सोमवार, 31 दिसंबर 2012

जिस वाहन में थे वे नरपिशाच वही उनकी चलती फिरती टेरिटरी थी!


किसी एक की पीड़ा जब पूरी कायनात की पीड़ा बन जाय ,करोड़ों आँखें नम हो उठें ,लगे कि कोई अपना ही बीच से उठ चला गया हो,जन जन के मन संवेदित हो उठे हों और ह्रदय क्लांत हो तो कैसे कह सकते हैं इंसानियत मर गयी -यही संवेदनशीलता ही तो मनुष्य को पशुओं से पृथक करती है -आज मानवीय संवेदना के उमड़े घहराते समुद्र ने हमें एक अदृश्य बंधन से जोड़ दिया है -जब तक यह मानवीय संवेदना जीवित है मनुष्य को कोई खतरा नहीं है -चंद नराधम कैसे इंसानियत को दागदार कर सकते हैं?

नराधमों के वहशियाना कृत्य के बाद हमने एक इतिहास को आँखों के सामने से गुजरते देखा है। बर्बरता के विरुद्ध जन सैलाब सड़कों पर उतरा -यह दुष्कृत्य मनुष्य की उसी पशुवीय हिंस्र वृत्ति की परिचायक है जो हमारे पशु -अतीत को बयान करती है और रेखांकित करती है कि बिना उचित संस्कार और नैतिकता के आग्रह के कैसे मनुष्य के भेष में आज भी कुछ आदमखोर हमारे साथ ही रह रहे हैं। इसलिए संस्कारयुक्त शिक्षा, आरम्भिक सही सीख,उचित अनुचित का बोध हर बच्चे को दिया जाना हमारी और राज्य की साझा जिम्मेदारी है . हमारे इसी समाज में कितने नर पिशाच रहते आये हैं, इसके हेतु को संस्कृत का कवि पहले ही स्पष्ट कर गया है -

येषाम न विद्या न तपो न दानम ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः
......ते मृत्युलोके भुविभारभूता मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति! 
(जो विद्या, तप , दान ज्ञान शील और गुण धर्म से रहित है वह इस मृत्युलोक में धरती पर भार स्वरुप है और मनुष्य के रूप में पशु ही है!)
ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती ही गयी है -ये संस्कारित लोग नहीं है -हिंस्र पशु है बस मनुष्य होने का धोखा हैं -इनसे सावधान रहने की जरुरत है!और यही आत्मरक्षा (सेफ्टी फर्स्ट) के प्रति सतर्क रहने की जरुरत है ,घोर जंगल में बिना होशियारी निर्द्वन्द्व विचरण कोई बुद्धिमानी नहीं है -सहज विश्वास ही विश्वासघात के मूल में है . आज बड़े बड़े शहर भी जंगल सरीखे हैं क्योंकि किसी का किसी से कोई वास्ता नहीं है -सब अजनबी हैं-इम्पर्सनल! अजनबीपन पशुओं में कबीलाई मानसिकता ,आक्रामकता को पोषित करता है . टेरिटोरियलिज्म को बढ़ावा देता है . हिंस्र पशुओं का मनुष्य रूपी झुण्ड बेख़ौफ़ बड़े शहरों में विचरण कर रहा है -हमारे बच्चे इस बात को क्यों नहीं समझ पा रहे हैं? घृणित घटना में वे नरभक्षी जिस वाहन में थे वही उनकी चलती फिरती  टेरिटरी थी -नहीं लिफ्ट लेना था उन बच्चों को उसमें! माना कि सहज विश्वास और भरोसा मानवीय गुण हैं मगर हमारे पास एक तर्कशील दिमाग भी तो है . बहरहाल आगे हमारे बच्चे सीख लें। 
एक बात और -इस घटना से उमड़े जन आक्रोश में क्या पुरुष क्या नारी सभी समवेत रूप से सम्मिलित थे -जे एन यू के बच्चों ने  इस बड़े जन आन्दोलन की अगुयायी की -उन्हें सलाम! युवाओं के उस भीड़ के आर्तनाद में लड़कियों के साथ लड़कों का भी स्वर बुलंद था। लडके भी उतने ही मर्माहत थे। इसे नारी पुरुष के चश्में से देखा जाना मनुष्यता का अपमान है . दिवंगत हुयी दामिनी एक लडकी ही नहीं बेटी, बहन ,मित्र थी हम सभी की -घोर कष्ट सभी को है . ये घटनाएँ हमारी समूची संवेदना को झकझोरती हैं . मनुष्य की संवेदना को नारी पुरुष के खांचे में बाटने का मतलब है हम अपने अभियान को कमजोर कर रहे हैं। इन दोषियों को तो कैपिटल दंड मिलेगा ही -आगे ऐसे क़ानून बनने का रास्ता भी दिख रहा है जिससे ऐसी भर्त्सनीय प्रवृत्तियों पर प्रभावी अंकुश लग सके . अपराध की गहनता को देखते हुए उम्र कैद या फांसी का प्रावधान ही समीचीन लगता है-रंगा बिल्ला काण्ड में ऐसा ही हुआ था . रासायनिक बंध्याकरण आदि के प्रस्ताव हास्यास्पद हैं-इनकी सफलता संदिग्ध है -आपराधिक प्रवृत्तियाँ कई बार जीनिक होती हैं -अतः अंग विशेष के निर्मूलन से कोई फर्क नहीं पड़ेगा बल्कि रिडाईरेक्टड हिंसकता और भी प्रबल हो सकती है -ऐसे अपराधिक वृत्ति वाले समाज में विचरण न करें तभी बेहतर!
भारत में उमड़े जन सैलाब ने समूचे विश्व में साबित कर दिया है कि मानवीयता जिन्दा है और मनुष्य की कौम सर्वोपरि है -आज साझा सरोकार की हमारी यही खासियत हमें आश्वस्त कर रही है और नए वर्ष में नए आशा और विश्वास के साथ हमारे दरवाजे पर दस्तक दे रही है -युवाओं निराश न हो -नया वर्ष आप सभी के स्वागत में बाहें पसारे आ पहुंचा है -जीवन भले ही हार गया हो हमारी जिजीविषा बरकरार है -उत्तिष्ठ, जागृत, प्राप्य वरान्निबोधत।' 'उठो, जागो और अपना लक्ष्य प्राप्त करो।' 
स्वाभिमान और शौर्य की प्रतिमूर्ति बन गयी दामिनी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि! 
आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं -नया वर्ष  हमें जीवन के प्रति नयी आशा और विश्वास से भरे, यही कामना है! 


मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

शंख बोली बलाय टली ...

दिल्ली की घटना ने सहसा इतना दुःख संतप्त और दिमाग को कुंद कर रखा था कि कुछ लिखने पढने का मन ही नहीं हुआ -ज्यादातर वक्त टीवी देखते गुजरा ,जिसने मन को निरंतर और भी विक्षुब्ध किया। मानवता को शर्मसार करते  एक घिनौने जघन्य कृत्य की जिम्मेदारी न लेकर उसके विरोध में सहज ही सड़कों पर उतर आये छात्र छात्राओं और अभिभावकों पर पुलिस का निर्मम बल प्रयोग दिल को सालता रहा . अब आशा बंधी है कि यौन अत्याचार पर प्रभावी अंकुश लगाने की दिशा में कुछ ठोस कार्यवाही हो सकेगी .और इस सोच ने मुझे और भी प्रफुल्लता से शंख ध्वनि के लिए प्रेरित किया . मैं प्रति दिन गीता के पांच श्लोकों के पाठ पूरा होने पर शंखनाद करता हूँ। कुछ एक अनुष्ठान की पारम्परिक प्रक्रिया के  तहत तो कुछ फेफड़ों के स्वास्थ्य के लिए .
शंख एक अद्भुत आदि -नैसर्गिक वाद्य यंत्र है . आप सभी जानते ही हैं कि यह वस्तुतः बिना रीढ़ के मोलस्क संघ   का समुद्री प्राणी है जो  इस मजबूत खोल में अपनी रक्षा करता है . हिन्द महासागर में पाया जाने वाला शंख - टरबिनेला पायिरम( Turbinella pyrum )  धार्मिक अनुष्ठानों का शंख है .

शंख वादन को  आदि मानवों ने शुरू किया होगा -अपने आस पास के घने जगंलों से खतरनाक पशुओं को दूर रखने के लिए . आग और शंख ध्वनि ही उन प्राचीनतम उपायों में रहे होंगें जिनसे आदि मानवों ने हिंस्र पशुओं से अपनी रक्षा की होगी -बाद में कई दूर तक मार करने वाले अश्त्र शस्त्र -धनुष ,भाले बरछे भी ईजाद  हुए होंगें . कह सकते हैं मनुष्य की आत्मरक्षा में शंख का योगदान प्राचीनतम है। मनुष्य की कल्पनाशीलता और कला प्रियता ने शंख के कई और भी उपयोग कालांतर में ढूंढ निकाले। धर्मयुद्धों के पूर्व शंखनाद की एक परिपाटी ही बन गयी . भारत वर्ष के सबसे बड़े युद्ध महाभारत की शुरुआत ही महा शंखनाद से हुयी -पांचजन्य हृषीकेशो देवदत्तं धनंजय : पौंनड्रम   दध्मौ महाशंखम भीमकर्मा वृकोदरः मतलब श्रीकृष्ण ने पांचजन्य ,अर्जुन ने देवदत्त ,भीमसेन ने पौण्ड्र नामके शंख बजाकर धर्मयुद्ध की घोषणा कर दी . फिर तो शंखों के नाद की एक श्रृखला ही शुरू हो गयी ...युधिष्ठिर ने अनंत विजय और नकुल सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामके शंख बनाए -फिर तो अनेक योद्धाओं ने अपने अपने शंख बजकर तुमुल घोष किये।
शंखनाद! 

कालान्तर  में यजमानी वाले पुरोहित  पंडितों ने इसे अपना कुल वाद्य यंत्र ही बना लिया और हर कथा वार्ता के अंत में शंखनाद करना आरम्भ किया . सत्यनारायण व्रत कथा के हर अध्याय की सम्पूर्ति पर शंख बजाने का चलन है . हमारे कुल पुरोहित  पंडित जी के पास एक पुश्तैनी शंख हैं,वह कई पीढ़ियों से उनके  पास है .  सत्यनारायण संतोषी माँ सरीखे काफी बाद के अन्वेषित देवता है और विष्णु   के स्वरुप लगते हैं .विष्णु  को शंख बहुत प्रिय है . उनके एक हाथ में शंख है -सशंख चक्रम  सक्रीट  कुण्डलं... हमलोग शंख की आवाज सुनकर  बचपन में भोग- प्रसाद और चरणामृत लेने पूजा स्थल पर पहुँच जाते थे , लोकजीवन में शंखनाद शुभ, कुशल क्षेम के आगत  का प्रतीक है . राबर्ट्सगंज के मेरे नए पड़ोसी 90 वर्षीय वृद्ध मेरे शंख बजने पर खुश होकर बोल पड़ते हैं -शंख बोली बलाय टली ...

