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शनिवार, 17 नवंबर 2012

भाग दरिद्दर!

इस बार भी दीपावली पैतृक आवास(चूडामणिपुर, बख्शा  -नौपेडवा,जौनपुर ,उत्तर प्रदेश ) पर मनाने का मौका मिला .सालाना त्यौहार अपने पैतृक आवास पर मनाना मुझे अच्छा लगता है . बड़े मिश्रित अनुभव रहे . पिछले वर्ष से शुरू हुयी बाल रामलीला इस वर्ष  बच्चों के और भी उल्लास के चलते अविस्मरणीय बनी . इस बार का प्रसंग था लंका दहन का . इस प्रसंग में बच्चों ने हनुमान के लंका में प्रवेश, लंकिनी से वार्ता और उसकी मुक्ति ,विभीषण से भेंट ,सीता को रावण द्वारा धमकाना ,हनुमान द्वारा श्रीराम की मुद्रिका गिराना ,उनके  द्वारा अशोक वाटिका का उजाड़ना ,अक्षयकुमार का वध ,मेघनाथ द्वारा हनुमान को ब्रह्मपाश में  बाँधना ,हनुमान रावण संवाद ,लंकादहन और माँ सीता से कोई स्मृति चिह्न माँगना और लौट कर उसे श्रीराम को सौंपना आदि दृश्य बहुत ही बढियां ढंग से अभिनीत किया . 
मातु मुझे दीजे कछु चीन्हा जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा 
हनुमान की सर्वश्रेष्ठ भूमिका कर सरिता मिश्र ने प्रथम पुरस्कार जीता 
इस कार्यक्रम के पीछे की सोच यह है कि समाज में श्रेष्ठ सांस्कृतिक और पारम्परिक मूल्यों को अक्षुण बनाने की दिशा में बच्चों से ही इसकी शुरुआत करनी चाहिए -कैच देम  यंग। इस दिशा में बाल रामलीला की शुरुआत एक विनम्र प्रयास भर है . कुछ चित्रों का आप भी दृश्य लाभ उठायें . जागरण ने भी चित्र के साथ खबर छापी .
बाल कलाकार टीम
 निर्देशक कीर्ति मिश्र,दृश्य समन्वयक प्रियेषा मिश्र,पार्श्व ध्वनि - स्वस्तिका, सोनी आदि 


प्रियेषा ने गाँव के बच्चों से घुलमिल कर रावण का पुतला भी बनाया और मुझसे पुतले के साथ अपना फोटो लेने का आग्रह किया . पुतला दहन के बाद  पैतृक  आवास मेघदूत  को सजाने संवारने का काम शुरू हुआ . इस बार हमसभी ने पटाखे से दूरी बनायी मगर चयनित फुलझडियों -अनार ,चरखियां ,स्वर्गबाण अदि आईटमों का मर्यादित प्रदर्शन किया गया -यह काम बच्चों को देने के बजाय आउटसोर्स कर एक प्रोफेसनल आतिशबाज को दिया गया . खूब मजा आया .
आतिशबाजी 

जाप ध्यान भी हुआ,प्रसाद बांटे गए। एक लोक परम्परा के अनुसार दिवाली के दिन अपने व्यवसाय या जो भी काम आप करते हों अवश्य करना चाहिए जिसे 'दिवाली जगाना' कहते हैं कि वह काम आप अगली दिवाली तक निर्विघ्न करते रहें.  इस लिहाज से तो मुझे जो कुछ काम करने थे वे  एक भी नहीं हो पाए,ब्लागिंग भी नहीं :-) सबसे बुरी बात यह हुयी कि मेरे फेसबुक अकाउंट से करीब दो दर्जन मोबाईल  फोटो अपलोड आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गए और मुझे विचलित कर गए .कारण अभी तक समझ में नहीं आया ,फेसबुक को  प्राब्लम रिपोर्ट किया मगर अभी तक जवाब नहीं आया है , मतलब मेरी दिवाली नहीं जगी . माता जी ने आँख में काजल इस बार भी घुड़क कर लगा ही दिया यह डरा कर कि अगर नहीं लगवाता तो अगले जन्म में छंछून्दर हो जाऊंगा . मुझे सहसा डार्विन की याद आयी और होठों पर बरबस मुस्कराहट आ गयी . रिवर्स एवोलूशन :-)
भाग  दरिद्दर! 
....देर से सोये ही थे कि  अल्लसुबह नींद कुछ धप्प धप्प ढब ढब की आवाज से खुल गयी .गृहिणी एक प्राचीनतम परम्परा का निर्वहन कर रही थीं हँसियाँ से सूप पीट पीट कर घर के अतरे कोने से दरिद्दर को भागा रही थीं . अब दीवाली की आराध्य देवी लक्ष्मी के आने पर दरिद्दर को घर से बाहर हो जाने की यह प्रतीकात्मक प्रस्तुति कहाँ से अनुचित है! मनुष्य उत्सव- अनुष्ठान प्रेमी है -वह कोई भी अनुष्ठान का मौका ऐसे ही गवाना नहीं चाहता . दरिद्दर भगाने का यह उपक्रम यहाँ पूर्वांचल में बहुत प्रचलित है . गाँव घर की लक्ष्मियाँ सूप पीट पीट कर गृह दारिद्र्य को गाँव से बाहर खदेड़ आती हैं . कहीं कहीं यह उपक्रम एकादशी की रात में करते हैं।

