और शायद  अन्यत्र भी किसी अन्य विधा में योगदान नहीं कर रहीं ,यहाँ  तक कि अपने काव्य चिट्ठे पर आयी टिप्पणियों का जवाब भी  नहीं देती..महज कवितायें ही लिखती हैं.. यही उनका मुख्य व्यसन /टशन है . और हाँ वे क्वचिदन्यतोपि की नियमित पाठिका हैं ..और इसलिए भी मेरी कृतज्ञता आखिर उनके प्रति क्यों न हो ....

अन्य ब्लागों पर भी अमृता की  सार्थक अभिव्यक्तिपूर्ण टिप्पणियाँ देखने को मिलती रहती हैं ...वे एक सजग पाठिका भी हैं ..केवल आत्मकेंद्रित, आत्म मुग्धा ब्लॉगर ही नहीं ....मैं उन्हें उदीयमान कवयित्री कहने से हिचक रहा हूँ क्योकि मेरी दृष्टि में वे काव्य कर्म के उस  मुकाम पर पहुँच गयी हैं जहां किसी को महज उदीयमान कहना उचित नहीं .....वे लम्बे समय से ब्लागजगत में अविकल साहित्य सेवा कर रही हैं और आपमें से अधिकाँश उनके  काव्य लालित्य से परिचित भी होंगे ....मैं अमृता की कई कवितायें आपको  पढाना चाहता हूँ मगर उन्होंने अपने ब्लॉग पर ताला जड़ रखा है -मैं कापी पेस्ट नहीं कर  पा रहा हूँ ...मगर सर्दियों में उनकी लिखी  एक और कविता  पढने की जोरदार सिफारिश करते हुए इस संभावनाशील कवयित्री के काव्य कर्म के आस्वादन  का आह्वान करता हूँ ....
शुभकामनाएं अमृता!  



शनिवार, 14 जनवरी 2012

मेहदी हसन साहब ..उनसा कोई नहीं है!

मेहदी हसन साहब आई सी यू में भर्ती किये गए हैं ,उनके दुश्मनों की तबीयत नासाज है ..हम उनके भारतीय प्रशंसक ,दीवाने ये दुआ करते हैं कि वे जल्दी ठीक हों और फिर अपनी आवाज का जादू बिखरने के लिए हमारी नज़रों के सामने हों ....यह खुशी की बात है कि भारत सरकार ने उनके यहाँ इलाज के लिए वीजा की पहल शुरू कर दी है .... समकालीन ग़ज़ल गायकी के सिरमौर हैं मेहदी हसन साहब ..उनसा कोई नहीं है सारी दुनिया में और अगरचे इस सारे ब्रह्माण्ड में भी कहीं दीगर भी ग़ज़ल गायकी और ग़ज़ल गायक हों तो भी मेहंदी हसन साहब की बराबरी नहीं ..अभी तो आप भी उनकी यह ग़ज़ल सुनिए ....और उनके शीघ्र स्वास्थ्य की कामना  कीजिये ...


गुरुवार, 10 नवंबर 2011

एक उदास शाम,देव दीपावली और पुण्य श्लोक राजमाता देवी अहिल्याबाई होलकर

आज बनारस का एक लख्खी मेला देव दीपावली है ..लख्खी का मतलब जहाँ कम से कम एक लाख की भीड़ होती हो ....यहाँ पहले से कई लख्खी मेले विख्यात हैं -जैसे नाटी इमली का भरत मिलाप ,चेतगंज की नक्कटैया ,तुलसीघाट की नाग नथैया तथा सिगरा के पास की रथयात्रा जिसके नाम पर एक चौराहे का ही नामकरण हो गया है ....इन सभी अपार जनसमूह वाले मेलों में लगभग एक दशक से देव दीपावली का भी नाम आ जुड़ा है और इसे वैश्विक पर्यटन का आकर्षण दे दिया गया है -देश विदेश से पर्यटकों का एक बड़ा हुजूम आज यहाँ आ पहुँचता है ...और बनारस के गंगा घाटों पर असंख्य दीप जगमगा उठते हैं ....आतिशबाजी भी होती रहती है और अस्ताचल को बढ़ते चंद्रमा की रश्मियाँ गंगा जी में एक स्वर्ण पट्टी बिखेरती चलती हैं ....

