शनिवार, 24 अप्रैल 2010

बुद्धिजीवी दिखना भी एक शौक है,एक चस्का है !

जी ,बुद्धिजीवी दिखना भी एक शौक है!यह कोई नया नहीं बल्कि पुराना शौक है या यूं कहिये कि अब आउटडेटेड हो चला है -कारण कि अब कथित बुद्धिजीवियों की कोई साख नहीं रही समाज में -एक ढूंढो हजार मिलते हैं ,मतलब कौड़ी के तीन! इधर कुछ लोग बुद्धिजीवी बनने में मशगूल रहे और उधर बिना बुद्धिजीवी बने /दिखे ही भाईयों ने अट्टालिकाएं खडी कर लीं ,अकूत धन वैभव जुटा लिया ...बुद्धिजीवी बिचारा कंधे पर झोला टाँगे पैरो में चमरौधा -पनही पहने एक उम्र पार कर गया और कहीं किसी अनजान से  कोने में कुत्ते से भी बदतर स्थिति में दम तोड़ गया -कई दशकों पहले जब बुद्धिजीवी बनने की ऐसी ललक दीगर भाई बंधुओं में दिख जाती थी तो शुरू शुरू में उन्हें  कामरेड का संबोधन और लाल सलाम मिलते रहते थे और वे  फूल फूल कर कुप्पा होते अपनी उस मंजिल की और बढ़ते जाते थे जो दरसल कहीं वजूद में थी ही नहीं ....इक कदम जो उठा था गलत राहे शौक में मंजिल तमाम उम्र मुझे ढूढती रही ....जो इतिहास से सबक नहीं लेते वे जागरूक नहीं होते ..

मुझे हमेशा से दया आती रही है ऐसे बुद्धिजीवियों पर ,बिचारों को न खुदा ही मिला न विसाले सनम ....कुछ ऐसे ही दोस्त आज भी मिलते हैं तो नजरे चुराकर चुपके से फूट लेना चाहते हैं जब तक कि मैं खुद उन्हें बढ़कर अंकवार में नहीं ले लेता-अक्सर कहता हूँ दोस्त ,जीवन कई कडवी सच्चाईयों पर टिका हुआ है यहाँ  तुम्हारे थोथे आदर्श ,मार्क्सवाद और  एंजेल के लिए आज भी जगह नहीं बन पाई है...तब उनकी सूनी आँखों और निस्तेज चेहरे से मैं भी अंदर से काँप जाता हूँ -मुझे भी कभी कुछ ऐसा ही बुद्धिजीवी बनने का शौक था ....बच गया .हाँ उन दिनों भी मार्क्स नुमा बुद्धिजीवी होने के बजाय मुझे स्वदेशी विचारधारा ज्यादा आलोड़ित करती थी मगर चड्ढी पहने बुद्धिजीवियों को देख कर मैं डर गया था ..इस  जमात से भी मुझे एक वितृष्णा सी  होने लगी थी -वह तो भला हो गुलजार का जिन्होंने चड्ढी पहन के  फूल खिला है जैसा मनोरम गीत लिख कर और उन नारीवादियों का जिन्होंने  गुलाबी चड्ढी अभियान चला कर मेरा चड्ढी भय अब काफी कम कर दिया है ...गरज कि मैं बुद्धिजीवी नहीं बन सका ..लाख लाख शुक्र है उस परवर दिगार का ....

 एक बात और साफ़ हो जानी चाहिए वह है -बुद्धिजीवी होने और दिखने में भी बड़ा अंतर है -यहाँ भी वही द्वैध है -कुछ दिखते हैं मगर होते नहीं और कुछ होते हैं मगर दिखते नहीं ....मगर उन लोगों की स्थिति शायद  सबसे दयनीय है जो होते तो बिलकुल  नहीं मगर दिखना और दिखाना चाहते हैं -वैसे तो यह सिम्पटम बस गदह पचीसी तक ही अमूमन दिखता है -हाँ यह बात दीगर है कि कुछ लोग  कालचक्र (क्रोनोलाजी ) को धता बता कर अधिक उम्र के होने पर भी अपनी गदह पचीसी बनाए रखते हैं .ब्लॉगजगत में ऐसे कई नौसिखिया बुद्धिजीवी दिख रहे हैं और मैं उनका भविष्य भांप भांप कर दहल रहा हूँ -अपने अनुभव से तो मूर्ख लोग सीखते हैं भैया ..कुछ हमरी भी मानो ..हम आपको गुमराह  नहीं कर रहे हैं आप हमरे हमराह हैं  . वैसे भी अब बुद्धिजीवी का वह चार्म  रहा भी नहीं ....काहें इस रूढ़ इमेज को ओढ़ कर अपनी जग हंसाई कराना चाहते हो -दूर की बात छोडो अपने थिंक टैंक कहे जाने वाले गोविन्दाचार्य जी की हालत देखिये -एक निर्वासित जिन्दगी जी रहे हैं ,जबकि वे असली वाले /सचमुच  के बुद्धिजीवी हैं .इस पर भी कोई पूछ नहीं है उनकी तो आप किस खेत के मूली हैं ...

.. मैं देख रहा हूँ ब्लॉगजगत में कई देवियों -सज्जनों को बुद्धिजीवी दिखने का शौक चढ़ा हुआ है -वे डंके की चोट पर खुद बुद्धिजीवी मनवाने पर तुले हुए हैं ...और हमारी आपकी सहिष्णुता कि उन्हें झेल रहे हैं बल्कि कई बन्धु न जाने किस सोच के वशीभूत उन्हें झाड पर चढ़ाये जा रहे हैं -काहें  उनकी जिन्दगी को बर्बाद करने पर तुले हो भाई लोग ? आपकी टिप्पणियाँ उन्हें मुगालते में बनाए चल रही हैं -अरे ज्ञान की धारा कृपाण की धार से कम नहीं है -स्वाध्याय करते पूरा जीवन बीत जाए तब भी सही अर्थों में बुद्धिजीवी होना मुश्किल ही है ....लेकिन क्या कहिये यहाँ तो कहीं का ईंट कही का रोड़ा भानुमती ने कुनबा /ब्लॉग जोड़ा ...और मुगालता ऐसा कि देखो हम अपनी गदह पचीसी में ही बुद्धि का वह मुकाम /पड़ाव हासिल कर गए जहाँ आप अपने  उम्र के आख़िरी पड़ाव तक भी नहीं पहुँच पाए!

