शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

यौन सम्बन्ध एक नीच और निषिद्ध कर्म है ,इसे पत्नी तक ही सीमित रखें-एक विमर्श !

इन दिनों एक भारतीय मूल की लेखिका का अंगरेजी उपन्यास पढ़ रहा हूँ ,विस्तृत समीक्षा  तो उपन्यास खत्म होने पर ही करूंगा -पर  यह है इतना रूमानी की मन  करता है यह ख़त्म ही न हो और मैं शेष जीवन भर इसे पढता ही चलूँ ..पर दुःख तो यही है कि मृत्युलोक में हर चीज अंत पा जाती है , अंततः विराम तक जा पहुँचती है -जातस्य हि ध्रुवः मृत्यु! जब शुरू है कुछ तो उसका अंत भी अंतर्निहित है ....मगर अभी तो उपन्यास दो तिहाई बाकी है इसलिए कुछ निश्चिंत हुआ जा सकता है ...लेकिन शुरू के ही कुछ अंश जोरदार हैं ८८०  वोल्ट से भी तेज झटका देते हैं -एक भारतीय सोच संस्कार की पश्चिमी पृष्ठभूमि में जीवन यापन कर रही नायिका जो उपन्यास की लेखिका की ही प्रतीति कराती है एक जगह अपने पुरुष मित्र (निसंदेह वह नायक नहीं लगता ,अभी तक उपन्यास के /में नायक  का शायद पदार्पण नहीं हुआ है ) पर बिफर पड़ती है क्योंकि उसे लगता है कि उसका वह पुरुष मित्र एक ख़ास आशय से  आग्रहपूर्ण हो रहा है -मेरी अंगरेजी अच्छी नहीं है मगर कोशिश करता हूँ कि नायिका के संवादों का मैं यथासंभव सही भावपूर्ण अनुवाद कर सकूं -
  नायिका : निसंदेह  आकर्षण एक कुदरती चीज है!
     पुरुष पात्र : जी बिलकुल ....                         नायिका :लेकिन चाहत जैसे ही घनी होने लगती  है पुरुष पजेसिव् हो उठता  है  और फिर लडकी से गहरी अपेक्षा करने लगता है कि  वह समर्पण  कर दे ,यह वह मान बैठता है की अब वह तो समर्पण के लिए तैयार है..किसी का सम्मान करने का यह मतलब नहीं होता है कि  उसे "टेक फार ग्रांटेड " ले लिया जाय .....किसी को भी नारी के निजी क्षेत्र में घुसने की कुचेष्ठा नहीं करनी चाहिए ...पुरुष पात्र  : मैं समझने की कोशिश कर रहा हूँ (आतंकित सा होते  हुए ....) शब्द दर  शब्द सहमत ....(मरियल सी आवाज में ) नायिका : और जब पुरुष उस औरत को हासिल करने में (आशय  शायद है यौन सम्बन्ध बनाने में ) नाकामयाब रहता है ..मतलब औरत मनमाफिक समर्पण से इनकार कर देती है तो पुरुष का अहम्  चोटिल  हो उठता है और वह उसपर आधिपत्य  का अभियान छेड़ देता है..पुरुष  पात्र : कहती रहिये बड़े ध्यान से सुन रहा हूँ ..... नायिका :  वह उस पर निरंतर दबाव बनाए रखता है और बात बात पर अपमानित करता चलता है..जिसके  चलते औरत बहुत पीड़ित हो उठती है...पुरुष  पात्र :ओह माई गाड....नायिका  : यही नहीं पुरुष अगले शिकार की ओर भी चल देता है..... पुरुष पात्र  :यह सब इतना भी क्या सोचना .....नायिका  : सभी पुरुष स्वार्थी ही होते हैं जैसा कि मैंने अपने जीवन में देखा है......और यह मुझे भयभीत  करता है  ....मेरी तलाश तो एक निःस्वार्थी पुरुष की है.... पुरुष  पात्र : मगर यह तो सहज है -घनिष्ठ सम्बन्ध बनाने की पुरुष की प्रवृत्ति ही होती है ..इसमें गलत ही क्या है -वह तो  अपनी पसंद को/के लिए  जो उसका सर्वश्रेष्ठ है लुटा देना चाहता है   ..? यह तो प्रेम के समर्पण का एक प्रदर्शन ही तो है ? शायद यौन सम्बन्ध से बढ़कर पुरुष के पास ऐसा कुछ भी  सर्वश्रेष्ठ  नहीं है -धन दौलत सब तुच्छ है -...जो वह मनमाफिक नारी को दे देना चाहता है ....  नायिका  : बहुत दुखी होकर ..सभी तो एक जैसे हैं ..मैं निराश हो गयी ... पुरुष  पात्र : (बात को सभालते हुए और ध्यान बटाने के लिए ) अच्छा इन बातो को छोडो भी ...नायिका  : लेकिन विश्वास और सम्मान ऐसी पेशकश से जाता रहता है ......थोडा संयत होते हुए और एक आह भरी ठंडी सांस लेकर  ..ये मंगल और शुक्र ग्रह वासी कितने अलग से होते हैं ना ....पुरुष पात्र : इसलिए ही तो दोनों डिजर्टड हैं ...(माहौल को हल्का करने का प्रयास )नायिका : (उसी आवेश में ....) मानसिक साम्यता में आखिर दैहिकता कहाँ से आ जाती है ? और क्यूं ? यह जरूरी ही क्यों है ? पुरुष पात्र : दैहिकता बस उसी मानसिक साम्यता को और घनिष्ठ बनाए रखने के लिए ही तो है ....नायिका : क्या आत्मिक सम्बन्ध घनिष्ठता के लिए पर्याप्त नहीं है ? क्या दैहिकता ही घनिष्ठता को और प्रगाढ़ करती है ? पुरुष पात्र : सच है मनुष्य के बारे में कुछ भी अंतिम रूप से नहीं कहा जा सकता और लोगों के अपने अपने वैयक्तिक अनुभव हो सकते हैं ...जैवीय आवश्यकताओं की जरूरत और भूमिका को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता ...नायिका : जैवीय जरूरत ..? क्या पुरुषों को उसकी पूर्ति के लिए ,संतुष्टि के लिए अपनी महिला मित्रों की ओर  उन्मुख होना ही चाहिए ,क्या पत्नियां इसके लिए काफी नहीं हैं ? पुरुष पात्र: तो आप क्या पत्नियों को महज यौनिक कैदी मानती हैं  ..मतलब वे क्या महज सेक्स की प्यास बुझाने के लिए हैं -एक नीच और टैबू कर्म के लिए ही .....और  विपरीत लिंगी प्रेम में तो यह किसी के साथ भी हो सकता है अगर प्रेम व्यवहार सहज और सामान्य  है तो फिर केवल पत्नी ही फिर अभिशप्त क्यों हो ? अगर यह यह इतना ही नीच और कुत्सित कर्म है तो पत्नी ही बेचारी जीवन भर क्यों सहे यह आघात ? नायिका : आखिर लोग मित्रवत स्नेह  को प्रेमी के प्रेमाग्रह के रूप में  संभ्रमित ही क्यूं कर लेते  हैं ?क्यूं  क्यूं पुरुषों की पहली नजर ही औरतों पर यौनिक संभावना को लिए होती है ? क्या आत्मिक कनेक्शन पर्याप्त नहीं है ? "  ,,अभी उपन्यास पढ़ रहा हूँ ..लगा कि आपको भी यह अंश पढ़ा दूं .....सच में यह एक बड़ा अंतर्द्वंद्व है नारी -पुरुष सम्बन्धों में -किसी द्वंद्वात्मक भौतिकवाद से कमतर नहीं ....पुरुष और नारी के बीच जैवीय आकर्षण तो है मगर नारी को अवांछित यौन सम्बन्ध से बचने के लिए  जैव विकासीय सुरक्षा के मानसिक अवरोध की भी व्यवस्था हुई है -दैहिक स्तर पर भी  हाईमन संरचना (कृपया इस लिकं को अवश्य ध्यान से पढ़ें )   भी एक ऐसी ही रोक ही तो है ....प्रकृति भी यही चाहती है कि नारी अपने मन  माफिक ही यौन सम्बन्ध बनाए नहीं तो वात्सल्य की जिम्मेदारियों से भरी उसकी और भावी संतानों का जीवन ही खतरे  में पड़ सकता है ..जाहिर है नारी का यौनिक चयन एक जैवीय और जीवनीय मूल्य  लिए हुए है -यहाँ पुरुषों जैसी स्वच्छन्दता का स्कोप नहीं है ! आपके क्या विचार हैं .... उपन्यास तो अभी बहुत बाकी है ..... पढता जा रहा  हूँ अनवरत ,,,

