सोमवार, 4 जनवरी 2010

कौन बताएगा पहली लाईन का अर्थ .......समर शेष है!

 कौन बताएगा पहली लाईन का अर्थ .......
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

कितनी अच्छी बात है दिनकर समग्र की चर्चा हो रही है दिनकर विशेषज्ञों द्वारा ब्लागजगत में ...मैंने तो  कहीं दिनकर की उक्त  बहुउद्धृत  पंक्ति ही फिर से उद्धृत कर दी थी -कई बार कह चुका हूँ ,फिर दुहराता  हूँ कि साहित्य  की मेरी समझ अधकचरी है और ज्ञान पल्लवग्राही -मैं साहित्य के अलिफ़ बे का भी विद्यार्थी नहीं हो पाया और यह दुःख मुझे जीवन भर सालता रहेगा.बस विद्वानों की सोहबत का दुर्व्यसन न जाने से कहाँ से छूत सा लग गया मुझे ...बहरहाल ....

 मैंने तो  दूसरी पंक्ति को ही साभिप्राय उद्धृत  करना चाहा था मगर पहली लाईन भी काफी अर्थबोधक है इसलिए उसे भी साथ ले लेने का लोभ छोड़ नहीं पाया .यानी यह लाईन -
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध!
मगर इसका अर्थ क्या है ? यह दिनकर विशेषज्ञ ही बता सकते हैं अपने बूते का तो नहीं .इसलिए दिनकर व्याख्यान पर ये टिप्पणी चेप आया हूँ -
"अब लगे हाथ  दिनकर स्पेशलिष्ट पहली वाली लाईन का मतलब भी  बता दें ....
तो शागिर्दगी कर लूँगा नहीं तो ...अब खुदैं फैसला कर लें अपने बारे में अब कुंजी वुन्जी मत देखियेगा भाई लोग.... यह ब्रीच आफ ट्रस्ट नहीं ब्लाग्वर्ल्ड में ..(..शागिर्दगी का मतलब जीवन भर टिप्पणी करता रहूँगा ऐसे विद्वान् की पोस्ट   पर जो इसका सटीक अर्थ बता देगा -मूल टिप्पणी में नहीं है यह वाक्य . )
नीचे क  सरल लाईन क व्याख्याकार और भाष्यकार कौनो कम नहीं हैं ,यानी बहुत हैं
मगर असली तेजाबी परीक्षा त  ई लाईन में है -
समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध!"

-पूरी कविता पढनी चाहें तो यहाँ मौजूद है .तो भैया कौनो है सरस्वती क लाल या दिनकर साहित्य विद्वान् जो इस दिनकरी ढाई आखर का अर्थ बता दे .....
मुझे इंतज़ार रहेगा .......

73 टिप्‍पणियां:

  1. I could be wrong, that's why I am not giving my name here.

    Samar Sesh hai, nahi pap ka bhagi keval vyadh.
    Jo Tatasth the samay likhega unka bhi apradh.

    Not a literal translation:
    The war is not over, the hunter alone must not partake the sin.

    Time will judge those who stood by and watched.

    As challenged, I did not refer to a dictionary.

    Was I right Mr. Mishra ji?

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  2. सर जी, एक और (mis) interpretation

    गर्मि अभी बच री हे,
    जो बिल्कुलै पाप नहीं है
    इसलिये अकेली बाघनी भाग गई

    नीचे वाली लैन के तो छै-छै मतलब पैले ही पड चुके

    जय हिन्द!

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  3. समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
    जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध

    पंडितजी हम तो अलिफ़ बे पे ते टे से, जीम चे हे ख़े, दाल डाल ज़ाल से आगे बढ़ ही चले थे कि अचानक जीम ने ज़ाल को रोक लिया और कहा यहाँ मुझे आने देगा तो शायद पहली लाइन का जवाब सूझ जाए। हमने कहा जीम भी तो अपनी जबलपुर ब्रिगेड का हिस्सा है चलो इसका काम आसान कर दें। सो उसे उठाकर ज़ाल की जगह पहुँचा दिया। इससे हमें पहला हिंट मिला "जाल"।
    हमने देखा कि पहली लाइन में "जाल" का रिलेटिव कौन है ? ज़ाहिर है व्याध।
    अब शब्दार्थ आपको मालूम न हो ये तो हम कह ही नहीं सकते। और दोनों लाइनों का भावार्थ बताने के चक्कर में अच्छे खाँ, तुर्रम खाँ और फ़न्ने खाँ भी व्याध के इस सुनहरे जाल में इस तरह फ़ँसने वाले हैं कि फिर तो रिहाई ह्ज़ार ज़मानतों में भी मुश्किल होगी। हा हा ।
    दिनकर विशेषज्ञों को जंजाल से सावधान करना फ़र्ज़े-बवाल था। कहाँ तक निभा पाए यह तो आगे पता चल ही जाएगा। आप बता ही चुके हैं कि यह तेज़ाबी परीक्षा है। और हम भी समझ चुके हैं के ये तेज़ाबी और सिर्फ़ तेज़ाबी परीक्षा है। हा हा।

    पंडितजी आज आपको दिल से नमन है। बहुत गहरी बात है इस पोस्ट में।

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  4. अब विद्वान तो हम में से कोइ ऐसा नहीं जो पूर्ण ज्ञान का दावा करे :)
    परंतु,
    कुछ यही आशय है कि,
    जैसा महिलाओं को प्रताडीत अवस्था में
    समझाया जाता है कि,
    ' एक अपराध सह लेना मूर्खता होगी,
    परंतु, उसके बाद,
    अगर प्रताड़ना सहती रहोगी
    वह कुछ अंश तक,
    तुम्हारा अपना भी अपराध होगा '--

    अब ये अलग बात है कि,
    "प्रताड़ना " - स्त्री या पुरुष -
    दोनों ही सहते हैं
    चूंकि, ये विश्व,
    कभी एक खेमे में ,
    रुका नहीं
    -- वाद विवाद - अंतहीन हैं ---

    आशा है, हमारे ब्लॉग जगत में ,
    शांति बनी रहे --
    - संयम, सद`भावना, सौहार्द्र ,
    मित्रता कायम रहे --
    अन्यथा
    " न जाने नया साल क्या गुल खिलाये " -- ये सच हो जाए !!
    आपके समस्त परिवार के लिए आगामी नव वर्ष २०१० सुख शांति व समृध्धि लेकर आये इस शुभकामना सहीत

    सद्भाव सहीत,
    - लावण्या

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  5. @अभी तक इक अनाम भाई की सही सही शाब्दिक अर्थ वाली टिप्पणी मिली है
    मैंने उसे रोक रखा है -हे दिनकर विशारदों अब आ भी जाओ न, विद्वत मंडली
    बुला रही है!