....और लेखनी तो सुभान अल्लाह ....खुद का लिखा/कहा  खुद ही समझा तो क्या समझा ,मजा तो तब है कि आपने कहा और दूसरे ने समझा ....नहीं नहीं मैं इन्हें हतोत्साहित नहीं कर रहा हूँ ..मगर यह कह रहा हूँ कि लिखो पढो खूब मगर बुद्धिजीवी का क्षद्म वेश धारण   कर नहीं ...सहज होकर अपनी सरल टूटी फूटी भाषा में ही ,न कि ज्ञान का दंभ और आतंक दिखा कर अगले पर और  अपनी बुद्धिजीवी होने की धाक जमाने की नीयत से....,आज के युग में इसका  चलन नहीं है भाई,जब यहाँ असली बुद्धिजीवी दर किनार कर दिए जा रहे हैं तो तुम्हारी  औकात ही क्या है ? कब तक यह थोथा चना चबैना   लेकर चलोगे ....(थोथा चना बाजे घना .) गावों में इधर एक कहावत कही जाती है बिच्छी का मन्त्र ही न जाने कीरा के मुंह में अंगुली डाले....कितना खतरनाक है यह .....मतलब अधजल गगरी भले ही छलकती जाय ..है परेशानी का सबब ही ....कम ज्ञान बहुत खतरनाक है व्यष्टि के लिए भी और समष्टि के लिए भी .....वैसे बुद्धिजीवी दिखने के लिए बुद्धिजीवी टाईप पोस्ट लिखने की कौनो जरूरत नहीं है -पुरुष भाई फ्रेंच कट ढाढी रख लें और एक झोला टांग लें बस हो गया बुद्धिजीवी का स्टीरियोटायिप ..हाँ चूकि कोई महिला बुद्धिजीवी से कभी कोई साबका पडा नहीं इसलिए महिला बुद्धिजीवी की वेश भूषा बताने में किंचित दिक्कत है -हाँ ब्लॉगजगत में उनकी पहचान उनके पोस्टों से की जा सकती हैं -कम हैं ,मगर हैं !

...अभी वक्त है पढो और पढ़ते जाओ और हाँ जब लगे कि तुन्हें  लोगों से बाटना है  कुछ तब शुरू करो लिखना ,बौद्धिक आतंक ज़माने के लिए नहीं और न ज्ञान बाटने के घोषित उद्येश्य से  ..बस अपनी बात कहने के लिए ..अभी तुम ज्ञान की लम्बी चौड़ी बातों को कहने के लिए क्वालीफाई नहीं कर रहे  ...बचकानी लगती हैं तुम्हारी पोस्टें और ज्ञान प्रदर्शन का दंभ! बुद्धिजीवी बनो जरूर मगर दिखो मत ! तुम्हे अपनी रोजी रोटी भी चलानी है!और हाँ टिप्पणियों से मत भरमाओ ,वे तुम्हारी बुद्धि पर नहीं दीगर बातों पर तरस खा रही हैं ..

76 टिप्‍पणियां:

  1. शत प्रतिशत सहमती. आज से ३०/३५ वर्ष पूर्व हमारे एक बॉस हुआ करते थे. उन दिनों हम अध्यापन का कर्तव्य निभा रहे थे. उनके मातहत कई लोग उनके लिए लेख आदि लिखा भी करते थे और उन सबका प्रकाशन हो जाता था "पारिजात" के छद्म नाम से. उन्हें बुद्धिजीवी का दर्जा समाज में प्राप्त हो गया. वे खुश. "बाजु बंद खुल खुल जाए" की रट लगाये रहते थे.

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  2. @ परवरदिगार - पाला बदल दिए :) कोई बात नहीं होता है, होता है।
    चड्ढी और गोविन्दा (चार्य) पर एक स्वतन्त्र पोस्ट का स्कोप बनता है। लिखिए न।

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  3. Bahut sahi kaha...gar aise logon se tark sangat baat/vivad karneki koshish karo to ladkhada jate hain..

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  4. हो ना हो पर लोग खुद को दिखाना ज़रूर चाहते है...बहुत बढ़िया प्रसंग...

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  5. आप माने या न मानें लेकिन हम तो आपको बुद्धिजीवी मानते हैं.z

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  6. ""जी ,बुद्धिजीवी दिखना भी एक शौक है!यह कोई नया नहीं बल्कि पुराना शौक है या यूं कहिये कि अब आउटडेटेड हो चला है -कारण कि अब कथित बुद्धिजीवियों की कोई साख नहीं रही समाज में -एक ढूंढो हजार मिलते हैं ,मतलब कौड़ी के तीन! इधर कुछ लोग बुद्धिजीवी बनने में मशगूल रहे और उधर बिना बुद्धिजीवी बने /दिखे ही भाईयों ने अट्टालिकाएं खडी कर लीं ,अकूत धन वैभव जुटा लिया ...बुद्धिजीवी बिचारा कंधे पर झोला टाँगे पैरो में चमरौधा -पनही पहने एक उम्र पार कर गया और कहीं किसी अनजान से कोने में कुत्ते से भी बदतर स्थिति में दम तोड़ गया -कई दशकों पहले जब बुद्धिजीवी बनने की ऐसी ललक दीगर भाई बंधुओं में दिख जाती थी तो शुरू शुरू में उन्हें कामरेड का संबोधन और लाल सलाम मिलते रहते थे और वे फूल फूल कर कुप्पा होते अपनी उस मंजिल की और बढ़ते जाते थे जो दरसल कहीं वजूद में थी ही नहीं ....इक कदम जो उठा था गलत राहे शौक में मंजिल तमाम उम्र मुझे ढूढती रही ....जो इतिहास से सबक नहीं लेते वे जागरूक नहीं होते ..""
    बहुत सटीक विश्लेषण .पूरी की पूरी पोस्ट जानदार है और चिंतन के लिए आग्रह करती चलती है.

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  7. कमाल की पोस्ट लिखी है आज !
    पी एन सुब्रमनियन पर आश्चर्य और बेनामी ठीक लगे ! अगर बुरा लगे तो क्षमा प्रार्थी हूँ भैया !

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  8. ईश्वर मुझे शक्ति दे कि मैं आपकी नाराजी झेल पाऊँ प्रभू !

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  9. जोड़,घटाना,गुणा, भाग कर रहे हैं कि कहीं अपन भी तो इस श्रेणी में नहीं आते ! :)

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  10. अच्छी अच्छी बातें लिखी हैं आपने. कल के गालबजाउ तथाकथित बुद्धीजीवि आज आउटडेटेड हो गए हैं. आज ज़माना तरक़्की की बात करने का है पर उनकी सुई आज भी वहीं अटकी पड़ी है

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  11. ये आप का वाला बुद्धिजीवी असल में गलत अवधारणा है। असल तो वो है जो कहता है जब तक मूरख हैं दुनिया में अक्लमंद को क्या कमी है। ऐसे लोग आज कल आईपीएल में अपने कमाल दिखा रहे हैं।

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  12. बात तो लाख टके की कह दी आपने सर ..और शायद यही कारण है कि बुद्धिजीवी में से बुद्धि बेचारी जीवी से पीछे पीछे चल रही है , और जीवी एकदम मजे में बुद्धि की शुद्धि वुद्धि का ध्यान दिए बगैर मजे से लिखे पढे जा रहा है । वैसे भी मेरे ख्याल से तो जीवी का अस्तित्व्व बिना बुद्धि के भी है .......