40 टिप्‍पणियां:

  1. रोचक लग रहा है समीक्षा का इन्तजार रहेगा ....आपने यहाँ उपन्यास का नाम नहीं लिखा है ...

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  2. पुरुष पात्र :ओह माई गाड....

    इसका अनुवाद नहीं किया आपने.

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  3. काफी रोचक लग रहा है मिश्रा जी और जायद पोस्ट कीजये पढने की उत्कंठा बढ़ रही है

    सादर
    प्रवीण पथिक
    9971969084

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  4. होना तो यह चाहिये कि आप पूरा उपन्यास पढ़ लें और उसके बाद हम टिप्पणी करें ! पर...यह कहता चलूं कि उपन्यास...उपन्यासकार के निज दर्शन और कल्पना शीलता के आख्यान हुआ करते हैं ! इसलिये मनों-जैविक मुद्दे और स्त्री पुरुष संबंधों पर रचे गये इस उपन्यास को भी इसी लेवल पर पढ़ा और समझा जाना अपेक्षित है ! इसे किसी शा॓ध आलेख की तरह से विवेचित किये जाने का औचित्य नहीं है...आशय यह कि स्त्री पुरुष संबंधों के विषय में यह कोई अभिप्रमाणित,तथ्यपरक दस्तावेज नहीं है ! बाक़ी आप जैसा आदेश दें !

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  5. sexual intercourse is not at all a dirty act but it is taken as an offence if done with a female friend, because it is against our moral and ethical values.

    The act is not done in public, It is confined up to bedroom, hence it is wise / logical / sensible to be confined with 'WIFE' only.

    'Coitus' is like a curse for the happiness of being together.

    There is a deep recognition in culture and in experience that intercourse is both the normal use of a woman, her potentiality affirmed by it, and a violative abuse, her privacy irredeemably compromised, her selfhood changed in a way that is irrevocable, unrecoverable. Both are true at the same time.

    A human being has a body that is inviolate; and when it is violated (penetrated), it is abused. In other words, it is rape.

    The political meaning of intercourse for women is the fundamental question of feminism and freedom: can a woman who is physically occupied be free?...self determined?

    Intercourse occurs in a context of a power relation that is pervasive and incontrovertible .Men have some kinds of power over all women; and most men have controlling power over what they call as 'their women'--the women they fuck. The power is predetermined by gender, by being male.

    Intercourse often expresses hostility or anger as well as dominance.

    Women have a vision of love that includes men as human too; and women want the human in men, including in the act of intercourse. Even without the dignity of equal power, women have believed in the redeeming potential of love
    She will no longer be captured like a fortress or hunted like a quarry.

    A martian can never understand a venusian. "Bandar kya jaane adrak ka swaad"

    Men are born "Baniya" (Traders). They cannot love a woman, because they are good at trading. Women are nothing but a status symbol or a sex-object for them. Men wants to own women as trophy. They don't understand the difference between love and lust. they fail to see the thin line between the two. The moment they cross that 'Laxman rekha' , they lose respect in their friend's eyes forever.

