रविवार, 27 फ़रवरी 2011

मंगता पड़ोसी उजडती दुनियाँ

महापुरुषों ने कभी कभार कुछ ऐसे भी सिद्धांत प्रतिपादित किये हैं जिन्हें व्यवहार में लाना असंभव नहीं तो बेहद कठिन जरुर है .अब गांधी जी को ही ले लीजिये -कहते थे अगर कोई तुम्हारे एक गाल पर तमाचा जड़ दे तो तुम अपना दूसरा गाल आगे कर दो ..मगर अगर वह दूसरे पर भी जड़ दे तो ..इसके बारे में गांधी जी  या तो विचार करने से चूक गए या फिर यह सुनिश्चित  नहीं कर पाए की गाल के बाद का दूसरा अंग उपांग क्या हो या फिर दस्तावेजों में इस बात का जिक्र छूट गया .... शायद इन्ही सब कन्फ्यूजन के कारण   बापू का यह सिद्धांत भी अमली जामा नहीं ले सका... अब ऐसे ही एक सिद्धांत है रहीम  साहब का -रहिमन वे नर मर चुके जो कहुं मांगन जायं ,उनसे पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाहिं ... अब इस सिद्धांत का व्यवहार में लाना कितना कठिन है यह वही समझ सकता है जिसे मंगतों के सामने जेब ढीली करनी पड़ जाती है और वह भी अपने महापुरुषों की मर्यादा बचाने के धर्मसंकट में ...मैंने खुद भी रहीमदास जी के इस सिद्धांत पर जीवन में अमल करने के चक्कर में बहुद कष्ट सहें हैं, आत्मा को दुःख  पहुचाया है ताकि अपने कम से कम एक महापुरुष के वचन का प्रमाण बना रहे ...कबीरदास भी एक ऐसी ही बानी बोल गए हैं -कबिरा आप ठगाईए और न ठगिये कोय और ठगे दुःख होत है आप ठगे सुख होय ....मैंने भी जीवन में बराबर लोगों को खुद ठगा उठने  का बदस्तूर मौका दिया है मगर दुःख है की मुझे कभी भी खुद को ठगाए जाने में सुख की अनुभूति नहीं हुई....शायद मुझमें ही कोई बड़ी कमी रह गयी है -मनसा वाचा कर्मणा कोई तो कमी जरुर रह गयी है अन्यथा महापुरुषों के वचन प्रमाणित न हों ऐसा कैसे हो सकता है ....कभी कभी लगता है महापुरुष भी कोई चौबीस घंटे के महापुरुष थोड़े ही रहे होंगे -किसी क्षण की सामान्य विवेकहीन मनुष्यता में कुछ ऐसी बात बोल गए होंगे जो उन्हें बाद में खुद भी याद नहीं रही होगी -अन्यथा वे सुधार जरुर कर लिए होते ...

मैं मंगतों की बात कर रहा था -शायद वे रहीमदास के सबसे बड़े अनुयायी रहे हैं ..वे निश्चय ही रहीमदास को कुलगुरु मानते होंगें जिन्होंने उनकी मदद में एक ऐसा मूल मन्त्र थमा दिया है जिसके चलते उनकी रोजी रोटी चल रही है -मांग लेने पर कुछ न कुछ तो मिल ही जाएगा ,अन्यथा अगला मृतक के समान नहीं हो जाएगा? मुझे लगता है माँगना  महज दरिद्रता या पेशे से नहीं जुड़ा है जैसे भिखारी या फिर कर्मकांडों के माहापात्र और धर्म स्थानों के पण्डे या ररे -ये सब अपनी दरिद्रता या पेशे के कारण मांगते हैं ...हमारे जौनपुर में एक जगह है- कुल्हनामऊ-जहाँ के मंगते कुल्हनामऊ के ररा के नाम से विख्यात हैं-आपके पीछे पड़ जायं तो दमड़ी के साथ चमड़ी भी उधेड़ लें -जनता जनार्दन उनसे सहज ही आतंकित रहती है ....मगर इनकी पेशागत मजबूरिया हैं जिनके चलते वे इस निषिद्ध  कर्म में लगे हैं.मगर उनका क्या जिनमें मागने की नैसर्गिक प्रवृत्ति है ....जैसे आपका पड़ोसी ...

हमारा यह सौभाग्य रहा है अब तक के जीवन में हमारे ऐसे पड़ोसी मिलते रहे हैं जिन्होंने हमें बराबर रहीमदास के उपरोक्त सिद्धान्त के मर्म को समझाये रखा है और बार बार हमें "जिन मुख निकसत नाहिं " की याद दिलाकर मरण  से बचाये रखा है -मतलब वे जानते हैं की मिश्रा जी का परिवार मांगने वाले को मुक्त हस्त देते रहने के फिलासफी में "रघुकुल रीति सदा चलि  आई ....प्राण जाय पर वचन न जाई " की सीमा तक उदार है ...सच तो यह  है कि हमारे पड़ोसी सहज ही हमारी इस नैसर्गिक क्षमता को भांप लेते हैं ...और हम ठगे से रह  जाते हैं ठगा जाते हैं ठगाए जाते  रहते हैं ....हमारे ऐसे मंगता पड़ोसियों में कई बार तो हमसे भी ज्यादा वेतनादि पाने वाले भी रहे हैं मगर अपने पूरे परिवार को मंगता धर्म में पूर्णतया दीक्षित और निष्णात किये हुए हैं ..कालबेल बजते ही एक प्रबल संभावना पड़ोसी द्वारा कुछ मांगने की आशंका होती है जो दस बार मे कम से कम तीन बार सच साबित होती है ..हर कालबेल रिंग के साथ हम दिल को मजबूत करने में जुट जाते हैं ....अब तो मैं उनके सामने कुछ पागलों जैसा व्यवहार करने लगा हूँ -इसलिए नहीं कि इच्छित वस्तु उन्हें न देने की मंशा रखता हूँ मगर अब बार बार खुद को मृतक साबित न होने की एक्टिंग से  ऊब चुका हूँ -पत्नी जी  मेरे मनोभावों को समझने लगी हैं इसलिए वे तुरंत ही आगे आकर स्थिति संभालती हैं और मैं पागलों सा कुछ आयं सायं बोलता वापस हो लेता हूँ ...

