रविवार, 4 अप्रैल 2010

...केरल में हुआ इक ब्लॉगर महामिलन ......(केरल यात्रा संस्मरण -८)

आज की दुनियां की भाग दौड़ ,आपाधापी में लोगों को खुद अपने लिए ही फुरसत नहीं है तब दूसरों के लिये समय की जुगाड़ करना कितना मुश्किल तलब( मुआमला )होता है इसका मुझे पूरा अहसास है और इसलिए ही दूसरों के वक्त की सीमाओं / पाबंदियों का मुझे  ख़याल  रहता है -बनारस से केरल के लिए रवाना होने के पहले मैनें सारथी सरीखे सुसम्मानित ब्लॉग के स्वामी  आदरणीय डॉ जांसन  सी फिलिप 'शास्त्री ' जी(शास्त्री जे सी फिलिप) से फोन पर कोचीन पहुँचने की तिथि और उनसे मिलने का संभावित समय बता दिया था ताकि वे अपने समय का प्रबंध तदनुसार करते हुए मुझे कुछ समय दे सकें .जैसी कि उम्मीद थी शास्त्री जी ने बहुत गर्मजोशी से मेरे आग्रह को स्वीकार कर लिया था और मैंने भी तत्क्षण उनसे अवश्यमेव मिलने का मन  बना लिया था -तिरुवनंतपुरम पहुँचने पर एक बार फिर मैंने उन्हें उनसे अपने अपाइंटमेंट की याद दिलाई -एक तरह की प्री कंडीशनिंग ताकि वे अपने समय के प्रबंध की प्रक्रिया अगर आरम्भ न कर सकें हों तो अब आरम्भ कर दें -बार बार के आग्रहों से शायद शास्स्त्री जी को  दक्षिण भारत के पर्यटन पर मेरे पहली बार निकले  होने की मनोदशा  सा भान हुआ और उन्होंने यह पूछ  लिया कि क्या मैं पहली बार कोचीन पहुँच रहा हूँ ? मैंने सहज और सधे स्वर में उन्हें जवाब दिया ( बस किसी एक से बात करने में मेरी जुबान कुछ बेदम होती रही  अन्यथा मैं एक पेशेवर प्रवक्ता हूँ ,विज्ञान वाचस्पति का सम्मान भी हासिल कर  चुका हूँ .हा हा ..मगर दुर्भाग्य या सौभाग्य से उस एक  की लाईन अब नहीं मिलती ...मेरा खोया आत्मविश्वास लौट चला है) -हाँ ,तो मैंने सधे स्वर में जवाब दिया -
और यह निर्जनता की कहानी कहता वामनदेव मंदिर -हिंदूतरेणाम  प्रवेशो निषिद्धः 


'शास्त्री जी ,जब मैं पहले कोचीन आया था तो आपको नहीं जानता था ...इस बार आप यहाँ हैं -कोचीन विथ  आर/एंड  विदाउट शास्त्री  जी मेक्स अ ग्रेट डिफ़रेंस ..."