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  6. @२-आज के गुरु घंटालों के जमाने में सही गुरु की बिना परीक्षा लिए उनकी शागिर्दगी
    नहीं स्वीकारी जा सकती है -और कौन कहता है गुरु होने में उम्र की कौन बाधा है -जो बताये अर्थ
    उसका ही हुआ मैं शागिर्द -यानी अनवरत टिप्पणियों की गारंटी
    और हाँ सही जवाब अंत तक माडरेशन में रहेगें ,इसलिए सही जवाब के लिए धैर्य न खोएं !

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  7. सही जवाब तो आ ही गया होगा अब तक ....जो थोडा बहुत दिमाग है क्यों खर्च किया जाए इस पर ....इसीलिए जो सही जवाब वो हमारा ....!!

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  8. "लड़ाई अभी बाकी है,पाप का भागी केवल बहेलिया ही नहीं है जो कि शिकार कर रहा है.

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  9. हम तो न बता बतायेंगे..हम खुद ही खोज रहे हैं.


    ---


    ’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’

    -त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.

    नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'

    कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.

    -सादर,
    समीर लाल ’समीर’

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  10. @अनाम ,मनोज ,चलिए शाब्दिक अर्थ तो हो गया अब इसका भावार्थ कोई दिनकर विशारद बताएं !
    जनता जनार्दन चली आ रही मगर कहाँ है दिनकर विशारद ?

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  11. @समीर जी , इस सरलता और साफगोई को सलाम !

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  12. व्याध का पाप कम है वो वही कर रहा है जो वह करता है, मगर तटस्थ रहकर तमाशा देखने वालों आप तो उस व्याध से भी गए गुजरे हो

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  13. @एक अज्ञात टिप्पणी से प्राप्त मेल-
    मिश्र जी यह तो बड़ी अनुचित बात उठा दी आपने ,राजा जनक जैसी -
    कही जनक जस अनुचित बानी वीर विहीन धरा मैं जानी

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  14. हमें अपनी एक पुरानी कविता का अंश याद आ गया। एक शिव बाबू उसमें भी हैं - व्याध व्याध में फरक होत है। जब तक हम कविता की कुंजी ढूढ़ें, आप लोग मनन करें। पूरी कविता यहाँ है: http://kavita-vihangam.blogspot.com/2009/11/2.html।
    "
    अचानक शुरू हुई डोमगाउज
    माँ बहन बेटी सब दिए समेट
    जीभ के पत्ते गाली लपेट
    विवाद की पकौड़ी
    तल रही नंगी हो
    चौराहे पर चौकड़ी।
    रोज की रपट
    शिव बाबू की डपट
    से बन्द है होती
    लेकिन ये नाली उफननी
    बन्द क्यों नहीं होती?
    "

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  15. @अज्ञात भाई ,
    एक लौकिक कहावत है हमरे हियाँ -
    "नाऊ ठाकुर कई बार ,हुजूर समनवै गिरे ..."
    .....तो इंतज़ार हमें भी है ......नहीं हम तो बहुतै उदास हो जायेगें !

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  16. अरे ! ये क्या हुआ ? अभी तक व्याख्या न आयी ?
    सब हम-जैसे ही अज्ञ हैं क्या ब्लॉगजगत में ? शिव-धनुष हो गया भई -
    "भूप सहस दस एकहिं बारा, लगे उठावन टरै न टारा।"

    हमें तो लगता है वीर-ज्ञानी तो आये ही नहीं होंगे इस धनुष-द्विपंक्ति को उठाने ! बल के रंक शक्ति की निधि कैसे लूटें (माफ करें, अर्थ नहीं आया, इसलिये कहा-मैं भी वैसा ही रंक)! अब इस दूलाइना में पहली एकलाइन ही ऐसा गुरुता का लौकिक बल लेकर बैठ गयी है कि कोई क्या करे ! दूसरी से काम चलाये !

    अब क्या कहूँ, उनका जो अब ’चाप-समीप’ भी नहीं पहुँचते (वीरता चुक गयी ना !)! अरे ! हठात् वीरों ! मूर्ख न कह दिये जाओ !

    इतना दो लाइन पर बहस चले, और उसका अर्थ भी न निकले ! हाल तो वही है, कोई आक्रमण करने चले और हथियार ही छिन जाय !

    कहीं यह बालि वाला चमत्कार तो नहीं !

    कहाँ हो ? -
    "सब नृप भये योग उपहासी, जैसे बिनु विराग सन्यासी ! "

    मैं प्रतीक्षा में हूँ ! खुले न यह अर्थ !

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  17. बेहतर होता आप मेरी टिप्पड़ी मेरे नाम से प्रकाशित होने देते-
    ----------------------------------------------------------------------------
    कही जनक जस अनुचित बानी वीर विहीन धरा मैं जानी,
    ----------------------------------------------------------------------------
    यह धरती वीरों से खाली नहीं हैं -देखिये आज फिर धमाका होगा .
    अभी एक -एक साहित्य रत्न अपना भावार्थ लेकर आयेंगे .
    फिलहाल यह तो मेरे समझ से बाहर है,मैं तो अपना हाँथ ऊपर उठा रहीं हूँ
    और एक मजेदार बात का भी खुलासा करती चलूं ,मेरा भाई भी हिन्दी साहित्य में एम्. ए अंतिम वर्ष में है और दिनकर साहित्य उसका विशेष प्रश्नपत्र है पर वह भी इसका भावार्थ बतानें में असहज महसूस कर रहा है.
    कभी -कभी ऐसा होता है कि काफी सरल लगने वाली बात भी व्याख्या में बहुत कठिन लगने लगती है.
    चलिए मुझे आशा है की ब्लॉग जगत के विद्वानगण इसको सहज भाव से लेते हुए इस पहेली को आज सुलझा लेंगे.
    आज इसके हल तक हमारी और मेरे भाई की भी निगाह ब्लॉग जगत पर ही रहेगी.सादर .