पड़ोसी द्वारा मांगी जाने वाली खाद्य वस्तुओं में चाय चीनी आंटा के साथ कभी कभी नमक भी होता है ..हमारेगाँवों में अभी भी एक कहावत है कि नावं गाँव इतना बड़ा घर में नूनै नाय -लेकिन कहा ना कि यह एक प्रवृत्ति है जो लोगों को हमेशा कुछ न कुछ मांगने को उकसाती रहती है ...खाने के सामान के साथ ही अखबार ,गोंद,लिफाफा ,हथौड़ी आदि भी मांग  लिए जाते हैं ..अभी कल ही तो पड़ोसी ने पिलास की मांग की ..मैं समझते हुए भी उनसे यह समझने की कोशिश करता रहा कि इसकी संरचना कैसी होती है तब तक पत्नी जी ने लाकर उसे थमा दिया ..पता नहीं वह अभी तक लौटाया भी गया कि नहीं -पोस्ट पूरी होते ही पता लगाता हूँ -एक दिन मैंने दरवाजा खोला तो अखबार की फरमाईश हुई ..हाथ में ही था मैंने तुरंत थमा दिया ...तुरंत फिर कालबेल बज उठी ..अब क्या ?... कुछ अखबार और दे दीजिये ..मतलब ? कल का ? ..नहीं नहीं कोई भी चलेगा ? अब मेरा माथा ठनका ..क्या पुराना अखबार चाहिए? हाँ हाँ रैक पर बिछाना है ...मगर अभी तो मैंने आज का ही अखबार दिया था उसे वापस कीजिये ...मैंने तो उसे बिछाकर उसपर सामान रख दिया है ....बहरहाल स्थति संभालने पत्नी जी आ  गयीं थीं ...

अब ऐसा मंगता पड़ोस मिल जाय तो एक ही जीवन में आपको बार बार पुनर्जीवन मिलता रहे ....यह कोई कम सौभाग्य है? इस लेख के शीर्षक पर मत जाईये ..वह तो तुकबंदी बिठाने के लिए है!

बुधवार, 23 फ़रवरी 2011

ब्लॉग स्कूप -एक टीनेजर ब्लॉगर की शादी तय हुई!

 आज अल्लसुबह उन्होंने फोन किया और अपने कैशोर्य उत्साह से भरे स्वरों में उद्घोषणा की कि मुझे जल्दी ही एक बरात करने का सुअवसर मिलेगा ..मैं सुनकर सहसा स्तब्ध रह  गया -१९ -२० वर्ष भी क्या शादी की कोई उम्र होती है? अभी तो खेलने खाने का दिन है ,समाज के तजुर्बे बटोरने का दिन है ...वैसे भी उन्नीस बीस साल के लड़के अमूमन होते बकलोल ही हैं; हाँ इत्ती उम्र की लडकियां शादी की बात करें तो ठीक भी है -वे इस उम्र में भी भावनात्मक रूप से परिपक्व और विवेकपूर्ण निर्णयों को लेने में थोडा बेहतर हो चुकी रहती हैं -ज्यादा परिपक्व होती हैं ...शादी व्याह का मामला बड़ा नाजुक होता है कई सामाजिक पारिवारिक पहलू इससे जुड़े रहते हैं -और इन विषयों में कोई फाईनल बात कर पाना हमेशा दुरूह होता है -मैंने पहले भी इस मामले में कुछ कहा है ..

अब उन्होंने मुझे बरात में चलने को आमत्रित किया है और यह भी कहा कि फलाने तो यह सुन कर झूम गए हैं और व्यग्रता के साथ उस मुहूर्त का इंतजार भी कर रहे हैं ...मैं अब कैसे बताऊँ कि समाजिकता के गहरे तकाजे के बावजूद भी मुझे शादी बिआह में शरीक होने का शौक नहीं है और अगर बड़े बुजुर्गों का दबाव न रहा होता तो शायद खुद की भी शादी में भी न गया होता ...मुझे शादी व्याह के अवसर का दिखावापन ,व्यर्थ की फिजूलखर्ची और झूठी शान शौकत से सख्त चिढ है -लोग बाग़ अपने जीवन की गाढ़ी कमाई व्यर्थ के आडम्बरों में फूक देते हैं कई बार तो कर्ज लेकर भी ....उत्सवों को सुरुचिपूर्ण तरीकों से मनाये जाने का भी सऊर लोगों को सीखना चाहिए -कई बार लडकी वाला बिचारा बेबस हो हाथ जोड़े वर पक्ष की  उल जलूल हरकतों को मानता और जी हुजूरी में जुटा रहता है ...और कभी कभार धूर्त लडकी वाले भी वर पक्ष को झान्से   में रखकर ,सब्जबाग दिखाकर अपनी बेटी का जीवन ही दांव पर लगा देते हैं -उनका सिद्धांत रहता है-'भयल बिआह मोर करब का ? ' मतलब एक बार शादी किसी तरह निपट जाय ,फिर क्या होना है ? मुझे लगता है कि कई बार ऐसी धोखाधड़ी और झूठ की बुनियाद बहुत गहरे दुष्परिणाम लेकर आते हैं ...दहेज़ हत्याएं भी! झेलना बिचारी लडकी को पड़ता है -ऐसे अनुभवों ने मुझमें शादी व्याह के पारम्परिक आयोजनों  के प्रति एक चिढ सी उत्पन्न कर दी है ...बहरहाल ..

बात शादी की उम्र और औचित्य  को लेकर हो रही थी ....सभी को शादी की अनिवार्यता हो ही यह कोई जरुरी नहीं -मगर वो कहते हैं कि यह एक वह गुड़ है जो खाए वह  पछताए और जो न खाये वह भी पछताये -कम उम्र की तयशुदा शादियों के कई सामाजिक कारण हो सकते हैं मगर इसमें निश्चय ही भावी वर वधु के विवेकपूर्ण निर्णय का पहलू गौड़ रहता है ....उनकी उम्र ही शायद विवेकपूर्ण निर्णय लेने की नहीं रहती तभी वे व्याह दिए जाते हैं -लड़कियों को एक सपनीले संसार का राजकुमार अपनी सम्मोहक दुनिया में आने का आमंत्रण  देता हुआ लगता है तो ज्यादातर कमतर युवाओं को यौन फंतासियां लुभाती हुई लगती हैं और वह चुप रहकर भी अपनी सहमति दे देता है ....और यह सपनीला संसार जीवन के  पथरीले यथार्थों से जल्द ही टकरा कर बिखरने लगता है -मैंने कितनी ही सुन्दर रूपवती लड़कियों को देखा है जो कम उम्र में व्याह दिए जाने के कारण ,जीवन के ठोस यथार्थों से मुठभेड़ के कारण एक दो वर्ष में ही कांतिहीन हो जाती हैं ...इसलिए भी मैंने मित्र ब्लॉगर को अभी शादी न करने की सलाह दी -वे खुद ही नहीं एक और जिन्दगी को भी तबाह करने के मुहाने तक आ गए हैं! 