दिवाली की अगली रात से कार्तिक का शुक्ल पक्ष आरंभ हो रहा था सो कार्तिक महात्म्य की एक पर्म्पारा के मुताबिक़ हम सब ने आवला के पेड़ के नीचे सामूहिक भोज भात -आहारा का आयोजन भी किया . बारबीक्यू की तर्ज पर ....

आप सभी के यहाँ से  दुःख -दारिद्र्य भाग जाए दीपोत्सव की यही सर्वतोभद्र कामना है ........

सोमवार, 20 अगस्त 2012

ईद मुबारक!


दोस्तों,हमारे पास सहिष्णु साहचर्य के बिना और कोई चारा नहीं है -हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई सभी को भारतीय जीवन की इस सच्चाई को समझना होगा... यह देश हम  सभी का और हम  सब इस देश के हैं.. अब यह विवशता है तो एक धुर सच्चाई भी है -हम इससे अगर मुंह चुरायेगें तो नुक्सान अपना करेगें ..हर तरह का नुक्सान, जानोमाल का नुक्सान जो आगामी पीढ़ियों तक को भी ग्रसित करेगा... जिम्मेदारी  सभी कौमों के सरपरस्तों और समझदार लोगों की है कि वे इस सच्चाई से सबको आगाह करते रहें ....आज हमारे बहुत से साथियों की ईद मनाने की इच्छा नहीं है ..कल किसी को होली दिवाली मनाने की इच्छा नहीं रहेगी ...एक आजाद और बहुरंगी संस्कृति के देश के लिए इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है ...देश का संविधान धर्मनिरपेक्ष बनाये जाने के पीछे के गहन विचार मंथन को ऐसे ही कारणों में देखा और समझा जा सकता है ......आईये क्या हिन्दू क्या मुस्लिम सभी को आगे बढ़ कर ईद की शुभकामनायें दें और जम कर सेवईयां जीमें :-) 
लगता है आज तो इतने से चल जाएगा ...कोई जरुरी तो नहीं कि हर पोस्ट एक  निश्चित सीमा के मापदंड हलांकि अघोषित, तक पहुँच ही जाए ....बात कभी कभी संक्षिप्त ही भली लगती है और संक्षिप्त बातें प्रायः सारगर्भित भी होती हैं -वो कहते भी हैं कि संक्षिप्ति वक्तृता/वाक्पटुता की आत्मा है ....तो आज इतना ही ..एक बार फिर आप सभी को ईद मुबारक हो! 

बुधवार, 11 जुलाई 2012

बाबा भोलेनाथ का दर्शन


सावन का महीना काफी धरम करम का होता है. बनारस में काफी भीड़ जुटती है श्रद्धालुओं की. इनकी एक और कैटिगरी पिछले एक दशक से आ जुड़ी है, कांवरिये. हर गली हर सड़क इन श्रद्धालुओं से लबरेज दिखती हैं. सावन के सभी सोमवारों पर बाबा भोले के दर्शन को लक्खी भीड़ (लाख से ऊपर) आ जुटती है मानो श्रद्धा का सैलाब उमड़ा आ रहा हो. अब इतनी भीड़, शहर की गड्ढों से भरी सड़कें और पतली गलियां. तिस पर बाबा भोले का एक अलग घनी आबादी और सकरी जगहं विराजमान होना. इंतजामिया विभाग के लिए बड़ी चुनौती. कैसे करे श्रद्धा के उमड़ते सैलाब को व्यवस्थित. लिहाजा बाबा भोले जो खुद विश्वनाथ हैं उनके इर्द गिर्द चप्पे चप्पे पर पुलिस और हर गली कूचे में एक मैजिस्ट्रेट की व्यवस्था ताकि खुदा न खास्ता कुछ अनहोनी हो तो उसकी पतली गर्दन नाप दी जाए :-). हम भी लगभग ऐसी ही एक जिम्मेदारी और घोर श्रम के काम में लगते हैं. एक रात के 11 बजे से शुरू हुई ड्यूटी दूसरे दिन शाम तक की हो जाती है क्योंकि श्रद्धा का सैलाब अर्धरात्रि से ही ऐसा शुरू होता है कि लगातार अहर्निश दूसरे दिन के शाम तक चलता रहता है. बिना रुके बिना थमे. किसी को भी बिना चार घंटे लाइन में लगे बाबा भोले का दर्शन मिलना शायद ही मयस्सर हो.
भला आप भी दर्शन से क्यों वंचित रहें 