    Love is abstract. Nothing to do with physicality. Love is union of souls. Love lies between two ears and not between two legs.

    So guys....Don't confuse love with lust.

    Love is endless and selfless. Lust is nothing but a man's greed.

    Men are born traders....they consider women as commodity. Men are not fools to love women ....They simply encash them.

    "Ghoda ghass se karega dosti to khayega kya?"

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  6. रंजना जी से सहमत हूँ……………आगे का इन्तज़ार रहेगा।

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  7. प्रश्न बहुत ही कठिन है और शायद कोई भी पार्टी इसका सही जबाब दे क्योंकि कोई भी व्यक्ति अपने अंदर की कुछ बातें किसी को भी नहीं बताता, किसी को भी नहीं, जो कि नितांत निजी होती हैं फ़िर चाहे वो पुरुष हो या स्त्री।

    अगर कोई भी कर्म करने के बाद स्त्री या पुरुष दोनों में से किसी की भी आत्मा कचोटती है तो वाकई ये एक नीच और निषिद्ध कर्म है और अगर नहीं कचोटती है तो ये कर्म निषिद्ध नहीं है।

    केवल अपनी आत्मा और आत्मसम्मान का संज्ञान लेना ही उचित है उक्त विमर्श के लिये।

    आगे के पोस्टों का इंतजार है।

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  8. पता नहीं स्त्री-पुरुष की बातचीत आ जा कर एक ही जगह पर क्यों रुक जाती है? आप पूरा उपन्यास पढ़ लेंगे तब तक शायद इस प्रश्न का उत्तर...

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  9. @यौन सम्बन्ध एक नीच और निषिद्ध कर्म है - Strongly disagree.

    Agree with Aliji & zeal to some extent - both appear to be your 'natural' allies.:)

    Physical relation is a natural system for reproduction. As creatures ride in intelligence ladder, the need of it becomes less and less guided by 'need for reproduction' and more and more by 'ultimate bliss' which also increases the bonding with partner. Perhaps nature wants it that way for higher ups- man being ultimate case. The female is ready every month for reproduction. Nature wants that human population should be more and more compared to others. Such 'greed' of nature compounded with complexity of human mind gave birth to institution of marriage so that sexual behaviour is controlled ..vast subject, I do not wish to dwell further on it but I do agree that IF ONE IS IN MARRIAGE, SHOULD HAVE PHYSICAL RELATION WITH ONE'S SPOUSE ONLY.
    Yes, adult singles do have freedom to maintain multiplicity of physical relations obviously with mutual consent but is this 'multiplicity of relations' so simple?

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  10. स्त्री और पुरुष के लिए यौन कर्म के अलग अलग अर्थ हैं। स्त्री को प्रकृति ने संतान उत्पन्न करने और उसे जीवन जीने लायक बनाने की जिम्मेदारी दी है। यौन कर्म उस का आरंभ है। पुंसवन के उपरांत उस के बाद जिम्मेदारियाँ ही जिम्मेदारियाँ हैं। यही एक बात है जिस ने उस के मस्तिष्क और विचारों को भिन्नता प्रदान की है। यह तो मनुष्य की समाज व्यवस्था और उत्पादन का गुण है जिस ने पुरुष को तनिक जिम्मेदार बना दिया है। वरना .....

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  11. I don't agree with this dirty and restricted thing, though in complete agreement on limiting it with wife only. The post was good, and simply a straight hit on male-n-female thought process. And if you don't count a very few men, it's true to almost all mankind! But, I would also like to make a point that in the direction of more liberty, women are also eagerly breaking the limits....limitlessly and ofcourse mindlessly!

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  12. अच्छा है ..
    अपनी तो बस ज्ञान पाने की वासना है , सो फिर फिर इस पोस्ट को देखने आता
    रहूंगा ... काफी कुछ मिल रहा है ..
    .
    @ गिरिजेश राव जी ,
    सुना है आप हिन्दी में भी ब्लोगिंग करते हैं कभी कभी !!! क्या है ऐसा ?

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  13. @ Amarendra ji

    My Devnagari tool is not functioning. I restarted it but without success. Sorry for comment in English - I HATE WRITING HINDI IN ROMAN SCRIPT.

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  14. देवनागरी परीक्षण. . . .
    सफल.
    धन्यवाद अमरेन्द्र जी, आलसी को कोंचने के लिए।

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  15. अभी तो पोस्ट और टिप्पणी पढ़कर चार लाइनें ही अर्ज करता हूँ...

    ...................
    ...................
    ...................
    ...................

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  16. ...ऐसे मामलों में मैं जैविक तर्कों से कभी भी सहमत नहीं होती. मानव प्रजाति एक विकसित प्रजाति है. विकास के सैकड़ों साल के क्रम में जो चीज़ उसे अन्य जीवों से अलग करती है, वह प्रेम है. मानव सिर्फ़ पुनरुत्पादन की जैविक भावना से प्रेरित होकर प्रेम नहीं करता. उसका प्रेम भावनात्मक सम्बल की खोज में होता है. औरतों के लिये कुछ ज्यादा और पुरुषों के लिये कुछ कम... ...
    मैं प्रेम को सर्वोपरि मानती हूँ. ...साथ ही यह मानती हूँ कि प्रेम, बिना यौन-सम्बन्ध के हो सकता है, पर यौन-सम्बन्ध बिना प्रेम के नहीं होना चाहिये और ये स्त्री-पुरुष दोनों पर बराबर से लागू होता है... और... प्रेम एकनिष्ठता चाहता है चाहे वह स्त्री हो या पुरुष. इसलिये अगर दोनों की मर्ज़ी से शादी हुई है, तब एकनिष्ठ होना ही चाहिये. लेकिन अगर शादी घरवालों की मर्ज़ी से हुई है, वह अपने पति या पत्नी को प्यार नहीं करता और शादी के बाद किसी और से प्रेम हो जाता है और कोई अपने प्रेमी से ही सम्बन्ध बनाना चाहता है, तो उसे अपनी पत्नी या पति को तलाक दे देना चाहिये.
    एक साथ दो नाव पर सवार होने को मैं सही नहीं मानती...एकनिष्ठता प्रेम में अपेक्षित भी है और अनिवार्य भी, अन्यथा कोई भी वह प्रेम नहीं पा सकता, जिसके लिये वह भटक रहा है.