उनका कहना है कि दरअसल यह उनका प्रेम विवाह कम अरेंज मैरेज है ...जबकि जनाब खुद अभी ठोस आर्थिक धरातल नहीं पा सके हैं -मैंने पूछा शादी की इतनी जल्दी भी क्या है ? तो उनका कहना है की लडकी वाले नहीं मान रहे हैं...कहते हैं शादी अभी करिए विदाई साल दो साल बाद हो जायेगी ..लडकी वालों की व्यग्रता समझी जा सकती है और वे भी लडकी को शुभस्य शीघ्रम की आड़ में जल्दी निपटाना चाहते हैं बिना यह देखे कि ब्लॉगर लड़के की आर्थिक स्थिति अभी मजबूत नहीं है ....मैंने मित्र ब्लॉगर को काफी उंच नीच समझाया भी मगर वे तो कृत संकल्पित हो रहे हैं -मैंने उनका ध्यान विकर्षित करने के लिए वह बात भी बतायी जो कभी हमारे एक प्रोफ़ेसर ने समझायी थी -मगर जीवन भर का मलाल यह कि शादी के बाद समझायी -वह मूल मन्त्र था "जब फुटकर  दूध सहज ही सुलभ हो  तो फिर किसी गाय /भैंस को खूंटे से क्या बाँध कर रखना " प्रोफ़ेसर साहब आजीवन ब्रह्मचारी हैं और आज भी खुद गायों का दूध लेने दूर तक जाते हैं -जीवन के ७८ वे बसंत का सामना इस वर्ष करेगें. हेल  हार्टी हैं ,चेहरे पर कान्ति है और अपनी क्षेत्र के मानेजाने विद्वान् भी ...कितने कुंवारों ने भारतीय मनीषा को समृद्ध किया है -एक अपने हर दिल अजीज सदाबहार अटल जी ही हैं जिन्होंने अगर शादी की होती तो राष्ट्र की ,आम जन की  इतनी सेवा नहीं कर पाते ,इतनी सुन्दर कवितायें  न रच पाते! 

पता नहीं कितने लोग मेरी इस बात से इत्तिफाक रखेगें कि शादी मनुष्य की बौद्धिक संभावनाओं पर निश्चय ही विराम लगाती है -तुलसी रत्नावली से  विरत होकर ही तुलसी हुए ....कितने महापुरुष हुए हैं जो आजीवन ब्रह्मचारी रहे ....या तलाकशुदा /परित्यक्ता ...जिन्होंने जीवन का लगभग सभी अभीष्ट पूरा किया -पुरुषार्थों की प्राप्ति की ....जो वे शादी शुदा रहकर निश्चय ही नहीं कर पाते ....अब पता नहीं मेरा यह प्रवचन मेरे मित्र को रास आया कि नहीं -अब इसके बाद भी मुझे उनके विवाह में जाना पड़ा तो बताईये मुझे कैसा लगेगा ?

नोट:इस पोस्ट में कुछ बातें महज निर्मल हास्य के लिए भी  हैं!

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

भोपाल यात्रा और लौटकर पर्ल परिणय वर्ष का अनुभव -आह्लाद!

भोपाल की यथा प्रस्तावित यात्रा मिनट टू मिनट वैसी ही बीती जैसी संकल्पित थी ...हाँ रेल की लेट लतीफी ने सुबह के आरम्भिक कार्यक्रम में मेरी भागीदारी थोड़ी विलंबित अवश्य करा दी ...रेल के साथ तो जैसे मेरी  पुरानी अनबन है ...ऐसी कोई रेल नहीं जिसमें बैठा मैं होऊँ और वह हो लेट नहीं ..लौटते वक्त फेसबुक पर टिपटिपाया मैंने ....जाते वक्त कामायनी एक्सप्रेस से और लौटते वक्त वाया इटारसी, महानगरी एक्सप्रेस से ... ...ये दोनों ही वाराणसी और मुम्बई के बीच की फेमस ट्रेने हैं मगर इतनी दूरी की ट्रेन होने के बावजूद भी इनमें आज तक पैंट्री -रसोईं यान नहीं है ..इन ट्रेनों के बारे में यात्रियों के अनुभव बड़े कटु हैं -गर्मी के दिनों में स्टेशनों के लम्बे अंतरालों के बीच बिना पानी के यात्री तडप उठते हैं -इन दोनों ट्रेनों में लगातार मांग के बावजूद भी आज तक पैंट्री की व्यवस्था नहीं हुयी है ...मैं खुद भी जाते और आते वक्त ढंग की चाय पीने को तरस गया ....एक और गट फीलिंग हुयी कि लालू के बाद शायद ट्रेनों की सामान्य साफ़ सफाई व्यवस्था भी इस रूट पर प्रभावित हुयी है -टू  ऐ सी कोच के टायलेट में टिशू पेपर तक नहीं और लिक्विड सोप डिस्पेंसर भी खाली ....किसका डिपार्टमेंट है यह ? निश्चित ही अपने ज्ञान दत्त जी और प्रवीण पाण्डेय जी का तो नहीं ...और रेल के हर मामले के लिए उनकी भी क्या जिम्मेदारी -अपने काम को वे दुरुस्त रखते हैं पूरे रेल का ठेका तो उन्होंने लिया नहीं ..हाँ ममता जी के पास जरूर है इसका ठेका मगर वे ब्लॉग तो पढ़ती नहीं और किसी से पढवाती भी नहीं होंगी -ब्लॉग जैसे अनुत्पादक चीज से इन बड़े लोगों का भला क्या लेना देना? 

भोपाल की आईसेक्ट नाम की संस्था पिछले दो दशकों से विज्ञान और प्रौद्योगिकी को समर्पित एक पत्रिका निकाल   रही है, नाम है इलेक्ट्रानिकी आपके लिए ..मैं इसमें लिखता रहा  हूँ इसलिए पत्रिका के दो सौवें अंक के लोकार्पण पर मुझे और देश के कई प्रसिद्द विज्ञानं संचारकों को इस पत्रिका के सम्पादक और वन मैंन  शो आईसेक्ट संस्था के श्री संतोष चौबे जी ने आमंत्रित किया था इस अवसर पर भविष्य की दुनियां परिवाद में शिरकत के लिए ...भोपाल के हबीबगंज रेलवे स्टेशन से मैं पहले अपनी मित्र के यहाँ गया ..वहां फ्रेश हो,नाश्ता पानी और  सज धज कर कार्यक्रम  के वेन्यू स्कोप कैम्पस को निकलने  को तैयार हो गया ..मित्र ने कहा कि चेहरा रुखा रुखा सा लग रहा है क्रीम लगा लीजिये,.." मेरा चेहरा स्थायी रूप से ऐसा ही है और क्रीम मैं कभी नहीं लगाता " के संक्षिप्त उत्तर से उनके चेहरे पर विस्मय को उभारते हुए मैं निकल पडा . पत्रिका का लोकार्पण कार्यक्रम भव्य था ,भोजन दिव्य था और परिवाद बुद्धिगम्य -यहाँ पूरी रिपोर्ट है ...रवि रतलामी जी के गृह आमंत्रण को मैं स्वीकार नहीं कर सका क्योकि मेरा पहले से कार्यक्रम तयशुदा और सार्वजनिक हो चुका था ...मैंने उनसे क्षमा मांग ली....