मैंने भारत के समुद्र तटीय धार्मिक स्थलों जैसे रामेश्वरम ,कन्याकुमारी,पुरी अदि की यात्रा पर वहां से शंख खरीदे हैं और पंडितों को शंख -दान किये हैं जिन्हें उन्होंने प्रफुल्लित होकर स्वीकार किया है . शंख केरल का राज्य प्रतीक चिह्न ऐसे ही नहीं बनाया गया है . भारत में अब फिर से एक बार तुमुल शंखनाद आरम्भ हो गया है -निहितार्थ आप सुधीजन समझ ही रहे होंगें -इसी तुमुल नाद में एक कोमल स्वर मेरा भी है!  

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

वे उधार लेने वाले :-(

ब्लॉग अपनी पर्सनल डायरी है न ? हाँ भाई हाँ! हाँ, यह बात अलग है लिखने वाला चाहे तो इसे सार्वजनिक कर दे या ना भी करे,मगर ब्लॉग तो अब ज्यादातर सार्वजनिक ही हो चले हैं। वैसे  ज्यादातर होते ये ब्लॉगर के खुद अपने बारे में ,उसकी सनकों के बारे में, उसके स्वभाव और उपलब्धियों के बारे में यानि बहुत कुछ खुद अपने ही बारे में -मैं ऐसा हूँ ,ऐसा ही हूँ, मैं ऐसा क्यों हूँ? मैं वैसा क्यों नहीं हूँ -हम सभी छुपे ,प्रत्यक्ष या बेशर्मी के साथ सेल्फ प्रमोशन भी करते फिरते हैं -देखो देखो मैंने ये बड़ा तीर मार लिया है। मैंने फला को पटा  लिया है ,फला को धूल चटा दिया है आदि आदि। 

आज मैं भी अपनी एक वह बड़ी महारत जो हासिल कर रखी है बताना चाहता हूँ , मैंने अब तक के अपने जीवन में कभी किसी से उधार नहीं माँगा है,भले ही बड़ी ही विषम स्थितियां रही हों मैं उधार मांग ही नहीं सकता -उधार मुझे व्यक्ति की  गरिमा को गिराने वाली बात लगती है -मेरा कान्सेंस अलाऊ ही नहीं करता . मैं बचपन से ही ऐसा हूँ . पैसा नहीं मांग सकता किसी से ..नहीं नहीं मैं बोस्ट  नहीं कर रहा अपनी एक आदत बता रहा हूँ और उस परम शक्ति का आभार भी कि अभी तक तो ऐसे ही निर्वाह होता गया है . मुझे याद है जब नयी नयी नौकरी मिली थी पगार बड़ी कम थी। पत्नी को नौकरी के शुरू शुरू से ही साथ में रखता रहा हूँ। लखनऊ की पहली पोस्टिंग थी ,,बस हैण्ड टू माउथ मामला था ...एक बार घर (जौनपुर ) आना था तो किराए के पैसे ही कम पड़ने की नौबत आ गयी,हमारी आदत शुरू से ही फुटकर पैसे गुल्लक में डालने की है। कोई रास्ता न निकलते देख गुल्लक से फुटकर पैसे गिनने की नौबत आ गयी -तब पांच और दस पैसे भी चलते ही नहीं दौड़ते थे ....गिना गया कुल पच्चीस रुपये निकल गए ....पचास तो पहले से ही था ..अब हम अचानक रईस हो गए थे .शान से बस पकड़ी और कुल पचहतर रुपये में दोनों जने  जौनपुर कुछ मुंह भी हिलाते डुलाते आ पहुंचे।एक दो रुपये बचे भी थे। 

हम भले ही किसी से उधार न मांगते हों मगर मैंने उधार मांगने वालों की एक लम्बी भीड़ अपने आज तक के जीवन में देखी है . एक सज्जन तो मुझे ऐसे मिले जो उधार मांगने के कई गुर में निष्णात थे ,मुझे बताते भी थे और मेरे किसी काम के न होने के बावजूद भी मैं उनके तौर तरीके को हिकारत से सुनता था . एक तो यही कि उधार कभी भी भूमिका बाँध कर नहीं माँगना चाहिए नहीं तो सामने वाला सावधान हो जाता है , उधार हमेशा अचानक ,हडबडी और औचक -बेलौस  माँगना चाहिए जिससे अगले को सेकेंड थाट का मौका ही न मिले और वह इनकार न कर पाए .मतलब यह कि उधार माँगना एक कला है और कुछ लोग इसमें पारंगत होते हैं -वे आपकी मानवता तक को ललकार सकते हैं .और यह भी अहसास दिला सकते हैं कि एक दुखिया की मदद न करके आप परले दर्जे के कमीने बन गए हैं . मेरे पिता जी जी उधार दे देकर थक पक  गए थे,दुनिया छोड़ गए उनके दिए उधार वापस नहीं हुए . मैं उनको कभी कभी बड़ा विवश देखता था -मेरे ही तरह सरल ह्रदय :-) थे और इसका फायदा उठाकर उनसे उधार मांगने वालो का तांता लगा रहता ..लेकिन उन्हें धक्का तब पहुंचता जब ज्यादातर उन्हें उधार वापस न करते, बार बार मांगने के बावजूद . मैं उन्हें बड़ा अपसेट देखता था . और उनके अनुभवों ने मुझे अपना एक सिद्धांत बनाने और उस पर कायम रखने को मजबूर किया ,

चार्वाक नाम के एक दार्शनिक हुए हैं जिन्होंने उधारी को प्रोत्साहित करके एक परम्परा की नींव ही डाल  दी मानो -मगर वह समय सूदखोरों महाजनों का था -लोग सुतही (आन इंटरेस्ट ) पैसे बाटते थे और अनाप शनाप व्याज लगा कर वसूली करते थे -इस काम में तब के पुरोहित पंडित भी ऐसे महाजन के मददगार होते थे -जो पैसा वसूलने के नाम पर तरह तरह के हथकंडे -स्वर्ग नरग और अगले जन्म तक की देनदारी के भय दिखाते थे ...चार्वाक ने ऐसे समय लोगों को सीख दी-यावत्जीवेत सुखं जीवेत ऋणं कृत्वा घृतं पीबेत , भस्मा विभूतस्य शरीरस्य पुनरागमनम  कुतः  -अरे, शान से उधार लेकर देशी घी पियो यानि मौज मस्ती करो ..कहाँ पैसे वापस करोगे और यह भी न घबराओ कि अगले जन्म में देना पड़ सकता है-यह शरीर एक बार भस्म हुआ तो फिर  कहाँ लौटना? लगता है उधार मानने वाले इन्ही चार्वाक महाभागा के ही अनुयायी हैं जो आज संदर्भ प्रसंग बदल जाने के बाद भी बेशर्म होकर कारज अकारज उधार मागंते फिरते हैं .

मैं किसी को उधार नहीं देता बल्कि यथाशक्ति मदद करता हूँ . और वह भी अपवादों को छोड़कर केवल पहली बार  की ही मदद .लोग मुझसे  उधार मांगते हैं तो मैं  उन्हें उधार नहीं देता मदद कर देता हूँ जो कर सकता हूँ मगर इस हिदायत के साथ कि मैं जो पैसे दे रहा हूँ वापस नहीं लूँगा और दुबारा  दूंगा भी नहीं . मैंने कुछ दिलदार लोगों को भी देखा है वे इस शर्त के बाद उधार, जो वस्तुतः उधार नहीं रह जाता लेते ही नहीं ....(किसी और से ले लेते होंगे) ..अंतर्जाल के अनुभव भी कुछ अलग नहीं है . एक उधार का ऐसा मामला आया कि उन्हें कुत्ते का पिल्ला /पिल्ली लेना था उधार माँगा दे दिया .....उन्होंने बाद में वापसी की पेशकश की तो मैंने  ठुकरा दिया ...कहा  अब मत मांगिएगा , आप भी अपने अनुभवों से मुझे धन्य करियेगा तो मैं इस विषय पर एक ठोस और संतुलित दृष्टिकोण अपना सकूंगा . कुछ तो हुआ है आज जो यह पोस्ट सहज ही लिखा उठी ....
यह पोस्ट इस लिए भी लिख दी ताकि सनद रहे और हर बार मुझे यह सब तफसील से इक्स्प्लेंन न करना पडा करे -लोग बाग़ यह समझने लगते हैं कि मैं बहाने बना रहा हूँ -मैं उधार नहीं देता ......