नाश्ते को देख मेरा मन  ललच उठा...केले सदृश दिखता ही बनाना फ्राई है  
"हा हा हा '' शास्त्री जी का मृदु हास कानों में गूज उठा और वे मुतमईन हो गए कि मैं कोचीन के लिए नया नहीं हूँ .मगर कुछ संवादहीनता सी शायद फिर भी तिरी  रही ...२६ मार्च की शाम को मसाले वसाले खरीद लेने के बाद मैंने शास्त्री जी के यहाँ जाने का  उद्यम शुरू  किया और  लोकेशन और लैंडमार्क्स की जानकारी के लिए उन्हें फोन किया .... बी एस एन एल का नेटवर्क कभी कभी बहुत झुंझलाहट  पैदा करता  है -ठीक से बात न उन्हें सुनायी दे रही थी और न मुझे ही ...मैंने शास्त्री जी से जानना चाहा कि अगर मैं ऑटो या टैक्सी करके आना चाहूं तो वे मुझे कुछ मेजर लैंड मार्क्स बता दें ताकि मैं सहजता से उनसे मिलने आ जाऊं -शास्त्री जी ने कहा कि मैं क्यूं जहमत करता हूँ वे ही आ जायेगें -मैंने पूछा मैं  उनसे कितने किलोमीटर की दूरी पर हूँ तो उन्होंने १२-१३ किमी  बताया शायद .
."".नहीं नहीं मैं आ जाता  हूँ आपके निवास .... " मैंने जोर देकर कहा !
"अच्छा तो आप मेरे घर आना चाहते हैं ? " उनकी इस मासूम सी जिज्ञासा पर मैं मानो आसमान से गिरा मगर खजूर में आ अटका (इस मुहावरे का जन्म कहीं  भी हुआ हो मैंने बड़े शिद्दत से इसे कोचीन रेलवे स्टेशन पर शास्त्री जी के उन शब्दों के श्रवण के साथ ही  सामने के खजूर के पेड़ों की ओर देखते हुए चरितार्थ पाया ....) ..अब मैं क्या कहूं ? इतने दिन और इतनी देर से मैं आपके  घर ही तो पहुंचना चाह रहा हूँ शास्त्री जी !! ..अब यह संवादहीनता कैसे हुई इस मीमांसा में तो मैं अभी भी लगा हूँ मगर मैंने प्रगटतः यही कहा कि हाँ हाँ मैं आपके घर ही आना चाहता हूँ .उधर  उन्होंने आदरणीय मिसेज शास्त्री जी से  शायद  यह कहा कि अरे यह सनकी तो घर ही आने को बोल रहा है ..(हा हा ) ..उधर से हरा सिग्नल तुरंत मिल गया था ..
..किताबों का एक कोना ..... 
"ओ. के. डाक्टर आप जब खुद आने को इन्सिस्ट कर रहे हैं तो थ्रिक्काकरा मंदिर तक आ जाएँ ,मैं वहीं पहुँचता हूँ ."
"कौन सी जगह ? प्लीज मुझे एस एम एस कीजिये  "
एस एम एस आया -'Thrikkakara Temple " और मैं तुरत एक ऑटो लेकर चल पड़ा  ...
करीब ३०- ३५ मिनट में जब मेरा ऑटो उक्त जगह पर रुका तो शास्त्री जी वहां पहले से विराजमान थे ...हम और वे पूरे उत्साह और उमंग के साथ गले मिले -वर्षों से एक दूसरे को अंतर्मन से जानते जो हैं ..फिर कैसा अपरिचय ? उन्होंने मुझे अंकवार में भरते हुए अपने गालों से मेरे दोनों गालों पर स्नेहिल संस्पर्श किया -भला कौन भूल सकता है वह वात्सल्यमय व्यवहार -अ लाईफ टाईम अनुभव! उन्होंने मुझे सामने एक मंदिर को सबसे पहले दिखाया और बताया  कि इस वामन देव मंदिर में गैर हिन्दू होने के कारण उनका भी प्रवेश वर्जित है -यह उनके घर का निकटवर्ती मंदिर है -चाहे तो वे गोपनीय तौर पर वहां जा सकते हैं  मगर उनकी संचेतना ऐसा करने से उन्हें रोकती है -उन्होंने मुझे उसे देख आने को कहा मगर मैंने उस निर्जन से होते वामनदेव मंदिर का बस एक  फोटो खींचा और खुद  उसमें  प्रवेश की अनिच्छा जताई -परदेश में कौन पातालगामी  बने -राजा बलि के अतिथि  वामन देव पातालस्वामी जो ठहरे -बलि और बालि दोनों मिथकीय पात्र सहसा याद हो आये -पहले बालि की असंगत सी याद न जाने क्यूं आ गयी ( शायद   बलि और बालि के नाम साम्य के कारण! )  ..बालि  एक गुफा में घुसा तो कहाँ जल्दी वापस आया था ? -पता लगा मैं इधर मंदिर -गुहा में  प्रवेश करुँ और उधर सशंकित शास्त्री जी फूट लें ..न बाबा न ..बहरहाल उन्होंने मुझे अपने वाहन में लिफ्ट दी और हम अगले दो मिनट  में उनके आवास पर थे.
एक आदर्श दंपत्ति 
शास्त्री जी एक साथ ही समस्त मानवीय सदवृत्तियों  के पुंजीभूत रूप हैं -एक साथ ही दया करुणा  मैत्री  औदार्य के प्रतिमूर्ति -बोली तो इतनी मीठी है कि लगता है उसके लिए अन्नप्राशन अनुष्ठान   के समतुल्य  ही उनका कोई जिह्वा मधुलेपन संस्कार  हुआ होगा . एक परफेक्ट इसाई जेंटलमैन हैं अपने शास्त्री जी ..एक आदर्श ईसाई के लिए सहज ही .सेवाभाव की  ऐसी परिपूर्णता शास्त्री दंपत्ति में है कि उसका साक्षात्कार  मुझे उनके उस अल्पकालिक  स्वागत सात्कार से ही हो गया ...मैंने पत्नी दवारा दिया एक स्म्रति चिह्न श्रीमती शास्त्री जी को सौंप दिया और इस जिम्मेदारी से फुरसत हो शास्त्री जी की बातों की मधुरता में खो गया -न जाने कितनी बातें वे  अल्प समय में ही कर लेना चाहते थे-तब तक भरपूर नाश्ता सामने आ चुका था ..समय प्रबंधन एक्शन में  था .....