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  13. महाराज !
    तुम्हारी बात अच्छों अच्छों की समझ में नहीं आती मैं क्या चीज हूँ ! मगर यार हर समय खिचाई मत क्या करो !...
    सम्मान सहित !
    काश किसी दिन मैं तुमसे डरना कम कर दूं ( सम्मान सहित )

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  14. तुम्हरी दो लाइन ने हरा दिया यार !
    गुरु आज से !

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  15. "उन नारीवादियों का जिन्होंने गुलाबी चड्ढी अभियान चला कर मेरा चड्ढी भय अब काफी कम कर दिया है"... क्षमा कीजियेगा ये अभियान किसी नारीवादी ने नहीं चलाया था...इसी तरह की बातों ने नारीवाद को बदनाम किया है...और जब मुझे समझ में ही नहीं आया कि ये पोस्ट आपने लिखी किसके या किनके लिये, तो मैं क्या टिप्पणी करूँ?...मैं आपसे पहले भी कह चुकी हूँ कि मुझे व्यंग्य समझ में नहीं आता...सीधे-सीधे अभिधा में कही गयी बात समझ में आती है.

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  16. वाह .. वाह दर वाह .. विचार - स्फुलिंगीय वाह ..
    ........ आपका बुद्धिजीवी बनने का प्रयास सराहनीय है ! ! !
    ...................
    विद्यानिवास जी की एक बात याद आ रही है जिसे एक अलग से परिप्रेक्ष्य में
    मिश्र जी ने उवाचा था -- '' कुछ लोग प्रतिभा और प्रतिभावानों को गाली देने को
    प्रतिभा का निदर्शन समझते है .. '' / यहाँ मुझे प्रतिभा शब्द पर बुद्धिजीवी शब्द को तरजीह
    करने का मन कर रहा है ..
    .................
    @ .सहज होकर अपनी सरल टूटी फूटी भाषा में ही ,न कि ज्ञान का दंभ और आतंक दिखा
    कर अगले पर और अपनी बुद्धिजीवी होने की धाक जमाने की नीयत से....
    --------- क्या सच में वह अनुवाद इतना पीड़ादायी था ... आपके अलावा और किसी ने ऐसी
    शिकायत तो नहीं दर्ज की !
    ............
    @ ...हाँ ब्लॉगजगत में उनकी पहचान उनके पोस्टों से की जा सकती हैं -कम हैं ,मगर
    हैं ! [और] ... तुम्हे अपनी रोजी रोटी भी चलानी है!और हाँ टिप्पणियों से मत भरमाओ ,वे
    तुम्हारी बुद्धि पर नहीं दीगर बातों पर तरस खा रही हैं ..
    ----------- अरे प्रभु इतना गुण विवेचन की आवश्यकता नहीं थी , सीधे नाम लिख देते .. गिरिजेश जी
    को भी गुना-भाग-जोड़-घटाव की मेहनत न करनी पड़ती ..
    वैसे इतने सब के बाद भी मैं पूरा कूल हूँ ... परेशान मत होइएगा ...
    मार्क्सवाद का कुछ नहीं बिगड़ेगा .. यह आज भी अमेरिका जैसे पूंजीवादी देश के प्रत्येक विश्वविद्यालय में
    बड़े आदर के साथ पढ़ाया जा रहा है , ज्ञान व 'इंटेल' का संबंद्ध है इससे और उस '' खादी नेकर - भगवा चोला '' से ज्यादा ही ..

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  17. लीजिये अब तो बुद्धिजीवी की आप की अवधारणा ही असल में गलत सिद्ध (यानी स्वयंसिद्ध) हो गयी है, ठीक वैसे ही जैसे राम का अनस्तित्व और चीन की सरकार और मओवादिओं की जनप्रियता स्वयंसिद्ध है।
    ;)
    झूठ के पाँव नहीं होते हैं मगर कुछ विचारों (बिचारों की बात नहीं कर रहा हूँ) के नसीब में घिसटना और घसीटना ही लिखा हैं. मगर हमें तो इसमें भी प्रभु-इच्छा ही दिखती है -
    होइहै वही जो राम रची राखा, कोकहीं तर्क बधावे साखा...

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  18. @ गिरिजेश जी ,
    अच्छा लगा आप इर्द-गिर्द तो हैं .. भले ही लक्ष्य नहीं हैं .. आप बेफिक्र रहिये मैं भी तो
    'कूल' हूँ ..
    @ सतीश जी / ईश्वर मुझे शक्ति दे कि मैं आपकी नाराजी झेल पाऊँ प्रभू !
    ----------- भरोसा है इश्वर पर कि मुझे उसने यह शक्ति थोड़ी-बहुत दे दी है .. अभी तो काम चल रहा है , नहीं
    तो मैं भी आ जाउंगा आपके साथ शक्ति-आराधन में !
    & @ तुम्हारी बात अच्छों अच्छों की समझ में नहीं आती मैं क्या चीज हूँ !
    ------------ यहाँ पर अब तो मामला कुछ 'डिकोड' सा हो चुका होगा .. कुछ आसानी हुई होगी ...

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  19. अरे अरे आज गुस्सा किस पर भाई ???

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  20. shandar, bahut hi satik mudde pe satik lekhan.

    bhai sahab, ye buddhijivi dikhne ka shauk hi hai jo blog jagat par bahudha jhalta hai kai blogs par....

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  21. मुझे तो कुछ समझ में नहीं आया।
    संदर्भ से ही अनभिज्ञ हूं।

    अब आप फिर सो नीरो मत कहने लगिएगा मुझे...:)

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  22. फ्रेंच तो अपनी डिफौल्ट ही उगती है. एक झुला का जुगाड़ करना पड़ेगा :)

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  23. खुद का लिखा/कहा खुद ही समझा तो क्या समझा ,मजा तो तब है कि आपने कहा और दूसरे ने समझा ....PURI POST ME YE HAI GURU MANTR THANKS SIR

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  24. जील ,दिल बहलाने या लुभाने ?

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  25. @अमरेन्द्र जी ,
    एक बुद्धिजीवी ही सही गलत -बुद्धिजीवी की पहचान करेगा न -आप तो असली दाने वाले हैं ,
    देखिये मुक्ति जी क्या कह रही हैं -बात अभिधा में किया करिये ,मुझसे तो हो नहीं पाता -शुरुआत जे एन यूं से होनी चाहिये !

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  26. ...बुद्धिजीवी होने और दिखने में भी बड़ा अंतर है -यहाँ भी वही द्वैध है -कुछ दिखते हैं मगर होते नहीं और कुछ होते हैं मगर दिखते नहीं ....