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

अखंड प्रेम का एक खंडित प्रतीक - लोरिक पत्थर( सोनभद्र -एक पुनरान्वेषण यात्रा, 2 )

राबर्ट्सगंज से शक्तिनगर मुख्यमार्ग पर मात्र 6 किमी पर एक विशालकाय दो टुकड़ो में खंडित पत्थर जिस पर वीर लोरिक पत्थर लिखा है यात्रियों  -पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर सहज ही आकर्षित करता है। मुझे भी इसके बारे में जिज्ञासा हुयी . जो कुछ जानकारी मिली आपसे अति संक्षेप में साझा कर रहा हूँ क्योकि इस पत्थर से जुड़ा  आख्यान वस्तुतः हजारो पक्तियों की गाथा लोरिकी है जिसे यहाँ के लोक साहित्यकार डॉ अर्जुन दास केसरी ने अपनी पुरस्कृत कृति लोरिकायन में संग्रहीत किया है . उत्तर प्रदेश में आल्हा के साथ ही लोरिकी एक बहुत महत्वपूर्ण लोकगाथा है .कहते हैं संस्कृत की मशहूर कृति मृच्छ्कटिकम  का प्रेरणास्रोत लोरिकी (लोरिकायन) ही है। पंडित जवाहरलाल नेहरु ने डिस्कवरी आफ इंडिया में लोरिकी का उल्लेख किया है।पश्चिमी विद्वानों में बेवर ,बरनाफ ,जार्ज ग्रियर्सन आदि ने भी लोरिकी पर काफी कुछ लिखा है।

लोरिक दरअसल एक लोकविश्रुत नायक हैं जो बहुत बलशाली और आम जन के हितैषी के रूप में इस क्षेत्र में विख्यात हैं . उनका जन्म बलिया जनपद के गऊरा गाँव में होना बताया गया है। उनके काल निर्धारण को लेकर बहुत विवाद है -कोई कोई विद्वान् उन्हें ईसा  के पूर्व का बताते हैं तो कुछ उन्हें मध्ययुगीन  मानते हैं . यह भी कहा जाता है लोरिक की वंशावली राजा भोज से मिलती जुलती है। लोरिकायन पवांरो का काव्य माना जाता है और पवारों के वंश में (1167-1106) ही राजा भोज हुए थे। बहरहाल लोरिक जाति  के अहीर (आभीर ) थे जो एक लड़ाकू जाति(आरकियोलोजिकल  सर्वे आफ इंडिया रिपोर्ट  ,खंड आठ ) रही है। 
जनश्रुतियों के नायक लोरिक की कथा से सोनभद्र के ही एक अगोरी(अघोरी?)  किले का गहरा सम्बन्ध है ,यह किला अपने भग्न रूप में आज भी मौजूद तो है मगर है बहुत प्राचीन और इसके प्रामाणिक इतिहास के बारे में कुछ जानकारी नहीं है ,यह भी ईसा पूर्व का है किन्तु दसवीं शती के आस पास  इसका पुनर्निर्माण खरवार और चन्देल राजाओं ने करवाया। अगोरी दुर्ग के  ही नृशंस अत्याचारी   राजा मोलागत से लोरिक का घोर युद्ध हुआ था . कहीं कहीं ऐसी भी जनश्रुति है कि लोरिक को तांत्रिक शक्तियाँ भी सिद्ध थीं और लोरिक ने अघोरी किले पर अपना वर्चस्व कायम किया . अपने समय का तपा हुआ ,अत्यंत क्रूर राजा मोलागत लोरिक द्वारा पराजित हुआ , और इस युद्ध का हेतु एक प्रेम कथा बनी थी -लोरिक और मंजरी (या चंदा? ) की प्रेम कथा।

अगोरी के राजा मोलागत के अधीन ही महरा नाम का अहीर रहता था . महरा की ही आख़िरी सातवीं संतान थी मंजरी जिस पर मोलागत की बुरी नजर पडी थी और वह उसे महल में ले जाने का दबाव डाल  रहा था। इसी दौरान उसके पिता महरा को लोरिक के बारे में जानकारी हुई और मंजरी की शादी लोरिक से तय कर दी गयी . लोरिक को पता था कि बिना मोलागत को पराजित किये वह मंजरी को विदा नहीं करा पायेगा। युद्ध की तैयारी के  साथ बलिया से बारात सोनभद्र के मौजूदा सोन(शोण)  नदी तट  तक आ गयी । राजा मोलागत ने तमाम उपाय किये कि बारात सोन को न पार कर सके ,किन्तु बारात नदी पार  कर अगोरी किले तक जा पहुँची ,भीषण युद्ध और रक्तपात हुआ -इतना खून बहा कि अगोरी से निलकने वाले नाले का नाम ही रुधिरा नाला पड़ गया और आज भी इसी नाम से जाना जाता है ,पास ही नर मुंडों का ढेर लग गया -आज भी नरगडवा नामक   पहाड़ इस जनश्रुति को जीवंत बनाता खडा है .कहीं  शोण (कालांतर का नामकरण सोन ) का नामकरण भी तो उसके इस युद्ध से रक्तिम हो जाने से तो नहीं हुआ? 
अघोरी किले का एक मौजूदा दृश्य 

मोलागत और उसकी सारी सेना और उसका अपार बलशाली इनराव्त हाथी भी मारा गया -इनरावत हाथी का वध लोरिक करता है और सोंन  नदी में उसके शव को फेंक देता है -आज भी हाथी का एक प्रतीक प्रस्तर किले के सामने सोंन  नदी में दिखता है। लोरिक मोलागत और उसके कई मित्र राजाओं से हुए युद्ध के  प्रतीक चिह्न किले के आस पास मौजूद है .जिसमें  राजा निर्मल की पत्नी जयकुंवर   का उसके पति के लोरिक द्वारा मारे जाने के उपरान्त  उसके  सिर  को लेकर सती होने के प्रसंग से जुड़ा एक बेर का पेड़ सतिया का बेर और युद्ध के दौरान ही बेहद  निराश मंजरी द्वारा कुचिला का फल (जहर ) खाने का उपक्रम करना और उसके हाथ से लोरिक का कुचिला का फल फेक देना और आज भी केवल  अगोरी के इर्द गिर्द ही कुचिला के पेड़ों का मिलना रोचकता लिए है। 

मंजरी की विदाई के बाद डोला मारकुंडी  पहाडी पर पहुँचाने  पर नवविवाहिता मंजरी लोरिक के  आपार बल को एक बार और देखने  के लिए  चुनौती देती है और कहती है कि वे अपने प्रिय हथियार  बिजुलिया खांड (तलवार नुमा हथियार) से एक विशाल  शिलाखंड को एक ही वार में दो भागो में विभक्त कर दें -लोरिक ने ऐसा ही किया और अपनी प्रेम -परीक्षा में पास हो गए -यह खंडित शिला आज उसी अखंड प्रेम की  जीवंत कथा कहती प्रतीत होती है -मंजरी ने खंडित शिला को अपने मांग का  सिन्दूर भी लगाया।  यहाँ गोवर्द्धन पूजा और अन्य अवसरों पर मेला लगता है -लोग कहते हैं कि कुछ अवसरों पर शिला का सिन्दूर  चमकता है -मैं फिर देखने का प्रयास करूंगा और प्रत्यक्ष कारण भी जानने की चेष्टा करूँगा . जब मैंने फोटो लिया तो शाम हो रही थी और मुझे कथित सिंदूरी चमक का  स्थान नहीं दिखा , लौटते वक्त इस पोस्ट का शीर्षक सहसा कौंध गया -अखंड प्रेम का खंडित प्रतीक! 

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

महफ़िल में इस ख़याल से फिर आ गया हूँ मैं :-)


मुझे  निकाल के कहीं पछता  रहे हों  न  आप 
महफ़िल में  इस ख़याल से फिर आ गया हूँ मैं :-)
यह शेर आज तब याद आया जब इस नए स्थान - राबर्ट्सगंज में नेट से कनेक्ट होने पर मुझे सहसा ब्लागिंग की सुधि आयी . इतना लम्बा अंतराल पिछले पांच वर्षों में किन्ही दो  पोस्ट के बीच नहीं हुआ था . जब गत 21 नवम्बर को सारे तामझाम, सर सामान और एक अदद धर्मपत्नी तथा  एक विदेशी नस्ल की कुतिया -पाम-स्पिट्ज(डेजी के साथ यहाँ बनारस से सरे शाम पहुंचा तो अंतर्जाल से लगभग  कट चुका था ..हाँ मोबाईल से/ का एक गर्भनाल सम्बन्ध अवश्य बना था मगर वह नाकाफी था .....लगा किसी सूनसान जनहीन द्वीप पर आ पहुंचा हूँ . कटे होने और गैर जुड़ाव की यह अनुभूति नयी किस्म की थी ....और यह सिलसिला लम्बा चला .नए स्थान पर अनुकूलन और व्यवस्थित होने की प्राथमिकतायें कुछ ऐसी रहीं कि विलासितापूर्ण ब्लागिंग के लिए कई मौका नहीं मिला . आते ही तेल नून लकड़ी के नवीन संस्करणों -गैस कनेक्शन ,आर ओ ,इनवर्टर ,दूधवाले ,अखबारवाले ,महरी की जुगाड़/व्यवस्था फिर डिश  टीवी कनेक्शन , बैंक खाता आदि  में ऐसा जी हलकान रहा कि हम अपना ही नहीं कई अन्य  पसंदीदा ब्लॉग फिलहाल भूल गए और साथ ही कई ब्लागरों को भी  ....मजे की बात वे ब्लॉगर भी मुझे भूल गए -हाँ कुछ फेसबुकिये  मित्र जरुर सम्बन्धों के आशा दीप टिमटिमाये रहे ......और मुझे नेट कनेक्ट करने के  तरीके बताते रहे .....फिलहाल  रिलायंस नेट कनेक्ट डाटाकार्ड एक जगहं से उधारी पर ले यह पोस्ट लिख रहा हूँ . हाँ खुद का अप्लाई कर दिया है ,एक हप्ते का वक्त लगना बताया गया है . 
नए स्थान पर जमने में अभी समय लगेगा ,नए लोग नए मिजाज। मगर लग अच्छा रहा है -पिछड़ा इलाका है तो लोगों की सरलता सहजता संदूषित नहीं हुयी है और खाने पीने के सामान भी अपेक्षया बहुत कम संदूषित  है ....पत्नी यहाँ के दूध और सब्जियों की मुग्ध भाव से प्रशंसा कर रही हैं .उनके विशेषाग्रह पर बचपन से ही दूध से नाक भौ सिकोड़ने वाला मैं भी यहाँ थोडा दूध पीने लगा हूँ -पियो  ग्लास भर दूध की तर्ज पर ......सब्जियों में निश्चय ही ताजगी भरा अलग सा स्वाद है . अब इतना सब इंतजाम होने के बाद बस ब्लागिंग की कमी रह गयी  थी सो वह भी आज से राह पर आ गयी -जिन्दगी की गाडी तेजी से पटरी पर लौटने लगी है . 
इस बीच केवल संतोष त्रिवेदी जी ने फोनियाया और हाल चाल पूछा .....कमाल के ब्लॉगर हैं वर्ना आज की इस भागमभाग की दुनिया में किसे किसकी फ़िक्र रहती है . गहन रिश्तों के वायदे करने वाले भी न जाने कहाँ मुकर  गए ....आप यहाँ तभी तक हैं जब तक हैं और दिख रहे हैं -अन्यथा कोई आपकी सुधि लेने वाला नहीं है .....नए ब्लागरों को यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए ....और अपेक्षाएं नहीं पालनी चाहिए ...अंतर्जाल आंनद के लिए कोई बैकुंठ नहीं है,असली दुनिया से भी इस मामले में गया गुजरा है . कितने मित्रों से इसलिए पहले से भी दुआ सलाम बंद है -और इन पांच साला ब्लागिरी में दुआ सलाम बंद वाली लिस्ट भी बढ़ती गयी है -कभी किसी ने कहा था क़ि आपकी आँखें बहुत गहराई  वाली सुन्दरता लिए हैं,किसी ने मेरी एक प्रोफाईल फोटो जो अब लगभग दस वर्ष पुरानी है मगर कहीं कहीं अब भी दिख जाती है -अरे वही सूट टाई वाली को देखकर मर मिटने का अभिनय किया था  :-) ....तब से सूट पहनना बंद ही कर दिया :-( ....किसी किसी ने  इमरजेंसी का तकाजा देकर कुछ इमदाद भी झटक लिया था ...वे सभी अब तटस्थ हो लिए हैं .....मगर यह सब मैं बनारस की गंगा मैया को समर्पित कर आया हूँ .....
सोनांचल में एक नयी ताजगी के साथ एक नयी ब्लागिंग पारी शुरू करते हुए मुझे एक नौसिखियापन सा लग रहा है :-) मैं वापस लौट आया हूँ ......हो सकता है मेरा यहाँ अनुपस्थित रहना किसी को सचमुच खला ही हो ... :-) यह बात अब तक मुंह से निकल पायी हो तो अब भी कोई देर नहीं हुयी है ...मेरा दर खुला है खुला ही रहेगा ...सुस्वागतम! 