ये दर्शनार्थी इतना कष्ट उठाते हैं कि मत पूछिए. कलेजा दहलता है और मुंह को आता है. और सिर श्रद्धा के इस रूप को देखकर स्वतः झुक जाता है. खुद की मुश्किल भरी ड्यूटी का कष्ट जाता रहता है. खुले में वर्षा में भीगते हुए, घंटों खड़े हुए, सूजे  हुए और झलकों से अटे पैरों के बावजूद भी चेहरों पर आशा और उत्फुल्लता की चमक...बोल बम के नारे...महादेव महादेव की रटन...एक अद्भुत दृश्य. जमीन पर दंडवत करता आता हुआ एक श्रद्धालु दूर से दिखा. पता लगा किसी दूसरे जिले से एक महीने पहले जमीन पर दंडवत करता ही चला आ रहा है. अब बाबा के दरवाजे आ पहुंचा है. कतार में नहीं है वह. मगर इस हठयोगी और बाबा के भक्त के लिए कतार की जरूरत ही कहां. मुझे कहने की जरूरत भी नहीं पड़ती. मुख्य वीवीआईपी द्वार का अवरोध उठा दिया जाता है. मंत्रमुग्ध द्वार प्रहरियों द्वारा. वह निर्विकार भीतर प्रवेश कर जाता है. अब वह बाबा का ख़ास भक्त है. उसे किसकी परमिशन लेनी है! मानो बाबा की प्रेरणा से दरवाजा खुल गया है. यह है श्रद्धा की विवेक और तर्क पर जीत. मैं भी किंकर्तव्यविमूढ़ देखता रहा यह लीला.





घंटों से कतार में लगे हैं दर्शनार्थी 



इन दृश्यों को देखकर सारे तर्क और बुद्धि की चंचलता जड़वत हो जाती है. भले ही चप्पे चप्पे पर पुलिस और सुरक्षा का भारी तामझाम है मगर सच पूछिए तो श्रद्धालुओं की यह भीड़ स्वयं बड़ी अनुशासित दीखती है. उसे बस बाबा भोलेनाथ का दर्शन चाहिए और किसी बात से उन्हें कोई मतलब नहीं है. वे एकाग्र होकर बस उसी पल की प्रतीक्षा में अपना नंबर लगाये रहते हैं. कतार में उन्हें घंटे दो घंटे चौबीस घंटे बीत जाएं कोई फरक नहीं है. मगर इतनी बड़ी भीड़ को नियमित करना सचमुच एक बड़ी समस्या है. प्रशासन के लिए नाकों चने चबाने का मौका है यह. पंजों पर खड़े रहने का वक्त. हम सब कुर्सी तोड़ मुलाजिम इतनी कठिन ड्यूटी के अभ्यस्त नहीं हैं तो दूसरे दिन तक पांव दुखते हैं. शरीर पोर पोर दुखता है और तापे पुरवईया भी पीर बढ़ाती चलती है. अब अगले सोमवार तक यह पीर बनी रहेगी जब तक दूसरी न घेर ले. यह सिलसिला इस महीने तक चलेगा. मगर यह कष्ट तो श्रद्धालुओं के कष्ट के सामने कुछ भी नहीं है..


 नन्हा कांवरिया बड़ा सा डमरू -बोले डम डम 



अब अगले सोमवार का इंतज़ार है...

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

एक उदास शाम,देव दीपावली और पुण्य श्लोक राजमाता देवी अहिल्याबाई होलकर

आज बनारस का एक लख्खी मेला देव दीपावली है ..लख्खी का मतलब जहाँ कम से कम एक लाख की भीड़ होती हो ....यहाँ पहले से कई लख्खी मेले विख्यात हैं -जैसे नाटी इमली का भरत मिलाप ,चेतगंज की नक्कटैया ,तुलसीघाट की नाग नथैया तथा सिगरा के पास की रथयात्रा जिसके नाम पर एक चौराहे का ही नामकरण हो गया है ....इन सभी अपार जनसमूह वाले मेलों में लगभग एक दशक से देव दीपावली का भी नाम आ जुड़ा है और इसे वैश्विक पर्यटन का आकर्षण दे दिया गया है -देश विदेश से पर्यटकों का एक बड़ा हुजूम आज यहाँ आ पहुँचता है ...और बनारस के गंगा घाटों पर असंख्य दीप जगमगा उठते हैं ....आतिशबाजी भी होती रहती है और अस्ताचल को बढ़ते चंद्रमा की रश्मियाँ गंगा जी में एक स्वर्ण पट्टी बिखेरती चलती हैं ....