देव दीपावली पर बनारस के बस एक घाट का नज़ारा (सौजन्य गूगल ) 

डॉ.राजेन्द्र प्रसाद घाट (पारम्परिक दशाश्वमेध घाट)  पर गंगा आरती का दृश्य और पार्श्व में शिव तांडव स्त्रोत का पाठ - अद्भुत  दृश्य और अध्यात्मिक अनुभव -जीवन का एकबारगी का समग्र अनुभव देता है ....मैं स्वजनों के साथ, परिवार के साथ ,राज्य अतिथियों के साथ पिछले लगभग हर वर्ष इस मेले का आनन्द उठाता आया हूँ -इस बार न बच्चे हैं ,न घर (तेलितारा ,जौनपुर)  से कोई आया और न ही कोई मेहमान ही सो मेले में नहीं गया हूँ और बैठे ठाले विगत जीवन के कुछ सिंहावलोकन की ओर अनायास उन्मुख हो इस शाम को ही उदास कर बैठा हूँ -लोगों के बनावटी पन,चालाकी ,मित्रों के विश्वासघात,ब्रीच आफ ट्रस्ट आदि के मंजर अचानक ही याद हो आये हैं -कोई बच्चा मेला जाने से बिछुड़ गया हो तो वह ऐसी ही कई विचारों,अकेलेपन और असहायता  से गुजरता है ..बस समझ लीजिये ऐसा ही कुछ बेहद खराब सा अनुभव हो रहा है ...
देवेन्द्र  पांडे जी ने मेले से लौट कर  देर रात भेजा यह  चित्र -देखिये स्वर्ण पट्टी  


कहते हैं देव दीपावली के कई मिथकीय कारणों के साथ ही इस समारोह को महारानी अहिल्याबाई होलकर से भी जोड़कर देखा जाता है ...मैं आज से अच्छा और उचित अवसर कोई और नहीं समझता जब इस अवसर पर मैं इस महान भारतीय नारी के बारे में आपसे कुछ साझा न  करूं..महारानी लक्ष्मीबाई से यहाँ का बच्चा बच्चा परिचित है -उन पर कवियों की खूब लेखनी चली है ....फ़िल्में और सीरियल भी आयें हैं मगर आश्चर्य है कि अहिल्याबाई होलकर के बारे में ज्यादातर लोग बहुत कम जानते हैं ...विकीपीडिया के अंगरेजी और हिन्दी संस्करणों ने इस महान महिला के बारे में यहाँ और यहाँ जानकारी दी है -अंगरेजी की जानकारी प्रभूत और पर्याप्त है ..अगर आपके समय हो तो अवश्य चंद मिनट वहां दें ..कई प्रान्तों में हिन्दू मंदिरों का पुनरोद्धार इन्हीने कराया ..काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर का एक तरह से जीर्णोद्धार ही इनके द्वारा हुआ ..गया के विष्णुपाद मंदिर को भी इनकी ही कृपा से नया रूप रंग मिला ....
पुण्य श्लोक राजमाता अहिल्याबाई होलकर 