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  18. मैं तो विज्ञानं की छात्रा रही हूँ...लेकिन मेरी माँ ने हिंदी में एम. ए. किया है और वो राष्ट्रकवि सर्वश्री रामधारी सिंह 'दिनकर' की छात्रा रह चुकीं हैं....

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  19. @स्वप्न जी अर्थ बताईये ,,,,चलिए माता जी से ही फोन पर पूछ कर .....

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  20. मुझे लगता है, अर्थ अब खुल जायेगा !
    गिरिजेश भईया कुंजी खोज ही रहे हैं, अदा जी प्रवृत्त हो ही चुकी हैं ।

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  21. @ज्ञानी जन फिर सुने
    किताबी कुंजी प्रतबंधित हैं यहाँ,वैसे भी वे बहुधा अर्थ का अनर्थ करती पायी गयी हैं:इसलिए ही विज्ञ जन कुंजी का निषेध करते भये हैं -केवल स्वाध्याय की ही कुंजी अनुज्ञात(परमिटेड) है .नो चीटिंग प्लीज़ -इमान का खेल है यह !

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  22. maine pahle hi bhej diya tha Arvind ji iska arth jo mujhe samajh mein aaya...
    chaliye fir bhejtu hun...

    व्याध का पाप कम है वो वही कर रहा है जो वह करता है, मगर तटस्थ रहकर तमाशा देखने वालों आप तो उस व्याध से भी गए गुजरे हैं

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  23. :( पढ़ा तो था ..कुंजी क्यों प्रतिबंध कर दी आपने :)

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  24. अब ताऊ ही अर्थ बता देगा तो बच्चे क्या बतायेगे? इसलिये हम चुप रहेंगे और उत्तर का इंतजार करेंगे.:)

    रामराम.

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  25. समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध,

    जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध।।
    अरविन्द जी, महाकवि दिनकर जी की इन पंक्तियों का अनुवाद मैं इस तरह से करू तो उम्मीद करता हूँ कि आप और पाठकगण इसे अन्यथा नहीं लेंगे !
    हे अज्ञानी अधर्मी मनुष्य ! अभी बहुत कुछ करना बाकी है ! आजादी के इन पिछले बासठ सालो में धर्म के नाम पर जितने भी दंगे हुए उसके लिए सिर्फ आर.एस.एस, बजरंग दल और विश्व हिंदु परिषद्, मुस्लिम लीग, कट्टर मुल्लावाद, इसाई मिशनरी इत्यादि ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि ये आज के जो तथाकथित स्योड़ो-सेकुलर है, ये सबसे बड़े जिम्मेदार है, और इनके अपराधो का लेखा-जोखा वक्त प्रस्तुत करेगा !

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  26. इस ब्लाग जगत में अरविंद मिश्र से ज्यादा शरारती व्यक्ति और कोई नहीं है, इस नतीजे पर अब पहुंच चुका हूं। लोग इनकी शरारतों पर न जाकर इन्हें संजीदगी से भी लेते हैं, ये इनकी शख्सियत का अलग पहलू है। कुछ खास लोगों को इनकी ये दोनों अदाएं नहीं भाती हैं।

    हां, व्याध का वहीं अर्थ हम बरसों से हम समझते आए हैं जो अनामजी बता रहे हैं। व्याध शिकारी होता है। व्याख्या आसान है।
    ...इसीलिए कहता हूं कि ये भी आपकी शरारत ही है।

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  27. "समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
    जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध"

    मेरे छोटे से नादाँ मन के हिसाब से इसका मतलब है...

    युद्ध अभी समाप्त नहीं हुआ है... स्वतन्त्रता का युद्ध निरंतर लड़ा जा रहा है...
    उसमे अत्याचार करने वाला (व्याध) ही केवल पापी नहीं है, वो प्रताड़ना देने वाले ही इस क्रूरता, हिंसा, अमानविक कृत्यों से जनित पाप के अकेले भागी नहीं हैं, अपितु, वो जो दूर खड़े होकर चुप चाप इस तरह के अत्याचार के विरोध में कुछ नहीं करते हैं, वो भी अपराधी हैं और अत्याचार के पाप के भागीदार हैं॥ समय उनके अपराध और पाप को नहीं भूलेगा, और समय आने पर वो सामने आयेगा।

    त्रुटी के लिए क्षमा करें, मैं तो बहुत छोटा हूँ जो दिनकर जी की बात समझ सकें, ऐसी तो अभी मेरी हस्ती कहाँ॥

    ~जयंत

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  28. Anonymus ji ! aapne bilkul sahi anuvaad kiya hai .vaise to yeh vaad uthnaa hi nahin chahiye tha.

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  29. आप कुंजी पढने देते तो शायद हम बता देते की उक्त पंक्तियों से दिनकर जी का आशय क्या है और ये किस सन्दर्भ में कही गई हैं ! किन्तु आपने कुंजी निषेध करके हमारा ज्ञान स्रोत शुष्क कर दिया है और अब हमें लग रहा है की ये दिनकर जी ? भला कौन थे ? फिर ऐसी पंक्तियां उन्होंने लिखी ही क्यों जिसका अर्थ वे खुद ही ना बता सके और गुरुओं में सर फुटौव्वल हो गई !
    बहरहाल ब्लाग में इन पंक्तियों को पढ़कर जो भाव हमारे मन में आये उनका दिनकर जी से दूर दूर का वास्ता नहीं है तथा वे इस प्रकार हैं ...