देव दीपावली पर बनारस के बस एक घाट का नज़ारा (सौजन्य गूगल ) 

डॉ.राजेन्द्र प्रसाद घाट (पारम्परिक दशाश्वमेध घाट)  पर गंगा आरती का दृश्य और पार्श्व में शिव तांडव स्त्रोत का पाठ - अद्भुत  दृश्य और अध्यात्मिक अनुभव -जीवन का एकबारगी का समग्र अनुभव देता है ....मैं स्वजनों के साथ, परिवार के साथ ,राज्य अतिथियों के साथ पिछले लगभग हर वर्ष इस मेले का आनन्द उठाता आया हूँ -इस बार न बच्चे हैं ,न घर (तेलितारा ,जौनपुर)  से कोई आया और न ही कोई मेहमान ही सो मेले में नहीं गया हूँ और बैठे ठाले विगत जीवन के कुछ सिंहावलोकन की ओर अनायास उन्मुख हो इस शाम को ही उदास कर बैठा हूँ -लोगों के बनावटी पन,चालाकी ,मित्रों के विश्वासघात,ब्रीच आफ ट्रस्ट आदि के मंजर अचानक ही याद हो आये हैं -कोई बच्चा मेला जाने से बिछुड़ गया हो तो वह ऐसी ही कई विचारों,अकेलेपन और असहायता  से गुजरता है ..बस समझ लीजिये ऐसा ही कुछ बेहद खराब सा अनुभव हो रहा है ...
देवेन्द्र  पांडे जी ने मेले से लौट कर  देर रात भेजा यह  चित्र -देखिये स्वर्ण पट्टी  


कहते हैं देव दीपावली के कई मिथकीय कारणों के साथ ही इस समारोह को महारानी अहिल्याबाई होलकर से भी जोड़कर देखा जाता है ...मैं आज से अच्छा और उचित अवसर कोई और नहीं समझता जब इस अवसर पर मैं इस महान भारतीय नारी के बारे में आपसे कुछ साझा न  करूं..महारानी लक्ष्मीबाई से यहाँ का बच्चा बच्चा परिचित है -उन पर कवियों की खूब लेखनी चली है ....फ़िल्में और सीरियल भी आयें हैं मगर आश्चर्य है कि अहिल्याबाई होलकर के बारे में ज्यादातर लोग बहुत कम जानते हैं ...विकीपीडिया के अंगरेजी और हिन्दी संस्करणों ने इस महान महिला के बारे में यहाँ और यहाँ जानकारी दी है -अंगरेजी की जानकारी प्रभूत और पर्याप्त है ..अगर आपके समय हो तो अवश्य चंद मिनट वहां दें ..कई प्रान्तों में हिन्दू मंदिरों का पुनरोद्धार इन्हीने कराया ..काशी के प्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर का एक तरह से जीर्णोद्धार ही इनके द्वारा हुआ ..गया के विष्णुपाद मंदिर को भी इनकी ही कृपा से नया रूप रंग मिला ....
पुण्य श्लोक राजमाता अहिल्याबाई होलकर 

इसके बावजूद एक प्रचलित लोक कथा के अनुसार काशी के लालची पंडों  ने इनके विश्वनाथ मंदिर में घुसने के समय इनके मार्ग पर हीरे जवाहरात बिछाए ताकि शूद्र के चरण से स्पर्शित हो पवित्र स्थल अपवित्र न हो जाय और बाद में मंदिर के गर्भगृह और आस पास के  प्रांगण  को  गंगा जल से धुलवाया ....तत्पश्चात महारानी ने यहाँ के पोंगा पंडितों को तब सीख दी जब वे गंगा स्नान के बाद जल धारा  से बाहर नहीं निकल रही थीं -अपनी सेना भेजकर उन्होंने उन्ही लालची पंडों को बुलाया और कहा अब तो मेरे स्नान के बाद  पूरी गंगा ही अपवित्र हो गयीं है इसे पवित्र करो तभी मैं बाहर आऊँगी ....लज्जित पंडों ने उनसे माफी मांगी ....ऐसी ही पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होलकर ने हजारा दीपस्तम्भ से यहाँ के एक गंगा घाट -पञ्चगंगा घाट पर देव दीपावली की शुरुआत की जो आज एक वैश्विक मेला बन चुका है .
लख्खी मेले पर उमड़ा जन सैलाब (यह चित्र भी देवेन्द्र पांडे जी के सौजन्य से ) 

केवल इस मेले को ही देखकर आप बनारस आने का औचित्य साध सकते हैं और जीवन को धन्य कर सकते हैं ...मेरी बात का भरोसा कीजिये एक अनिर्वचनीय अनुभव के साथ आप वापस जायेगें ...और आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अपने संस्मरण छोड़ जायेगें ..इस पोस्ट को पूरी करते करते मैं अपने अवसाद से मुक्त हो रहा हूँ .....बाकी तो बेचैन आत्मा एलियास देवेन्द्र पाण्डेय जी ने आश्वस्त किया है कि इस बार  मेरे संती (हिस्से का ) भी मेला वे देखेगें और उसकी चौचक रिपोर्ट आपको  तक पहुचायेगें  ......मुझे उन्होंने फोटो उपलब्ध करने का भी वादा किया है मगर मुझे सब्र कहाँ और इस उदास शाम के गम को गलत करने का कोई और सहारा भी तो नहीं था -सो थोड़ी सृजनात्मकता का सहारा ले लिया और यह पोस्ट लिख दी है ......
शुक्रिया देवेन्द्र पाण्डेय जी आपके फोटो अवदान के लिए 
और देर रात आयी देवेन्द्र जी की यह आँखों देखी टटकी रिपोर्ट 

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2011

पैतृक आवास पर मनाई दीवाली ..शुरू हुई बाल रामलीला!

