गुरुवार, 29 अप्रैल 2010

अच्छे और बुरे लोग ....1

भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक  बेहद ईमानदार और स्वच्छ छवि वाले अधिकारी जो  इस समय उत्तर प्रदेश में एक उच्च पद को सुशोभित  कर रहे हैं ने काफी वर्षों पहले अपने लिए गए  एक निर्णय पर थोड़ा विचलित  होकर मुझसे पूछा था कि क्या उनका लिया गया निर्णय सही था ...वे  मुझसे वरिष्ठ अधिकारी थे  /हैं ..और चूंकि हायिआर्की का दबाव  ऐसा होता है कि आप ऐसे ही कोई कैजुअल जवाब अपने वरिष्ट अधिकारी को नहीं दे सकते इसलिए मैं थोडा पशोपेश में पड़ गया कि आखिर जवाब क्या दूं -मैं जानता था कि वह प्रश्न उन्होंने तमाम अधिकारयों की भीड़ में मुझसे ही पूछा था -बाकी उनके सामने बिछ जाने को लालायित ही रहते थे- सरकारी सेवाओं में जी हुजूरी की अपनी परम्परा रही ही है -उन्होने मुझसे पूछा, यह मुझ पर उनके विश्वास का तो परिचायक था ही मगर इस सवाल ने मेरे सामने सहसा  ही धर्मं संकट ला दिया था -बॉस को गलत जवाब भी न दूं ,उनकी औरों की तरह चापलूसी करुँ ना करू या सच इस तरह कहूं कि उन्हें मेरा जवाब चापलूसी सा न लगे -और यह कुदरती हुनर है जिसके कभी मसीहा हुआ करते थे बीरबल या तेनालीराम जैसे चतुर दरबारी .शायद उस समय मैंने इन्ही महापुरुषों का ध्यान किया हो ,अकस्मात मुंह से निकल पड़ा -
" सर आपका यह कदम अच्छे लोगों को अच्छा लगेगा और बुरे लोगों को बुरा  ...."
वे मुस्कुरा उठे और बात ख़त्म हो गयी ......मगर अकस्मात मुंह से निकल गयी बात पर मैं तब भी और आज भी वह प्रसंग याद आने पर विचारमग्न हो जाता हूँ .मेरे कहने का निहितार्थ क्या था ,यथार्थ क्या था ? आखिर उस बीरबली बात का क्या था भावार्थ ? मैं आज भी यह सोचता रहता हूँ ...

इसका एक सरलार्थ तो यही है कि दुनिया में एक ही मानसिकता के लोग नहीं होते ....संस्कार  ,परिवार और परिवेश -मतलब रहन सहन के चलते लोगों के अलग अलग व्यक्तित्व हो जाते हैं -एक जैसे विचार ,बुद्धि और व्यक्तित्व के लोगों में जमती है और अलग किस्म के अलग होने लगते हैं ....और यह आभासी दुनिया इस मामले में और भी धोखेबाज है ...मायावी है ..यहाँ लोगों के चेहरे के हाव भाव तो दीखते नहीं हैं -कुदरती निषेध भी समय रहते आगाह नहीं करते ..इसलिए यहाँ कई बिलकुल विपरीत विचारों के लोग धोखे  से पास आ जाते हैं मगर धीरे धीरे उन्हें लग जाता है की गलती हो गयी बन्दा /बंदी तो  अपने गोल की है ही नहीं -मेरे साथ ऐसा हो चुका है -और यह सचमुच बहुत पीड़ा दायक होता है दोनों पक्षों के लिए --ओह कहाँ फंस गए ..किस बजबजाती नाली /नाले में ....कितना समय तो कीचड साफ़ करते ही बीत जाता है...नए दोस्त तलाशो तो भी खतरे वही के वही ....बच के रहना रे बाबा बड़े धोखे हैं इस जाल में .....