शनिवार, 17 नवंबर 2012

भाग दरिद्दर!

इस बार भी दीपावली पैतृक आवास(चूडामणिपुर, बख्शा  -नौपेडवा,जौनपुर ,उत्तर प्रदेश ) पर मनाने का मौका मिला .सालाना त्यौहार अपने पैतृक आवास पर मनाना मुझे अच्छा लगता है . बड़े मिश्रित अनुभव रहे . पिछले वर्ष से शुरू हुयी बाल रामलीला इस वर्ष  बच्चों के और भी उल्लास के चलते अविस्मरणीय बनी . इस बार का प्रसंग था लंका दहन का . इस प्रसंग में बच्चों ने हनुमान के लंका में प्रवेश, लंकिनी से वार्ता और उसकी मुक्ति ,विभीषण से भेंट ,सीता को रावण द्वारा धमकाना ,हनुमान द्वारा श्रीराम की मुद्रिका गिराना ,उनके  द्वारा अशोक वाटिका का उजाड़ना ,अक्षयकुमार का वध ,मेघनाथ द्वारा हनुमान को ब्रह्मपाश में  बाँधना ,हनुमान रावण संवाद ,लंकादहन और माँ सीता से कोई स्मृति चिह्न माँगना और लौट कर उसे श्रीराम को सौंपना आदि दृश्य बहुत ही बढियां ढंग से अभिनीत किया . 
मातु मुझे दीजे कछु चीन्हा जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा 
हनुमान की सर्वश्रेष्ठ भूमिका कर सरिता मिश्र ने प्रथम पुरस्कार जीता 
इस कार्यक्रम के पीछे की सोच यह है कि समाज में श्रेष्ठ सांस्कृतिक और पारम्परिक मूल्यों को अक्षुण बनाने की दिशा में बच्चों से ही इसकी शुरुआत करनी चाहिए -कैच देम  यंग। इस दिशा में बाल रामलीला की शुरुआत एक विनम्र प्रयास भर है . कुछ चित्रों का आप भी दृश्य लाभ उठायें . जागरण ने भी चित्र के साथ खबर छापी .
बाल कलाकार टीम
 निर्देशक कीर्ति मिश्र,दृश्य समन्वयक प्रियेषा मिश्र,पार्श्व ध्वनि - स्वस्तिका, सोनी आदि 


प्रियेषा ने गाँव के बच्चों से घुलमिल कर रावण का पुतला भी बनाया और मुझसे पुतले के साथ अपना फोटो लेने का आग्रह किया . पुतला दहन के बाद  पैतृक  आवास मेघदूत  को सजाने संवारने का काम शुरू हुआ . इस बार हमसभी ने पटाखे से दूरी बनायी मगर चयनित फुलझडियों -अनार ,चरखियां ,स्वर्गबाण अदि आईटमों का मर्यादित प्रदर्शन किया गया -यह काम बच्चों को देने के बजाय आउटसोर्स कर एक प्रोफेसनल आतिशबाज को दिया गया . खूब मजा आया .
आतिशबाजी 

जाप ध्यान भी हुआ,प्रसाद बांटे गए। एक लोक परम्परा के अनुसार दिवाली के दिन अपने व्यवसाय या जो भी काम आप करते हों अवश्य करना चाहिए जिसे 'दिवाली जगाना' कहते हैं कि वह काम आप अगली दिवाली तक निर्विघ्न करते रहें.  इस लिहाज से तो मुझे जो कुछ काम करने थे वे  एक भी नहीं हो पाए,ब्लागिंग भी नहीं :-) सबसे बुरी बात यह हुयी कि मेरे फेसबुक अकाउंट से करीब दो दर्जन मोबाईल  फोटो अपलोड आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गए और मुझे विचलित कर गए .कारण अभी तक समझ में नहीं आया ,फेसबुक को  प्राब्लम रिपोर्ट किया मगर अभी तक जवाब नहीं आया है , मतलब मेरी दिवाली नहीं जगी . माता जी ने आँख में काजल इस बार भी घुड़क कर लगा ही दिया यह डरा कर कि अगर नहीं लगवाता तो अगले जन्म में छंछून्दर हो जाऊंगा . मुझे सहसा डार्विन की याद आयी और होठों पर बरबस मुस्कराहट आ गयी . रिवर्स एवोलूशन :-)
भाग  दरिद्दर! 
....देर से सोये ही थे कि  अल्लसुबह नींद कुछ धप्प धप्प ढब ढब की आवाज से खुल गयी .गृहिणी एक प्राचीनतम परम्परा का निर्वहन कर रही थीं हँसियाँ से सूप पीट पीट कर घर के अतरे कोने से दरिद्दर को भागा रही थीं . अब दीवाली की आराध्य देवी लक्ष्मी के आने पर दरिद्दर को घर से बाहर हो जाने की यह प्रतीकात्मक प्रस्तुति कहाँ से अनुचित है! मनुष्य उत्सव- अनुष्ठान प्रेमी है -वह कोई भी अनुष्ठान का मौका ऐसे ही गवाना नहीं चाहता . दरिद्दर भगाने का यह उपक्रम यहाँ पूर्वांचल में बहुत प्रचलित है . गाँव घर की लक्ष्मियाँ सूप पीट पीट कर गृह दारिद्र्य को गाँव से बाहर खदेड़ आती हैं . कहीं कहीं यह उपक्रम एकादशी की रात में करते हैं।

दिवाली की अगली रात से कार्तिक का शुक्ल पक्ष आरंभ हो रहा था सो कार्तिक महात्म्य की एक पर्म्पारा के मुताबिक़ हम सब ने आवला के पेड़ के नीचे सामूहिक भोज भात -आहारा का आयोजन भी किया . बारबीक्यू की तर्ज पर ....

आप सभी के यहाँ से  दुःख -दारिद्र्य भाग जाए दीपोत्सव की यही सर्वतोभद्र कामना है ........

गुरुवार, 8 नवंबर 2012

मोतियाबिंद का आपरेशन

जब माता जी ने करीब छः महीने पहले यह शिकायत की कि उनकी आँखों के सामने मकडी के जाले  सा दिखता है तो मैंने उन्हें नेत्र चिकित्सक को दिखाने का निर्णय लिया .बनारस में आर के नेत्रालय सबसे अच्छा नेत्र चिकित्सालय है और डॉ. आर के ओझा एक जाने माने नेत्र सर्जन हैं . उन्होंने   जांच कर बताया कि इनकी आँखों में मोतियाबिंद की शुरुआत है और दायीं  आँख का आपरेशन करा लिया जाना उचित होगा . बाईं आँख के लिए इंतज़ार किया जा सकता है , आज सभी को मालूम है कि आँखों का कुदरती लेंस किन्ही कारणों (बल्कि कई कारण हो सकते हैं ) से धूसर होते जाते हैं तो दिखना प्रभावित होने लगता है . अब आपरेशन तुरंत कराया जाय या इंतज़ार किया जाय इस पर जैसा कि प्रायः सभी भारतीय परिवारों में दो विचार हो जाया  करते हैं यहाँ भी हुआ . इन मामलों में मैं चिकित्सक का सुझाव निर्णायक मानता हूँ . डॉ ओझा ने स्पष्ट रूप से कहा कि आपरेशन जरुरी है . माता जी थोडा घबरा रही थीं तो उन्होंने कई दलीलें रखीं -गर्मी का मौसम है ,धूल बहुत उड़ रही है ,बिना नहाये दो तीन दिन कैसे रहा जाय ...घर के कुछ सदस्य भी दन से माता जी से सहमत हो लिए ..मैं अकेला पड़  गया मगर मन में निश्चय कर लिया कि जितना जल्दी हो आपरेशन तो कराना ही है . इसी के तत्काल बाद मेरा ट्रांसफर भी हो गया और ऐसी जगहं कि वहां आधुनिक चिकित्सा सुविधा भी उपलब्ध नहीं है ,सोनभद्र में ज्वाईन करते ही मेरे कार्यालय -मालिके मकान ने खुद अपना और एक और मामले का ऐसा उद्धरण दिया जिसमें वहां आपरेशन करने बाद आँख की रोशनी चली गयी थी  .....अब तो बनारस में आपरेशन के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था  . सोनभद्र सर सामान ले कर जाने के पहले माता जी का आपरेशन करा लेना ही था . 
माता जी आपरेशन के ठीक बाद 
मुझे बचपन की जब मैं मात्र पांच साल का था यानी पचास साल  पहले गाँव में ही एक वृद्ध महिला के मोतियाबिंद के आपरेशन का खौफनाक दृश्य आज भी याद है . वह आपरेशन जमीन पर बैठा कर हुआ था पीढ़े पर दोनों मरीज और ग्राम्य शल्य चिकित्सक  बैठे थे ,अनेस्थेसिया तो था नहीं, ऐसे ही उसके औजार वृद्धा की आंख पर चल रहे थे और वे चिल्ला रही थीं ....यह दृश्य मुझे आज भी ठीक वैसे ही याद है .गनीमत कहिये या घोर आश्चर्य वह आपरेशन सफल हुआ था और वे महीनों तक एक हरे रंग की  आँख -टोपी लगाती  थी .बहुत झगडालू थीं अब दिवंगत बहुरूपा दादी की  आँख ठीक हो गयी तो उन लोगों को भी जिन्हें वे देख नहीं  पाती थीं देखने लग गयीं तो देखते ही आदतन गरियाने भी लग गयीं थीं . लोग शिकायत भी करते "काहें भैया इनका आपरेशन करा दिए इससे भली तो वे आन्हर ही थीं " :-) मगर उस समय जिस किसी ने उनकी आँख का आपरेशन उस ग्राम्य सर्जन से कराने का निर्णय लिया था ,उनके पति और हमारे आजा ( मैं उन्हें यही कहता था ) या उनके पुत्रों ने जिनमें एक अभी भी हैं को लेकर मेरे मन में बड़ा आदर है .उन्होंने एक बड़ा रिस्क तो लिया था क्योंकि  उन दिनों उस तरह की सर्जरी के बिना और कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी , 
आपरेशन का दूसरा दिन -काला चश्मा लग गया 
आज तो फेको सर्जरी है जिसमें आँख में बस एक-दो मिमी का चीरा लगा कर खराब लेंस को काटकर बाहर खींच लिया जाता है और नया लेंस लगा दिया जाता है .कुल आपरेशन महज 15-20 मिनट का ही है . परसों रात 10 बजे माता जी का आपरेशन हो गया . और ठीक दस मिनट बाद उन्हें अस्पताल से छुट्टी भी मिल गयी . रात भर एक पट्टी (बैंडेज) लगा रहा सुबह वह भी हट गया और काला चश्मा अभी कुछ दिन और लगा  रहेगा , मगर बस इसी पल भर के आपरेशन कराने का निर्णय लेने में कुछ महीने लग गए ..क्या करें, अकेले किसी एक आदमी को संयुक्त परिवार में अब निर्णय लेने में समय लग ही जाता है और अब कोई भी निर्णय शायद बहुमत से होते भी नहीं -कई समाजार्थिक कारण इनके पीछे होते हैं .