 पैतृक  आवास मेघदूत जो वाराणसी लखनऊ मार्ग एन एच 56 (जौनपुर) पर है.

कल जौनपुर स्थित अपने पैतृक  आवास से दीवाली मना कर लौटा -मगर यहाँ तो बिजली गायब ,फोन का डायल टोन गायब ,ब्राडबैंड कनेक्शन नदारद ..लगा कहीं सुदूर अतीत में आ पहुंचे हों ...बिना अंतर्जाल के जुड़ाव से यह दुनियाँ सहसा कितना बदरंग हो जाती है इसका अनुमान आपको होगा ही ...जैसे तैसे रात कटी ..आज का पहला काम बी एस एन यल आफिस में शिकायत और फिर कहीं से आप सब से जुड़ने की जुगाड़ .... .अब  इसमें सफल हुआ हूँ...
 बाल रामलीला टीम
..सोचा था विस्तार से ग्राम्य दीवाली की चर्चा करूँगा मगर अब यह संभव नहीं दीखता ...हाँ कुछ चित्रों और उनके विवरणों को जरुर साझा करना चाहता हूँ -हमारा कोई भी त्यौहार सच पूछिए तो बच्चों का ही होता है ..उनका उत्साह देखते बनता है ....घर पहुँचते ही बिटिया प्रियेषा और बेटे कौस्तुभ तथा अनुज मनोज के बेटे आयुष्मान और बिटिया स्वस्तिका ने गाँव भर के बच्चों की दिवाली की टीमें तैयार की -कोई कंदीले बनाने में जुटा तो कोई दीयों और मोमबत्तियों को संभालने में तो कोई आतिशबाजी संजोने में .....
 सीता(आस्था ) श्रृंगार में जुटी प्रियेषा

 लेत उठावत खैंचत गाढे काहूँ न लखा रहे सब ठाढ़े ...धनुषभंग बाल राम (आयुष्मान ) द्वारा
मैंने एक नयी शुरुआत कराई .बाल रामलीला की ....और बाललीला टीम का आडिशन,पात्र चयन ,संवाद अदायगी आदि का काम दीवाली के दिन ही रिकार्ड ४  घंटे में पूरा किया गया ..मेरी मदद में आयीं गाँव की ही होनहार छात्रा कीर्ति मिश्र ..उन्होंने निर्देशन का काम संभाला ..शाम को बाल रामलीला की एक नयी परम्परा ही शुरू हो गयी ...दृश्य था सीता स्वयम्बर का ..बच्चों ने ऐसी अभिनय प्रतिभा दिखाई कि लोग बाग़ बाग़ हो उठे और वाह वाह कर उठे ....बच्चों में अपनी संस्कृति और संस्कारों के प्रति प्रेम -झुकाव  आज के इस विघटन के युग में बनाए  रखना भी एक बड़ी जिम्मेदारी है ....पश्चिम की आंधी में हमारा बहुत कुछ बेहद अपना भी दूर होता जा रहा है ....अंगरेजी में कहा ही जाता है "कैच देम यंग " मतलब जिन संस्कारों की नीवें गहरी करनी हो उसके लिए बच्चों से ही शुरुआत होनी चाहिए ..अभी तो यह हमारी यह विनम्र शुरुआत ही है आगे इसके विस्तृत स्वरुप की संभावनाएं हैं .....

 मनोज ने विधिवत संपन्न कराई लक्ष्मी पूजा
आतिशबाजी हमारी एक सुन्दर सी प्राचीन कला है जिसमें विज्ञान के साथ  ही कलात्मकता का अद्भुत मिश्रण है..हम तो आतिशबाजी के बड़े वाले पंखे(फैन) हैं  ..सो एक आतिशबाज को ही पिछले साल से पड़ोस में बसा लिया गया है और उसे इस अवसर पर आर्डर देकर आतिशबाजी का प्रदर्शन करने को बुलाते हैं ..हम आतिशबाजी पर लिखने  लगेगें तो यह पोस्ट कम पड़ जायेगी....बस इतना ही कि बड़े आईटमों से बच्चों को दूर रखते हैं और तेज आवाज के पटाखे हम नहीं छुडाते ....बाकी तो स्वर्गबान ,चरखी ,राकेट ,अनार आदि का तो प्रदर्शन होता ही है -हमने इस बार भी आतिशबाजी का खूब आनन्द लिया ..बच्चों ने खूब तालियाँ ठोंकी और गला फाड़ कर चिल्लाए ...बड़ा  आनंद आया ....
 दीवाली पर दुल्हन की तरह सजा हमारा पैतृक आवास मेघदूत