कहाँ दिखे है उत्तर दक्षिण ? 

....मैंने विनम्र धृष्टता   से शास्त्री  जी के सुभाषित -प्रवाह को रोका .....

"नाश्ते का दृश्य मात्र मुझे और कहीं केन्द्रित नहीं करने देता शास्त्री जी ...." मैंने निश्चित ही अशिष्टता ( बैड मैनर्स )   दिखायी ..पर क्या करें ,दोनों बराबर के आकर्षण पर एक साथ ही तो ध्यान नहीं रखा जा सकता था न ...नाश्ते में मुझे बनाना  फ्राई ख़ास तौर पर आमंत्रित कर रही थी ....मैंने देखा कि प्रगटतः तो शास्त्री जी नाश्ते में मेरा साथ देने लगे मगर असली नाश्ता तो मैं ही कर रहा था -चटोर जनम जनम का ....इस बीच शास्त्री जी ब्लॉग जगत के अपने निजी , बिजी और सार्वजनिक अनुभवों को बताते रहे -मेरी  दृष्टि भी बहुत साफ़ हुई -महापुरुष की औपनिषदिक संगति भला अपना प्रभाव क्यूं न डाले -उनके मन  में ब्लॉगर मात्र के लिए जो आकंठ करुणा थी वह बार बार छलकती पड़ रही थी  ...पर यह ब्लागजगत भी ..छोडिये क्या कहें ? हमने भी खुलकर अपने मंतव्य व्यक्त किये.  कहना न होगा हमारे और उनके बीच कोई   भी वैचारिक  वैषम्य  नहीं रहा .हमने व्यक्ति से समष्टि तक ,रामपुरिया से कानपुरिया तक ,कनाडा से कन्नौज तक ,साकार से निराकार तक , नामी से बेनामी तक  ,तर्क से कुतर्क तक ,रचना से अ -रचना तक बहुत ही भावपूर्ण संवाद नाश्ते के साथ किया  -न किसी के प्रति कोई मानो मालिन्य और नही कोई निंदा भाव ....सब समय के दास हैं ..यही निष्पत्ति रही हमारी नाश्ता चर्चा का ....


फिर शास्त्री जी ठाढ़  भये नव सहज सुहाए मुद्रा में  उठकर मेरा  हाथ पकड़ अपने घर के प्रथम तल के ध्यान कक्ष में लेकर पहुंचे -द्वार पर ही व्यायामं की बड़ी सी जुगत अपना पूरा इम्पैक्ट ड़ाल रही थी -उन्होंने बताया कि वे नियिमत  व्यायाम  करते हैं जो उनके  शरीर के गठन(कसरती बदन )  और सहज उत्फुल्लता से लग ही रहा था-बस एक यही वैषम्य मुझमें और उनमे  प्रमुख  रहा ,सहसा ही मैं कुछ चिंता निमग्न हुआ .लेकिन वह क्षणिक ही था ..सामने एक विशाल  निजी लाईब्रेरी ने मुझे चकित सा कर दिया ....विगत दिनों से वे मुद्रा शास्त्र (न्यूमिस्मैटिक्स  ) के शास्त्रीय पक्षों के अध्ययन पर  पर जुटे हैं ...ऐसा अध्ययन  जो विरले अध्यवसायी कर पाते हैं -उनकी लाईब्रेरी में मानविकी , धर्म दर्शन , इतिहास की अनेक पुस्तकें और ज्ञान कोश सुशोभित थे -मेरा मन  ललचा रहा था मगर मैं आर के नारायण  के एक निबंध "अ बुकिश टापिक " की याद करके मन  मसोस रहा था ..बातें तो अंतहीन थी ..परशुराम  के केरल प्रवास ,आदि मानव के केरल तट से प्रवेश और कालान्तर की सैन्धव सभ्यता और आर्यों का उत्कर्ष आदि विषयों पर हमारा अनवरत संवाद होता रहा ..अचानक घड़ी पर निगाह पडी -सवा आठ ..मेरा अपायिन्टमेंट ख़त्म हो गया था ..समय पल भर में बीत गया था ...काव्य शास्त्र विनोदेंन  कालो गच्छति धीमताम ...
...