इसके बावजूद एक प्रचलित लोक कथा के अनुसार काशी के लालची पंडों  ने इनके विश्वनाथ मंदिर में घुसने के समय इनके मार्ग पर हीरे जवाहरात बिछाए ताकि शूद्र के चरण से स्पर्शित हो पवित्र स्थल अपवित्र न हो जाय और बाद में मंदिर के गर्भगृह और आस पास के  प्रांगण  को  गंगा जल से धुलवाया ....तत्पश्चात महारानी ने यहाँ के पोंगा पंडितों को तब सीख दी जब वे गंगा स्नान के बाद जल धारा  से बाहर नहीं निकल रही थीं -अपनी सेना भेजकर उन्होंने उन्ही लालची पंडों को बुलाया और कहा अब तो मेरे स्नान के बाद  पूरी गंगा ही अपवित्र हो गयीं है इसे पवित्र करो तभी मैं बाहर आऊँगी ....लज्जित पंडों ने उनसे माफी मांगी ....ऐसी ही पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर ने हजारा दीपस्तम्भ से यहाँ के एक गंगा घाट -पञ्चगंगा घाट पर देव दीपावली की शुरुआत की जो आज एक वैश्विक मेला बन चुका है .
लख्खी मेले पर उमड़ा जन सैलाब (यह चित्र भी देवेन्द्र पांडे जी के सौजन्य से ) 

केवल इस मेले को ही देखकर आप बनारस आने का औचित्य साध सकते हैं और जीवन को धन्य कर सकते हैं ...मेरी बात का भरोसा कीजिये एक अनिर्वचनीय अनुभव के साथ आप वापस जायेगें ...और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपने संस्मरण छोड़ जायेगें ..इस पोस्ट को पूरी करते करते मैं अपने अवसाद से मुक्त हो रहा हूँ .....बाकी तो बेचैन आत्मा एलियास देवेन्द्र पाण्डेय जी ने आश्वस्त किया है कि इस बार  मेरे संती (हिस्से का ) भी मेला वे देखेगें और उसकी चौचक रिपोर्ट आपको  तक पहुचायेगें  ......मुझे उन्होंने फोटो उपलब्ध करने का भी वादा किया है मगर मुझे सब्र कहाँ और इस उदास शाम के गम को गलत करने का कोई और सहारा भी तो नहीं था -सो थोड़ी सृजनात्मकता का सहारा ले लिया और यह पोस्ट लिख दी है ......
शुक्रिया देवेन्द्र पाण्डेय जी आपके फोटो अवदान के लिए 
और देर रात आयी देवेन्द्र जी की यह आँखों देखी टटकी रिपोर्ट 

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

यादों की एक सुहानी शाम

आज बंगलौर से बेटे कौस्तुभ का आगमन हुआ ...और  आज २३ तारीख को  उनका तेईसवां जन्मदिन भी है और  एक ख़ास मेहमान केक काटने के अवसर पर आज  आमंत्रित थीं ...अमेरिकावासी डॉ.रोशनी राव nee शुक्ल जो वहां के मशहूर एम डी एंडरसन कैंसर इंस्टीच्यूट टेक्सास में सर्जन हैं ...और इन दिनों भारत भ्रमण पर आयी हुई हैं...अपने काबिल पिता डॉ. एस. डी. शुक्ल की काबिल पुत्री डॉ.रोशनी राव धर्मपत्नी की सगी भतीजी हैं ..जन्मी तो भारत में थीं मगर बचपन में ही इंग्लैण्ड गयीं और अमेरिका जाकर वहां की नागरिक बन गयीं ...
केक टोस्ट आफरिंग: गेस्ट आफ आनर डॉ रोशनी राव  और कौस्तुभ 

डॉ रोशनी राव हिन्दी तो  कुछ बोल समझ लेती हैं मगर पढ़ लिख नहीं पातीं ...वे मेरा ब्लॉग देखती  हैं मगर खुद पढ़ नहीं पाती जब तक कि पापा या मम्मी उन्हें पढ़कर न सुनाएँ ...बेटे के जन्मदिन की शाम को उनके आने से सादे जन्मदिन कार्यक्रम में काफी  वैल्यू एडीशन हो गया ....बच्चे, उनकी मम्मी हम  सब खुश हो गए ...कौस्तुभ की खुशी का तो कुछ पूछना ही नहीं था ...सात समुद्र पार से कोई अपना ही इस अवसर पर संयोग से आ पहुंचा था ..इस लिहाज से यह जन्मदिन  ख़ास बन  गया ......