दीवाली का एक मुख्य कार्यक्रम है देवी लक्ष्मी की पूजा से जुड़ा  अनुष्ठान जिसकी जिम्मेदारी मनोज ने निभाई ....और उन्होंने सभी को प्रसाद का वितरण किया ..हम लोगों के यहाँ एक मान्यता यह भी है कि हर हुनर और क्षेत्र के लोगों को दीवाली के दिन अपना काम भले ही अंशतः लेकिन करना  जरुर  पड़ता है ..जिससे साल भर उसमें कोई विघ्न बाधा न उत्पन्न हो ..बच्चों को किताब खोलना ही पड़ता है .अकादमियां का आदमी कुछ जरुर पढ़ लिख लेता है ... हम सभी ने  कुछ न कुछ बतौर शुभ करने को  अपना अपना इंगित काम किया ....इसी मान्यता के अंतर्गत रात में चोर लोग कही हाथ भी साफ़ करते हैं -इसलिए दीवाली की रात इधर चोरियां भी बहुत होती हैं .....हमने तो कुछ सामान जानबूझ कर मैदान में छोड़ भी दिया था मगर दुःख यह हुआ कि किसी ने उन्हें छुआ तक नहीं ..जाहिर है लोग दीवाली जगाने में भी अब लापरवाही बरत रहे हैं :) 
 आतिशबाजी आसमानी

घर को सजाने में भी बाल टीम जुटी रही ...और बाल रामलीला के कलाकारों के  मेकअप को बेहद कम समय  के बावजूद प्रियेषा ने निपटाया......मेरे शंखनाद से बाल रामलीला शुरू हुई..मैंने मुख्य दृश्यों के समय रामचरित मानस के सुसंगत अंशों का सस्वर पाठ भी किया ...काफी ग्राम्य जन जुट आये थे इस नए अचरज को देखने सुनने ...अगले वर्ष से इस कार्यक्रम को व्यवस्थित रूप देना है ....प्रियेषा को दिल्ली जल्दी लौटना था इसलिए हम दीवाली के दूसरे दिन जिसे यहाँ जरता परता कहा जाता है और जिसमें कहीं आना जाना निषेध भी है ..यहाँ लौट आये हैं ....और झेल भी रहे हैं ..


और यह रही इस बार की रंगोली जो प्रियेषा और स्वस्तिका ने मिल बैठ  बनाई 


मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

महारास की रात

आज शरद पूर्णिमा है मतलब क्वार (आश्विन ) माह की पूर्णिमा -स्निग्ध खिली खिली चांदनी पूरी रात ....गुलाबी जाड़े का संस्पर्श और खिली चांदनी आखिर क्यों न श्रृंगारिकता का उद्रेक करे ...फिर तो यही महारास भी होना था कृष्ण का ..दुग्ध धवल चांदनी में  काले गिरधारी का चेहरा निश्चय ही गोपियों को साफ़ शफ्फाक दिखता होगा और प्रेम आसक्ति का भाव गाढ़ा होता होगा ..कहते हैं इसी दिन ही रास नहीं कृष्ण महारास रचाते थे -रास में तो वे केवल राधा के साथ होते, महारास समस्त प्रेम विह्वल गोपियों का आह्वान था ....आज की चांदनी देखिये तो आपको खुद लग जाएगा कि महारास की यही तिथि क्यों चुनी गयी होगी -यह प्रेम का स्फुरण और उत्प्रेरण है ..मिलन का आमंत्रण है!



फेस बुक पर यह महारास आयोजित हो गया है ...ब्लॉग जगत न जाने क्यों रीता रीता सा है ...रास पूर्णिमा को भी यहाँ घनी कालिमा छाई हुयी है ....सोचा तनिक चेता दूं रसिक जनों को ..... :) ज्योतिषी कहते हैं कि केवल आज की रात चन्द्रमा सभी सोलह कलाओं से युक्त होते हैं जैसे वे भी नायक नायिका के अटल प्रेम को अपनी सम्पूर्णता में निरख रहे हों ....बड़ी मान्यताएं है आज के रात की ....कहते हैं चाँद आज रात भर अमृत वर्षा करता है ..सोम नाम चन्द्रमा का इसलिए ही है ...चिर जीवनीय गुणों से युक्त औषधियां इसी अमृत वर्षा से और भी गुणकारी हो उठती हैं ...अब इतने गुणकारी अमृत वर्षा को लक्ष्य कर ही वैदिक ऋषि ने कहा होगा ....तस्मै सोमाय हविषा विधेम .....यही अमृत संचित कर सेवन कर लेने के लिहाज से यह भी परम्परा है कि रात में खीर बनाकर चांदनी में रखा जाय और फिर रसास्वादन कर  आरोग्यता लाभ लिया जाय ..मैंने गृहिणी जी को इस व्यवस्था के लिए कह दिया है ..अब अनुष्ठान प्रिय तो मानव है ही और इसमें सुस्वादु खीर खाने का जुगाड़ भी है ....वैसे तो गृहिणी ना नुकर भी करतीं मगर शरद पूर्णिमा का महात्म्य बताने पर सहर्ष तैयार हो गयी हैं ....अच्छी गृहणियां ऐसी ही होती हैं न ..... :)