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  17. राव साहब ,
    अच्छा है मेरा कोंचना सफल रहा ..

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  18. Interesting book !
    ---------------
    This conversation is very common..I think most of we[females] think same...
    Why a man is so selfish?
    ...............
    A man can never think beyond physical pleasure.[whenever you talk about male-female relations]
    ............
    लेकिन चाहत जैसे ही घनी होने लगती है पुरुष पजेसिव् हो उठता है
    -UNIVERSAL TRUTH!
    ---------------------------
    मानसिक साम्यता में आखिर दैहिकता कहाँ से आ जाती है ? और क्यूं ? यह जरूरी ही क्यों है ?क्या आत्मिक सम्बन्ध घनिष्ठता के लिए पर्याप्त नहीं है ? क्या दैहिकता ही घनिष्ठता को और प्रगाढ़ करती है ?
    ---------Who will really answer these questions?

    waiting!
    ----------------------------

    I guess this novel is by Shobha dey?

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  19. @ एक साथ दो नाव पर सवार होने को मैं सही नहीं मानती...एकनिष्ठता प्रेम में अपेक्षित भी है और अनिवार्य भी, अन्यथा कोई भी वह प्रेम नहीं पा सकता, जिसके लिये वह भटक रहा है....

    सहमत हूँ ...
    विवेक रस्तोगी जी से भी सहमत ...!!

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  20. Martians are warriors ! Their passion is to win the battle and be the conqueror.

    The biggest challenge in front of men is to win the battle with women .

    Material things, money, luxery and all the riches on earth can be easily achieved by a man. And a woman also has the capacity to earn all the worldly pleasures.

    Here comes the crux !

    When a man finds a woman is so powerful , he starts fearing losing his dominance over the so called weaker sex (women).

    Now the man wants to lure woman by all means (Saam, Daam, Dand, Bheda). Fortunately women are so empowered now that they are not easily lured by flattery, worldly gifts or anything. When men starts failing at all fronts to appease a strong woman and make her surrender, then he becomes hostile and tries to get control over woman by dragging her into sex talks or sex itself.

    This offends the self respect of a woman and she goes further away from the man who is desiring her.

    To posses anything is entirely different from possessing a person. All are individual entities. How can a man possess a woman or vice versa.. This possession is greed. It leads to Obsession. If not attended in time a man becomes a patient of obsessive-compulsive disorder (OCD).Such an individual might find their consequent behavior irrational on a more intellectual level. In severe OCD, obsessions can shift into delusions when resistance to the obsession is abandoned and insight into its senselessness is lost.

    Gradually and unknowingly it becomes an objective of the man to make a woman surrender in front of him. On the contrary a woman becomes strong and stronger by such compulsions.

    Barring the biological difference, there is no significant difference between men and women.In the race of proving their superiority on each other, both the gender tend to skip the 'Love' part.The relation goes thus....Liking --strong liking -- Higher frequency of interactions --difference of opinion...disaggreements...repulsion/rejection....then becoming hostile and mutual accusations and allegations come into picture. A relationship ends with disappointment and dejection.

    Any solution?

    Yes , the solution is `simple.Learn to listen. Respect everyone's individual thinking and opinion. Do not ever try to impose our views on others. Never try to suffocate anyone by taking away one's freedom and personal space.

    " For a healthy relationship, a healthy distance is essential."

    Thanks !

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  21. जाने क्यों मुझे चोखेर बाली की नई पोस्ट पर ab inconve..(उफ, टेढ़ा नाम है!) की टिप्पणियाँ याद आने लगी हैं ..
    http://blog.chokherbali.in/2010/04/blog-post_07.html
    ये ससुरी बात निकलती है तो हमेशा दूर तक क्यों जाती है :)

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  22. @ Girijesh Rao

    Coffee is important, not the cup.

    So do not bother about Language. Your comments are important.

    Comments are welcome in all the 18 regional languages.

    On a hindi site, Blogs must be in Hindi, but comments can be in national (Hindi) and International (English) Language.

    Its true that English written in Roman appears funny. And i don't even know how to type in Hindi. (Though my mother tongue is Hindi).

    I am not ready to learn A, b , c ,d of Devnagri typing just for sake of typing in hindi.

    Freedom of expression is important...The language used is not important.

    Above all....Author has the authority to block the comments.

    Thanks !