प्रायः हम लोगों को कहते सुनते हैं कि अमुक आपरेशन तो बहुत हल्का, छोटा सा है। जैसे आँख के मोतियाबिंद का  यही आपरेशन . किन्तु मैं समझता हूँ कि किसी भी आपरेशन में रिस्क फैक्टर हमेशा मौजूद रहता है चाहे वह छोटा हो या  बड़ा . आपरेशन टेबल से सकुशल वापसी किसी बड़े युद्ध से सकुशल वापसी से कम नहीं है और बड़ी राहत वाली बात है . मुझे खुद अपना एक आपरेशन याद है 2005  का जब मैंने मेजर आपरेशन से अपने गाल ब्लैडर के स्टोन को निकलवाने का निर्णय लिया  था .फिजिसियन और सर्जन दोनों ही  मेरे क्लास फेलो थे ,बल्कि मैंने ही इस आपरेशन के लिए उन्हें चुना था . वह आपरेशन जनरल अनीसथीसिया में हुआ था यानी पूरा बेहोश करके . आपरेशन  टेबल पर लेटने के पहले तरह तरह के विचार मन में आ  रहे थे . उनमें एक तो यह था कि मुझे इसलिए चिंता नहीं करनी चाहिए कि अगर कुछ अनहोनी हुयी भी तो फिर तो आपरेशन के उपरान्त मुझे उसका पता ही नहीं चलेगा और आपरेशन सफल हुआ तो  चिंता करने की बात ही नहीं है . यानी दोनों ही स्थितियों में फिकर नाट . और यह बड़ी राहत  वाला विचार था . आपरेशन बहुत  सफल था मगर मेरे मित्र सर्जन ने बाद में बताया कि मुझसे ज्यादा तो वे तनाव में थे -मित्र के शरीर पर सर्जरी में उनका मन स्थिर नहीं था .....मैंने पूछा था क्यों ? तो उन्होंने बताया था कि आपरेशन में अगर कुछ भी हो जाता तो वे मित्रता के कारण ज्यादा आहत होते और अपयश भी कम न मिलता . ऐसे मामलों में चिकित्सक भी कहाँ पूरी तरह प्रोफ़ेसनल रह पाते हैं .आपरेशन टेबल हमेशा ही निरापद नहीं रहता . एक सर्जन  के जीवन की सबसे बुरी घटना होती है डी  ओ टी यानी डेथ आन आपरेशन टेबल और यह एकदम असंभव भी नहीं है . माता जी के सारे परीक्षण हो चुके थे ,वे ब्लड प्रेशर की मरीज हैं .मुझे डर  भी लग रहा था मगर वे आपरेशन टेबल से विजेता की तरह लौटीं -मेरे जान में जान आयी . सूत्र वाक्य यही कि जब तक सफल न हो जाय कोई भी आपरेशन छोटा -बड़ा नहीं होता यानी सब बड़े ही होते हैं! 

मैंने यह पोस्ट कुछ तो मोतियाबिंद को लेकर अपने अनुभव आपसे शेयर करने के लिए लिखी है ,.दूजे फेको विधि से मोतियाबिंद -सर्जरी की अच्छाई बताने के लिए और यह भी क़ि एलोपैथी में सर्जरी का कोई श्रेष्ठ  विकल्प नहीं है . 

सोमवार, 5 नवंबर 2012

.....और मैं हतप्रभ सा देखता रह गया!


पिछले कुछ दिनों मैं जौनपुर जनपद के अपने पैतृक आवास पर छुट्टियों के दौरान था जब 1/2 नवम्बर  की रात को  दो- ढाई बजे से चार बजे  के दौरान वह  अद्भुत आकाशीय नज़ारा दिखाई दिया. मुझे बचपन में ऐसा ही दृश्य दिखायी दिया था तब मेरी बाल सुलभ उत्सुकता को शांत करते हुए मेरे बाबा जी ने कहा था तुम यह जो घेरा सा देख रहो हो चंद्रमा के चारो ओर यह दरअसल इंद्र की सभा है और  वे  मौसम  के आगामी रुख पर विचार विमर्श कर रहे हैं -घटना थी चन्द्र छल्ले या चन्द्र आभा की . चन्द्रमा ठीक मेरे सिर के ऊपर और उसके चारो ओर सटीक गोलाई में ४४ अंश का घेरा ....मैं विस्मित सा देखता रह गया -आधी रात के बाद की घोर निद्रा में सो रही पत्नी और बेटी को भी जब यह नज़ारा दिखाया तो नीद में खलल पड़ने का उनको कोई मलाल न था और सबसे बड़ी राहत कि मुझे डांट नहीं पडी . मैं तो तुरंत फेसबुक अपडेट करने में लग गया . मगर हद है इक्का दुक्का ही लोग जागते मिले ..एक तो अजमेर के साहब जिन्हें भी यह दृश्य दिखा था .पलकों से नीद गायब थी और सुबह होते होते काफी जानकारी अंतर्जाल से बजरिये मोबाईल मिल गयी थी .. 
अद्भुत संयोग था कि सैंडी के अमेरिका के पूर्वी तट पर कहर बरपाने वाली रात को ऐसा ही छल्ला वहां दिखा था .....तो क्या मेरे द्वारा देखे गए चन्द्र छल्ले का मतलब किसी तूफ़ान का संकेत था ..बिलकुल  था -यह नीलम चक्रवात की ही धमक थी मगर अच्छी बात रही कि उसका प्रभाव यहाँ तक आते आते काफी क्षीण हो चुका था ,सुबह सुबह जागरण के स्थानीय संवाददाता ओंकार मिश्र ने इस खबर को कवर किया और जागरण ने इसे प्रमुखता से छापा .मगर मुझे आश्चर्य यह है कि आलतू फालतू ख़बरों को दिन रात दिखाने वाले मीडिया चैनेल और भारतीय खगोल शास्त्री या फिर शौकिया खगोल विद सभी उस रात घोड़े बेंच के सोये हुए थे? दरअसल ऐसी घटनाएं लोगों में और खासकर बच्चों -किशोरों में खगोल विज्ञान के प्रति रूचि जगाने का एक अवसर देती हैं और ऐसे में चूकना नहीं चाहिए. 
अद्भुत आकाशीय नजारे का हुआ दीदार
नौपेड़वा (जौनपुर): गुरुवार आधी रात के बाद चन्द्रमा के इर्द-गिर्द बना विशाल गोल घेरा लोगों को अचंभित कर रहा था। अद्भुत आकाशीय नजारा देखने हेतु लोगों ने अपने परिजनों को जगाया। रात दो बजे से चार बजे तक दिखा घेरा धीरे-धीरे स्वत: समाप्त हो गया। चन्द्रमा के बिल्कुल करीब वृहस्पति ग्रह भी स्पष्ट रूप से चमक रहा था। इस बारे में अपने पैत्रिक आवास चुरावनपुर बक्शा में छुट्टियां बिताने आए विज्ञान संचारक डा.अरविन्द मिश्र ने बताया कि यह एक दुर्लभ आकाशीय घटना है। जो प्राय: किसी आने वाले तूफान का आभास देता है।
डा.मिश्र ने बताया कि अमेरिका में आए हुए सैन्डी तूफान के ठीक पहले 28 अक्टूबर को पूर्वी तट के निवासियों ने एक ऐसा ही आकाशीय नजारा देखा था। वैज्ञानिक इस आकाशीय घटना को चन्द्र छल्ला 'ल्यूनर हालो' अथवा मूल रिंग का नाम देते हैं।
वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि जब आसमान में एक खास प्रकार के बादल जिसे सिर्रस बादल कहा जाता है जो बहुत ऊंचाई पर होते हैं तथा बर्फ के क्रिस्टल बनते हैं तो चन्द्रमा के प्रकाश के परावर्तन से चन्द्र छल्ले का बनना दिखलाई देता है। लोक कथाओं में ऐसे चन्द्र छल्ले का बनना दिखना किसी तूफान के आने का संकेत माना जाता है जिसे वैज्ञानिक भी पुष्ट करते हैं। सैंडी तूफान के आने के ठीक पहले एक विशाल चन्द्र छल्ले का दिखना इसका प्रमाण है। आकाश में गुरुवार की रात इस छल्ले को तमाम लोग देखे जिसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं रही।

रविवार, 28 अक्तूबर 2012

एक वैज्ञानिक चेतना संपन्न ब्लागर का निरामिष चिंतन!