डॉ .रोशनी ने कैंसर के कई मरीजों की सफल सर्जरी की है जिसमें एक हेंडा सल्मेरान ही हैं जो पिछले वर्ष बनारस आयीं थी और हम लोगों के साथ पूरे चार दिन बनारस में घूमती फिरी थीं और अब वे पूरी तरह स्वस्थ हैं और डॉ.रोशनी राव  के गुण गाया करती हैं ....हेंडा की अपनी राजनीतिक अभिरुचियाँ भी हैं और अभी अभी टेक्सास राज्य में अधिसूचित हेन्डाज ला जिसमें ब्रेस्ट कैंसर की आरम्भिक जानकारी प्राप्त करने के नागरिक अधिकार को सहमति मिली है  इन्ही के अथक परिश्रम की देन है .हेंडा अब एक सेलिब्रिटी हैं ...हमें फख्र है कि हम इस बला की हिम्मती और महात्वाकांक्षी महिला के साथ कुछ बनारसी दिन बिताने का सौभाग्य प्राप्त कर चुके हैं .. वे डल्लास में प्रापर्टी डीलर भी हैं और उनके सौजन्य सहयोग से डॉ.रोशनी राव को अब डल्लास में एक खूबसूरत बंगला मिल गया है ....डॉ. रोशनी राव के वर्तमान इंस्टीच्यूट -एम डी एंडरसन कैंसर इंस्टीच्यूट टेक्सास से मेरा भी एक रिश्ता रहा है ..मेरे पी एच डी के एक परीक्षक डॉ .सेन पाठक अब यहीं प्रोफ़ेसर हैं ....आज की शाम कई ऐसी यादों के साथ और भी सुहानी बन गयी ....

फर्स्ट सपर विद डॉ. रोशनी राव 

हमने साथ में बाहर खाना खाया ...डॉ. रोशनी शुद्ध शाकाहारी हैं ...मैंने आज के डिनर को "फर्स्ट सपर विद डॉ. रोशनी राव " का नाम दिया है ...अभी अभी लौटे हैं ..सोचा इन  यादगार लम्हों को ब्लॉग करके ही सोने जाऊं ...उन्होंने रेस्टोरेंट में आये ढेर से बच्चों के उधम को अच्छा नहीं माना और बताया कि ऐसे स्थलों पर अमेरिकी बच्चों को अनुशासित रहने को सिखाया जाता है और वहां घर पर आने वाले लोगों को कुत्ते भी नहीं भूंकते ...अजनबियों तक को नहीं ..वहां ज्यादातर शान्तिपूर्ण माहौल हर जगहं मिलता है ..कोई कोलाहल नहीं कोई आपाधापी और चिल्ल पो नहीं ..मैंने देखा बच्चों की उधम से वे बार बार विचलित सी हो रहीं थीं ..हम तो ऐसे माहौल के आदी हैं मगर उनके लिए यह अप्रिय सा था ....

हैपी बर्थ डे कौस्तुभ और बाय बाय डॉ रोशनी ..फिर मिलेगें ......

शुक्रवार, 26 नवंबर 2010

पूरब और पश्चिम के मिलन की एक यादगार घटना (..एक पारिवारिक पोस्ट )