    (१) "रे मूढ़ तू गुरु होने का दंभ त्याग दे तुझे अभी बहुत कुछ सीखना शेष है तुझे तो ये भी पता नहीं की तेरे शिष्य भलीभांति जानते हैं की मठ की लूट के समय तटस्थ रहना अपराध होता है "

    (२)"आलेख तूने लिखा ये तो समझे,किन्तु दोषी ब्लागर.कॉम भी है !....और वे जो तटस्थ रहने का नाटक करते हुए पोलिटिकल टाइप टिप्पणी दे रहे हैं उनका अपराध भी टाइम मैगजीन?(शायद?) द्वारा नोट किया गया है"

    (३)"जीवन शेष है मज़े करो ! मज़े करने वाला अकेला गुनाहगार नहीं माना जायेगा ! जो मज़े से निर्लिप्त हैं या किसी मजबूरीवश मज़ा नहीं कर पा रहे हैं और जैसे तैसे टाइम काट रहे है उनका नाम भी गुनाहगारों की लिस्ट में सम्मिलित कर लिया जायेगा"

    (४)"मिसिर जी भाव तो और भी शेष हैं पर बाल बच्चे भी पालने हैं सो अनुमति दीजिये ! फिलहाल थोड़ी नौकरी भी कर ली जाये !"

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  30. फल मिलना अभी बाकी है, पापों का भागीदार सिर्फ शिकारी ही नहीं है.....!

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  31. पूरी माथा-पच्ची कर लिये हैं। बारम्बार पूरी कविता पढ़ गये हैं, मिश्र जी...मुदा कुछो समझ में नहीं आ रहा। अब काहे सस्पेंस बढ़ा रहे हैं। आपकी टिप्पणी तो हमें मिलती ही रहेगी इस बारे में तो आश्वस्त हैं हम...कोई नया प्रलोभन देते तो और जोर लगाते!

    ऐसे ही चलते-चलते ख्याल आया कि इशारा गांधी-वध की ओर तो नहीं है। व्याध=गोडसे। पता नहीं...

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  32. वाह सचमुच आननद आ गया ,अब तक अनाम के साथ गोदियाल साहब ,अदा और जयंत जी की प्रशंसनीय व्याख्याएं मिल चुकी हैं -कुछ मित्रगन बा आज भी मेरी शरारत ढूँढने की शरारत में ही लग गए हैं .अब यहाँ भी कौनो शरारत हुयी सकथ का पंचौ? अब इहाँ व्याध का उल्लेख महाकवि ने क्यों किया - एकर भी कौनो निहितार्थ बा का भाई लोगों ?
    मगर अभी तक दिनकर धुरंधर लोग नहीं पहुंचे -चलिए अब कुंजी परमिट की जाती है ,
    अब तो आयें दिनकर विशारद !

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  33. 'गर्मि अभी बच री हे...'
    वाह!
    क्या व्याख्या की है अनामी व्यक्ति ने![हा हा हा]
    @@@@@बाकी ....अजीत जी की बात में दम है.
    :D...आप को अर्थ ना मालूम हो????ऐसा हो नहीं सकता...

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  34. are ab aap hi arth bata dijiye ...kahe tippiniyan badhwa rahe hain :) aapko malum hoga jarur.

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  35. अन्याय करने वाले व सहने वाले को तटस्थ भाव से देखने वाला भी अपराधी होता है...


    अपनी मति यहीं तक चलती अहि. अन्यथा पंडित न होते?

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  36. आप अगर अपने सामने किसी के साथ अन्याय होते देख कर चुप है तो आप भी पाप के भागी है . बस इत्ती सी बात है जो आप रोज करते है

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  37. सीधी बात -विन्टर में परेशान हो रहे हो अभी तो समर शेष है .

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  38. चलिए सुबह से आँख गड़ाए रहने का कुछ तो परिणाम मिला -बात धीरे -धीरे मेरे मन में साफ़ हो रही है.सुश्री अदा जी ,श्री अजीत जी ,श्री गोदियाल साहब ,श्री जयंत जी ,श्री हिमांशु जी और अल्पना जी नें तो लगभग स्पष्ट कर ही दिया है लेकिन आज कोई काम नहीं कर पाई .आपनें कुंजी देखनें की अनुमति दे दी सो विश्वविद्यालय के एक हिन्दी के वरिष्ठ आचार्य जी से वार्ता के उपरांत इसका जो अर्थ मुझे ज्ञात हुआ है उसको मैं लिख रहीं हूँ.-----------

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    महाकवि दिनकर जी का संकेत उस पौराणिक /महा काव्य कालीन सन्दर्भ की ओर है,जिसमें महाभारत समर समाप्त हो चुका है .एक व्याध द्वारा अज्ञानतावश / भूल से श्री कृष्ण जी को मार दिया गया है.
    वहाँ युद्ध समाप्त हुआ और महाभारत के केंद्रीय पात्र श्री कृष्ण जी अनजाने ही सही व्याध के कृत्य से पीड़ित हुए.
    इसी दृष्टान्त की ओर इशारा करते हुए महाकवि दिनकर जी कहतें है की वह युद्ध तो समाप्त हो गया था और श्री कृष्ण की भूमिका शेष न रहनें केकारण वे मृत्यु को प्राप्त हो गये थे .
    अत : समर अभी शेष है ,जो तटस्थ रहेंगे उनका भी हश्र कहीं व्याध के कृत्य जैसा ही न हो जाये.
    --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
    साभार.
    तनु

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  39. हम भी इन पंक्तियों का अर्थ ढ़ूँढ रहे हैं।

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  40. 2शाबाश तनु आपने तो दिनकर साहित्य के महारथियों की छुट्टी कर दी -व्याख्या थोड़ी और विस्तारित हो सकेगी ?