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  23. Hi Blogger:
    [Disclaimer: I seek your pardon for not using Hindi fonts. It is for 2 reasons – First, while I do have Hindi fonts but am not accustomed to using it. Second, and more importantly, I feel commenting on a blog is about conveying one’s viewpoint and that can be best expressed only in the language one is most comfortable with. Hope it is fine with you.]
    In a small village the semi-literate villager sits at the village centre holding a paper and reads out the ‘selected excerpts’ from ‘selected news’ to demonstrate to the lesser folks of his superior intellect. Zmiles.
    We will cover the content of the blog later, first let us talk of the genesis of it.
    There are a few things I would like to mention –
    01] Your selection of the topic header is essentially to ‘titillate’ people into reading it. Shrewd move. After all, without readers, what is the existence of your blog? Zmiles.
    02] You have barely read 1/3rd of the novel and from that minor part, you have chosen to be extremely judgmental about a passing conversation which you have ‘smartly’ translated to suit your arguments. Zmiles.
    03] You feel you read the most and are so secretive that you need to hide the novel title and author’s name, lest others read it and see through your biased perception of the passage you have chosen. Zmiles.
    04] You have added your comments [in parenthesis] in the ‘translation’ which is again a despicable act of yours to make the readers see it the way it suits your line of proposition. I would have appreciated if you had also reproduced [read copy-pasted] the English passage as it is in the novel. Zmiles.
    05] Any writing in a novel is contextual to the entire narration of the novel and judgmental isolation of its ‘titillating portions’ shows your lack of originality and craving for such nasty passages. You borrow from other writers [I would prefer to use ‘steal’] and then do some ‘mirch-masaalaa’ of your ‘intellect’ on it to serve on your blog site. Zmiles.
    Now, to the content of the blog. I would rather call yours as a BLOB. A blob is a soft, amorphous, formless mass, a splotch, a wasted, vague poodle of nothingness. You could have devoted this much energy and time in writing something original rather than mere copy-paste....er.....’translation’ too. At least all the commentators are more original than you. Know that. Zmiles.
    I would look forward to read something original from you.
    And yes, one last thing, Mr. Blogger. Freedom Of Expression when controlled or curtailed is NO Freedom Of Expression. In such a case, a blogger openly accepts that he seeks only flattery. Zmiles.
    Since you probably lack originality, and also because it is a good read, I humbly suggest you to read a short story titled “The Emperor’s New Clothes.” Know that – You are the King. Zmiles.

    Arth Desai

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  24. दो पहलू हैं एक ही, सिक्के के नर-नार.
    दोनों में पलता सतत, आदि काल से प्यार..

    प्यार कभी मनुहार है, प्यार कभी तकरार.
    तन से अभिव्यक्त या, मन से हो इज़हार..

    बिन तन के मन का नहीं, किंचित भी आधार.
    बिन मन के तन को नहीं, कोई करे स्वीकार..

    दोनों क्षणभंगुर मगर, करते प्रीत पुनीत.
    होती देह विदेह तब, जब मिल गाते गीत..

    सुर होता यदि बेसुरा, याकि भंग हो ताल.
    एक-दूजे को दोष दें, दोनों पाल मलाल..

    केवल तन से ही नहीं, हों आत्मिक सम्बन्ध.
    केवल मन से ही नहीं, हों प्राणिक अनुबंध..

    तन-मन हैं रथ-सारथी, दोनों का सहयोग.
    नर-नारी ले सकें- हो, 'सलिल' सफल उद्योग..

    पुण्य-पाप से परे है, प्रकृति का व्यापार.
    हमने खुद ही रच लिया, मनचाहा आचार..

    भावनाएँ होतीं प्रबल, कामनाएँ बलवान.
    द्वैत मिटा अद्वैत वर, रहते बस इंसान..

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  25. @@
    sexual intercourse is not at all a dirty act but it is taken as an offence if done with a female friend, because it is against our moral and ethical values.

    जील के विचारों का स्वागत है -मुझे लगता है कि कुछ कहने की जरूरत है -और अभिव्यक्ति का हक़ सभी को है -अगर अपनी बात नहीं रखता तो मुझे लगेगा की मैं अपने कर्तव्य से च्युत हुआ हूँ -यह अनुभूति मुझे बहुत सालेगी /सतायेगी -साथ ही मुझे यह लगता है की कहीं कोई अपारदर्शिता न रह जाय-बातों में और सम्बन्धों में भी ...मैंने देखा है ,लोग लोग घुट घुट कर अव्यक्त रहकर पूरा जीवन काट डालते हैं -मैं उन प्रजाति में से नहीं हूँ -बातें कही जानी चाहिए जिससे बातें साफ़ हों और अगर इनसे ही अ -संवाद हो उठे तो फिर संवाद के भी कोई मायने नहीं रह जाते ...


    सेक्स की अनुभूति और उसका चरम दुनिया और अगर दूसरी दुनिया भी कोई हो तो.... मतलब दोनों दुनिया के लिए परम आनंद या कहिये कि आनंदातिरेक की अनुभूति है इससे बढ़ कर कोई और आनंद नहीं है -आध्यात्म्वादियों तक ने केवल इसी ब्लिस -इसी आनन्द को तनिक दूसरी अनुभूति से सत चित आनंद तक कहा है,मष्तिस्क के आंतरिक स्पाट दोनों में सामान ही हैं -यह प्रक्रति का मनुष्य को दिया अन्यतम अप्रतिम उपहार है ...रजनीश इन्ही अनुभवों से गुजरकर सम्भोग से समाधि तक के साम्य का दर्शन सामने लाते हैं.... .....भारत में कई विपर्यय और विरोधाभास हैं ....हम न खुल कर पश्चिम की भौतिक रागात्मकता अपना पाते हैं और न ही प्राच्य की विरागता ही ....हम अधकचरे होते जाते लोग है -यहाँ सेक्स दमित है ,टैबू है ,इसपर चर्चा और चर्चाकार भी वर्जित है -हम डरे और घबराए हुए लोग हैं -ब्लोग्वानी पर इस पोस्ट के नाम ७ नापसंद आयी हैं -मैंने मित्रों से कहा कि और नापसंद का चटका लगाकर संख्या दस तक पहुंचाये ताकि सनद रहे ...

    (यह एक संक्षिप्त मुखड़ा ....)

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  26. अब बात जील के विचारों की ....

    यदि पुरुष -महिला मित्र की आपसी सहमति और पसंद हो तो यौनानुभूति से सुखद पल जीवन में और कोई नहीं हैं मगर इसमें पूरी पारस्परिकता और योगदान हो -और टॉप पर होने की पूरी लिबर्टी जो भी जब भी चाहे ....

    The act is not done in public, It is confined up to bedroom, hence it is wise / logical / sensible to be confined with 'WIFE' only.