सायंकाल परिवाद के समापन पर भोजपुर के  मंदिरों का भ्रमण आयोजित था मगर मैं वहां न जाकर तयशुदा कार्यक्रम के हिसाब से सुब्रमणियन साहब के यहाँ पत्नी शोक पर संवेदना व्यक्त करने गया ...वे बैंक के एक उच्च अधिकारी होने के बावजूद प्राचीन भारतीय इतिहास ,सिक्कों ,शिलालेखों ,पुरातत्व के शौकिया विद्वान् रहे हैं -ऐसे लोगों से मिलना मुझे बहुत आत्मीय अनुभव दे जाता है -कोई और अवसर होता तो उनके अर्जित ज्ञान से भी लाभान्वित होता मगर फिर भी विन्ध्य पर्वत मालाओं के स्थान पर कभी समुद्र ठांठे मारता था इसके प्रमाण स्वरुप इन्ही स्थलों से उनके जुटाए समुद्री शेल्स -शंखों के फासिल्स हमने देखे और उन्होंने मुझे माहाभारत काल के भारत पर पंडित माधवराव सप्रे द्वारा अनूदित अद्भुत पुस्तक हिन्दी महाभारत मीमांसा की प्रति भेट की ...कर्मकांडों के लोकाचार को निभाते हुए मैंने उनके बहुत आग्रह के बाद भी कुछ खाया नहीं ,बस चाय पी और हाँ थोड़ी देर में ही हमें सोमेश सक्सेना जी ने भी ज्वाईन कर लिया जो मेरी विज्ञान कहानियों  के एक पुराने   पाठक और प्रशंसक रहे हैं और ब्लॉगजगत में अब उनकी धमाकेदार इंट्री हो चुकी है ....वे बहुत सुदर्शन ,मितभाषी और मोहक व्यक्तित्व के (कुमार ) स्वामी हैं अपना तखल्लुस वे अब यही कर देगें ऐसी इल्तिजा है ...बहुत कम बात हो पायी उनसे मगर लगा ऐसे व्यक्ति से तो अहर्निश अनन्तकाल तक बतियाते रह सकते हैं ...मेरे अगले कार्यक्रम का समय हो रहा था इसलिए मैंने भारी मन से दोनों जने से विदा  ली ....

 भोपाल में पुरानी यादों का एक जखीरा ...बजरिये ग्रामोफोन 
सौजन्य:मास्टर कार्तिकेय जैन  

अगले तयशुदा कार्यक्रम के हिसाब से मुझे एक वैलेंटाईन भोज में हिस्सा लेना था और शेष शाम वहां सुरुचिपूर्ण भोजन और पुरानी  यादों को शेयर करते हुए ,ग्रामोफोन पर गाने सुनते हुये बीता... ग्रामोफोन पर गाने सुनना एक अद्भुत सा सुखद काल विपर्यय  (अनाक्रोनिज्म ) और पुरसकूं माहौल सृजित करता है ....एक विलक्षण और दुर्लभ होता ...अनुभव ....अगले दिन मित्र की परिवहन सुविधा सौजन्य से इटारसी आकर महानगरी एक्सप्रेस पकड़कर वापस बनारस आकर फिर दुनियादारी में तल्लीन हो गया हूँ ......
 पुनश्च:
डॉ.दराल साहब के स्नेहादेश पर आज अपनी परिणय त्रिदशाब्दि   -मुक्ता परिणय वर्ष (पर्ल एनिवेर्सरी ) की यह इन्द्रधनुषी छवि यहाँ लगा रहा हूँ आप सभी आदरणीय अग्रजों के आशीष और प्रिय अनुजों की शुभकामनाओं के लिए ....



परिणय त्रिदशाब्दि -चित्र परिचय 
बाएं से -सबसे छोटी बहन ज्योत्स्ना,मैं ,पत्नी संध्या ,अनुज मनोज की पत्नी डॉ.छाया मिश्र ,अनुज डॉ मनोज और मेरे बहनोई, दिल्ली प्रवासी इंजीनियर  दीपक मिश्र जी 
यह हमारे लिए परम आह्लादकारी रहा कि आज सभी इस मौके पर अपने स्नेह और शुभकामना के लिए इकट्ठे हुए ..(चित्र सौजन्य :प्रियेषा मिश्र } केक भी आया और गुलदस्ते भी ...


रविवार, 13 फ़रवरी 2011

भोपाल की मेरी प्रस्तावित एक दिनी यात्रा

मेरे भोपाल जाने के कई युक्तियुक्त कारण रहते हैं मगर जाने की बारम्बारता फिर भी कम रहती है -मगर मैं मौके की प्रतीक्षा करता रहता हूँ-इस बार की यात्रा सुखद और दुखद कारणों के मेल से हो रही है.सुखद कारण यह कि विज्ञान संचारकों /लेखकों की बैठक में शिरकत करनी है और ठीक वैलेंटाईन के दिन ही अपनी एक चिर परिचिता मित्र के साथ सानिध्य के कुछ पल गुजारने को मिल जायेगें और एक वैलेंटाईन डिनर पार्टी की सौगात भी. दुखद कारण यह कि सुब्रमणियम साहब को धर्म पत्नी का शोक,हाँ  उनसे मिलकर शोक संवेदना भी प्रगट कर सकूंगा .
लिहाजा यह कार्यक्रम  बन गया है -
प्रस्थान: ३ बजे अपराह्न  बनारस से कामायनी एक्सप्रेस द्वारा १३.२.११ 
आगमन : ७ बजे प्रातः हबीबगंज रेलवे स्टेशन,भोपाल  १४.२.११
ब्रेकफास्ट एवं अवस्थान :अपनी मित्र सुश्री कंचन जैन के साथ १० बजे तक 
प्रस्थान: भविष्य की दुनिया सेमिनार स्थल स्कोप कैम्पस ,आईसेक्ट ,मिसरोद 
सेमिनार में सहभागिता :५ बजे सायंकाल तक ...
चिट्ठाकार पी एन सुब्रमणियन जी से मिलकर धर्मपत्नी के निधन पर शोक संवेदना :६-7 बजे 
रिजर्व टाईम एवं वैलेंटाईन पार्टी : मित्र के साथ :७ से ११ बजे, तदन्तर 
शयन होटल आमेर ग्रीन 
१५.२. ११.
प्रस्थान इटारसी के लिए :९ बजे 
इटारसी से बनारस : १२ बजे महानगरी एक्सप्रेस 

कोई भूले भटके ब्लॉगर बन्धु भी इस दौरान मिल जायं तो फिर सोने में सुहागा! 