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  41. परीक्षक ने अभी रेजल्ट आउट नहीं किया है। लेकिन अबतक दिख रही चौवालिस टिप्पणियों के बाद भी इन पंक्तियों में कुछ बचा होने की उम्मीद मुझे नहीं है। वैसे तो व्याख्याकार चाहे जो जोड़ते रहें।

    मुझे डर है कि अन्त में यह उक्ति न चरितार्थ हो जाय कि “खोदा पहाड़ निकली चुहिया वह भी मरी हुई।”

    शब्द साधक अजित बडनेरकर जी भी शायद इसी ओर इशारा कर रहे हैं:)

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  42. @छोटे भैया,कैसा इशारा चाह रहे हैं ,फिर कौनो बवाल कराना चाहते हैं तो ऐसन बोल़ा न -अब अक्लमंद क भी कौनो इशारा चाहे का ?

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  43. दिनकर जी की पूरी कविता पहली बार अभी-अभी पढ़ के लौटा हूँ। मुझ अल्प ज्ञानी को तो उस कविता के ब्याघ्र का अर्थ नाथूराम गोडसे लगा और समर का अर्थ भारत का स्वतंत्रता संग्राम लगा।

    कवि के अनुसार अंग्रेजों से छुटकारा मिलने के बाद भी अभी हमारे राष्ट्रनायकों को भीतरी दुश्मनों से लड़ना बाकी है। अभी भी राष्ट्रविरोधी शक्तियाँ सक्रिय हैं और उन्हें शान्त करने से पहले लड़ाई बन्द न समझी जाय। गान्धी जी की हत्या करने वाला गोडसे अकेला अपराधी नहीं है। इस हत्या के बाद जो लोग तटस्थ होकर तमाशा देखते रहे उनका अपराध भी समय आने पर उजागर हो जाएगा।

    अब इसमें कोई अन्य गहराई छिपी हो तो भगवान जाने या अरविन्द जी।

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  44. @मान गए भाई -तनु श्री का जवाब भी जरा देख लीजिये !

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  45. तनु श्री सब कुछ स्पष्ट कर दिया है जो अस्पष्ट है उसे मैं स्पष्ट कर रहा हूँ.
    जो वर्तमान समय में जो समर चल रहा है उसमें जो तटस्थ रहेगा उसको तो व्याध भी नहीं मारने वाला नहीं है

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  46. सुश्री तनु जी , आदरणीय सिद्धार्थ जी और भाई दिग्विजय जी ने तो अंततः सब कुछ लिख ही दिया है अब शेष है ही क्या ,लेकिन अभी भी असली समर शेष ही है .

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  47. समर शेष है...क्योंकि इसका उद्देश्य पूरा नहीं हुआ। समर का उद्देश्य-हर दोषी को उचित सजा देना, न कि सिर्फ़ व्याध को। जो तटस्थ हैं, "मौनं स्वीकार लक्षणं" के आधार पर इस जघन्य कृत्य में उनकी सहभागिता है इसलिये वे भी दोषी हैं। ध्यान दें, व्याध का प्रयोग लाक्षणिक अर्थ में है न कि शाब्दिक अर्थ में। जैसे कहा जाय-"काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम" अर्थात कौए से दही की रक्षा की जाये तो इसका ये मतलब नहीं है कि बिल्ली आये तो उसे खाने दिया जाये। कौए का प्रयोग लाक्षणिक है जिसका मतलब है "कोई भी जिससे दधि को खतरा हो" व्याध के संदर्भ में भी ऐसा ही अपेक्षित है। वैसे चलते-चलते मुझे अकबर इलाहाबादी का शेर याद आ गया, तटस्थ लोगों के संदर्भ में-

    खामुशी जुर्म है जब मुंह में जुबां हो अकबर
    कुछ नहीं कहना भी है ज़ालिम की हिमायत करना

    बस इतना ही, किम अधिकं विज्ञेषु ?

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  48. "समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
    जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध"

    महाकवि ने अंग्रेजी शब्द का अनूठा प्रयोग किया है अपनी इन पंक्तियों में. उनको नमन.

    महाकवि कहते हैं कि समर शेष है याने कि गरमी अभी बाकी है. जिन विवादों को आप निपटा समझ रहें हैं, वो सिर्फ शांत ज्वालामुखी वाली भ्रांति है. वह कभी भी पुनः फट सकती है और यदि उस शांति को देख आप अपने आपको पाप मुक्त समझ बैठे हैं तो यह आपकी मूढ़ता है. आपने विवाद छेड़ा है(व्याध) तो आपको तो पाप भुगतना ही होगा लेकिन आपके वो समस्त साथी एवं बैरी जो विवाद के समय किनारे बैठे तमाशा देख रहे थे और जो अब पुनः आपके साथ साथ आ नृतन में मगन है, इस बार जब वो ज्वालामुखी बिना बताये किसी भी समय फटेगा तो ये सब भी उसी के लपेटे में आयेंगे. इनको उस समय किनारे बैठ मौज लेने और आज साथ में नृतन करने के अपराध की क्या सजा होती है, तब समझ में आयेगा. बस, समय की धार देखते चलो.


    इसी तरह के अनेक अनुपम प्रयोग करने में महाकवि को महारत हासिल थी, इसी से उनकी रचनाएँ कालजयी हो चली.