    क्या पत्नी के साथ सहवास है इसलिए ही वह बंद कमरे में होना चाहिए ?-यहाँ तार्किकता का झोल झलकता है -यह निजता और एकान्तता की ही मांग करता है ,वैवाहिक हो या गैर वैवाहिक ....ऐसा क्यूं है -यह जैवीय विश्लेषण की मांग करता है, फिर कभी .....यहाँ खतरा किसी और के शेयर कर जाने का है, जैसे खाना भी छिपाकर खाने का रिवाज अभी भी है बहुत सी मूल आदिम जातियों में ,कोई और न टपक पड़े -और चूंकि आत्मीय /कामुकता के प्रगाढ़ पलों में मनुष्य बहुत आक्रामक भी हो उठता है -पौरुष हारमोनों के कारण इसलिए भी यह सुन्दर कृत्य छुपाकर होता है ताकि झगड़ा झन्झट न हो जाए ...



    'Coitus' is like a curse for the happiness of being together.

    समागम जोड़ी के जोड़ को गहरे सीमेंट करता है यह वरदान है अभिशाप नहीं ...



    There is a deep recognition in culture and in experience that intercourse is both the normal use of a woman, her potentiality affirmed by it, and a violative abuse, her privacy irredeemably compromised, her selfhood changed in a way that is irrevocable, unrecoverable. Both are true at the same time.

    हमारी जैवीय वृत्तियों को ही अनेक संस्कृतियाँ उभारती आयी हैं -सम्भोग कुदरती है ,हाँ स्त्री की इच्छा के विरुद्ध नहीं जैसा कि खुद कुदरत की मंशा है

    A human being has a body that is inviolate; and when it is violated (penetrated), it is abused. In other words, it is rape.

    जी सच है ......जब इच्छा के विरुद्ध हो तो वह यौन व्यवहार निश्चित ही रेप है

    The political meaning of intercourse for women is the fundamental question of feminism and freedom: can a woman who is physically occupied be free?...self determined?

    यह अतिवाद है -अभी तक तो यौन अंगों की भूमिका प्रजनन के लिए ही है -मगर यह सोच इंगित करती है कि कहीं प्रकृति किसी और परीक्षण के लिए तो तैयार नहीं हो रही है ..? मतलब सूदूर भविष्य में यौनांग केवल अवशेषी अंग रहेगें और जनन का काम मशीने करेगीं -मादाएं केवल अंडे दान देगीं -पेनीट्रेशन वगैरह का झगड़ा ही खत्म ..लेकिन तनतब मनुष्य होने के मतलब को भी प्रक्रति को पुनर्परिभाषित करना होगा ..




    Intercourse occurs in a context of a power relation that is pervasive and incontrovertible .Men have some kinds of power over all women; and most men have controlling power over what they call as 'their women'--the women they fuck. The power is predetermined by gender, by being male.

    यही अति नारीवाद की मान्यताएं हैं .....



    Intercourse often expresses hostility or anger as well as dominance.

    हाँ सच है ......मगर यह दबंगता पर पर पुरुषों को पास न फटकने देने का सिग्नल है -भोग्य अको चेतावनी भी बस अन्यथा तो पुरुष अपने जोड़े के लिए मर मिटने के लिए ..आत्मोत्सर्ग के लिए भी तैयार रहता है

    Women have a vision of love that includes men as human too; and women want the human in men, including in the act of intercourse. Even without the dignity of equal power, women have believed in the redeeming potential of love

    She will no longer be captured like a fortress or hunted like a quarry.

    सहमत



    A martian can never understand a venusian. "Bandar kya jaane adrak ka swaad"

    बन्दर किसे कहा? आपत्ति माई लार्ड ....



    Men are born "Baniya" (Traders). They cannot love a woman, because they are good at trading. Women are nothing but a status symbol or a sex-object for them. Men wants to own women as trophy. They don't understand the difference between love and lust. they fail to see the thin line between the two. The moment they cross that 'Laxman rekha' , they lose respect in their friend's eyes forever.

    यह वहम है लस्ट और लव एक ही है बस गहनता का का फर्क है

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  27. Love is abstract. Nothing to do with physicality. Love is union of souls. Love lies between two ears and not between two legs.

    फालतू साहित्यिक बाते हैं .....अवैज्ञानिक लफ्फाजी ....



    So guys....Don't confuse love with lust.

    आप कर रही है -सारी !

    Love is endless and selfless. Lust is nothing but a man's greed.

    लव और लस्ट एक हैं



    Men are born traders....they consider women as commodity. Men are not fools to love women ....They simply encash them.

    नारी वादी दृष्टि ....ये कहाँ से आते/आती हैं नारी वादी ?



    "Ghoda ghass se karega dosti to khayega kya?"

    अब घोडा किसे कहा ...

    निष्पत्ति -खुद के जीवन के कटु अनुभवों से मानवता और समस्त कायनात के नियम और कार्य वापार नहीं बदल जाते ..

    जील आपको कहीं भी कोई भी दुःख मेरी व्याख्याओं से पहुंचा हो तो सार्वजनिक माफी मांगता हूँ ....मैं खुद से गद्दारी नाहे कर सकता .....

    उत्तर देंहटाएं
  28. @अर्थ देसाई हैं नए बेनामी ...लोग बेनामी क्यूं होते हैं !
    01] Your selection of the topic header is essentially to ‘titillate’ people into reading it. Shrewd move. After all, without readers, what is the existence of your blog? Zmiles.
    उद्दीपन /सनसनी नहीं बस जनमत का ही उद्येश्य है -सनसनी का शीर्षक और होता है -दूं क्या ?
    02] You have barely read 1/3rd of the novel and from that minor part, you have chosen to be extremely judgmental about a passing conversation which you have ‘smartly’ translated to suit your arguments. Zmiles.
    इसमें क्यों आपत्ति होनी चाहिए ?