 सुबहे बनारस 
नहीं ,सुबहे बनारस तो नहीं ,वह  तो एक रोजमर्रा सी सामान्य सी शाम थी  जब  सात समुद्र पार से प्रोफ़ेसर डॉ शिवेंद्र दत्त शुक्ल , मेरे बड़े श्याले (शब्द संदर्भ /सौजन्य :श्री प्रवीण पाण्डेय जी ) के फोन ने उसे घटनापूर्ण  बना दिया .उन्होंने सूचना दी कि उनकी एक पारिवारिक अमेरिकन मित्र एक विशेष मिशन पर भारत आ रही हैं और अपनी वापसी यात्रा में वे १ नवम्बर  से ४ नवम्बर ,१० तक वाराणसी दर्शन भी करेगीं .और हमें उन्हें अटेंड करना है .अब हमारे एक दशक के वाराणसी प्रवास ने हमें ऐसी स्थितियों के लिए काफी कुशल बना दिया है और इस जिम्मेदारी को हम बड़े संयम और समर्पण से पूरा कर लेते हैं ..क्योंकि हम यह मान   बैठे हैं  कि किसी को काशी दर्शन कराने के पुण्य का एक हिस्सा हमें भी स्वतः मिल जाता है .और इस तरह हमारे पुण्य की थैली (अगर ऐसी कोई संरचना होती हो )निरंतर भरती जा रही है ....यह मैं व्यंग में नहीं सच कह रहा हूँ !
 पूरब और पश्चिम के बीच सेतु बनी रेशम की (डोर) साड़ी :) 

मुझे जो आरंभिक जानकारी मिली उसी से ही लग गया था कि हेंडा  सल्मेरान एक जीवट की महिला हैं .वे एक ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर हैं और अभी उनके आपरेशन के ज्यादा वक्त भी नहीं बीते कि वे हिमालय की १०० माईल दौड़ प्रतिस्पर्धा में भाग लेने भारत आ धमकी ..उनकी पूरी यात्रा दास्तान उनके ब्लॉग पर है.हिमालय स्पर्धा के बाद वे तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक़ पहली नवम्बर को ही वाराणसी आ गयीं  .मैं और बेटे कौस्तुभ उन्हें लेने के लिए एयरपोर्ट गए ...उन्होंने अमेरिकन लहजे और हमने पारम्परिक भारतीय हाव भाव सद्भाव से उनका स्वागत किया ...कहने को तो वे अपने च्वायस के एक होटल में  रुकीं मगर बस रात में वहां सोने के लिए ही ,बाकी तो उनके बनारस अवस्थान के चार दिन हमारे साथ ही पूरी तरह  से बीते ...सुबहे बनारस से लेकर दोपहर -शाम तक हमारे साथ यहाँ  की गलियों में घूमने ,शापिंग आदि में वे मगन रहीं .बनारसी साड़ी और भारतीय मसालों की तो पूरी दीवानी .. बनारसी साड़ी के प्रति उनकी जोरदार रुझान को देखते हुए उन्हें प्रियेषा और संध्या ने साड़ी पहनने की दीक्षा दी और ट्रेनिंग  की  साड़ी भी उन्हें उपहार में दे दी जिसे वे २४ घंटे पहने ही रह गयीं इस डर से कि अगर उतार दी तो फिर कैसे पहनेगी ..वे उसी में लिपटी सो गयीं और अल्लसुबह गंगा के किनारे उसे लपेटे  ही सूर्योदय देखने हमारे साथ चल पडीं ...भारतीय खानों में उन्हें पनीर के प्रेपरेशन काफी पसंद आये  जिसे वे चीज की एक किस्म समझती रहीं ..उन्हें परवल की कलौंजी भी पसंद आई ....रोटी का बनना भी वे विस्मय से देखतीं थीं ....
 मिलन सदाबहार पूरब  और रूपांतरित पश्चिम का 

मैंने एक बात गौर की ..संध्या और वे जल्दी ही बहुत घुल मिल गयीं जबकि भाषा का एक बड़ा अवरोध उनके बीच था ...दोनों एक दूसरे की भाषा में कुशल न होने के बावजूद भी लगा कि पुरानी मित्र हैं ..नारियों में जरूर संवेदना /संपर्क के ऐसे  तंतु होते होंगें  जो उन्हें भाषा का मुहताज नहीं बनने  देते ..यह मैंने साक्षात देखा ...कुछ चित्र जो मैंने उनके ब्लॉग   से ही उठायें हैं  पूर्व पश्चिम के इस यादगार मिलन की कथा खुद कह रहे हैं ......बनारस यात्रा के उनके संस्मरण  यहाँ है ,जिसे वे किश्तों में लिख रही हैं ! पहली किश्त को  उन्होंने बनारस के जाम (ट्रैफिक जाम ) और दूसरी को रेशम की साड़ी पर फोकस किया है .आगे का इंतज़ार है!