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  49. ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
    श्रद्धेय डॉ अरविन्द सर ,
    मुझे अच्छा लगा कि आपको मेरा जबाब सही लगा लेकिन एक निवेदन विनम्रता के साथ करना चाहती हूँ कि जरूरी नहीं है कि ब्लॉग पर हर ऊट -पटांग ढंग से लिखी जाने वालीबातों को हम संज्ञान में लें.
    अपने मन की सच्ची बात कह कर फुर्सत ले लिया करें .क्योंकि ऐसा लगता है कि कुछ लोग अब सामान्य सी बात को भी तिल का ताड़ बना दे रहें हैं यह पढ़े लिखे समाज के लिए शोभामान नहीं हैं .आप भी कहाँ ब्लॉग के चक्कर में पड़ गये ,क्या अच्छा था कि हम लोंगो को आपके लेख यहीं दिल्ली में बैठे-ठाले राष्ट्रिय -पत्र पत्रिकाओं में देखनें को मिल जाते थे लेकिन अब समझ में आ रहा है कि आप अब समाचारपत्र-पत्रिका और जर्नल्स में आपके लेख ,वैज्ञानिक खोज और रिपोर्ट क्यों कम हो गये हैं, क्योंकी आप भी इन्ही चक्करों में पड़ कर मूल उद्देश्य से पीछे हो गयें है .ब्लॉग जगत पर अब अपने प्रशासनिक सेवा से रिटायर होने के बाद सक्रीय होइए ,छोड़ दीजिये ब्लॉग जगत , क्योंकि अब आप और कुछ दिन सक्रिय रहे तो समाज का बहुत नुक्सान होगा.वैसे भी ब्लॉग पर सक्रिय लोग समाज-परिवार को भी समय नहीं दे पा रहें हैं क्योंकि ब्लागिंग का रोग ही ऐसा है. .मैं एक सज्जन को अच्छी तरह जानती हूँ जो कि ब्लागिंग के चक्कर में घर-परिवार और समाज तीनो से कट गये परिणाम उनके लिए अच्छा नहीं हुआ .
    अब आप फिर से हम जैसों की प्रेरणा के लिए पुनः पहले जैसा राष्ट्रिय पत्र पत्रिकाओं ,जर्नल्स आदि में लिखना शुरू करें ताकि देश के लाखों लोग आपके विचारों से लाभान्वित हो संके .ब्लॉग जगत को तो कुछ हजार या सैकड़ा लोग ही अभी जानते -पहचानतें है .
    -------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
    आशा है आप मेरी बातों को सकारात्मक रूप से लेंगे और अपनी कृपा मुझपर बनाये रखेंगे.
    आदर सहित
    तनु .

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  50. मिल गया , अभी अभी एम बी डी गाईड उठा के पेज नं फ़लाना के ढिमकाना पैराग्राफ़ में वर्णिट है कि ई सब जो इहां हो रहा है , उ का असली दोषी गूगल बाबा हैं जो फ़्री फ़ंड का प्लौट सबको काट काट के दे दिये हैं , अब इसमें व्याध घूमे कि निरीह हिरण , जब तक ई गूगल बाबा अपने ई ब्लोग्गर बस्ती बसाए रखेंगे ...समर तो रहबे करेगा जी ,दिनकर जी को पहले ही पता चल गया होगा कि एक दिन ई पंक्ति ब्लोग्गर सब के काम आएगा ...अरे ओईसे ही दिनकर थोडे थे वे

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  51. @तनु श्री ,
    आपका भावपूर्ण आग्रह पढ़ मन विचलित हुआ ....का करून मैं तो ब्लागरी छोड़ दूं मगर ये मुई मुझे नहीं छोड़ रही ...
    हाँ फिर उस दुनिया को तेजी से लौट रहा हूँ जिस और अपने याद दिलाया है -नव वर्ष मेरे शुभचिंतकों को निराश नहीं करेगा !
    और हाँ ब्लॉग जगत में मेरी मुख्य गतिविधि विज्ञान संचार की ही थी मगर सच है आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास !
    इस पूरे प्रकरण से आपको भी क्षोभ पहुंचा -खेद है!

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  52. अरविन्द जी ,
    एक और कोशिश करती हूँ....
    समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
    जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध
    कितने ही शत्रु (व्याध) घात लगाये बैठे हैं...
    अपने स्वत्व की रक्षा के लिए संघर्ष करना ही पड़ेगा ...यह अपने अस्तित्व का प्रश्न है....
    अब अगर तटस्थ होकर , मुहं लटका कर बैठा गए तो यह घोर अपराध होगा...

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  53. हम तो भाई हिन्दी साहित्य में ज़ीरो हैं. संस्कृत होती तो कुछ कहते. वैसे टिप्पणियों में भिन्न-भिन्न अर्थ बता के कन्फ़्यूज़ कर दिया गया है. अब आप एक पोस्ट इसका अर्थ बताने में खर्च कीजिये.

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  54. भैया, सुबह की हमारी बात सही थी। बिना पूरी कविता देखे जो अनुमान लगाया गया था, उसे तनुश्री जी ने बता ही दिया। सिद्धार्थ जी ने पूरी कविता के वर्तमान सन्दर्भ को समझा है। तमाम उकसाने के बावजूद हिमांशु जी का 'टू द प्वाइण्ट' न कह कर घुमावदार कहने का एक लाभ यह हुआ कि तनुश्री जी से जान पहचान हुई।