    03] You feel you read the most and are so secretive that you need to hide the novel title and author’s name, lest others read it and see through your biased perception of the passage you have chosen. Zmiles.
    मेरे बायस्ड परसेप्शन को लेकर आप ही पहले बायस्ड हो गए -मजेदार ! मुद्दा विषय का है किताब का नाम ज्यादा जरूरी नहीं -आम खाईये न देसाई साहब /साहिबा पेड़ काहें गिनती है ?
    04] You have added your comments [in parenthesis] in the ‘translation’ which is again a despicable act of yours to make the readers see it the way it suits your line of proposition. I would have appreciated if you had also reproduced [read copy-pasted] the English passage as it is in the novel. Zmiles.
    मेरी अंगरेजी थोड़ी कमजोर है न और भाई बिरादरी की और कमजोर इसलिए विषय को समझाने के इरादे से कहीं कहीं धृष्टता हो गयी लगती है आपको ,पर मैंने अपनी मंशा लादने की कोई हिमाकत नहीं की है ..
    05] Any writing in a novel is contextual to the entire narration of the novel and judgmental isolation of its ‘titillating portions’ shows your lack of originality and craving for such nasty passages. You borrow from other writers [I would prefer to use ‘steal’] and then do some ‘mirch-masaalaa’ of your ‘intellect’ on it to serve on your blog site. Zmiles.
    यह आपके विचार हैं और इससे आप नहीं हट सकते तो मान ही लेते हैं -बहुत लोग ऐसा करते हैं -और नैतिकता भी शायद आड़े हाथ न आती हो ऐसा करनेमें

    Now, to the content of the blog. I would rather call yours as a BLOB. A blob is a soft, amorphous, formless mass, a splotch, a wasted, vague poodle of nothingness. You could have devoted this much energy and time in writing something original rather than mere copy-paste....er.....’translation’ too. At least all the commentators are more original than you. Know that. Zmiles.
    I would look forward to read something original from you.
    जी स्वीकार है -भविष्य के लिए नोट किया -वो अंतिम पैरा इस नाचीज का है और वो हाईमेंन का लिंक आपने लगता है नहीं देखा
    And yes, one last thing, Mr. Blogger. Freedom Of Expression when controlled or curtailed is NO Freedom Of Expression. In such a case, a blogger openly accepts that he seeks only flattery. Zmiles.
    जी कौनो नियंत्रण नहीं है - आप खुद ही देख लो
    Since you probably lack originality, and also because it is a good read, I humbly suggest you to read a short story titled “The Emperor’s New Clothes.” Know that – You are the King. Zmiles.
    ठीक है पढता हूँ -मगर आप प्रमाण दे की आप सौ प्रतिशत मौलिक हैं -आपकी टिप्पणी में कहीं भी मौलिकता नहीं झलकती -यहाँ अभिव्यक्तियाँ कितनी बासी हैं ?

    उत्तर देंहटाएं
  29. अंग्रेजीदाँ लोग आने लगे हैं, यह इस हिन्दी चिठ्ठे की उपलब्धि है। जो हिन्दी पढ़ सकते हैं, समझ सकते हैं लेकिन लिखने से घबराते हैं या यूँ कहें आलस के मारे हैं, सीखना नहीं चाहते । किसी दिन यह भी घटित होगा। आखिर मैंने भी देवनागरी में हिन्दी लिखना सीख ही लिया। केवल सात दिन लगे थे - माजने में । सीख तो पहले ही दिन गए।

    अंग्रेजी के साथ आई है वहाँ की बेबाकी। उफ ! कितने जजमेंटल हैं ये बेनामी जी ! कुछ लेख पहले जाते तो कथित ओरिजनलिटी भी पाते। कितने आलसी हैं न !
    योनिच्छद से सम्बन्धित लिंक रोचक है! आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  30. @ Girijest Rao saab-

    If English offends you, do let me know. Will try to refrain from commenting here.

    Divya

    उत्तर देंहटाएं
  31. Girjesh:

    Mind your business.

    Is it clear?

    Comment on the blog / blogger.

    Do not act oversmart and be vindictive of fellow commentators.

    Know the protocol of blogging.

    Keep this in mind.


    Arth Desai

    उत्तर देंहटाएं
  32. Girjesh:

    As to being 'benami', I guess you are senile if a name makes you think it is nameless. Zmiles.

    Suggest you get a reorientation done of your comprehension of what is a name.

    It is better late than never.

    Zmiles.

    Arth Desai

    उत्तर देंहटाएं
  33. @ zeal
    @ If English offends you, do let me know. Will try to refrain from commenting here.

    राम राम राम। आप ने तो एक नास्तिक से भी राम राम जपवा दिया ! :)
    ऐसी कोई बात नहीं है। मैं कौन होता हूँ आपत्ति जताने वाला, वह भी यहाँ? सम्भवत: आप से समझने में भ्रम हो गया है। यदि मैं इस तरह का होता तो टूल खराब होने पर स्वय़ं अंग्रेजी में टिप्पणी क्यों करता ?
    मेरा बस यही कहना है कि हिन्दी पढ़ने और समझने वालों के लिए अब देवनागरी टाइपिंग सीख कर हिन्दी में लिखना आसान हो गया है। मैं ट्रांसलिटरेशन का प्रयोग करता हूँ और अब अभ्यास से देवनागरी भी उतनी ही तेजी से टाइप कर लेता हूँ। शिक्षा और प्रशिक्षण से इंजीनियर हूँ, हिन्दी में औपचारिक शिक्षा बस बारहवीं तक रही; जब मैं कर सकता हूँ तो कोई भी कर सकता है।
    बाकी आप की जैसी इच्छा। हर व्यक्ति स्वतंत्र है।
    आप ब्लॉग पर आती रहें और अपनी मूल्यवान टिप्पणियों से समृद्धि प्रदान करती रहें।
    जय हो।

    उत्तर देंहटाएं
  34. Shyam:

    Thanks for your review of my comments and responses thereon.