वे  उत्साह और ऊर्जा से लबरेज महिला हैं और उन जैसी सौम्यता और सहज व्यवहार मैंने बहुत कम महिलाओं में पाया है ...  बुद्धि चातुर्य में भी  उनकी कोई सानी नहीं ....भारतीयता के प्रति उनका समर्पण अचम्भित करने वाला था ..यहाँ अपने हाथों में मेहंदी लगवाकर वे बहुत प्रफुल्लित हो उठी थीं ....और मुझे दिखाने दोनों हाथ उठाये सरे बाजार तेजी से लपकती हुई मेरे पास आयीं तो अपने देशज भाई बन्धु भौचक से कभी उन्हें तो कभी हमें देख रहे थे.......हमने पूरे परिवार के साथ उन्हें रेड कारपेट वेलकम की ही तरह वेट आईज विदाई भी दी ....
प्रातः  दशाश्वमेध घाट, बनारस ,३ नवम्बर ,१० 

हेंडा सल्मेरान अब हमारे लिए बनारस की सुखद यादों का एक हिस्सा  बन गयी हैं ...

सोमवार, 8 नवंबर 2010

बालक सुरेन्द्र गौड़ से मैं प्रभावित हुआ! इस नन्हे से बच्चे के हुनर की सराहना कीजिये!

अब तक के अपने २७ वर्षों के सुदीर्घ सेवाकाल में मैं दीवाली और होली अपने पैतृक आवास पर ही सपरिवार मनाता  आया हूँ ,इस अवसर पर अधिकारियों को मिलने वाले दस्तूरी गिफ्ट पैकेटों की परवाह किये बिना : ) ....मुझे गाँव में ऐसे अवसरों पर स्वजनों से मेल मिलाप का जो संतोष -धन मिलता है उसके सामने सचमुच ही अन्य प्रकार के सभी धन धूरि समान ही लगते हैं .घर पर गाँव के लोगों से भेट मुलाकात और अपने बचपन के साथियों से भूली बिसरी बातों का जिक्र लगता है जीवन में एक नई उर्जा ही समाविष्ट कर देता है ..बच्चों से तो मेरी खूब पटती है ,लगता है खुद मेरा बचपन ही लौट आया हो ..बच्चे मुझे घेरे रहते हैं और मैं बच्चों को ....मगर इस बार सब कुछ फीका रहा ..पड़ोसी श्रद्धेय बुजुर्ग के देहावसान के कारण शोकाकुल कुनबे ने इस बार दीवाली नहीं मनाई....मतलब आतिशबाजी का दौर भी नहीं हुआ ..दीवाली के दिन बच्चों का मायूस सा चेहरा मुझे कचोटता रहा ...अब उन्हें समझाएं भी तो क्या ..थोड़े बड़े बच्चे तब भी मौत का अर्थ समझ रहे  थे मगर ४-७  वर्ष वाले बार बार पिछली बार की आतिशबाजी छुड़ाने की  जिद पकडे रहे ..बहरहाल .....किसी तरह उन्हें बहलाया फुसलाया गया ...
 मिनिएचर खटिया 