मिसेज शास्त्री जी भी विनम्रता की साक्षात प्रतिमूर्ति दिखीं  --एक सफल व्यक्तित्व   का संबल, अनुप्रेरण ...उन्होंने तो मुझे बिना कहे कि "मातु मुझे दीजे कछु चीन्हा ...." अनेक उपहारों से लाद दिया ..शास्त्री जी ने मुझे एक द्विधात्विक सिक्का दिया और पत्नी के पूजा  गृह  लिए अहिल्याबाई होलकर  का  चांदी का दुर्लभ सिक्का  जिसमें शिवलिंग उत्कीर्ण है सहेज कर  दिया और अहिल्याबाई के शिव समर्पण के दास्तान से उस सिक्के का महत्व भी बताया ..इतना उपहार और धरोहर ..मैं किंचित असहज सा महसूस करने लगा था -मगर शास्त्री दम्पति के वात्सल्य भाव के आगे मेरा संकोच तिरोहित होता गया ..मैंने उन्हें बनारस आने का आमंत्रण दिया ...शास्त्री जी मुझे दूर तक अपने वाहन से छोड़ने आये ....रात ९ बजे तक मैं अपने कैंप तक पहुंच आया था और वापसी यात्रा की एक नई दिनचर्या की तैयारियां शुरू हो गयी थीं ...
जारी ..

32 टिप्पणियाँ:

Manish Kumar ने कहा…

अच्छा लगा शास्त्री जी से आपके संवाद के बारे में जानना !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आप के इस मिलन विवरण का बहुत देर से इंतजार था। जैसा सोचा था वैसा ही पाया शास्त्री जी को। इस अंतर्जाल ने वाकई दुनिया को छोटा कर दिया है।

सत्य ने कहा…

:):):)

ali ने कहा…

मुझे लगता है कि शास्त्री जी ब्लागर ना भी होते तो भी उतने ही प्रेम से मिलते जैसे कि अब ...ये बात दूसरी है कि इस मिलन का मूल कारण ब्लागर होना है ! इस विषय में मेरी निजी राय यह है कि मिशन के लिए समर्पित लोग सामान्यतः किसी को शिकायत का मौका नहीं देते क्योंकि सौहार्दय और सौजन्यता उनकी कंडिशनिंग में शामिल हुआ करती है ! इसी तरह से अध्ययन उनके दैनिन्दिक जीवन का हिस्सा ! सच कहूं तो इस भेंट नें मुझे आश्चर्य चकित नहीं किया बल्कि यह सब मेरे लिए अपेक्षित ही था ! संयोगवश यहां बस्तर में मलयाली समाज ,विशेषकर क्रिश्चियन मिशनरीज से मेरे अत्यंत निज सम्बन्ध हैं अतः आपके संस्मरण के पिछले एपिसोड से ही मैं इस भेंट के सुखद होने का पूर्वानुमान कर बैठा था ! हो सकता है कुछ लोगों को इस तरह के ब्लागर मिलन निरर्थक लगते हों पर ...अपनापन गढ़ने और नये अपने बनाने में इससे बेहतर क्या ? आप वहां भले ही किसी शासकीय कार्य से गये हों ,पर आभासी मित्र को यथार्थ मित्र बनाने का जीवट तो आपमें भी है ही ...इसलिये आप दोनों को साधुवाद ! बेवजह गरियाने / निंदा करने और असहमत होते रहने से बेहतर है कि संवाद किया जाये मिला जुला जाये अल्प समय के लिए ही सही प्रेम स्नेह की ऊर्जा...बिखेरी जाये !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

बहुत खुशी हुई.

Ashok Pandey ने कहा…

आप दो विशिष्‍ट ब्‍लॉगरों का यह महा‍मिलन अभिभूत करनेवाला है।

Arvind Mishra ने कहा…

@बेवजह गरियाने / निंदा करने और असहमत होते रहने से बेहतर है कि संवाद किया जाये मिला जुला जाये अल्प समय के लिए ही सही प्रेम स्नेह की
ऊर्जा...बिखेरी जाये!