    वादे के मुताबिक हम भी 'मरे हुए साँप' को पीट लेते हैं:
    पूरी कविता में मिथकीय सन्दर्भ बिखरे पड़े हैं। विभा हुई बन्दिनी, प्रकाश बन्दीगृह से छूटेगा, धरा के मग में अनेक पर्वत, गंगा का पथ रोक इन्द्र के गज अड़े ....और अंत में व्याध भी।
    स्वतंत्रता के 7 वर्षों के बाद दिल्ली के उपर रची गई इस कविता में स्वतंत्रता आन्दोलन की असफलता की आहटें हैं। जिस कवि ने संस्कृति के चार अध्याय, रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, उर्वशी से आख्यान रचे, वह हर बड़ी त्रासदी के बाद भी चेतना वेणु वादन की भारतीय काव्य परम्परा से कैसे चूक जाता?
    अधिक विस्तार न देते हुए व्याध पर केन्द्रित रहूँगा। राम कथा का प्रारम्भ व्याध द्वारा मारे गए क्रौञ्च मिथुन वध से होता है। वाल्मीकि का प्रथम छन्द 'मा निषाद..... काम मोहितम' याद करिए। याद करिए उत्तरकाण्ड में श्रीराम द्वारा त्याग देने पर पहले लक्ष्मण का देहत्याग(आत्महत्या?) उसके बाद राम का अयोध्यावासियों के साथ सरयू में जीवित ही जलसमाधि (आत्महत्या?) । रावण के उच्छेद जैसा महान कर्म करने वाले राम की यह त्रासदी! और फिर क्रौञ्च मिथुन वध की करुणा का आश्रय ले वाल्मीकि का रामकथा लेखन (थोड़ी सतर्कता से पढ़ने पर उनका राम के रहते ही रामायण रचना संदिग्ध लगता है।)
    अब आइए कृष्ण गाथा पर। रामकथा के प्रारम्भ का आश्रय बनता है व्याध का क्रूर कर्म तो कृष्ण कथा का अंत बनता है व्याध का तीर ! पहले में बस करुणा के आश्रय भर से काम चल जाता है तो दूसरे में साक्षात हरि ही व्याध के शिकार बनते हैं (भले अनजाने ही सही)। बहेलियों ने बहुत नुकसान किए! क्या सचमुच? जैसे कृष्ण ने अपने हाथों अत्याचारी यादव कुल का विनाश किया वैसे ही नेहरू ने दलाल तत्त्वों को पहचान उनकी रीढ़ क्यों नहीं तोड़ी? क्या उनका नास्तिक अवचेतन भारत की त्रासद परम्परा से डरा हुआ था? कहीं कृष्ण का हाल न हो जाय! फिर इन्दु कैसे प्रधान बनेगी? ऐसे में वे कौन लोग थे जो तटस्थ बने घी पीने में लगे हुए थे? निषिद्ध क्षेत्र में बहक रहा हूँ। लेकिन लगता है कि कहीं दिनकर जी संतप्त रहे होंगे और तटस्थों को दी गई उनकी ललकार गहरे अर्थ लिए हुए थी।
    सम्भवत: हर महान कर्म उद्योग अभिशप्त होता है - एक महान त्रासदी में रूपायित होने के लिए। भारत की स्वतन्त्रता भी अपवाद नहीं रही। स्वतंत्रता आन्दोलन भी रामायण और महाभारत की परम्परा में है। आज से शायद हजार वर्षों के बाद डिजिटल रूप में उस पर मिथक रचे जाएँगे।
    सत्ता के दलालों ने नेहरू की रूमानियत और आदर्शवादिता का खूब फायदा उठाया । दिनकर जी नेहरू के प्रशंसक थे। नेहरू को ढापते हुए भी महज 7 वर्षों में ही उन्हों ने जो घपला भाँप लिया था, उसे अभिव्यक्त कर दिया। यहीं दिनकर जी वाल्मीकि और वेदव्यास की परम्परा से जुड़ जाते हैं। ... संस्कृति के चार अध्याय ऐसे ही नहीं लिख गए !
    पहली पंक्ति के अर्थ और व्याध पर यहाँ बहुत विमर्श हो चुके हैं। कुछ बचा खुचा है तो हिमांशु जी बतावें। हमने तो अपनी बकवास कर ली।

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  55. @मुक्ति
    क्या गिरिजेश जी के इस पांडित्यपूर्ण उदबोधन के बाद भी एक पोस्ट लिखी जानी चाहिए ?
    उपसंहार
    ....और गिरिजेश जी आप भी तो बौद्धिक नृशंसता की हदें पार कर जाते हैं ,किसी के लिए कुछ छोड़ा ही नहीं .मेरे लिए भी नहीं ...बुरी बात ..अच्छे बच्चे ऐसा नहीं करते ......
    मैं तो केवल एक व्याध तक पहुँच पाया था और आप एक और ढूंढ लाये और क्या बात कही कि आदि महाकाव्य का प्रणयन
    भी एक व्याध के मर्मान्तक कृत्य से आरम्भ हुआ और दूसरे महाकाव्य -गाथा का अंत भी एक व्याध ने कर डाला .अब तीसरे व्याध की इन्गिति अगर गोडसे है तो यह सूझ भी काबिले गौर है!
    महाभारत के अवसान पर व्यतीत के सिंहावलोकन में डूबे खिन्न कृष्ण का पराभव एक बहेलिये के बाण से अकस्मात ही हो गया -एक महासमर के केन्द्रीय पात्र का ऐसा बेबस अंत ? कार्य कारण सम्बन्ध की बात देखें तो काल /यम कभी भी अपने कालकर्मों का जिम्मा खुद पर नहीं लेता -किसी पर थोप जाता है -अब यहाँ बिचारा बहेलिया काल के रणनीतिक नियोजन का शिकार बनता है -महाकवि केवल व्याध को ही इसलिए पाप का भागी नहीं मानते .काल (समय ) बलवान है ! करता धरता वही सब कुछ है -आरोप दूसरे पर लगता है . बहरहाल वह महासमर तो बीत गया था,कृष्ण की उपादेयता भी खत्म हो ली थी और उनका अवसान तो नियत ही था ....व्याध को अकेले क्या दोष दिया जाय ? हाँ असली अपराधी तो वे हैं जो समय की पुकार पर भी तटस्थ हो लेते हैं -महाकवि ने समकालीन समर की ओर संकेत करते हुए इसलिए ही तटस्थों को चेताया है -व्याध नहीं असली पाप के भागी तुम्ही होगे .....
    दिनकर काव्य व्यास नहीं आये .....यह दुःख है मेरा ...सच कहूं बड़ा ही सात्विक दुःख -क्या ब्लागरी बस हलकान विद्रोहियों के हलके फुल्के जायकेदार लेखन तक ही पनाह मांग गयी है ? ....समय लिखेगा उनका भी अपराध ....
    सभी सुधीजनों को जिन्होंने इस परिचर्चा में सहज उत्साह से भाग लिया बहुत बहुत आभार !

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  56. अच्छा, अन्तत: विद्वतपरिषद ने क्या अर्थ बताया? कौन तय करेगा कि कौन है तटस्थ?
    एक चरित्र है बर्बरीक। उसका भी बहुत महत्व है महाभारत में!

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  57. क़ाफी गर्मी अभी बाकी है केवल पाप म्यूजिक से व्याधि नही बढ रही है, जो समय से नही नाचेंगे वे भी अपराधी है

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  58. पढने के बाद बस जय शंकर प्रसाद जी
    की एक कविता महसूसते हुए चला जा रहा हूँ ---
    '' क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ '' ..