निरामिष ब्लॉग पर मेरी टिप्पणियाँ विस्तार पाती गयीं तो सोचा क्यों न उन्हें संहत तौर पर यहाँ सहेज लिया जाय ..कई दिनों से कुछ लिख नहीं पाया तो मित्रों के उलाहने मिलने लग गए हैं . यह भी अजीब है कि लिखूं तो वे पढ़ने न आयें और न लिखूं तो लिखने को फरमाएं - :-) 

मुझे अपना दृष्टिकोण कुछ और स्पष्ट करना होगा .सबसे पहले यह कि मैं किसी भी तरह की ईशनिंदा या धर्म विरोध का पक्षधर नहीं हूँ -हिन्दू हूँ किन्तु अज्ञेयवादी (अग्नास्टिक) या कह सकते हैं नास्तिक हूँ . दुनिया के सभी धर्म मूलतः श्रेष्ठ हैं ,इस्लाम ने भी मानवता को बहुत सी अच्छी सीखें और विचार दिए हैं .किन्तु सभी धर्म समय के अनुसार बहुत सी नासमझी और गलतियां ओढ़ते गए हैं -अपनी चादर मैली करते गए हैं -हिन्दू धर्म में कभी हजारों अश्वों की एक साथ बलि दे दी जाती थी ,वैदिक काल घोर हिंसा से भरा था ...यहाँ तक कि कालांतर तक लोग उस हिंसा को वैसे ही जस्टीफाई(वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति ) करते थे  -इसलिए ही हिंसा की प्रतिक्रया स्वरुप एक महान धर्म का उदय हुआ -बौद्ध धर्म और इसने भी दुनिया को अहिंसा ,प्रेम और शान्ति का सन्देश दिया -यह एक नास्तिक धर्म है ,मूर्ति पूजा का यह भी विरोध करता है मगर मजे की बात देखिये कि आज इसके अनुयायी विशाल और भव्य मूर्तियाँ बना रहे हैं -बुद्ध की विशाल प्रतिमाएं ही तालिबानियों ने पहले तोडीं -धर्मों के बीच के ये सारे आपसी झगड़ें मूर्ख मुल्लों और पंडितों ने रचे बनाए हैं ....इसी में से एक कुर्बानी है जो कुछ और नहीं बस वैदिक काल की वीभत्स पशु हिंसा ही है -मुझे तो कभी कभी लगता है कि कालांतर के  कुछ तिरस्कृत वैदिक विचार और परम्पराएं ही इस्लाम में प्रश्रय पा गयी हैं ,
आज पूरी दुनिया में सह अस्तित्व की एक पारिस्थितिकीय सोच परिपक्व हो रही है . यह भी हमारी एक मूल सोच का ही आधुनिक प्रस्फुटन है -"सर्वे भवन्तु  सुखिन:  सर्वे सन्तु   निरामया........ कामये दुःख तप्तानाम प्राणिनाम आर्त नाशनं"  आज पेटा जैसी संस्थायें -(पीपुल फार एथिकल ट्रीटमेंट टू एनिमल्स)  पशु हिंसा का प्रबल विरोध करती हैं -और यह उचित भी है -इस धरती पर सभी प्राणियों का सह अस्तित्व है.  सामूहिक पशु हिंसा और वह भी बड़े जानवरों की -अब वो जमाना नहीं रहा -शिकार तक प्रतिबंधित हो गए हैं .दुनिया एक पर्यावरणीय संचेतना (कान्शेंस) से गुजर रही है ..हमें क्या हिन्दू क्या मुस्लिम अनुचित प्रथाओं का विरोध करना ही होगा! 
बड़े स्तनपोषी हमारे अधिक जैवीय करीबी है .उन्हें मारने में सहजतः एक विकर्षण भाव होना चाहिए मगर धर्म का लफडा देखिये -इस कृत्य का भी उत्सवीकरण शुरू कर दिया ....यह हमारा ही कर्तव्य है कि हम कठमुल्ले या पोंगा पंडित ही न बने रहें बल्कि अपने धर्मों का निरंतर परित्राण करते रहें . हिन्दुओं ने समय के साथ अपने रीति रिवाजों में बहुत से सामयिक परिवर्तन किये हैं -बलि अब मात्र क्षौर कर्म -मुंडन आदि तक सीमित होकर रह गयी है और "बड़ा" भोज केवल उड़द के 'बड़े' तक सिमट  चुकी है -अश्वमेध तो अब किताबों में ही हैं .....समय देश और काल का तकाजा है कि मुसलमान दिशा दर्शक अब आगे आयें और अपने यहाँ सामूहिक पशुवेध की परंपरा को बंद करें -ऊंटों की कुर्बानी तो अत्यंत वीभत्स दृश्य उत्पन्न करती है -कुर्बानी का मूल अर्थ जो है  उसका अनुसरण क्यों नहीं किया जाय? त्याग और आत्म बलिदान की -बिचारे निरीह पशु क्यों इस सनक के शिकार बनें! . 
कुर्बानी का अर्थ तो पशु अत्याचार कतई नहीं हो सकता -यह विकृत सिम्बोलिक परम्परा इतनी पुरानी होती गयी ,आश्चर्य है! समाज की कुरीतियों पर क्या हिंदू क्या मुस्लमान सभी को आगे बढ़कर सकारात्मक कदम उठाना चाहिए -तभी हम एक बेहतर भविष्य और रहने योग्य धरती की कल्पना कर सकते हैं!दुनिया के लगभग सभी धर्मों में एक अपरिहार्य सी बुराई घर कर गयी है -सभी बेहद जड़ हैं -कोई गति नहीं हैं उनमें -बस लकीर का फ़कीर बने हुए हैं जबकि विज्ञान कितना गतिशील है -आज आवश्यकता इस बात की है कि हम विज्ञान के नजरिये को अपना कर अपने धर्मों की कालिख और बुरी परम्पराओं का प्रक्षालन करें -यह मानवता का एक साझा कर्तव्य है -यहाँ धर्मों की श्रेष्ठता की कोई लड़ाई नहीं है -मैं हिन्दू धर्म की अनेक बुराईयों को सुनने और प्रतिकार करने को तैयार हूँ . 
मैं देख रहा हूँ कि बस बहस के लिए ही अब बहस हो रही है जो अनर्गल और अनुत्पादक है -ठीक है पेड़ पौधों में भी जान है और मनुष्य में भी जान है -तो क्या मनुष्य भी भोज्य बन जाना चाहिए? कुछ धर्म नरमेध को भी उचित मानते रहे -शुक्र है अब आख़िरी साँसे ले रहे हैं . किसी भी धर्म को अगर अपने श्रेष्ठ मूल्यों को बचाए रखना है तो उसे समय के साथ आ रही बुराईयों को पहचानना और प्रतिकार भी करना होगा .....और यह जितना ही शीघ्र हो उतना ही अच्छा .आज यह कितना दुखद है कि मानवता के बीच की कितनी ही खाइयां धर्मों ने तैयार की है -जहां हम अच्छे मित्र हैं ,सहपाठी हैं ,एक जगह काम करने वाले सहकर्मी हैं ,ब्लॉगर हैं -सब ठीक है मगर जैसे ही हम हिन्दू और मुसलमान होते हैं परले दर्जे के अहमक बन जाते हैं ....आखों के आगे पर्दा पड़ जाता है - अगर धर्मों का  यही उत्स है तो ऐसा कोई धर्म भी मुझे स्वीकार नहीं है. आईये हम सभी यहाँ धर्मों की बजाय अपने स्वतंत्र विचारों को प्रस्फुटित होने का मौका दें!
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 मुझे वैज्ञानिक  चेतना संपन्न ब्लॉगर का खिताब अता किया है अनूप शुक्ल 'फुरसतिया' जी ने और उतने ही ख़ुलूस और प्यार से मैं उन्हें ब्लॉग व्यंग विधा शिरोमणि की उपाधि  से नवाजता हूँ! :-)    

सोमवार, 15 अक्तूबर 2012

बहुत कुछ हमारे सोच पर निर्भर है!