    ...अरे ज्ञान की धारा कृपाण की धार से कम नहीं है -स्वाध्याय करते पूरा जीवन बीत जाए तब भी सही अर्थों में बुद्धिजीवी होना मुश्किल ही है

    ..क्या बात है ! आपने तो बखिया उधेड़कर रख दी तथाकथित बुद्धिजीवियों की। ऊपर उद्धरित ये दो पंक्तियाँ ह्रदय में भी कट-पेस्ट हो गईं।
    -बेहतरीन पोस्ट के लिए आभार।

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  27. Arvind Mishra said...

    जील ,दिल बहलाने या लुभाने ?

    Arvind ji,...Thanks for correction.

    After all,we all are living in some kind of illusion. Ye 'bhulava' hi to jinda rehne ke liye aavashyak hai.

    What life is ?..Vanity of vanities !
    Sab mithya hai..

    Its human nature to look for praises and appreciations, which we do not easily get at home (taken forgranted) or at work place (where they deliver less and expect more).

    Hence the virtual world !....People come here to get what they fail to achieve in real life.Residents are increasing here also...Soon we have to look for another world as this (virtual) world is also having population explosion.

    Buddhijivi hona kon nahi chaahta...Intellect is relative....It cannot be absolute. I bow my head in front of intellectuals and i appreciate those who are trying hard to be categorised as buddhijivi.

    But the question is......Who will decide who is buddhijivi?

    Aren't we all imperfect somewhere or the other?

    In this huge creation (universe)...aren't we all just miniscule?

    Then how one can survive?...Don't we need some illusion to live?.....Kya bura hai agar khud ko is 'behlave main rakha jaye ki hum bhi buddhijivi hain...

    punah..."dil behlane ko ye khayal achha hai Galib"

    By the way reading and writing is indeed intellectual's domain. May be some are extraordinary and some are not up to the mark.....but sabhi ke prayas saraahniya hain.

    I honestly feel....

    "All that glitters , is not gold"

    As far as....."बुद्धिजीवी दिखना भी एक शौक है,एक चस्का है !"......

    I indeed love to be among intellectuals...."teri buddhi ke siva , duniya mein rakha kya hai..."

    Ek hi 'chaska' hai humara......"Ginger tea"

    Khoob Gujregi jab mil baitheinge deewane do.

    Iss shandaar post ke liye aapko shat shat Naman !


    .

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  28. @Zeal,
    Agreed Zeal,
    Adrakh chaay kee chuskee Mubarak!
    What I dislike most is pseudo intellectualism, masquerading as an intellectual and the pretensions of being a true intellectual ...
    and why you are perturbed ?you definitely don't fall in any such category....
    Its not good to enjoy the elixir of life that is your ginger tea alone ,why don't you share it with lesser mortals! don't have extra cups?No problem intellectuals can share the same ,,baaree baree se ...

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  29. बहुत बढ़िया प्रसंग! उम्दा प्रस्तुती! बधाई!

    उत्तर देंहटाएं
  30. पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ , हुआ न पंडित कोई
    ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होई

    प्यार बांटते चलो

    उत्तर देंहटाएं
  31. पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ , हुआ न पंडित कोई
    ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होई

    प्यार बांटते चलो

    उत्तर देंहटाएं
  32. मेरा भी किसी महिला बुद्धिजीवी से कभी पाला नहीं पड़ा. वरना मैं भी स्टीरियोटाइप बुद्धिजीवी दिखने की कोशिश तो करती ही, छद्म-बुद्धिजीवी.

    उत्तर देंहटाएं
  33. @ दिव्या जी,
    जनसंख्या विस्फोट तो आभासी दुनिया में सचमुच हो चुका है लेकिन एक closed group बना कर यहाँ भी वैसे ही रहा जा सकता है जैसे वास्तविक दुनिया में रहस्य वाले लोग रहा करते हैं। ..मैं इसका समर्थक नहीं हूँ।
    आप की टिप्पणियाँ उलझे तंतुओं को सुलझाती हैं। अच्छा लगता है आप को पढ़ना।

    उत्तर देंहटाएं
  34. बुद्धिजीवियों !
    अगर सुप्त चेतना जग जाय तो सही संशोधन करें ---
    पहले तो वह शेर लिख दें जिसपर इतना होने के बाद भी ग़ालिब के नाम के साथ अन्याय बंद नहीं
    किया गया है .. ( बड़े अंधे संशोधन होते हैं कभी-कभी ).. वह है ,---
    '' हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
    दिल के खुश रखने को गालिब यह ख्याल अच्छा है।''
    - न तो कहीं 'दिल लुभाने' है और न ही कहीं 'दिल बहलाने' की बात है शेर में , अरे जब ग़ालिब का
    नाम ले लिया है तो जो भी लिखिए जिम्मेदारी पूर्वक लिखिए , क्या यह छद्म बुद्धिजीविता नहीं है ?
    कहाँ चला गया है व्यास-ज्ञान ? संशोधन भी बौद्धिक - अंध - दृष्टि के साथ ?
    .
    चलिए आगे आते हैं --
    जे.एन.यूं. नाम आपके जुबान पर आने से ज्यादा देर तक नहीं रह सकता था , इसका हमें विश्वास था ..
    '' कुछ बात है हस्ती मिटती नहीं हमारी '' , क्या करेंगे आप ?
    यहाँ (इस पोस्ट का ) बुद्धिजीवी-प्रलाप अरण्य-रोदन ही तो है ?
    आपके मुहाविरे पर जाऊं --- '' कब तक यह थोथा चना चबैना लेकर चलोगे ....(थोथा चना बाजे घना .)
    गावों में इधर एक कहावत कही जाती है बिच्छी का मन्त्र ही न जाने कीरा के मुंह में अंगुली डाले...
    .कितना खतरनाक है यह .....मतलब अधजल गगरी भले ही छलकती जाय .. ''
    काहे इतना भभक रहे हैं .. जो होना है वह तो होगा ही ..
    आप भी 'कूल' रहें .. मतभेद तो होता ही रहता है , पर अफ़सोस है आप तो जैसे बौद्धिक - नियंत्रण ही
    खो रहे हों ..
    .
    वैसे व्याख्या के लिए इस पोस्ट को विखंडित ( डीकंसट्रक्ट ) करने लगूंगा तो दो परिणाम निकलेंगे -
    १) आप भीति-क्रोध-दर्प की मनःस्थिति को न पहुँच जांय , जो कि मैं नहीं चाहता ... और ,
    २) अंध-श्रद्धा में झुकी 'नमन-प्रजाति' कहाँ मुंह दिखाने लायक रहेगी ..
    इसलिए ऐसा नहीं करूंगा ..
    और हाँ , हमें बीछी का मन्त्र पता है , कीरे का भी पता है , इसलिए कीरे के मुंह में उंगली दाल ही देता हूँ !
    कुछ कीरे उंगली से ही मानते हैं तो क्या किया जाय ? मुझको भी क्या फरक पड़ता है !
    .
    आभार !!!