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

बड़े काम का प्रोडक्ट है हैण्ड सैनिटायिज़ेर (विज्ञापन नहीं!)

चिकित्सक तो इसका प्रयोग पहले से ही करते रहे हैं मगर अब यह  सर्वसुलभ हो चला है और बड़े काम की चीज है .इधर अनेक संक्रामक बीमारियों का दौर दौरा है जिसमें छुआछूत से और हाथों में संक्रमण से महामारियों के फैलने का भी अंदेशा बढ़ता गया है . सुअरा (स्वायिन फ़्लू ) का संक्रमण जब था तो हाथों को कई बार साफ़ रखने की हिदायत दी जा रही थी -डायरिया जैसी बीमारियाँ भी हांथों की गंदगी -जीवाणुओं के सम्पर्क से फैलने की संभावना रहती है क्योकि हाथों का सम्पर्क मुंह और नाक से होता ही रहता है ...अब हाथों को विषाणु  मुक्त रखने के के लिए बाजार में कई बहुराष्ट्रीय और देशी कम्पनियों ने हैण्ड सैनिटायिज़र उतार दिया है जिसमें अमूमन एथेनाल अल्कोहल होता है जिसका गुण है कि यह ९९.९९९ प्रतिशत तक जीवाणुओं का सफाया कर देता है ...एक मिनट के भीतर ....बशर्ते आप जिस हैण्ड सैनिटायिज़र का इस्तेमाल कर रहे हैं उसमें एथेनाल की सांद्रता ६०  फीसदी के ऊपर हो ...
यह अमेरिकी ब्रैंड मेरे उपयोग में है मगर यहाँ उपलब्ध नहीं है
इन दिनों सैनिटायिज़र का प्रयोग साबुन से हाथ धोने के विकल्प में प्रचलन में है ..मैंने अभी गोदरेज और लायिफबाय द्वारा लांच किये इस प्रोडक्ट को खरीदा है ...जिसकी कीमत ६० रूपये के आस पास है और इस्तेमाल के समय बस चन्द बूंदे हथेली पर लेकर पूरे हथेली के आगे पीछे मल लेना होता है ..साबुन पानी से फुरसत ...ये छोटी शीशियों में हैं अतः आवश्यकतानुसार साथ में बाहर रहने के समय भी  रखी जा सकती हैं -अगर आप किसी बीमार को अस्पताल देखने जा रहे हों और उसकी तीमारदारी में लगे हों तो यह काम की चीज है ....अल्कोहल युक्त सैनीटायिज़र ज्यादातर जीवाणु (बैक्टेरिया ) ,फफूंद और कुछ विषाणुओं (वाईरस ) का सफाया कर देने में सक्षम हैं ..हाँ अगर हाथ बहुत गंदे हों तो साबुन पानी का इस्तेमाल जरूरी है और फिर  सैनीटायिज़र का इस्तेमाल भी कर सकते हैं .इस्तेमाल के विस्तृत तरीके को यहाँ से देख सकते हैं जिसमें नाखूनों ,उँगलियों के पोरों तक इसे ठीक तरह से मलने की सिफारिश की गयी है -यह वास्तव में बहुत सहज और आसान है.

एक सवाल यह भी है कि मुसलमान भाई  सेहत के इस नायाब नुस्खे का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं क्योंकि इसका मुख्य घटक ही अल्कोहल है जो इस्लाम में हराम -वर्जित है.मगर इस बिंदु पर इस्लामी विद्वानों का मानना है कि एक दवा के रूप में यह वस्तुतः हलाल है मतलब इसका इस्तेमाल कर सकते हैं .मुस्लिम काउन्सिल आफ ब्रिटेन का भी यही कहना है .वैसे अध्ययन भी यही बताते हैं कि हाथों में प्रयोग के बाद इसका अधिकाँश भाग अवशोषित नहीं होता बल्कि हवा में उड़ जाता है और इसका असर शरीर के अंदरूनी हिस्से तक नहीं होता ....और नशा उत्पन्न करने की कोई समस्या तो है ही नहीं ...

 यह कंज्यूमर स्टोरों  पर उपलब्ध है 
 
एक अच्छी बात और है कि यह एन्टीबायोटिक औषधियों के प्रति असहिष्णु (रेजिस्टेंट ) हो चुके जीवाणुओं और टी बी के जीवाणुओं पर भी समान  रूप से कारगर है -मतलब इनका सफाया करके न रहेगा बांस न बसेगी बासुरी जैसी उपयोगिता भी इसने ऐसे जीवाणुओं के मामले में साबित किया है .फ़्लू ,कामन कोल्ड ,एच  आई वी के जीवाणुओं पर तो कारगर है ही .यद्यपि इनमें से कई विषाणु जब तक फेफड़े में नहीं पहुँचते रोगकारक नहीं होते .....हाँ रैबीज विषाणुओं पर यह  उतना कारगर नहीं है .
 यह तो अभी अभी खरीदा है ..

इसके इस्तेमाल में सावधानी यह होनी चाहिए कि आग का स्रोत निकट न हो ..और इसके उड़ जाने के बाद ही माचिस की तीली आदि जलाई जाय ..यह बहुत ही ज्वलनशील है और समीपस्थ आग की लौ  इसे ज्वलनशील कर सकती है ...बच्चों की पहुँच से इसे दूर होना चाहिए.. यह  केवल बाह्य उपयोग के लिए है ....जख्म जले कटे पर इस्तेमाल वर्जित है ..मुंह से गरारे के लिए भी वर्जित है ...बच्चे इसका इस्तेमाल बड़ों की देखरेख में करें .. अमेरिका में अकेले २००६ में ही जब इसका प्रचलन बढ़ा था तो १२००० लोग इसे पीने की गलती कर गए जिसमें बच्चों की बड़ी तादाद थी ....यह बच्चों के लिए विषाक्त है .बाजार में अब सहजता से उपलब्ध होने के कारण यह दवाओं की ओवर द काउंटर (ओ टी सी ) श्रेणी में है .

आप के लिए  सिफारिश करता हूँ ...