अली सा बहुत मार्के की बात है मगर लोग बाग़ माने तब न !

Vivek Rastogi ने कहा…

बहुत ही अच्छा लगा यह महामिलन और वैसे भी सभी ब्लॉगरों के पास समय बहुत ही कम होता है (यह मेरा मानना है) इसलिये समय प्रबंधन भी बहुत जरुरी है क्योंकि २-३ घंटे तो पंख लगाकर उड़ जाते हैं।

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

....सब समय के दास हैं ..यही निष्पत्ति रही....सही कह रहे हैं-समय होत बलवान.
फिलिप जी के व्यवहार को जान कर बहुत अच्छा लगा,सामाजिक सहभागिता आज भी ऐसे ही लोंगो की बदौलत जिन्दा है.

गिरिजेश राव ने कहा…

माना कि भाव के हिसाब से शब्द ठीक नहीं है फिर भी उसकी गरिमा का ध्यान तो रखा ही जाना चाहिए - 'ध्रिष्ठता' को 'धृष्ठता' कीजिए। कुछ लोग संकोची होकर 'ट' कहते हैं लेकिन बिना 'ठ' के इस शब्द में ठसक नहीं आती।
यह 'किसी एक' कौन है?
@ "अच्छा तो आप मेरे घर आना चाहते हैं ? "
- इस मासूम प्रश्न के द्वारा मैंने भी लोगों को दु:खी किया है।
@ -परदेश में कौन पातालगामी बने -राजा बलि के अतिथि वामन देव पातालस्वामी जो ठहरे -बलि और बालि दोनों मिथकीय पात्र सहसा याद हो आये -पहले बालि की असंगत सी याद न जाने क्यूं आ गयी ( शायद बलि और बालि के नाम साम्य के कारण! ) ..बालि एक गुफा में घुसा तो कहाँ जल्दी वापस आया था ? -पता लगा मैं इधर मंदिर -गुहा में प्रवेश करुँ और उधर सशंकित शास्त्री जी फूट लें ..न बाबा न ..
स्वाभाविक ह्यूमर - आनन्दित भए।
@ जिह्वा मधुलेपन संस्कार - :):):)
आप ने जब मुझसे बात कराई तो मुझे भी ऐसा ही लगा। सिद्धार्थ बाबू भी शास्त्री जी की वाणी सुन उनके फैन हो गए थे।
@ शरीर के गठन(कसरती बदन ) - इसीलिए आप फोटो में डरे डरे से लग रहे हैं। शास्त्री जी नारीवादी तो नहीं ? :)
@न किसी के प्रति कोई मानो मालिन्य और नही कोई निंदा भाव - बिना पूछे स्पष्टीकरण सा लगता है।
आप के लेख में आत्मीयता दर्शनीय है।

Arvind Mishra ने कहा…

@गिरिजेश जी आप धृष्टता से बाज नहीं आयेगें ..
एक घर तो डाईन भी छोड़ देती हैं आप तो महाप्रेत निकले महाबाभन से

बेचैन आत्मा ने कहा…

रोचक वर्णन
पढ़कर आनंद आ गया।

उन्मुक्त ने कहा…

शास्त्री जी, उनकी पत्नी और उनकी पुस्तकों से मिल कर अच्छा लगा।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

श्री शास्त्री जी को सपरिवार शुभकामनायें । आपको भी अतिशय धन्यवाद इतना सरल और मधुर परिचय कराने के लिये ।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत ही मंत्रमुग्ध कर देने वाली मुलाकात रही. बहुत शुभकामनाएं दोनों को.

रामराम.

Anil Pusadkar ने कहा…

वकील साब की बातों से सहमत हूं,इस अंतर्जाल ने दुनिया को छोटा कर दिया है।शास्त्री जी से मिलना हम भी चाहते हैं मिश्र जी और आप से भी देखें कब मौका मिलता है?वैसे हमारे बस्तरिहा भाई अली साब बहुत कुछ कह गयें है,मगर हम तो चाह कर उनसे भी नही मिल पाये हैं।

Neelima ने कहा…

आपका यात्रा संस्मरण पढकर आनंद आया ! शास्त्री जी से पिछले साल ठीक इन्हें दिनों हुई मुलाकात की यादें ताज़ा हो गईं !