शरद पूर्णिमा का महारास 
कहीं कहीं व्रत भी रखते हैं -जिसे कौमुदी व्रत कहते हैं -कौमुदी चांदनी की पर्यायवाची है ....विधान यह भी है कि खीर बनायी जाय और उसी के साथ बैठा भी जाय ....रास ,महारास  के साथ रस भोग  भी  ....चांदनी में सूई में धागा भी पिरोया जाय .....पता नहीं इनमें से आप की तैयारी कुछ है भी या नहीं ..अभी भी समय है कुछ जुगाड़ कर सकते हैं ....मान्यता यह भी कि रात में लक्ष्मी जी गश्त लगाती हैं और देखती हैं कौन जग रहा है और उसे धन धान्य से परिपूर्ण कर देती हैं ...महारास  भी धन धान्य भी ..और चाहिए भी क्या? अब लक्ष्मी भगवती का यह देखना कि कौन जाग रहा है इस महारास पर्व को कोजागर पर्व  नाम भी दे गया है ...



अब कुछ ज्यादा लिखने लग गया तो आप को फिर सारे इंतजाम का मौका नहीं मिलेगा और अक्लमंद को इशारा ही काफी होता है ..क्या समझे? 

बुधवार, 31 अगस्त 2011

मैकडानेल माल में मियाँ मुहम्मद आजम से मुलाक़ात

आज ईद के त्यौहार का खुशनुमा माहौल चारो  ओर था ..खुशियाँ उमड़ी पड़ रही थीं ..बहुत अच्छा लग रहा था..बेटी ने भी इस खुशी को अपने तरीके से सेलिब्रेट करने के लिए मुझसे  निकट के माल में चलने की खुशामद की ....वहां भी भीड़ उमड़ी पड़ रही थी ..चारो ओर उमंग और खुशियों से लबरेज दृश्य ..सचमुच ईद एक ऐसा ही त्यौहार है ....बेटी ने मैकडानेल से कुछ खाने का आर्डर दिया ..वही सब जंकी स्टफ ..बच्चों का टेस्ट भी कैसा है -मगर वे कहाँ मानते हैं ....लिहाजा बर्गर ,कोल्ड ड्रिंक्स मैक पिजा वगैरह ...मैं भी बेटी का मन रखने को साथ दे रहा था -रेस्तरां में बहुत भीड़ थी ...ईद के रंग  मैकडानेल के संग! ओर तभी मैंने महसूस किया कि मेरे पीछे की कुर्सी पर बैठा एक ५-६ साल का बच्चा बड़ी चाहत से बिटिया के कोल्ड ड्रिंक को निहार रहा है ....जब हम कुर्सी पर बैठ रहे थे तो लगा कि वह एक समूह के साथ है ..मैंने फिर चेक किया ..सचमुच उसकी आँखे ललचाई सी थीं ...मतलब साफ़ था ..वह अकेला था ओर उसके पास पैसे भी नहीं थे शायद! मैंने उससे पूछा बेटे तुम्हारा नाम क्या है? मुहम्मद आजम ..उस भोली सूरत के होठ बुदबुदाए .....क्यों तुम्हारे साथ कोई आया नहीं क्या? नहीं ..बड़ी मायूसी थी उसके जवाब में ....मैंने पूछा कुछ खाओगे ..उसने हसरत से जवाब दिया -हाँ ....और कोल्ड ड्रिंक की भी फ़रियाद कर दी ....मैंने उसकी इस छोटी सी साध को तुरंत आज्ञाकारी जिन की तरह पूरा कर दिया ...ईद की मुबारकबाद दी और हम वहां से चले आये ..

.नन्हे मियाँ मुहम्मद आजम 
अब लौटने पर जो टिप्पणियाँ मिलीं वे बड़ी मिली जुली सी थीं ...नहीं करना चाहिए था यह ..कुछ लोगों ने पेशा बना लिया है ..बच्चों से भीख मंगवाते हैं ..हो न हो वह पाकेटमार रहा हो ..हद है ईद का दिन ..एक नन्हे मियाँ ..हम उन्हें एक सबसे न्यारे और प्यारे त्यौहार पर छोटी सी गिफ्ट न दे सके तो लानत है हमारी मानवीय संवेदना पर ..मैं तो आज उसके  चेहरे के संतोष को देखकर अपनी ईद मानो मना ली ...नन्हे मियाँ पूरी तरह नए परिधान और खूबसूरत जूते में नमूदार थे वहां ..मुहल्ले की भीड़ के साथ मैकडानेल में आ गए थे..मगर खलीता तो खाली था सो मायूस से बैठे थे ..बहरहाल अल्लाह मियाँ ने इन नन्हे मियाँ की सुन ली .....