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

निधन सूचना - पी एन सुब्रमणियन साहब को पत्नी शोक!

एक दुखद समाचार यह है कि मल्हार के अपने प्रिय चिट्ठाकार पी एन सुब्रमणियन साहब की पत्नी का स्वर्गवास हो गया ..आज फोन पर मैंने उनसे यह स्तब्धकारी सूचना सुनी -अवाक रह गया ..उनका नंबर मोबाईल पर आते ही बहुत उत्साह से हेलो कहा और उधर से वैसी ही स्फूर्तिभरी आवाज की प्रत्याशा कर रहा था कि उनकी शोकाकुल आवाज सहसा आशंकित कर गयी ...आशंका दुर्भाग्य से सच निकली और उन्होंने अगले पल जो जानकारी दी मैं स्तब्ध  रह गया ..उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था ....मुझे समझ में ही नहीं आया कि मैं क्या कहूँ -सहज ही पूछ बैठा कि उन्हें क्या हुआ था और मुझे यह भी याद था कि लगभग एक वर्ष पहले ही उनकी कूल्हे की हड्डी के खिसकने से उन्हें लेकर काफी समय तक सुब्रमणियन साहब मुम्बई में थे....उन्होंने बताया कि उसके बाद निरंतर उनके स्वास्थ्य की जटिलतायें   आती गयीं और उनकी लाख कोशिशों के बाद भी वे नहीं रहीं ....मैं उनसे बस यही कह पाया कि बस मृत्यु पर हमारा  बस नहीं है ..आप खुद को संभालें और बच्चों को धीरज दें ...

गोलोकवासी श्रीमती सुब्रमणियन
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः 
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः

आप  इस श्रेष्ठ ब्लॉगर को जो पुरातात्विक और ऐतिहासिक लेखन का सिरमौर रहा है की इस  शोकाकुल स्थिति में उन्हें यहाँ ढानढस दे  सकते हैं,अपना शोक संवाद छोड़ सकते हैं  और स्वर्गवासी आत्मा के प्रति शान्ति कामना कर सकते हैं ...

सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

सामाजिकता का निर्वाह

समाज में रहते हुए हमें कई जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं -सामाजिकता का तकाजा भी यही रहता है कि हम जहां तक संभव हो एक दूसरे के सुख दुःख दोनों में हिस्सेदार बने -यही मानवीय सरोकार भी है ..यही मानवीयता हममे गहरे सामाजिक संस्कार भी विकसित करती है ....आधुनिक जीवन शैली ने इस मानवीय बोध पर गहरा कुठाराघात किया है मगर फिर भी हम एक धरातल पर  हैं तो मनुष्य ही और मनुष्यता  प्रदर्शित किये बिना भी नहीं रह पाते  ..भले ही इसके कारण कुछ जटिलतायें आ उपस्थित हों ...अब आज ही एक धर्म संकट मेरे सामने आ गया ....

पड़ोस में ही  मृत्योपरांत तेरहवीं के ब्रह्म भोज का निमंत्रण था ...और आज ही मेरे एक परम मित्र के लड़के की बरात में जाने का निमंत्रण ....और दोनों का समय भी लगभग एक ही ....एक जगह खुशी तो दूसरी जगहं गम का माहौल ..वही क्वचिद वीणा नादः क्वचिदपि च हा हेति रुदनम* ...कहीं तो वीणा वादन और कहीं हाहाकारी रुदन ....   और भोजन करने का विशेष आग्रह भी दोनों जगह ....अब क्या किया जाय ? सुबह से इसी उधेड़बुन में लगा  रहा ...मल्हार वाले सुब्रमन्यन साहब की मेरे बारे में की गयी एक फब्ती कि मैं भी गजब का खाऊ इंसान हूँ सहसा याद हो आई और ओठों पर मुस्कान बिखेर गयी ...सचमुच यह  एक जटिल  मुद्दा था ....प्रचलित लोकाचारों के हिसाब से तेरहंवीं में खाना खाने के बाद फिर कहीं और कुछ नहीं खाया जाता ...यह वर्जित है ....मगर विवाह के भोज में व्यंजनों की विविधता का भी स्मरण हो रहा था ...तय यह पाया गया कि मृत्यु-ब्रहम भोज में केवल द्वार पर जाकर चेहरा दिखा दिया जाय ,संवेदना व्यक्त कर खाना न खाने का कुछ बहाना बना कर लौट आया जाय और फिर बरात की पार्टी में चलकर जमकर जीमा जाय ....सो यही प्लानिंग बन गयी .....

मगर तब सब प्लानिंग फेल हो गयी जब अपनी सहजता से झूंठ न बोल पाने की कमजोरी उभर आई और दूसरे ब्रह्म भोज का विविधता भरा मीनू भी निश्चय को डिगा गया ....अब मृत्युभोज और उत्सव भोज के मीनू में कोई अंतर ही नहीं रह गया है ..यहाँ भी कई पकवान थाल की शोभा बढ़ा  रहे थे ..मिठाई में बनारस का देशी घी में बना मशहूर मालपुआ और सजावटी मीठी दही के कुल्हड़ और पनीर इत्यादि के अन्यान्य पकवान ललचा रहे थे..वैसे भी अन्नपूर्णा देवी का अपमान तो करना ही नहीं चाहिए ...मैंने अट्ठासी वर्षीय स्वर्गीय पूज्य  की आत्मा के शान्ति की कामना की और ब्रह्म भोज में शामिल हो गया ....कहना नहीं है कि भोजन सुस्वादु बना था ...अन्नपूर्णा देवी को भरपूर सम्मान देकर पड़ोस से लौटने के उपरान्त विवाहोत्सव में जाने की जैसे इच्छा ही समाप्त हो गयी ... मगर हाय रे सामाजिकता ..फिर तैयार होना पड़ा बेमन से ..कपडे आदि ऐसे पहने गए जैसे कवच और शिरस्त्राण वगैरह का बोझ शरीर पर आन पड़ा हो .....

विवाह लड़के का था ..खूब आवाभगत और खाने पीने का पुख्ता प्रबंध था ..लड़के के पिता ठहरे अपने जिगरी दोस्त ही ....तुरंत खाने की पेशकश होने लगी ...अब क्या बहाना बनाऊं....खुशी के मौके पर यह कैसे कह दूं कि तेरहवीं   का खाना खाकर आया हूँ ...अब हर जगह सच बोलना भी कोई  जरुरी तो नहीं ....अनावश्यक सच तो कतई नहीं ....अब ब्रह्मभोज के अवसर पर भी कैसे कह सकता था कि आज ही एक विवाह का भी निमंत्रण है इसलिए खाना तो वहीं खाऊंगा ....नहीं बोला जाता न ऐसा...वे क्या सोचते ..मिश्रा जी भी कैसे आदमी हैं ..अब भाई, बद अच्छा बदनाम बुरा!अब बदनामी? ..न बाबा न ...