    उत्तर देंहटाएं
  35. @ Arvind ji-

    ............What I dislike most is pseudo intellectualism, masquerading as an intellectual and the pretensions of being a true intellectual ...

    Who on earth likes pretensions?....I Guess no one likes that. But Everyone has there own way of living/thinking/presenting themselves. We cannot ask anyone to change or adapt the way we wish to. We cannot serve knowledge to anyone in a glass , like Lemonade.Some are born genius !..Some are acquiring knowledge.....Some are curious and inquisitive....some are working hard....Some are delivering....some are trying......

    But fortunately all are trying their level best...."Karmanyewadhikaraste.........".........."Do your duty reward is not thy concern".

    If first position is not assured , one cannot quit trying...

    Sabhi ke prayaas saraahniya hain....I believe in encouraging people , not in discouraging anyone.

    But yes encouragement doesn't mean to FLATTER anyone, which is quite common in blog-world also , like anywhere else. Number of comments makes a person feel like 'GOD'. But Alas Quantity is not important...What matters is 'Quality'.

    Author must feel buoyant by the number of comments they get. They must appreciate the valuable comments they get. They must humbly accept if any mistake is being pointed out by someone. [Eg- Sameer Lal ji disregarded the valid point raised by Rajesh ji in his blog].

    "Phal aane par daliyan vinamrata se jhuk jaati hain."

    now coming to your another mention...

    @...and why you are perturbed?

    Being perturbed is something that doesn't exist in my dictionary.

    I love to read-think-analyze-assimilate and then i present my views with utmost sincerity , honesty, gravity and without any kind of bias and fear.

    Arvind ji- waiting for your next comment...meanwhile i am in kitchen with Sandhya bhabhi, fixing Ginger tea....If you want to join us...You are also welcome.

    PS- My request to few bloggers...kindly do not try to contact me through mails. If you like my comments..appreciate or criticize in public.I will try to answer you all..But don't pester me through mails.

    Be right back...after the commercial break...

    Smiles ..

    उत्तर देंहटाएं
  36. आईना वही रहता है, चेहरे बदल जाते हैं...

    सिद्ध खुद को आचरण से सिद्ध करता है, न कि ज़ुबानी जुगाली से...

    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  37. @ zeal
    ....... @ PS- My request to few bloggers...kindly do not try to contact me through mails. If you like my
    comments..appreciate or criticize in public.I will try to answer you all..But don't pester me through mails.
    --------------- संभव हो तो उस ब्लोगर का नाम लिख दें , जिसने आपको मेल किया है , वह क्यों ऐसा किया शायद यह भी बताये ..
    अगर समस्या सार्वजनिक तौर पर रखी जा सकती है तो उसका नाम क्यों नहीं ?

    उत्तर देंहटाएं
  38. @अमरेद्र ,
    आखिर दाढी का तिनका तेज मची खुजली में दिख ही गया -और यह भी कि अवधी विरासत कैसे जे एन यूं में जाकर तार तार हुई जा रही है वह भी ...
    ग़ालिब का सही शेर उधृत कर आपने निश्चित ही बाजी(?)मार ली ...शुक्रिया ! आपकी बुद्धिजीविता का लिटमस टेस्ट भी हो गया, .सलाम !
    आपने साबित कर ही दिया कि सारी पोस्ट आपके ऊपर ही लिखी गयी थी -फोकस आफ अटेंशन होने के लिए बधायी!
    अब खुले तौर पर इसे आपको ही समर्पित कर दिया जाना ही श्रेयस्कर है ..
    हाँ जे एन यूं वाले से कौन नहीं डरेगा ? रोजी रोटी चलती हैं न सारे देश वासियों की ..

    "अफ़सोस है आप तो जैसे बौद्धिक - नियंत्रण ही
    खो रहे हों ." मेरी आपत्ति है इस वाक्य पर ..यह अभद्र और अशिष्ट है और अक्षम्य भी ...पिता माता ने कुछ भी शिष्टाचार नहीं सिखाया ?
    आप निराश करते हैं अमरेन्द्र ! या किसी के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं ?

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  39. @ Girijesh ji-

    Thanks for the appreciation . Liking is often mutual. I also enjoy reading your unbiased, logical and honest comments.

    @ Amrendra ji-

    I conveyed my request, not to write unnecessary mails to me. Concerned people must have understood. There is no point humiliating anyone by mentioning their names.

    उत्तर देंहटाएं
  40. Zeal,
    Your views are intelligible,explicit and don't demand for any further clarification,
    it was perhaps a deep rooted/pent up anguish to certain type of people in society which got the vent here after reading a post by a fellow blogger.
    Pretensions in the name of intellectualism is dangerous for society ..we already have had such lessons from history -lysekoism and all that ....so it was my spontaneous fall out to such things ! thanks for the brilliant input!
    Amrendra seems to be restless to hear from you ...plz oblige him!

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  41. @ Khushdeep ji-

    I agree..."Actions speak louder than words"....But in this virtual world actions are conveyed through words only...No other option.

    @ Arvind ji-

    Thanks.