    A point on point revert on your mentions:

    Getting the basics corrected, is a name mentioned clearly a case of presuming 'benami' existence?

    Or are you haunted by some 'named' ones whom you have blocked and see them in each new id? Zmiles.

    If your definition of sleazy is even lower than this, I can understand your sensibilities. Zmiles.

    By quoting an adage out of place, you are still camouflaging the author and the work you have pilfered. Diagnosis is always fructified when root-cause is ascertained. A rotten apple seldom portrays a rotten tree. Zmiles.

    Get the gender right. I am a male.

    Your [misdirecting] comments in parenthesis are deliberate. Further, if your english is weak, try not to translate in the first place. And stop being presumptous that the linguistic proficiency of others is even lesser than yours. That is sheer vain arrogance on your part. Grow up.

    Morality is the biggest inhibition which moderates our behaviours. When you yourself accept your parting ways with it.....well, that says all.Zmiles.

    On originality, I have not resorted to using translated items like you have. Whatever is written is an assessment of things as they are evident. Zmiles.

    On the doubt of an entity, a couplet comes to mind-

    puchhte hain wo ke 'Ghalib' kaun hain?
    koi batlaaye ke hum batlaaye kyaa?

    Zmiles.


    Arth Desai

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  35. Sjyam:

    SO you blocked 2 comments as I took offense to a silly guy like Girjesh trying to criticise commentators in English.

    You post the retort of ZEAL on in and also Girjesh's reply to it but conveniently block my which was also on the same lines?

    Lagtaa hain ZEAL female hain is liye she gets preferred treatment by you. Zmiles.


    Are you running a match-making bureau? Zmiles.

    Try and be neutral of gender bias when you act as God here about what is published and what is not.


    And convey to your crony Girjesh, that do not critise fellow commentators on anything. He has no rigt at all. Better he minds his business.

    Arth Desai

    उत्तर देंहटाएं
  36. Arvind:

    [Pardon erroneous mention as Shyam in the previous post]

    So you blocked 2 comments as I took offense to a silly guy like Girjesh trying to criticise commentators in English.

    You post the retort of ZEAL on in and also Girjesh's reply to it but conveniently block my which was also on the same lines?

    Lagtaa hain ZEAL female hain is liye she gets preferred treatment by you. Zmiles.


    Are you running a match-making bureau? Zmiles.

    Try and be neutral of gender bias when you act as God here about what is published and what is not.


    And convey to your crony Girjesh, that do not critise fellow commentators on anything. He has no rigt at all. Better he minds his business.

    Arth Desai

    उत्तर देंहटाएं
  37. @अर्थ देसाई एलियास जाये जमाने के ग़ालिब बाबा एलियास इथेरल इन्फीनिया ,
    हाँ सच है मैंने गिरिजेश पर किये गए आपके दो निजी कमेन्ट को प्रकाशित कर रखने से रोके रखा क्योकि मैं गिरिजेश को जानता हूँ और उस लिहाज से आपकी व्यक्तिगत आक्षेप की टिप्पणी शोभनीय नहीं है -फिर भी आपके कलेजे को ठंडक देने के लिए उन्हें प्रकाशित कर दिया है .आपको गिरिजेश और मुझ पर व्यक्तिगत खुंदक निकालने की खुजली क्यूं हो रही है ?
    Punch:You seem to be a born cynic and a man of bad taste -everything in this beautiful world looks distorted to your eyes !
    भैया थोडा सहज होईये ,हंसिये मुस्कुराईये काहें अपनी ऊर्जा काउंटर प्रोडक्टिव चीजों में खर्च कर रहे हैं ? आप विद्वान् लगते हैं, (एक विद्वान् को दूसरा भांप ही जाता है हा हा ) तो दिखिए भी ...ये बाशिंग छोडिये तनिक प्रेम मुहब्बत की बात करिए न जिसके बिना ये दुनिया कराह रही है ...आपकी अंगरेजी और जील की पढने में मजेदार है और लिखिए मगर गरियायिये नहीं ..अब हम प्वाईंट तो प्वाईंट जवाब नहीं देगें आपको -यी कौनो अच्छी बात नहीं है ..हाँ भाषा की कौनो संशय कम स कम हमको तो नहिए है जबतक बात समझ में आ जाये ....जरा मुस्कुराईये तो .....

    उत्तर देंहटाएं
  38. इस विषय को सतही विस्तार के रूप में तो हर जगह फैला देखा है । गहराई से विश्लेषण रोचक है ।

    उत्तर देंहटाएं
  39. @..........भैया थोडा सहज होईये ,हंसिये मुस्कुराईये काहें अपनी ऊर्जा काउंटर प्रोडक्टिव चीजों में खर्च कर रहे हैं ? आप विद्वान् लगते हैं, (एक विद्वान् को दूसरा भांप ही जाता है हा हा ) तो दिखिए भी ...ये बाशिंग छोडिये तनिक प्रेम मुहब्बत की बात करिए न जिसके बिना ये दुनिया कराह रही है ...आपकी अंगरेजी और जील की पढने में मजेदार है और लिखिए मगर गरियायिये नहीं ..अब हम प्वाईंट तो प्वाईंट जवाब नहीं देगें आपको -यी कौनो अच्छी बात नहीं है ..हाँ भाषा की कौनो संशय कम स कम हमको तो नहिए है जबतक बात समझ में आ जाये ....जरा मुस्कुराईये तो .....
    ---------------- ओह कितना कुछ !!!!!!
    हम तो इस व्यास - वचन पर ही मोहाय गए ! हिमाचल गए हुए थे नहीं तो बतकुच्चन हमहूँ करते !

    उत्तर देंहटाएं

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