अब सामाजिकता का तकाजा देखिये की दोनों जगह खाना  खाकर लौटना पड़ा है ....लोकाचार के उल्लंघन का दोष हुआ सो अलग ..पता नहीं कैसे निकार हो सकेगा उसका .....सच है मन  भले न दस बीस होता हो पेट जरूर दस बीस हो सकते हैं ......


 *भर्तृहरि के एक प्रसिद्ध श्लोक का अंश!
पूरा श्लोक यूं है -
क्वचिद विद्वत गोष्ठी ,क्वचिद सुरमात्त कलहः
क्वचिद वीणा नादः क्वचिदपि च हाहेति रुदितम 
क्वचिद रम्या रामा ,क्वचिदपि ज़रा जर्जर तनु 
नजाने संसारे किममृत्मय: किम विषमयः 
(कवि ने इस विरोधाभास् पूर्ण जगत /जीवन पर विस्मयपूर्ण  कटाक्ष सा किया है -
कहीं तो विद्वान् विमर्श रत हैं तो कहीं सुरा मद से मत्त कलह का दृश्य है ,कहीं उत्सवपूर्ण 
वीणा की ध्वनि गूँज रही है तो कहीं कारुणिक रुदन है ,कहीं तो रमणीय काया है तो कहीं ज़रा -जर्जर शरीर !
कवि का विस्मयपूर्ण प्रेक्षण है कि इस संसार में क्या अमृत मय और क्या विषमय है ? ) 
मूल श्लोक में और अर्थ निष्पत्ति में त्रुटि संकेत के लिए विद्वानों,खासकर अरुण प्रकाश जी का आह्वान है!उन्होंने अपने संग्रह से मुझे इस चिर अनुसंधानित श्लोक को नोट कराया था ! )



शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

औरत और पुरुष की संवेदना का फर्क -एक शोध प्रस्ताव!

बहुत से लोग स्वभावतः शोध प्रेमी होते हैं ..उन्हें नित नई नई  शोध संभावनाएं सूझती रहती हैं ...यहाँ तक तो ठीक है ..कौतूहल और नई शोध संभावनाओं का उत्खनन कोई बुरी बात भी नहीं है ...मानव की एक मुख्य वृत्ति ही शोधात्मक है.मगर आफत तब आती है जब किसी दूर की वैचारिक कौड़ी पर शोध आरम्भ होता है ...सारा गुड गोबर हो उठता है ....सुन्दर वैचारिक प्रत्यय/ विषय की रेड़ मार उठती है ....और ऐसा अक्सर कला /हिन्दी विभागों के स्वनामधन्य गाईड  और उनके शोधार्थी करते हैं .राग दरबारी के मसीहाई लेखक श्रीलाल शुक्ल ने अपने एक व्यंग संकलन 'अंगद के पाँव  ' में 'बया का घोसला ' नाम्नी लेख में इस प्रवृत्ति का मुजाहरा किया भी है ...बया पक्षी पर शोध निष्कर्ष की  कुछ लाईनों पर  मुलाहिजा फरमाएं ....

"बया एक पक्षी का नाम है ,यह घोसला बनाती है ,घोसले पेड़  पर बनाये  जाते हैं ....घोसले में अंडे मादा देती है ..नर अंडे नहीं देते ..."सच बताऊँ इस लेख को पढ़ कर मुझे ये सभी बहुमूल्य जानकारियाँ पहली बार प्राप्त हुईं ..मैं धन्य धन्य और कृत कृत्य हो गया या फिर वह हो गया जिसमें शायद  गिरिजेश जी को वर्तनी सुधारनी पड़े इसलिए इसलिए वह होने का उल्लेख ही नहीं कर रहा ...वैसे वे इत्ते में ही वर्तनी सुधार का पूरा माद्दा रखते हैं ...वे सुन रहे होंगे मगर इन दिनों मौन पर्व मना रहे हैं जबकि पूर्वजों द्वारा निर्धारित मौन महापर्व मौनी अमावस्या बीत चुकी और बसंत की रणभेरी बस बजने ही वाली है तब वे कैसे मौन रह पायेगें ..इसलिए अभी यह सुनहरा मौका है वे इस पोस्टीय संतरा समतुल्य पेय गटक कर धीरे से अपना  मौन यहीं तोड़ डालें ...अब खुदा न खास्ता अचानक व्रत तोड़ने में कहीं कोई विकार न हो जाय  ...बहरहाल अपुन की हिन्दी कमजोर है यह जानते हुए भी   पड़ोस की एक मनोविज्ञान की शोध छात्रा ने ऊपर  के  मनोविज्ञान शीर्षक विषय पर मुझसे मदद मांगी ली  है और मेरी सिट्टी पिट्टी या यह जो भी होती हो गुम हो गयी है ..'सर आप तो विज्ञान के आदमी हैं , इस विषय पर मेरा बेडा पार कराईये न सर ...' अब लाख समझा रहा हूँ कि भैय्ये मैं कहाँ जीव विज्ञान का मानुष और कहाँ यह मनोविज्ञान ..मेरे लिए तो यह विषय गांडीव से भी गुरुतर है ...मैंने अचानक  ही समुपस्थित इस मनो- देवि को काफी मनाया भी कि देखो तुम इस विषय में हेल्प के लिए मुझे छोड़ दो ब्लागरों की मदद ले सकती हो -एक तो अपने समय जी हैं और दूजे अपनी एल गोस्वामी -ये दोनों ही विद्वानों द्वारा अनुशंसित श्रेष्ठ मनोविज्ञान लेखक  हैं और इस विषय पर  इन दिनों ये सोलो लेखन भी कर रहे हैं ...मतलब अपडेट हैं ...मगर ये देवि हैं कि मान  ही नहीं रहीं और मैं इस विषय की सतही जानकारी देने की मानहानि से प्रकम्पित हूँ .. त्रिया हठ के आगे आखिर टिकूंगा ही कब तक ? लिहाजा एक मैंने आउटलाईन  बना ली है और इसे उन्हें सौंप कर जान  छुडा लेना चाहता हूँ ...आप अगर अनुमोदन कर देगें तो मेरा काम और आसान हो जाएगा ...