इसी दौरान किसी बच्चे ने बताया कि भैया , सुरेन्द्र बहुत अच्छी खटिया  बनाता है ...और फिर  सकुचाते  शर्माते सुरेन्द्र की पेशी हुई. वे अपने चर्चित उत्पाद के साथ हाजिर हुए ...उन्होंने एक उस  ग्राम्य साज सामग्री का मिनिएचर बनाया है जिसे बनारस अंचल में  चारपाई ,बसहटा,खटिया आदि कहते हैं .(अरे वही खटिया जिसे लेकर एक मशहूर भोजपुरी गाना है न ..सरकाई लो खटिया जाड़ा लगे )  -भारत की ८० फीसदी ग्राम्य जनता अभी भी इसी खटिया नामक   शैया  पर रातें गुजारती है ..जो लोग गावों से उतने वाकिफ नहीं हैं उन्होंने इसे रोड साईड ढाबों पर देखा होगा जिन पर अक्सर ट्रक ड्राईवर बैठकर खाना खाते हैं ....और मैं सुरेन्द्र की बनायी हुई मिनिएचर खटिया देख , बुनाई की बारीकी देख कर दंग रह गया ....कितनी कलात्मकता से इस छोटे से बच्चे ने इस काम को अंजाम दिया था ..उसकी उम्र से बड़े बच्चे  जहाँ अपना समय खेलने कूदने में ज्यादा लगाते हैं -उसी समय में से ही कुछ क्षण यह अपने इस हुनर को आजमाने में लगाता है .
 भीड़ में अलग सुरेन्द्र गौड़ 
मेरे पूछने पर उसने बताया कि उसे यह रूचि स्वयमेव उत्पन्न हुई ..किसी ने सिखाया नहीं . उसने खुद  से ही ट्रायल एरर से सीखा है ...उसके हाथ की बनायी यह मिनिएचर खटिया अब डिमांड में है जो वाल हैंगिंग या डेकोरेशन पीस के रूप में इलाके में  लोकप्रिय हो रही है ..मैंने उससे पूछा कि क्या मेरे लिए भी तुम यह खटिया बनाओगे तो वह सहर्ष तैयार हो गया .....मैंने कहा एक नहीं चार ....तो उसके चेहरे पर चिंता के भाव आ गए .....मैंने पूछा कि क्या बनाने में ज्यादा समय लगेगा तो उसने बताया कि नहीं एक खटिया तो एक घन्टे में वह बना लेता है मगर उसके पास बस एक खटिया का ही ऊन  बचा है ..मैंने उसे कुछ पैसे दिए और अगले ही दिन उसने मुझे चार खूबसूरत सी मिनिएचर पलंगें   ला पकडाई  .
स्वनिर्मित मिनिएचर खाटों के साथ सौम्य सुरेन्द्र

मेरे बगल के जिले भदोही जिसे भारत का गलीचा शहर (कारपेट सिटी ) कहा जाता है ,में करीब एक दशक पहले एक बड़े आन्दोलन में बच्चों को कारपेट उद्योग से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया  था ...जबकि उनके हाथ से बुने गलीचों की गल्फ देशों में बड़ी डिमांड थी ..क्योकि उनकी बुनाई बड़ी महीन और काम साफ होता  था  ...मगर तब यह फितूरबाजी हुई थी कि खेलने खाने के  उम्र के बच्चों के श्रम का शोषण हो रहा है और अब तो बाल श्रम शोषण पर कड़े कानून भी हैं -मगर सुरेन्द्र की स्वतःस्फूर्त प्रतिभा ने मुझे यह सोचने पर विवश किया है कि क्या जन्मजात प्रतिभाओं को ,उनके तकनीकी रुझान या दक्षता को हमें प्रोत्साहित नहीं करना चाहिये ? मुझे तो सुरेन्द्र का हुनर उसके टेक्नोलोजी टेम्पर की झलक दिखा गया ....अब उसकी इस नैसर्गिक प्रतिभा को हम अगर बाल श्रम शोषण के बहाने विकसित होने से रोक दें तो क्या उसके साथ अन्याय नहीं होगा ?और हम कहते हैं कि हमारे देश में बेरोजगारी की भीषण समस्या है ..जो सच भी है ...अब आप ही बताईये कि सुरेन्द्र के साथ हमारा ,स्टेट का और समाज का क्या बर्ताव  होना चाहिए ? 

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