    उत्तर देंहटाएं
  42. @ अरविन्द जी ,
    दाढी और तिनका आपको दिखने लगा , बधाई हो ! मुझे लगा जैसे कुछ नहीं दिख रहा है आपको !
    आँखें काम करने लगी हैं , मैं इसमें भी खुश हूँ ...
    अवधी विरासत ने जे.एन.यूं. में ही आकर 'अवधी विरासत' का मतलब समझी ! सो वह जे.एन.यूं. में
    तार तार नहीं होगी .. पुष्पित - पल्लवित होगी ..
    .
    @ ग़ालिब का सही शेर उधृत कर आपने निश्चित ही बाजी(?)मार ली ...
    -------- जी हाँ , अगर सही कहने का मन होगा तो सौ बार बाजी मारूंगा .. लिटमस टेस्ट सब नहीं दे पाते ..
    '' कबहुँ न भडुवा रन चढ़ें , कबहुँ न बाजी बम्ब ! ''
    .
    @ फोकस आफ अटेंशन होने के लिए बधायी!
    -------- आपको बधाई देने की हार्दिक इच्छा है तो मान लेता हूँ .. अपमान की कर्मनाशा में क्या पहली बार नहा रहा हूँ !..
    .
    @ हाँ जे एन यूं वाले से कौन नहीं डरेगा ? रोजी रोटी चलती हैं न सारे देश वासियों की ..
    --------- कितना मुझे जे.एन.यूं. से सम्बंधित उलाहने देंगे .. ये नए नहीं हैं .. सुनता ही रहता हूँ इन्हें .. सीखना भी
    इन्हीं उलाहनों से होता है .. हमेशा कुछ न कुछ सीखता रहता हूँ ... और हाँ देश का बौद्धिक गढ़ है यह विश्वविद्यालय , यह
    बात निर्विवाद सच है .. ब्लॉग-जगत की कोई गदह - पचीसी ( आपकी पोस्ट का शब्द ले रहा हूँ ) अपना सर पीटने के अलावा
    और कुछ नहीं कर सकती .. ज्ञान का मक्का है यह , स्वतंत्रता का 'इडेन गार्डेन' है यह , मुझे इसपर गर्व है .. बाकी ज्यादा क्या कहूँ ..
    .
    @ यह अभद्र और अशिष्ट है और अक्षम्य भी ...पिता माता ने कुछ भी शिष्टाचार नहीं सिखाया ?
    ------- मेरा वाक्य नागवार गुजरा कोई बात नहीं ... ब्लॉग-जगत पर क्या ऐसा व्यवहार[इससे भी ज्यादा] अन्यत्र नहीं करते आये हैं ?
    और यह भी कह दूँ कि जे.एन.यूं. मेरी अस्मिता (आइदेंतिती) की बहुत बाद की कड़ी है , माँ-बाप पहली कड़ी हैं , वहाँ से बात उठेगी
    तो मुश्किल होगी आर्य ! अनुरोध है कि ऐसा न ही करें !
    .
    @ आप निराश करते हैं अमरेन्द्र ! या किसी के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं ?
    -------- निराश क्या होना ! .. निराशा तो भावनामयता की पृष्ठभूमि मांगती है .. जहां आप इस तरह की बौद्धिक (?) रगड़-घस्स कर रहे
    है वहाँ निराशा जैसी बात को कहना आपको हास्यास्पद बनाना है .. याद है , सलीम खान का परिप्रेक्ष्य ! , जहां मैंने यही बात आपसे
    कही थी और आप मुझे बच्चे का ''लक्ष्मनी-शर-संधान'' का आरोप लगाते रहे !
    सो , इस निराशा की हकीकत मुझे भी पता है ........
    .
    @ ... किसी के एजेंट के रूप में काम कर रहे हैं ?
    -------- सही कहा आपने ! ... हूँ एजेंट , अपनी बुद्धि का ! ... अपने मन का ! ... उन्मुक्त भावों का !...दुःख देने वाले के प्रति 'प्रतिदुखदायी
    प्रतिबद्धता का '!..
    पर इनका मोल आप क्या समझेंगे ..
    आ गए न पर्सनल अटैक पर ..
    जब कुछ नहीं साधता तो व्यक्ति इसी पर आ जाता है ..
    कौन है ब्लॉग-जगत में जो मेरी बुद्धि को नियमित-निर्देशित करने की हिम्मत रखता हो ..
    आपका ऐसा कहना '' अभद्र और अशिष्ट है '' , अक्षम्य शब्द नहीं कहूंगा .. क्योंकि अभी भी आपके ब्लॉग पर बना हूँ जिसदिन ऐसा हो जाएगा
    उस दिन 'अलविदा' कह देना होगा ..

    उत्तर देंहटाएं
  43. @ Zeal & अरविन्द जी ,
    Zeal ,
    ह्यूमिलेसन की कोई बात ही नहीं .. इस तरह आप उपकार ही करेंगी उसपर ..
    संभव हो वह व्यक्ति इस सार्वजनिक तौर पर लज्जित होकर ई-मेल करने की कमजोरी से उबर जाय ..
    किसी को मजबूत बनाने के लिए थोड़ा सा ह्यूमिलेसन भी बड़े और उदारमना लोग करते आये हैं .. सो
    आप थोड़ा परोपकार भी कर देवें , उस मूर्ख मेल करने वाले व्यक्ति के लिए .. आपसे निवेदन है .. ...
    @ Amrendra seems to be restless to hear from you ...plz oblige him!
    अरविन्द जी,
    कृपया , उपकार/एहसान (ओबलाइज) की भीख न मांगिये मेरे लिए , कोई हक़ नहीं बनता किसी को इसका ..
    मैं न भीख मांगूं न इसकी वकालत पसंद करूँ !
    मैं अशांत/बेचैन ( रेस्टलेस) नहीं हूँ ..
    अगर ऐसा हूँ भी तो इसी में खुश हूँ ..
    क्षण भर जलना श्रेयकारी होता है [ मुहूर्तमपि ज्वलितं श्रेयो ..]

    उत्तर देंहटाएं
  44. @Zeal,

    Thanks but action-reaction (even written) is also a sort of action and it is delivering...

    Agree to disagree (Is n't it a cliche of blogging specially Hindi blogging)

    Jai Hind...

    उत्तर देंहटाएं
  45. अमरेन्द्र जी .
    आपका मामला कुछ लाईलाज सा लगता है ,यह कोई सहज बोध नही रहा अब ! .
    सत्यापित हो गया है .
    अभी समय लगेगा और लम्बा लगेगा आपकी विमुक्ति में
    शुभस्य शीघ्रम -प्रस्थान करें महानुभाव यहाँ !
    आपन तेज संभालो आपै ,
    यह ब्लॉग आपके रहने न रहने से सुहाग -वैधव्य का की गति/दुर्गति नहीं पायेगा
    यहाँ कम बौद्धिकों से ही काम चलता रहेगा !
    कहीं और धूनी रमायिये ,
    आपने बहुत कह लिया अब आप यहाँ बैन किये जाते हैं !

    उत्तर देंहटाएं
  46. मुझे लगता है कुछ अतिरेकी हो रहा है यहाँ !
    यहाँ कम से कम बुद्धिजीवी की एक भी भूमिका नहीं दिख रही मुझे !

    @ अरविन्द जी,
    आलेख थोड़ा और ’बैलेन्स’ होता तो...

    @ अमरेन्द्र,
    कुछ संकोच तो करना ही चाहिए ! शक्ति का व्यय है यह, अपव्यय नहीं कहूँगा ! चेतन बनिए अनुज ! कहीं पढ़ा था, (अपनी डायरी में लिखा भी है )-
    "चेतन प्राणी अपने भीतर सदा गति के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा तो पाता ही है, पुनरपि अनुद्वेलित होकर जहाँ हैं वहीं पड़े रहने की विश्रामकामना भी निसर्गतः अपने में पाता है ।" - वैसे है तो यह द्विविधा की स्थिति ! मूलतः तल्लीन नहीं, विलीन होने की इच्छा ।
    अब यह मत कह देना कि, यह अप्रासंगिक बात क्यों लिख बैठे ! कुछ तो जोड़ है इधर !
    एक अप्रासंगिक-सा लिंक और दे रहा हूँ अपने ब्लॉग से -
    सच्चा शरणम्: जो प्रश्न हैं अस्तित्वगत...