आज हमारे समाज में अनेक समस्यायें हैं -कुप्रथायें हैं ,अंधविश्वास है ,बेरोजगारी और भूख है, दिशाहीनता है, पलायन है. कई मामलों में मनुष्य की मूलभूत जरूरतों का हवाला हम अक्सर देते हैं -कपडा ,रोटी और मकान ,मतलब जीविकोपार्जन और रहने के लिए  एक खास जगह  की दावेदारी -मतलब एक छत . मगर देखा यह जाता है कि इन मूलभूत जरूरतों के पूरा होने के बाद भी कई समस्यायें उठती रहती हैं . और उनका एक तात्कालिक हल निकालकर हम आगे बढ़ते हैं .कई बार तो समस्याओं का निराकरण तो कुछ ऐसे फार्मूले से होता है जैसे कि गरीबी हटाने का सबसे  कारगर तरीका है गरीबों को ही मिटा देना :-) .... चलिए यह तो भूमिका हो गयी . आज की इस पोस्ट के लिए कोई एक विषय तो चुनना होगा. मैं भ्रष्टाचार पर कुछ कहना नहीं चाहता -काजल की कोठरी में रहकर तो हर ओर अँधेरा ही दिखता है -समाज में नारी की स्थिति,विवाहादि पर  अकेले कुछ नारीवादी ही इतना लिख चुके हैं कि कुछ ख़ास  बचा ही नहीं लिखने को और लिखा तो कुहराम मचना तय है. बढ़ती जनसख्या ,गर्भनिरोध के तरीकों पर लिखना अब कुछ नया नहीं रह गया . मनुष्य के अन्तरंग  जीवन के पहलुओं पर लिखने पर हमेशा श्लीलता और अश्लीललता की विभाजक रेखा धुंधलाती हुयी सी लगती है . फिर ?
आज सोचता हूँ कुछ ख़ास पर्सोनालिटी टाईप्स की बात करूँ. ऐसे लोग जो हमेशा नकारात्मक ऊर्जा का संचार करते रहते हैं .अंगरेजी का एक शब्द है सिनिक (cynic ) -अर्थात- दोषदर्शी/मानवद्वेषी/निंदक ...ऐसे लोग आपसे भी अक्सर टकराते होंगें .उन्हें हमेशा यह लगता है कि यह दुनिया ही बड़ी कमीनी है ,स्वार्थी है ,यहाँ कुछ भी अच्छा नहीं है ....अब कुछ भी नहीं बचा जो अच्छा हो -कबीर ने ऐसे आदमी की पहचान तरीके से कर ली थी बल्कि यहाँ तक कह डाला था कि उसकी तो बड़ी आवाभगत करो -घर के भीतर भी बुला आँगन में बिस्तर आदि लगा उसकी पूरी सेवा श्रूशुषा करो क्योंकि वह तो आपनी आदत से बाज तो आएगा नहीं, हां आपकी बर्दाश्त करने की आदत में निरंतर इजाफा करता जाएगा -अब महापुरुष लोग समस्याओं का ऐसा ही कोई यूनिक तरीका बताते  हैं जो व्यवहार में पूरी तौर पर कभी लागू न हो पाए और इसलिए उसे कभी खारिज भी न किया जा पाए :-)  
मगर मुझे लगता है कि ऐसे लोगों को अवायड करना चाहिए क्योकि वे आपमें एक तरह की नकारात्मक ऊर्जा का समावेश करते हैं -आपका आत्मविश्वास डिगाते हैं. और आपका कोई काम बनते बनते इसलिए बिगड़ जाता है कि आप में नकारात्मक सोच घर कर गयी थी . दर्शनशास्त्र  में ऐसी ही एक विचारधारा(Solopsism) है कि आपका मस्तिष्क जो सोचता है वही साकार हो उठता है. इसलिए मस्तिष्क का सकारात्मक सोच वाला होना बहुत आवश्यक है .मनुष्य की यह सकारात्मक सोच न होती तो वह चन्द्रमा का जेता न हुआ होता और आज ब्रह्माण्ड के असीम दिक्काल तक जा पहुँचने का हौसला न रख पाता. हम छोटी छोटी बातों को लेकर नकारात्मक हो उठते हैं -किसी ने अन्यान्य कारणों से आपका साथ नहीं निभाया तो सारा समाज ही दोषी हो गया , किसी औरत ने अपने खसम पर हाथ उठा दिया तो सारी नारी जाति ही कुलटा बन गयी -ऐसे सोच खुद ऐसा सोचने  /कहने वालों को और प्रकारांतर से सारे समाज को नुकसान पहुंचाते हैं . एक व्यक्ति  ऐसी नकारात्मक अतिवादी सोच के चलते अपना और समाज का बड़ा नुक्सान करने पर उद्यत रहता है . 
मेरा आशय यह नहीं कि सभी झूठ मूठ आदर्शवादी हो जायं ....यथार्थवादी रहते हुए भी एक सकारात्मक ऊर्जा के साथ हम क्यों न रहें? -विवेकानन्द की अनेक ऊर्जाभरी बातों में मुझे यह उनका सबसे अच्छा विचार लगता है कि देखो अगर तुम सब कुछ खो चुके हो तो भी पूरा भविष्य अभी भी तुम्हारे पास बचा हुआ है . यह है आशावादी सोच -हमेशा नकुआये रहना ,मुंह को बिसूरते बिसूरते उस पर एक  नकारत्मक स्थायी भाव ही चिपका लेना मुझे तनिक भी नहीं भाता ..माना कि दुनिया बहुत बुरी है मगर सच तो यह है कि बहुत कुछ हमारे सोच पर निर्भर है -. सकारात्मक सोच और ऊर्जा के प्रवाह से हम नरक को स्वर्ग में तब्दील कर सकते हैं ....ऐसा मेरा सोचना है . 
आपका क्या सोचना है ? 

शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

तू हाँ कर या ना कर?


अपनी  फेसबुक भित्ति पर एक प्रखर नारीवादी विदुषी ने विवाह नाम्नी सुदृढ़ सामजिक  व्यवस्था पर  कटाक्ष करते हुए लिखा "  . कल एक ब्लॉगर और फेसबुकीय मित्र ने मुझे यह सलाह दी कि .... मैं शादी कर लूँ, तो मेरी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगी :) इस प्रकार का विवाह एक समझौता ही होगा. तब से मैं इस समझौते में स्त्रियों द्वारा 'सुरक्षा' के लिए चुकाई जाने वाली कीमत के विषय में विचार-विमर्श कर रही हूँ और पुरुषों के पास ऐसा कोई सोल्यूशन न होने की मजबूरियों के विषय में भी :).." यह एक टिपिकल नारीवादी चिंतन है जो विवाह की पारम्परिक व्यवस्था पर जायज/नाजायज सवाल उठाता रहा है. यहाँ के विवाह के  फिजूलखर्चों ,दहेज़ ,बाल विवाह आदि का मैं भी घोर विरोधी रहा हूँ मगर नारीवाद हमें वह राह दिखा रहा है जहाँ विवाह जैसे सम्बन्धों के औचित्य पर भी प्रश्नचिह्न उठने शुरू हो गए हैं -और यह मुखर चिंतन लिविंग रिलेशनशिप से होता हुआ पति तक को भी "पेनीट्रेशन" का अधिकार देने न देनें को लेकर जागरूक और संगठित होता दिख रहा है . क्या ऐसे अधिकार की वैयक्तिक स्वतंत्रता की इज़ाज़त दी जा सकती है -क्या समाज के हितबिंदु इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगें ? धर्म तो विवाह को केवल प्रजनन के पवित्र दायित्व से जोड़ता है -अगर 'पेनीट्रेशन' नहीं तो फिर तो प्रजनन का प्रश्न  नहीं और प्रजनन नहीं तो फिर प्रजाति का विलुप्तिकरण तय .  क्या कोई भी धर्म और समाज या क़ानून समाजिक सरोकारों के ऊपर/अपरंच  जाकर ऐसे दिमागी फितूरों को वैयक्तिक/नागरिक आधिकारों के रूप में स्वीकृति  प्रदान कर सकता है? मामला गंभीर है और एक प्रबुद्ध विमर्श की मांग करता है.  
मैं अपने विचार यहाँ रख रहा हूँ जो समाज जैविकी(Sociobilogy)  के नजरिये से है और कोई आवश्यक नहीं कि मेरा इससे निजी मतैक्य अनिवार्यतः हो भी? अकेले मनुष्य प्रजाति में  यौन भावना का प्राबल्य या प्रजनन किसी ख़ास माहों तक सीमित न होकर सदाबहार है . हमारी नजदीकी चिम्पांजी मादा भी छठे छमासे ही हीट में आती है ..मगर मनुष्य के मामले में यह बारहोमास है .और प्रत्येक माह में अंड स्फोटन(ovulation)  के साथ ही मनुष्य -मादा के गर्भधारण की संभावनाएं बलवती हो उठती हैं -इस ग्रह पर अरबों जनसँख्या उसकी इसी अति प्रजननशीलता की ही देन है -यहाँ नारी या पुरुष किसी भी वक्त संयोग करते हैं गर्भधारण की तिथियों से दीगर भी ..... निश्चित ही मात्र प्रजनन ही मनुष्य के मामले में हेतु नहीं है कोई और भी कारक है जो जोड़े को साथ बनाए रखता है और गहन आत्मीय/यौन  सम्बन्ध ही जोड़े के लिए सीमेंट का काम करता है ..मगर क्यों यह जोड़ा सीमेंटेड होना चाहिए? इसलिए कि विद्रूप नैसर्गिक सत्य यह है कि जैव- विकास की  सीढी में न जाने क्यों प्रकृति ने मनुष्य प्रजाति की मादा को ही वात्सल्य देखभाल (पैरेंटल केयर ) का नब्बे फीसदी तक का उपहार /ठेका  देकर नारी को बिचारी बना दिया ...मनुष्य शावक पट्ठा(!) बरसों बरस तक मां  की छाती पर मूंग दलता रहता है ..दुग्धपान से डायपर बदलाव के  बहुत बाद तक भी वह मां पर पूरी /बुरी तरह आश्रित रहता है -और बाप बस उसे कभी कभार निर्मिमेष निगाहों से पलता बढ़ता देखता और औपचारिकता स्वरुप कभी कभार कुछ प्यार पुचकार करता रहता है ताकि कम से कम यह आभास तो होता ही रहे की साहबजादे उसी की औलाद हैं :-) अब सभी डी एन ऐ जांच  के लिए तो जाने से रहे ... :-) 
बच्चे  के बाप कहीं अपने दायित्वों से खिसक न लें इसलिए मनुष्य के मामले में प्रकृति ने सेक्स को और भी "सेक्सियर" -आनंददायक बना डाला -ले पट्ठे तुझे साथ रहना है तो भरपूर मजे लेता रह  और संतान की अपनी जिम्मेदारियों से  मत भाग ....मनुष्य नर  के ऊपर प्रकृति ने वात्सल्य देखभाल की  उतनी विवशता डाली ही नहीं.....न तो मानसिक स्तर पर ही और न ही शारीरिक स्तर पर ....उसके चूचक भी अवशेषी होकर सिमट सिकुड़ गए नहीं तो कम से कम प्लेसेबो दुग्धपान की राहत कभी कभार तो  बच्चे को देते ही ...... :-) 
अब उक्त परिप्रेक्ष्य में जरा सोचिये भारत ही नहीं पूरे विश्व के किसी भी भूभाग या संस्कृति में शादी एक नारी के लिए कितनी जरुरी है -मुख्यतः एक कारण से -एक तो  बच्चों के बड़ा होने तक जच्चा बच्चा  दोनों को  किसी  आपदा की स्थितियों में पुरुष का तन मन धन से तात्कालिक और दूरगामी सहयोग देना और इस तरह वंश रक्षा की निरापदता सुनिश्चित करना ....विवाह जैसी संस्था इसी जैवीय और सांस्कृतिक जरुरत को ही पूरा करती है. एक सामाजिक   संस्था के रूप में भी वह यह भी सुनिश्चित  करती है कि बच्चा पैदा कर बंदा कहीं और न सटक ले ...कुछ तो लाज भय रहेगा ...अगर मनचाहा कुदरती आनंद न भी मिल रहा हो तो बेचारा  सामजिक/कानूनी  भय और संकोच वश वैवाहिक जीवन को निबाहते रहने को अभिशप्त हो रहता है -और यह नारी के ही पक्ष में एक छुपा हुआ वरदान है . पुरुष को एक ओर गहन वात्सल्य देखभाल से मुक्त कर प्रकृति ने काम भावना को बुलंद कर दिया ताकि वह कम से कम  नारी बिचारी से जुड़ा रहे ....अन्यथा समागम के बाद उसका काम ख़त्म ..और वह बीजारोपण के लिए आगे भटक /सटक लेगा .
शादी इसलिए जरुरी है .हाँ अगर बच्चे पैदा करने का  मातृत्व बोध क्षरित हो गया लगता है (जैसा कि अभी तक नहीं है )  तो फिर विवाह जरुरी नहीं तथापि पश्चिमी देशों में यही हो रहा है -कई कई तलाक और पुनर्विवाह! नैसर्गिक इंस्टिंक्ट बस वही है -पुरुष  रुकना नहीं चाहता और नारी को वात्सल्य देखभाल से निवृत्ति नहीं है .पश्चिम में इसलिए ही आजीवन बिन व्याहे और विवाहेत्तर सम्बन्ध,तलाक  का  आंकडा बढ़ रहा है . आखिर भारत क्या चाहता है ? 