तो तय बात यह है कि आप जो कुछ करते हैं वह समान धर्मा ,समान मनसा लोग पसंद करते हैं दीगर लोग नापसंद ..ब्लोगवाणी में  नापसंद की मौजूदा होड़ भी यही साबित करती है ..और लाख कोशिश की जाय ये छोटे छोटे दल यहाँ  बने ही रहेगें ....बल्कि और उग्र होते जायेगें यहाँ,  शन्ति के प्रयास बेमानी है -हम मनुष्य की प्रक्रति को इतनी जल्दी नहीं बदल सकते .संभल सकते हैं .....नीच लोग नीचों   के साथ ही रहेगें और अच्छे लोग अच्छे लोगों के साथ ..वे भी बिलकुल यही सोचते हैं .
पर दरअसल  नीच कौन है और कौन देवदूत ? अपनी अपनी निगाहों में तो सभी देवदूत ही हैं ..
यह चर्चा आगे भी चलेगी ... 






38 टिप्‍पणियां:

  1. "बीरबली बात" आज की जरुरत है, नहीं तो जीवन जीना मुश्किल है ।

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  2. सुन्दर. समान धर्मा ,समान मनसा लोगों में भी यदा कदा असहमति प्रकट हो सकती है.

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  3. हम मनुष्य की प्रक्रति को इतनी जल्दी नहीं बदल सकते .संभल सकते हैं .....नीच लोग नीचों के साथ ही रहेगें
    सहमत !!

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  4. बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलया कोय,
    जो मन खोजा आपना तो मुझसे बुरा न कोय...

    जय हिंद...

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  5. बहुत सही विषय है...हर इंसान की मानसिकता अलग होती है...और हर कोई स्वयं को सही समझता है...

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  6. .
    VIBGYOR !

    There are not just seven colours. Million shades are there.

    Likewise not just two...there are infinite combination and permutations of good and evil. Its an art to get along with all.

    Anekta mein ekta !....what say?

    But yes, i cannot deny..."chor-chor mausere bhai"

    Smiles !

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  7. बहुत ज्ञानदायक आलेख, इसीलिये हम हमेशा ताऊ बनकर रहना पसंद करते हैं. आपने बास को जो जवाब दिया उस समय आपमें ताऊ की आत्मा का साया सवार था.

    रामराम

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  8. अर्विंद जी बुरे लोग इस दुनिया मै नही होंगे तो अच्छो की पहचान केसे होगी जी, मुझे हर तरह के लोग मिले है, अच्छो को रख लिया, बुरे ओर चाप्लूसो को दुसरा ओर तीसरा मोका नही दिया, क्योकि खॊटा सिक्का चलेगा भी नही ओर जेब भी फ़ाडेगा, अच्छा है उसे पहले दिन ही फ़ेंक दो

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  9. Bahut sanjeeda aalekh! Duniyame har qism ke log hote hain..jo baaten hame nagaar guzarti hon,wo ham doosaron ke saath na karen..doosaronko ham badal nahi sakte,khudko badal sakte hain!
    Oh! khushdeep ji tippanee badi sahi hai!

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  10. MR.ARVIND
    who were those people who gives so much value to pasand -napasand?

    there are few criteria by which you can easily opt these people

    they write on every day sometimes even twice.
    they are having two three blogs
    after every second or third post the will write good things about there friend
    some people don"t have writing skills so they will write only on blogs.
    they are those person sends you mail or on chat request to increase pasand but in pubilic they will become mum unfortunately large number of them are female.
    look today top post and think.