    उत्तर देंहटाएं
  47. अरविन्द जी ,
    मैं सदैव कहता रहा कि मतभेद मनभेद नहीं होता , पर आपको समझ में न आ सका , कोई बात नहीं !
    आपको तब से पढ़ रहा हूँ जब से ब्लॉग - जगत को जानने लगा , इसलिए यह 'बैन' थोड़ा कष्ट तो दे ही रहा है !
    पर कोई बात नहीं ..
    धूनी रमाना आपका प्रिय क्रिया-कर्म है , जिस फ्रेम में मैं नहीं फिट हो सका , सो इसे आप ही बेहतर कर सकते हैं ..
    संभव हो आपको 'मामला लाइलाज सा' लग रहा हो , पर यह भी निर्णय समय और अन्य लोगों पर छोड़ दीजिये ..
    सबसे बड़े पारखी आप ही नहीं हैं , शायद !
    अपना क्या है .. गंवार हैं .. जब तक दिल्ली में हैं , 'नेट' की सुविधा है .. गाँव चले जायेंगे तो कुएं की जगत पर
    चर्चा करेंगे .. पड़ोसी के छप्पर में हाँथ लगायेंगे .. यादव जी के यहाँ माठा पियेंगे .. बैल खूंटा उखाड़ लेगा और हम
    उसे फिर गाड़ेंगे-ठोंकेंगे .. बस यही जिन्दगी है .. तब तो यही होगा न ! , ''भूली गया यह देस '' !
    पर आपको यह दुनिया मुबारक हो !
    आप नाहक हमें सो काल्ड बौद्धिक की कोटि में रख बैठे ! गंवार कहते तो खुश होते हम भी !
    यह सब तो आप ''सभ्य-समझदारों'' की दुनिया है !
    आह्लाद लीजिये , अंतिम में बस यही मंगल-कामना है ---
    '' सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
    सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्॥''
    हाँ अब आपके यहाँ मेरे कमेन्ट कभी आपको किसी तकलीफ में डालने नहीं आयेंगे ! अब तक हुई तकलीफ के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ !

    उत्तर देंहटाएं
  48. क्या खूब लिखा है अज्ञानता और महानता के बीच बड़ी पतली लकीर होती है
    खुद का लिखा/कहा खुद ही समझा तो क्या समझा ,मजा तो तब है कि आपने कहा और दूसरे ने समझा
    क्या सुन्दर अभिव्यक्ति है

    उत्तर देंहटाएं
  49. अरे यहां तो पहले ही काफी बौद्धिकता भरी बातें हो चुकी हैं ...लेकिन ये समझ में नहीं आया कि आप कौन सी बौद्धिकता की बातें कर रहे हैं ...वो जो मेरी श्रद्धा का केंद्र है या कि वो जिससे मैं आतंकित रहता हूँ ?

    उत्तर देंहटाएं
  50. @अमरेन्द्र आपका स्वागत है यहाँ ,अब आप अपनी मर्जी से आ जा /नहीं आ जा सकते हैं -आपको शाक देना जरूरी था -नई सृजनशीलता जनमता है ऐसा शाक !
    मुझे भी तो वहीं लौटना है जहां आपको !

    उत्तर देंहटाएं
  51. "बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी"
    पता न था कि बात में से बात निकलेगी और फिर इतनी दूर तलक निकल जायेगी.

    व्यक्तिगत टिप्पणियों पर कुछ भी नहीं कह सकता हूँ मगर इतना ज़रूर कहूंगा कि लोकतांत्रिक देशों के विश्वविद्यालयों में मार्क्स पढाये जाने में मार्क्स की नहीं बल्कि लोकतंत्र की महानता सिद्ध होती है जो अपनी जड़ काटने वाले की जड़ें नहीं काटते हैं. काश हम सब ह्रदय से लोकतांत्रिक हो पाते तो यह जगत (और ब्लॉग-जगत) और सुन्दर होता.

    उत्तर देंहटाएं
  52. @अरविन्द जी, अमरेन्द्र जी

    मेरा एक मित्र एक शेर सुनाता रहता है जिसका भाव यह है:
    "मित्र! लड़ो, कर लो दुश्मनी लेकिन इतनी नहीं कि बाद में फिर से मिलो तो नज़रें चुरानी पड़ें।"
    आप दोनों लोग 'बुद्धिजीविता' से बाज आएँ या मैं अपनी बुद्धिजीविता दिखाऊँ? :)
    बचपन में गलियों में खेलते बच्चे बड़ा जुगुप्सित सा कुछ गाते थे - "झगड़ा झुगड़ी माफ करो ..... "
    आशय वही था कि मित्रों (पसन्दीदा होना, फैन फान होना इन सबको मेरी बुद्धिजीविता मित्रता ही मानती है)के बीच के झगड़े बढ़ जाने पर बहुत शर्मनाक स्थिति पैदा कर देते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  53. आप दोनों लोग दण्ड स्वरूप मेरी ताजी पोस्ट पर तीन तीन टिप्पणियाँ करेंगे:

    http://girijeshrao.blogspot.com/2010/04/6.html
    (1) एक ठकुरसुहाती वाली

    (2) एक निर्मम आलोचना वाली

    (3) एक निरपेक्ष

    मित्रों के बीच की लड़ाई से कुछ फायदा तो होना ही चाहिए :) न न बिल्लियों के झगड़े में बन्दर वाली कथा यहाँ फिट नहीं बैठती :) :)

    उत्तर देंहटाएं
  54. @गिरिजेश जी आप तो बहती गंगा में हाथ धोने लगे ....
    वो अंगरेजी में इसी को कहते हैं ना
    फिशिंग इन ट्रबलड वाटर !
    यह दुनिया अगर ऐसी ही है तो क्यों है ?

    उत्तर देंहटाएं
  55. बुद्धिजीविता इसी को कहते हैं ;)

    उत्तर देंहटाएं
  56. बहुत बढ़िया प्रसंग! उम्दा प्रस्तुती! बधाई!

    बबली जी से सहमत!

    उत्तर देंहटाएं
  57. Place a full stop...or a comma at least....( the sooner , the better).

    उत्तर देंहटाएं
  58. @ अरविन्द मिश्र !
    आपसे शिकायत है पोस्ट और टिप्पणियां दोनों के लिए ...आपसे अपेक्षाएं अधिक होना स्वाभाविक है !
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  59. मैच ख़तम होते-होते और टिप्पणियां आ जातीं तो बहस आगे बढ़ती. वापस आता हूँ.

    उत्तर देंहटाएं
  60. @अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी,
    अरविन्द मिश्र का उखड जाना अस्वाभाविक क्यों मान रहे हो, आप खुद उनके प्रसंशक रहे हो तो गुरु की खामियों को क्या गिनना, रह गयी बात गुरुता की तो कहीं चेलों के कारण वह भी अस्वाभाविक नहीं !फिर भी यहाँ कार्यरत सैकड़ों धूनियों के मध्य इस धूनी में कुछ सूफियाना मज़ा आता है !