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  59. समझ में आ गया. बहुत ही खूबसूरती से. गिरिजेश जी की व्याख्या तो ऐसी है कि यदि महाकवि दिनकर होते तो पढ़कर निहाल हो जाते. आज मुझे हिन्दी साहित्य न पढ़ने का अफ़सोस हो रहा है... गिरिजेश जी, मैंने यूँ ही नहीं कहा था कि मैं इतनी उच्चकोटि की लेखिका नहीं हूँ. जिस अगाध सागर को मथकर आप ये व्याख्या रूपी मोती ढूँढ़कर लाये हैं, मैं उसके किनारे बैठकर गिट्टियाँ बीन रही हूँ. आपलोगों के स्तर तक पहुँचने के लिये मुझे अभी समय लगेगा.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  60. जब पहली बार इस लेख को पढा तो मतलब समझ आ गया था लेकिन लेख का स्वर -
    " पूरी कविता पढनी चाहें तो यहाँ मौजूद है .तो भैया कौनो है सरस्वती क लाल या दिनकर साहित्य विद्वान् जो इस दिनकरी ढाई आखर का अर्थ बता दे .....

    मुझे इंतज़ार रहेगा ......."


    - मुझे पहलवानो जैसा लगा इसलिये जबाब नही दिया. अब तो सारी बात सामने आ ही गयी है. इसी से मिलती जुलती लाइन याद आई.

    दे वक्त के मान्झी उनको भी
    दो चार झकोले हौले से
    साहिल पे खडे होकर के जो
    तूफ़ान का नज़ारा करते है

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  61. मैंने तो अकेले इस पोस्ट से काफी कुछ सीखा...!
    इसमे कुछ बुरा नही है कि आपने विद्वतजनों का आह्वाहन किया..और एक सुंदर सी चर्चा चली..! दिनकर जी के बारे मे थोड़ा और जानने को मिला..!
    एक चिंता और पसरी मिली है..बीच मे..!

    कि ब्लागिरी को उतना महत्व नही मिलना चाहिए...! मै आए दिन अपने परिचितों को सफाई देता फिर रहा हूँ कि मै टाईम waste नही कर रहा वरन प्रतिपल कुछ सीख रहा हूँ. दरअसल इस माध्यम का उपयोग करना धीरे-धीरे आएगा. पहले सेलफोन का बहुधा दुरुपयोग ही होता था..अब एक अनिवार्य-प्रासंगिक आवश्यकता बन चुकी है...!

    वैसे आपके किसी भी माध्यम मे आने वाले लेखों के लिए मेरे हार्दिक शुभकामनायें..! आप हमारी रीडिंग लिस्ट मे सर्वदा से ही हैं..!

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  62. BHAI LOG YEDI BURA NAHIN MAANE TO MUJHE TO YE KAVITA SATTA KE STUTI GAAN KE LIYE LIKHI GAYI JAAN PADTI JISMEIN NA SATTA PAKSH ( JISKO DELHI KAHKAR ITISHRI SAMAJH LEE HAI ) AUR NA HI ANGREJON KE PRATI ( VYAAGH ) KUCHH KAHA HAI BALKI AAROP KI SOI DHANI LOGON KI AUR KARKE PRASHNA KAR DIYA GAYA HAI KI 7 VARSH HO GAYE LEKIN SWARAJYA KAHAN ATAK GAYA. YEDI VISHWAAS NAHIN HO TO KUCHH LINE DOBARA DAAL RAHA HOON APNE COMMENT MEIN>>

    समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
    विचरें अभय देश में गांधी और जवाहर लाल।


    समर शेष है, अभी मनुज-भक्षी हुँकार रहे हैं।
    गाँधी का पी रुधिर, जवाहर पर फुंकार रहे हैं।


    अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
    तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?

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  63. BHAI LOG YEDI BURA NAHIN MAANE TO MUJHE TO YE KAVITA SATTA KE STUTI GAAN KE LIYE LIKHI GAYI JAAN PADTI JISMEIN NA SATTA PAKSH ( JISKO DELHI KAHKAR ITISHRI SAMAJH LEE HAI ) AUR NA HI ANGREJON KE PRATI ( VYAAGH ) KUCHH KAHA HAI BALKI AAROP KI SOI DHANI LOGON KI AUR KARKE PRASHNA KAR DIYA GAYA HAI KI 7 VARSH HO GAYE LEKIN SWARAJYA KAHAN ATAK GAYA. YEDI VISHWAAS NAHIN HO TO KUCHH LINE DOBARA DAAL RAHA HOON APNE COMMENT MEIN>>

    समर शेष है, शपथ धर्म की लाना है वह काल
    विचरें अभय देश में गांधी और जवाहर लाल।


    समर शेष है, अभी मनुज-भक्षी हुँकार रहे हैं।
    गाँधी का पी रुधिर, जवाहर पर फुंकार रहे हैं।


    अटका कहाँ स्वराज? बोल दिल्ली! तू क्या कहती है?
    तू रानी बन गयी वेदना जनता क्यों सहती है?

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  64. श्री कृष्ण ने गीता में कहा था , इस धर्म युद्ध में अधर्म के साथ लड़ने वालों के अतिरिक्त तटस्थ रहने वाला भी अधर्म की तरफ है ..... धर्म की तरफ वही है जो धर्म की तरफ से लड़ रहा है ... मेरे हिसाब से ये पंक्ति उसी ओर इशारा करती है , कि सिर्फ व्याध (अधर्म करने वाले) ही नहीं , समर के बाद तटस्थ रहने वालों का भी अपराध लिखा जायेगा कि उन्होंने से सच का साथ नहीं दिया |

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  65. Prashant Aur sandarbh ke swath kisi bhi ka via ya pankti ka sadaiv hi ek Aur kevak ek hi arth kavi dwarf abhipret hota hai. Ham are mat me ,Jo yeh 71+ mahanubhavon dwar matha pachchi ki gayi hai!van poornath nirarthak hai Aur khshma Karen; chand phaltu logon ka vani-vilas ke atirikt Aur Kuching nah I.kripaya is Kati Aur apriya satya ke liye hamen maf kiya Kaye!,

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  66. Abhi yudh baki hai..surf dhanudhar he apradhi nahi...waqt us a bhi apradh like a Jo nirpakas hai ..regards Raj Chadha 9023022277

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं

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