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  11. जील ,
    अभी मैं अच्छे और बुरे दो ब्राड श्रेणियों पर केन्द्रित हूँ .,
    सूक्ष्म विवेचन का न अभी मेरा मन है और न माद्दा ही

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  12. पर ये तो ज़रूरी नहीं कि जो आपके जैसी सोच वाला नहीं है, वह गलत है...आपके कहने का निहितार्थ तो कम से कम यही समझ में आ रहा है. --- विपरीत सोच वाले लोग भी करीब आ जाते हैं...और बाद में पता चलता है कि किस नाली में फँस गये...
    ---मेरे ख्याल से विपरीत विचार के लोग भी अच्छे दोस्त हो सकते हैं, बशर्ते हम अपनी-अपनी सोच अपने पास रखें और एक-दूसरे पर थोपने का प्रयास न करें. बहस करें, पर उसमें कटुता न आने दें. ये तो आप खुद ही कह रहे हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग परिवेश के कारण अलग सोच का होता है, तब तो दो लोगों में मित्रता ही नहीं हो सकती...हमारे देश की विशेषता रही है कि यहाँ अनगिनत विचारधारायें, संस्कृतियाँ, सम्प्रदाय , पंथ, धर्म आदि शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना से रहे हैं...
    ...माओ ने तो ये बात बहुत बाद में कही--
    "let the hundred flowers bloom"

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  13. मुक्ति ,
    मैं किसी को बुरा भला नहीं कह रहा हूँ बल्कि केवल यह कह रहा हूँ कि एक जैसे सोच के लोग सहज ही एक साथ हो जाते हैं .
    और खुद को तो अच्छा और दूसरी तरह के लोगों को बुरा मानते हैं -पारस्परिक रूप से ...
    बाकी झेलना तो अलग बात हुयी ,हर कोई किसी न किसी को झेलता ही रहता है जीवन में कभी न कभी .
    विचार- हवि के लिए आभार !

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  14. "हमारे देश की विशेषता रही है कि यहाँ अनगिनत विचारधारायें, संस्कृतियाँ, सम्प्रदाय , पंथ, धर्म आदि शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की भावना से रहे हैं..."
    यह रेटेरिक है अगर ऐसा होता तो खान और तिरपाठी यहाँ तलवारे भाजते न दीखते !

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  15. आपने सही लिखा है कि दुनिया में अनेक मानसिकता के लोग हैं और एक सी मानसिकता वाले व्‍यक्तियों के साथ हमारी मित्रता भी हो जाती है। लेकिन इस आभासी दुनिया में हम व्‍यक्ति से मित्रता नहीं करते, यहाँ हम मानसिकता से या उसे लिखे को पसंद और नापसंद करते हैं। प्रत्‍येक व्‍यक्ति के सारे ही विचार हमारे जैसे नहीं हो सकते इसलिए कहीं विरोधाभास भी हो जाता है। लेकिन दुश्‍मनी तो कदापि नहीं होनी चाहिए। क्‍योंकि हम विचारों का सम्‍मान करते हैं, यदि पसंद आए तो ठीक और नहीं आए तो भी ठीक। क्‍योंकि हम यहाँ ब्‍लाग लिख रहे हैं, अपने जैसे लोग बनाने का ठेका नहीं लेते। इसलिए दुनिया के अध्‍ययन के लिए यह प्‍लेटफार्म श्रेष्‍ठ है।

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  16. आपका प्रश्न बुद्धि अथवा बुद्धि लब्धि को लेकर नहीं है वरन आपने चिंतन प्रणाली / माइंड सेट की विविधता के सवाल के साथ ही उसके परिवेश के अनुरूप अनुकूलित होने का जबाब भी दे डाला है ! इसका मतलब यह हुआ की एक बार परिवेश के अनुकूल माइंड सेट तय हो जाने के बाद किसी अलग परिवेश में पृथक पृथक माइंड सेट्स के दरम्यान पुनःअनुकूलन के बजाये केवल संवाद आधारित सहयोजन की सम्भावना ही शेष बचती है यहाँ पर होता यह है कि माइंड सेट का वैविध्य संवाद आधारित सहयोजन को ना केवल बाधित करता है बल्कि दुष्कर बारगेनिंग से भयाक्रांत भी करता है यही कारण है कि व्यक्ति अपनी सोच की लकुटी कमरिया लेकर फूट लेने में ही भलाई समझता है ! असहमति अथवा नापसंद इसी सहज पलायन की परिणति है.... वैचारिक बारगेनिंग की दुष्करता से पलायन ! पसंद यानि कि चिंतन की सदृश्यता यानि की एक स्कूल आफ थाट इस सिक्के का दूसरा पहलू है ! आप सब जानते बूझते हुए भी वैचारिक द्वन्द से पलायन कर चुके कापुरुषों / पराजित योद्धाओं / संवाद और सहयोजन से भयाक्रांत महानुभावों , पर आलेख लिखते है ...आश्चर्य है ! मेरे लिए बौद्धिक दौर्बल्य ...नापसन्दीदगी का पर्याय और सीना तान असहमति बौद्धिकता का !