    उत्तर देंहटाएं
  61. .
    .
    .
    आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

    ससम्मान कह रहा हूँ कि अच्छा नहीं लग रहा यह प्रसंग-वार्तालाप-बहस... कुछ कड़ुवाहट सी आ गई है टिप्पणियों के आदान-प्रदान में... न जाने क्यों... बिगड़े के सुधार की अपेक्षा रहेगी उभय पक्षों से...

    उत्तर देंहटाएं
  62. आई.पी.एल का मैच कल खत्‍म हो गया। एक भारतीय हार गया और दूसरा भारतीय जीत गया। दर्शक दो भारतीयों के लड़ने का मजा लेते रहे।

    उत्तर देंहटाएं
  63. @ अरुणेश मिश्र
    "आनन्ददायक?"

    लोग कहाँ-कहाँ से आनंद टान लेते हैं?

    उत्तर देंहटाएं
  64. खुद का लिखा/कहा खुद ही समझा तो क्या समझा ,मजा तो तब है कि आपने कहा और दूसरे ने समझा ....
    बहुत सही कहा आपने...विचारणीय लेख है....स्वयं का आंकलन करना चाहिए...

    उत्तर देंहटाएं
  65. भभ्ड़ मचती देख कर
    चकरा गये समीर
    जुटे हुए सब साथ में
    सूफी, संत, फकीर....



    :)

    उत्तर देंहटाएं
  66. यहाँ ये जो कुछ हुआ , सब दुर्भाग्यपूर्ण हुआ!
    अभी देखा ये सब..बुरा लगा .
    आशा है सुलह के रास्ते बंद नहीं हुए होंगे.

    उत्तर देंहटाएं
  67. अरविन्द जी
    बेहद निराश किया आपने
    हद से ज्यादा
    -
    बहुत कुछ कहना चाहता हूँ
    लेकिन कोई फायदा नहीं
    -
    जाने कैसी मदहोशी है
    आपको स्वयं ही नहीं पता होता कि आप क्या कर रहे हैं
    -
    अपनी ऊर्जा यूँ अपव्यय न कीजिये
    -
    पटाक्षेप की आशा में

    उत्तर देंहटाएं
  68. @प्रकाश जी ,
    अच्छा लगा आपने अपने आईवरी टावर से मुंह तो दिखाया -कायनात धन्य हुयी !
    मैं तो नहीं समझ पाया की ये मैंने क्या कहा मगर आप तो समझ ही गए होगें .

    उत्तर देंहटाएं
  69. @ सारथी पर मेरी प्रतिक्रिया !
    अरविन्द मिश्र और आपका यह मिलन अच्छा लगा शाष्त्री जी ! निस्संदेह आचार्यवर अरविन्द मिश्र ब्लागजगत में अपनी बेवाकी के लिए मशहूर ( बदनाम ) हैं, मगर मुझे लगता है कि वे ईमानदार और सुह्रदय हैं ! आजकल उनकी इसी कटाक्ष युक्त बेवाकी और साफगोई के कारण कुछ "विशाल ह्रदय लोग" उनसे नाराज हैं और अरविन्द मिश्र अपनी सफाई भी नहीं दे रहे :-), आप ही समझाएं शायद वे आपकी बात मन जाएँ और अपना मत व्यक्त करें !
    ५०००० से अधिक की इस भीड़ चाल में गलत फहमी के कारण भी, कई बार अच्छे लोगों को बुरा सिद्ध कर दिया जाता है ! अक्सर विद्वजन मूर्खों को जवाब नहीं देते मगर सामने अगर कुशाग्रबुद्धि अभिमन्यु हो तो जवाब न देना, उसे खोना नहीं कहा जायेगा ? और भटके बच्चे की पीठ थपथपाने बहुतेरे विद्वान् इंतज़ार में हैं !

    उत्तर देंहटाएं
  70. हमारे यहाँ कुछ बुद्धिजीवी भागवत मे प्रवचन भी करने लगे है ।

    उत्तर देंहटाएं
  71. बड़ी बमचक मची है यारो.....बड़ी बमचक। और वह भी बुद्दिजीवीपन को लेकर।

    मुंबई धमाकों में हम सभी को छोड़ गये कवि श्याम ज्वालामुखी जी का कहना था कि बुद्धिजीवी वह होता है जिसे कि यदि तबेले की गायों को गिनने कहा जाय तो वह सबसे पहले तबेले में स्थित गायों के पैर गिनेगा और उसे चार से भाग देगा।

    अब इसके आगे तो अपन बुद्दि पर जीवनयापन करने वालों पर ज्यादा न कह सकेंगे।

    उत्तर देंहटाएं
  72. Bhai jee log, baki sab toh theek hai, lekin ee apane chutiyafe mein hamari universitiya (JNU) ko kahein kheench rahe ho yaar? sala koi buddhijeevee howe ya na howe humko uss bahas mein padana nahi hai bakir ek baat to hum kahabe karab ki yaar ee internet ya anterjaal ko "pachbajana mohalla" na banao yaar. Jumma jumma 4 din hue mujhe iss blog world pe aaye hue. Shuruaat Shatish pancham ke safed ghar se hui phir ek aise aalsi se mukka laat hui ki ab main bhi aalsi ban ke baitha rahata hoon prem patra aur bau charcha ki pratiksha mein. Pahale (jab shayad blog ka chalan nahi tha) kabhi kabhi kuchh likh leta tha par ab kewal padh ke hi swayam ko kritarth maan leta hoon. Jitana dekha, soncha aur samajha, usaka mere liye, meri jindagi mein bas ek hi nishkarsh nikala hai ki JNU ne mujhe bahut kuchh diya hai aur aaj JNU chhodane ke 12 saal baad bhi jab bhi mauka milata hai ya mann karataa hai to hum JNU chale jaate hain, G Dhabs pe chai peene, waqt-bewaqt.

    Dukh hua is saari charcha mein JNU ka naam ek galat sandarbh mein uthate hue dekh kar, halaki usase kahi jyada dukh hota hai yeh dekh kar ki aaj ka JNU 90 ke dashak ke JNU se kaafee badal gayaa hai, and as they say,"old is gold", mujhe to apna purana wala hi JNU pasand hai.

    Purana wala ya naya wala, JNU JNU hai aur shayad yahi wajah rahi ki aawesh mein, rosh mein, taish mein, main itana likh gaya jo ki shayad mujhe nahi likhana chahiye tha.aur antatah, banaras ke hamar chachaa hain ego, kahalein ehi sab charcha ke dauraan, bahut pahile, ki BUDDHIJEEVEE ke maane hamara samajh se pocketmaar hola, kahein se ki oo ta aapan buddhi ke prayog kar ke pocket maar ke aapan jeevan yapan karela... Ab oohi din se, hum kam se kam apna ke ta "buddhijeevee" na maani la ......

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