बी एस पाबला ने कहा…

हम तो कायल हो गए आपकी स्पष्टवादिता के > नाश्ते का दृश्य मात्र मुझे और कहीं केन्द्रित नहीं करने देता

Ali का वाक्यांश भी खासा पसंद आया >
बेवजह गरियाने / निंदा करने और असहमत होते रहने से बेहतर है कि संवाद किया जाये मिला जुला जाये अल्प समय के लिए ही सही प्रेम स्नेह की ऊर्जा...बिखेरी जाये !

बाकी तो मुझे ऐसा लगा कि आपके साथ-साथ मैं भी शास्त्री जी से मुलाकात कर रहा। लाईब्रेरी देख-पढ़ कर तो मन मचल गया।

हम भी जा रहे बहुत जल्द मुलाकात करने

बी एस पाबला

सतीश सक्सेना ने कहा…

शास्त्री जी का स्नेह तो सर्व विदित है ही , कम महत्वपूर्ण आपका अपनापन भी नहीं है , आज के व्यस्त समय में किसके पास इतना समय है की हजारों किलोमीटर जाकर शास्त्री जी के घर पहुँचने की विनम्र मनुहार करे ! आप की सह्रदयता और स्पष्टवादिता दोनों पसंद आयीं ! अरे हाँ ...गिरिजेश राव का क्या करोगे ?
शुभकामनायें !

mukti ने कहा…

शास्त्री जी से आपकी मुलाकात का ये वर्णन निस्सन्देह रोचक है. शास्त्री जी तो हमेशा की तरह मुस्कुराते नज़र आ रहे हैं, पर आप क्यों मुँह बनाकर खड़े हैं?

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

रोचक रहा यह वर्णन भी ...

राज भाटिय़ा ने कहा…

शास्त्री जी से मिल कर बहुत अच्छा लगा, लेकिन मेरी नजर तो उस नशते की टेबल पर ही है.... केक, बिस्किट, रोल ओर काफ़ी ...ओर शास्त्री जी को हम ने ब्लांग के माध्यम से ही जाना, ओर इन का जीवन हम सब को बहुत संदेश देता है...काश मै भी इन जेसा होता
आप का धन्यवाद

अजय कुमार झा ने कहा…

हम तो नाश्ता ही घूरते रह गए ...फ़िर लाईब्रेरी में घुस गए ..बस ई समझा कि पोस्ट को निहार निहार के निहाल हो गए ..
अजय कुमार झा

संगीता पुरी ने कहा…

अच्‍छा चल रहा है आपका यात्रा संस्‍मरण .. शास्‍त्री जी से आपका मिलना हमें भी सुखद अहसास दे रहा है !!

वाणी गीत ने कहा…

संस्मरण में साफगोई अच्छी लगी ...!!

Udan Tashtari ने कहा…

शास्त्री जी से आपके मिलन गाथा को पढ़कर मन प्रसन्न हो गया.

zeal ने कहा…

I was so engrossed in reading. Your post made me feel as if i'm reading some fiction. Felt like joining the conversation between you and Shastri ji.....'Mil baithe deewane teen'

RAJ SINH ने कहा…

खूब मस्त घुमाई हो रही है मित्रवर .आपके वृतांत वर्णन से लगा की हम खुद ही शाश्त्री जी से मिल आये .

Meenu Khare ने कहा…

बहुत बढिया संस्मरण. नाश्ता चर्चा पसन्द आई. शास्त्री जी निसन्देह सर्वप्रिय आदरणीय ब्लॉगर है. उनसे मुलाक़ात का अच्छा चित्रण किया है.

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

शास्त्री जी का सदैव रहने वाली मुस्कान इशारा करती है उनके इस सम्मोहक व्यक्तित्व का, जिसकी झलक आपने दिखा दी है हमें इस प्रविष्टि में !
विशिष्ट व्यक्तित्वों का मिलन ! खूबसूरत !

P.N. Subramanian ने कहा…

दो अतृप्त आत्माओं का मिलन प्रसन्न कर गया. गुफा में प्रवेश करने वाला बाली और महाबली भिन्न भिन्न हैं

आशा जोगळेकर ने कहा…

आपकी शास्त्रीजी के साथ भेंटवार्ता बहुत रोचक लगी ।
ऐसा नाश्ता देख कर किसके मुंह में पानी नही आयेगा ।

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