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  17. हमें तो ये ब्लागजगत भी किसी मायावी दुनिया से कम नहीं लगता...जितना इसे समझने का प्रयास करते हैं, उतना ही ओर उलझ जाते हैं....

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  18. देखिए अच्छे बुरे के मामले में आदर्श जैसा कुछ नहीं होता। समूह तमाम आदर्शों में से कुछ को मिला कर अच्छाई का एक व्यावहारिक मॉडल बनाता है और मोटा कटेगराइजेशन कर देता है।
    "फलाने में यह दोष हैं लेकिन अच्छे आदमी हैं"

    "फलनवा बहुत दुष्ट है लेकिन ये अच्छाई तो है ही उसमें.."
    एक समाज का कटेगराइजेशन दूसरे में नहीं चलता। बनारस के मानक शायद तिब्लिसी में न चलें। तब भी सभ्य समाज के कुछ सर्वमान्य मानक हैं जिनसे दो विभिन्न समाजों का भी आपसी सम्वाद चलता रहता है। ...ये बात सच है कि "यह आभासी दुनिया इस मामले में और भी धोखेबाज है ...मायावी है ..यहाँ लोगों के चेहरे के हाव भाव तो दीखते नहीं हैं -कुदरती निषेध भी समय रहते आगाह नहीं करते ." ..

    अब लोग इसमें भी इंगित ढूढ़ेंगे। इंगित की ओर ध्यान न देकर बात का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण होना चाहिए।

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  19. जिसकी जैसी प्रवृति होती है, वह वैसा ही सोचता है । आदमी की सोच से ही उसके व्यक्तित्व का आभास हो जाता है।

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  20. दुष्ट क्रियाशील अधिक होते हैं । सज्जन की क्रियाशीलता परिस्थिति के अनुसार होती है । पर अच्छे प्रयास की प्रशंसा अवश्य होती है ।

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  21. संसार में न कुछ भला है न बुरा, केवल विचार ही उसे भला-बुरा बना देते हैं।

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  22. काला है तो ..सफ़ेद की पहचान है.
    आभासी दुनिया वास्तविक दुनिया से अधिक लुभावनी ,सरल परन्तु बेहद खतरनाक भी हो सकती है.
    अगले भाग की प्रतीक्षा है.

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  23. आपकी यह पोस्ट मुझे तो अच्छी लगी ।

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  24. @ यहाँ कई बिलकुल विपरीत विचारों के लोग धोखे से पास आ जाते हैं...
    ये खतरे तो वास्तविक जिंदगी में भी होते हैं ...वो ज्यादा खतरनाक होते हैं ...आभासी दुनिया में तो इग्नोर करके बचा जा सकता है ... वास्तविक दुनिया में झेलना पड़ता है ...

    हर व्यक्ति के अपने विचार होते हैं जो परिवेश और दुनियावी अनुभव से बनते हैं ...बेहतर तो यही लगता है कि अपने विचार किसी पर थोपे नहीं जाए ..." जियो और जीने दो " सिद्धांत रूप में सबके लिए समान रूप से उपलब्ध हो ...