विषय आप जानते ही हैं  -औरत और पुरुष की संवेदना का फर्क....इस विषय में मेरे बहुत अस्पष्ट से विचार हैं -मैं समझता हूँ कि संवेदना के मामले में औरतें पुरुषों से इस लिहाज से बाजी मार ले जाती हैं कि वे जन्म से ही संवेदनशील होती हैं बल्कि उनका प्रारब्ध ही संवेदना से भरा  होता है और शायद यह भी होता हो कि यह भार काफी अधिक हो जाने के कारण ही उन्हें  जन्म भी ले लेना पड़ता हो उससे कुछ हल्का जाने के लिए ....अन्यथा वे जन्म ही न लें ..अगले जनम मुझे बिटिया  न कीजो ....अब यह एक दीगर शोध का विषय हो सकता है कि जन्मोपरांत संवेदनाएं  क्षरित होती जाती हैं या फिर और संवेदना का लोड  उन पर लदता चला  जाता है ...मुझे तो यह लगता है कि पुरुष में संवेदना का स्पर्श/संदूषण  इन्ही के जरिये ही हो जाता होगा क्योकि मैंने खुद पाया है कि पुरुष जन्मजात ही संवेदना शून्य होते हैं -संवेदना का उनका स्वर बिना किसी औरत की प्रेरणा   के उभर ही नहीं सकता ......शायद संवेदना के स्वर के युगल ब्लॉगर मेरी इस बात से इत्तेफाक भी कर जाएँ और इस शोध प्रबंध में कुछ इनपुट भी दे जायं ...दूसरे मैंने यह भी पाया है जहां पुरुष पूरी तरह संवेदना रहित देखे जाते हैं औरतें सहज ही संवेदना -सिंपल या ज्यादातर तो संवेदना -सिम्पलटन   होती हैं -आसान समझ  के लिए जो अंतर हंसमुख और हंसमूरख का  होता है वही अंतर संवेदना -सिंपल और संवेदना सिम्पल्टन का समझना चाहिए ..विश्लेष्णात्मक तौर पर यह भी  पाया गया है कि औरतें ज्यादा संवेदना टची होती हैं जबकि पुरुष संवेदना की जीरो समझ के कारण अक्सर कंधे उचका कर चल देता है  ..औरतें संवेदना के मुद्दे पर अक्सर प्रछन्न और कहीं कहीं तो प्रत्यक्ष तौर पर मरने  मारने पर उतारू हो जाती हैं जबकि किसी भी संवेदना -लफड़े पर पुरुष दुम दबाकर सटक लेता है ....मतलब पुरुष  संवेदना के मसले पर निर्वाह करने में खुद को बिल्कुल असमर्थ  पाता है ..उसकी नैया संवेदना -मझधार में ही डूब लेती है ..बेड़ा गर्क हो उठता है   .....और ऊपर से तोहमत यह कि वह इमोशनल अत्याचार करता है  ....जले पर नमक! इससे कभी कभी पुरुष  संवेदना की आहट मात्र से  आह़त हो उठता है ..और यह  ही भी कि औरतों की संवेदना उनकी दिल की निस्सीम गहराईयों तक उतरती चली जाती है पाताल गंगा की तरह जबकि पुरुषीय संवेदना मन मष्तिस्क  की झिल्ली ही भेद  नहीं पाती ...

अब मैं यह अपनी संवेदना समझ का पुर्जा उस संवेदना ..ओह सारी ,मनो- देवि को सौंप देता हूँ ..उनके असली तारणहार तो उनके संवेदना स्थूल गाईड हैं ...हमसे क्या लेना देना ....आप भी कुछ जोड़ना चाहेगें?

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

मौन ही मुखर है आज ...

मौन को महिमामंडित करने में हमारे प्राचीन अर्वाचीन मनीषी प्रायः मुखर होते रहे हैं . मुनि शब्द ही मौन धारण करने की गुणता के कारण है .मौन आपकी स्वच्छन्दता  का कारण हो सकता है -
आत्मनः गुण दोषेण बंध्यते शुक सारिका 
बकाः तत्र न बध्यते ,मौनं सर्वार्थ साधनं

अर्थात वाचालता के   अपने गुण /दोष के चलते ही तोते और मैना पिजरे में कैद हो जाते हैं ;मगर बगुला चुप्पी लगाये रहने के कारण ही स्वतंत्र रहता है -मतलब मौन रखने से सब कुछ साधा जा सकता है ....अंगरेजी साहित्यकारों की ऐसी उक्तियाँ हैं कि वाचालता  रजत है जबकि मौन स्वर्ण या फिर पानी वहां शांत बहता है जहाँ सोता गहरा होता है ...साथ ही यह भी कि खाली शीशी जोरदार आवाज करती है (इम्प्टी वेसेल मेक्स हाई न्वायज ..) और अपने यहाँ भी अधजल गगरी छलकत जाय जैसे मुहावरे चुप रहने की ओर ही निर्देश करते लगते हैं ..ऊपर के संस्कृत श्लोक की ही तर्ज पर एक देशी कहावत भी है कि न निमन्न गीत गायन न दरबार धर के जायन ....

कभी कभी सचमुच समझ में नहीं आता कि मुखर हो जाना ठीक है अथवा मौन ....हाँ यह जरूर है कि अति की वर्जना तो होनी ही चाहिए ....अति का भला न बोलना अति की भली न चूप ..अति का भला न बरसना अति की भली न धूप ...अति सर्वत्र वर्जयेत .....मगर मेरी अपनी तो व्यथा ही अलग रही है -
नतीजा  एक ही निकला 
कि किस्मत में थी नाकामी 
कहीं कुछ कह के पछताया 
कहीं चुप रह के पछताया 
अब  यह तो किसी विडंबना से कम नहीं ....मेरे मन  में ये बाते परसों से न जाने क्यूं उमड़ घुमड़ रही थी कि  सुबह ही सिद्धार्थ जी ने बताया कि आज तो मौनी अमावस्या है यानि जम्बू  द्वीपे  भारत भू खंडे का एक प्राचीन पर्व -एक मौन पर्व जिसका विधान रहा है कि आज के दिन पुण्य सलिला नदियों में स्नान ध्यान दानादि करके यथासम्भव चुप रहना चाहिए ...मानवता का एक गुण है मौनता ....चिर मौन हो जाने के पहले भी मौन होने का  शायद एक पूर्वाभ्यास या चिर मौनता का एक पूर्वाभास :) मतलब मौन रहकर आध्यात्मिकता की अनुभूति .... गंगा स्नान न कर पाने की विवशता में घर में गंगा जल के छिडकाव से  ही मैंने गंधर्व स्नान कर लिया है और यथा संभव मौन रहने के प्रयास में लगा  हूँ ..आप भी कुछ समय मौन रहकर इस पर्व की भावना से जुड़ें -यही अनुरोध है ! 




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