मैं यह पोस्ट इसलिए लिख रहा हूँ कि हम कर सके तो ऐसा करना चाहिए और नेकी कर दरिया में डाल के भाव से करना चाहिए -यह कोई आत्म प्रचार नहीं है -यह आप सबसे अपेक्षा है ....ऐसा पुण्य आपको मंदिर मस्जिद में जाने से भी नहीं मिलेगा ..कभी मौका मिले तो चूकिएगा नहीं -और नसीब वालों को{ :) } ऐसे मौके मिलते ही रहते हैं ....

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

कान्हा जब धरती पर अवतरित हुए तो बैकुंठ खाली हो गया.......

जन्माष्टमी करीब आ गयी है ...इससे जुडी खरीददारियां शुरू हो गयी हैं .शिशु  कान्हा के पहनने के लिए नन्हे नन्हे झिंगोला दुपट्टा ,मुकुट ,बांसुरी ,मोरपंख सभी बाजारों में बरबस ही आकर्षित कर रहे हैं .मेरे यहाँ भी ये खरीददारी हो गयी है ....इन सामानों से किशन कन्हैया के जन्मोत्सव की झांकी सजाई जायेगी ....बनारस में अब वैष्णवों का भी बोलबाला है यद्यपि मूलतः यह प्राचीनतम नगरी शैवों की रही है .शिव भक्ति यहाँ की मूल संस्कृति में रची बसी है -यह तो बाबा तुलसीदास का चमत्कार कहिये कि उन्होंने राम और शिव का ऐसा अन्योनाश्रित सबंध स्थापित कर दिया कि वैष्णवों को शिव सुहाने लगे और शैवों के लिए राम भी आराध्य बन गए ....
झांकी का ताम झाम और हसरत से देखता बच्चा 
कहते हैं जहां भगवान राम महज आठ कलाओं से युक्त थे कान्हा सभी सोलह कलाओं के साथ जब धरती पर अवतरित हुए तो बैकुंठ खाली हो गया ....क्योकि अपने सम्पूर्ण रूप में विष्णु कान्हा का रूप ले धरती पर आ गए ....साम दाम दंड भेद सभी की सभी चालों से युक्त थे कृष्ण .....छलिया थे,रसिया थे ,रणछोड़ थे, सब कुछ थे ....परकीया प्रेम में आसक्त रहे ,भोली भाली गोपियों को छला,महाभारत के दौरान -युद्ध क्षेत्रे धर्म क्षेत्रे कितने ही अर्ध सत्य बोले ,शत्रु दमन के लिए झूठ तक का सहारा लिया किन्तु तब भी हर दिल अजीज बने रहे ...

.कभी कभी सोचता हूँ भगवान राम   बिचारे सीता के निर्वासन की एक गलती कर आलोचना के पात्र बन गए ...उन्हें आम लोगों ने ही नहीं कविजनों तक ने नहीं बख्शा .....मगर कृष्ण को जन मानस कभी शायद ही कोई कोसता हो ....उत्तर राम काल में राम को दीवानगी की हद तक शायद ही किसी ने चाहा हो मगर कृष्ण की दीवानगी की एक झलक तो बावरी मीरा में ही देखी जा सकती है ...बिचारे राम!कृष्ण कूटनीति में माहिर थे....राम को केवल रघुकुल की रीति का सम्मान ही सर्वोच्च था ...वे वचन पर दृढ थे मगर अपने छलिया महराज सब तरह के कूट -प्रपंच में माहिर ....प्रत्यक्ष रूपवती सूर्पनखा के प्रति राम तुरंत अलेर्जिक हो उठते हैं ..कृष्ण ने कितनों को उपकृत किया यह सूचीबद्ध करने की किसी को भी सूझा तक न हो -पटरानियों ,रानियों के साथ उनका द्वारिकापुरी का अन्तःपुर श्री संमृद्धि से भरापूरा था ..
नन्हे कान्हा के नन्हे नन्हे लिबास 

कृष्ण ज्यादा आधुनिक लगते हैं .....लोक मानस  ने उनके साथ ज्यादा तादाम्य बना लिया ....राम जहां आराध्य ही बने रहे वहीं कृष्ण के प्रति लोगों में सखा भाव संचारित होता रहा ....कृष्ण से बढ़कर भला कौन तारणहार हो सकता है ? गज को ग्राह से मुक्त किया ....सुदामा का दारिद्रय दूर किया ,द्रोपदी की ऐन वक्त पर लाज बचा ली -यह सखत्व भाव किसी और देव में नहीं दीखता .....अपनी इसी लोकगम्यता के कारण ही कृष्ण  जन जन के ज्यादा करीब हैं ,मित्रवत लगते हैं ,ज्यादा सामजिक और अपने से हैं ....

कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएं ! 




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