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  25. जन्मजात कोई नीच नहीं होता आर्थिक ,मानसिक,सामाजिक कारणों से मजबूर हो कर मनुष्य को नीचता पर उतरता है |
    पोस्ट पढ़ कर खुशी हुई

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  26. हर तरह के लोग हैं..सभी का स्थान है कहीं न कहीं.

    जारी रहिये.

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  27. @ -ये खतरे तो वास्तविक जिंदगी में भी होते हैं ...वो ज्यादा खतरनाक होते हैं ...आभासी दुनिया में तो इग्नोर करके बचा जा सकता है ... वास्तविक दुनिया में झेलना पड़ता है ...

    I agree completely.

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  28. @- अब लोग इसमें भी इंगित ढूढ़ेंगे। इंगित की ओर ध्यान न देकर बात का वस्तुनिष्ठ विश्लेषण होना चाहिए।

    sahi farmaya aapne.

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  29. @- सूक्ष्म विवेचन का न अभी मेरा मन है और न माद्दा ही..

    Do not worry , i can wait patiently for the detailed analysis of this interesting topic.

    Its a very vast topic and needs a detailed research work on it.

    Since you have embarked on an ambitious series of this fine topic, just go ahead with full zeal in yourself. I have full faith in your calibre.

    Will wait ardently for the next episode of this enchanting series.

    Gracias.

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  30. अरे अरविंद बिटवा काहे हलकान होत हो? ई ब्लागजगत मा दू चार नालायक और कुलच्छनियां घुस आई हैं. पर इनके करे से कछु नाही हो सकत. इन सबका सरदार तो ऊ हमार कपूत अनूपवा है. ऊही इन सबको भडकात है...दू चार चेला चपाटी पालि लिहिन है अऊर उनको लिखे पढे से कोनू काम नाही बा...बस यही सब करत रहत हैं.

    हम ऊ नालायक का चर्चा पर रोज कमेंट करत हैं पर ऐसन कपूत कोई देखा है क्या जौ महतारी अम्माजी का कमेंटवा ही नाही छाप रहा है. हम भी देखती हैं कि कब तक ऐसन करेगा...हम भी असली नखलेऊ की हैं. कई सुरसतिया देखें हैं.

    तुम इन सब के चक्कारों नाही पडना...बस अच्छा लिखो और मौज ल्यो.

    -तुम सबकी अम्माजी.

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  31. सुन्दर टॉपिक पर आपने सुन्दर बात कही.

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  32. "सुंदर रसचर्चा कर लेते हैं।"

    चतुर्वेदी जी से सहमत.

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  33. @जील : प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया!
    भाग दो भी आ चुका है

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  34. इसका एक सरलार्थ तो यही है कि दुनिया में एक ही मानसिकता के लोग नहीं होते ....संस्कार ,परिवार और परिवेश -मतलब रहन सहन के चलते लोगों के अलग अलग व्यक्तित्व हो जाते हैं -एक जैसे विचार ,बुद्धि और व्यक्तित्व के लोगों में जमती है और अलग किस्म के अलग होने लगते हैं ....और यह आभासी दुनिया इस मामले में और भी धोखेबाज है ...मायावी है ..यहाँ लोगों के चेहरे के हाव भाव तो दीखते नहीं हैं -कुदरती निषेध भी समय रहते आगाह नहीं करते ..इसलिए यहाँ कई बिलकुल विपरीत विचारों के लोग धोखे से पास आ जाते हैं मगर धीरे धीरे उन्हें लग जाता है की गलती हो गयी बन्दा /बंदी तो अपने गोल की है ही नहीं -मेरे साथ ऐसा हो चुका है -और यह सचमुच बहुत पीड़ा दायक होता है दोनों पक्षों के लिए --ओह कहाँ फंस गए ..किस बजबजाती नाली /नाले में ....कितना समय तो कीचड साफ़ करते ही बीत जाता है...नए दोस्त तलाशो तो भी खतरे वही के वही ....बच के रहना रे बाबा बड़े धोखे हैं इस जाल में .....
    सहमत .

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