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012

यह नेह क्यों, अनुराग क्यों?


भावों को शब्द -बद्ध करना  कितना  मुश्किल है :-( शब्द साधना एक तपस्या है . गुणी  मित्र गण माफ़ करेगें इस अनाधिकार चेष्टा के लिए -


यह नेह क्यों, अनुराग क्यों?

जो  दीन है औ  शीर्ण है 
 जर्जर  जरा अधीन है 
 तुम्हे अब क्या दे सकेगा 
 जो आर्त है,पराधीन है 

 क्षितिज की ओर देखो 
उभरती तरुणाई  जहां है 
नव चेतना का आह्वान औ
आ पहुंचा  शुभ  विहान  है  

कर सकेगा सम्पूर्ण  तुमको 
अभिसार  कर हर विध वही 
हो सकेगी संतृप्ति रसमय 
मिटेगी चिर प्यास   भी 

अब नहीं  है शेष कुछ भी 
दे सकूं जो प्राण प्रिय को 
छीजती जाती  है प्रतिपल 
जीवन की डोर अब तो 


फिर भी हूँ  विस्मित  भला 
 नेह पर जिसके   पला 
क्यों अचंचल बन गयी वह 
स्वभाव से ही  जो चंचला 

पूछता जाता हूँ विस्मित 
छोड़ नव आकर्षणों को 
मुझी पर है किसी का 
 नेह क्यों,अनुराग क्यों?







रविवार, 7 अक्तूबर 2012

मेरी सोनभद्र की खोज यात्रा -1


शोण भद्र से कालान्तर में सोनभद्र शब्द बना. यहाँ आने के बाद यहाँ की संस्कृति,आबो हवा में मेरे अनुकूलित होने का सप्रयास क्रम जारी है. यहाँ कितना कुछ जानने  समझने को है.उत्तर प्रदेश से उत्तरांचल के अलग हो जाने के बाद सोनभद्र ही वह अकेला जिला है जहाँ आज भी वनों का आच्छादन ५३ फीसदी है .बड़े बड़े बाँध,झीलें और जलाशय है .अकूत वनौषधि और खनिज तथा खनन संपदा है. मगर दुर्भाग्य से आज भी यह एक बहुत ही पिछड़ा हुआ अंचल है. विकास के आधुनिक मानदंडों पर इसे अभी हाल में ही हुए एक सर्वे (पंचायती राज मंत्रालय )में उत्तर प्रदेश ही नहीं देश का सबसे पिछड़ा जिला पाया  गया है. मगर इतना कुछ होने के बावजूद भी इसकी अपनी कुछ विशिष्टतायें हैं -यह देश की  ऊर्जा राजधानी है .जल विद्युत और ताप विद्युत की कई परियोजनाएं यहाँ पर हैं .जल प्रपात और प्राकृतिक धरोहरों के मामले में सोनभद्र का अनूठा स्थान है .एक विश्वविख्यात जीवाश्म क्षेत्र (फासिल बेड ) यहाँ है . प्रागैतिहासिक शैल चित्र भी हैं . सोन और कर्मनाशा नदियाँ हैं . सोन दरअसल एक पुरुष "नदी" है और इसलिए इसे वस्तुतः नदी नहीं नद कहा जाता है-सोन नद ..रेनुकूट में हिंडालको के विश्वप्रसिद्ध एल्मूनियम कारखाने के साथ ही कई औद्योगिक गतिविधियाँ यहाँ की एक अलग पहचान हैं ,
राबर्ट्सगंज के सोन इको प्वायंट से  सोन घाटी का एक विहंगम दृश्य 
 सोनभद्र से मेरा संवेदित होना अभी शुरू ही हुआ है . बहुत कुछ अभी जानना समझना शेष है जिसे आपके साथ साझा करता रहूँगा .ज्ञान जी को गंगा जिस भाति मिल गयीं हैं अन्वेषण पुनि पुनरपि पुनरान्वेषण के लिए, मैं समझता हूँ मेरी झोली में अब सोनभद्र उसी तरह आ गया है और मैं कृत्यार्थ हो उठा हूँ . अभी तो सोनभद्र के नामकरण को लेकर मन में उथल पुथल मची हुयी है . अग्निपुराण में आया है -नमस्ते ब्रह्मपुत्राय शोणभद्राय ते नमः कालांतर  में शोण ही सोन बन गया है ..किन्तु शोण का शाब्दिक अर्थ क्या है ? क्या शोणित का शाब्दिक अर्थ खून तो नहीं है? कोई संस्कृत का विद्वान मेरा मार्गदर्शन करेगा? .कभी कोई भयंकर युद्ध तो इस नदी के किनारे नहीं हुआ जिससे इसका रक्त रंजित जल दूर दूर तक लाल हुआ हो और नाम शोणभद्र हो गया हो -मगर भद्र का अर्थ कुशलता से है .अर्थात शोणित होकर भी जन कल्याण करने वाली नदी -शोणभद्र! ये बस विचारभर है और मुझे किसी गुरु की खोज है जो मुझे दिशा दिखाये! लेकिन यह तो तय है कि जिले का नाम सोनभद्र सोंन  नदी के कारण ही है .कहीं आल्हा की व्याहता सोनवा के नाम से तो सोनभद्र का कोई कनेक्शन नहीं है ? यहाँ की चंदेलों के वक्त की कुछ लड़ाईयां आल्हा की अगुवाई में हुयी हैं -पास के चुनार के किले में सोना के विवाह मंडप में कितने ही योद्धा मार दिए गए थे . 
वाराणसी -सोनभद्र मार्ग पर अहरौरा बांध का एक मंत्रमुग्ध करता दृश्य 
यहाँ आदिवासियों का भी बाहुल्य है, उनकी कई जातियां उपजातियां हैं. यहाँ का करमा  नृत्य मशहूर है .  पत्नी जो मिर्जापुर की मूल वासी है (यह जिला मिर्ज़ापुर से ही पिछले नवे दशक में अलग हुआ था ) बता रही है कि सोनभद्र के एक तहसील घोरावल के घड़े मशहूर हैं. यह जानकारी देने का उनका छुपा मंतव्य हो सकता है कि मैं एक   घड़ा यथाशीघ्र उनके लिए ले आऊँ :-)
बनारस सोनभद्र मार्ग मध्य का एक नयनाभिराम जल प्रपात -लखनियां दरी 
यहाँ की लोक परम्परा में पत्नियां मोतीझील की मेहन्दी के साथ बहुत कुछ अपने पिया से मांगती रही हैं और अब उस फेहरिस्त में घोरावल का  घड़ा भी जुड़ गया है! यहाँ आल्हा के बाद के दूसरे लोक विख्यात जननायक लोरिक की कथायें भी जन श्रुतियों में व्याप्त हैं -एक विशाल शैल खंड राबर्ट्सगंज -शक्तिनगर मुख्य मार्ग पर ही है जिसे लोरिक पत्थर कहा जाता है और मान्यता है कि उसे महा लोकनायक लोरिक ने अपने खड्ग वार से दो  भागों में विभक्त कर दिया था ... यह वृत्तांत भी मैं तफसील से आपके सामने लाऊंगा! 
अभी तो मेरी सोनभद्र की खोज यात्रा बस शुरू ही हुयी है!  

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

आज पिता जी की पुण्य तिथि है!


आज पिता जी की पुण्य तिथि है. आज उन्ही की एक कविता श्रद्धा -सुमन के रूप में उन्ही को अर्पित है -त्वदीयं वस्तु गोविन्दम तुभ्येव समर्पयामि.......
अथ नेता अर्ध चालीसा 
दोहा:
बंदौ नेता पद कमल,सब सुख धन दातार 
         कम्प्यूटर  नहीं कह सकत,माया अमित अपार  
चौपाई 
यद्यपि सब भगवान  बखाना, नेता अनुपम अगम महाना
नेता चरित अगाध अपारा,समुझत कठिन कहत विस्तारा 
कथनी करनी कहि नहिं जाई,क्षण प्रतिक्षण विस्मय अधिकाई 
बहु विधि सब्ज बाग़ दिखलावे,पीछे बहुरि न  पूछन आवे 
मतदाता सब खोजत फिरहीं, अलख ब्रह्म इव देख न परहीं 
महा महा मुखिया सब जोहत,माथा ठोक ठोक पुनि रोवत  
पत्रकार निशि दिन यश गावें,सहजई  बढियां माल उड़ावें 
ठेकेदार सब जय जय करहीं,बिनु श्रम लूटि  तिजोरी भरहीं 
जो व्यवसायी चंदा देई,कोटा परमिट सब कुछ लेई 
तस्कर अपराधी सब मिलते,'रस्म' चुकाई मधुर फल चखते 
दोहा:
नहि विद्या नहिं बाहु  बल ,बिनु धन करत कमाल 
संबंधी तक हो रहे, झटपट मालामाल 
चौपाई 
धन्य वचन अद्भुत चतुराई,ह्रदय भेद कोऊ जान न पाई  
लोकतंत्र की अलख  जगाते,पोलिंग बूथ कैप्चर करवाते 
समाजवाद की माला जपते, फाईव स्टार होटल में रमते 
जातिवाद का मन्त्र जगाते,धर्म निरपेक्ष गीत बहु गाते 
असमाजिक जन बहु आते,अभय दान पा मंगल गाते 
कला शास्त्र विज्ञान न आवा,नित नूतन अभिनन्दन पावा 
देश सभ्यता सब कुछ जाए, सत्ता सुख नहिं जाने पाए 
लोकलाज मर्यादा हीना ,'सब कुछ' करत न होत मलीना 
जो कोऊ तुम्हरो  यश गावे, विहसि प्रशासन कंठ लगावे 
झोला बस्ता तक जो ढोवे,पुलिस सभीत सशंकित होवे 
प्रभुता कोऊ नहिं सके बखानी,आई ऐ एस तक भरते पानी 
दोहा:
धन्य  धन्य तुम धन्य हो, तव प्रताप  को जान 
देवता सब रोवत फिरें,मौन भये भगवान 
-डॉ.राजेन्द्र प्रसाद मिश्र 
(रचना काल:१९९५;'राजेन्द्र स्मृति' से )   


शनिवार, 29 सितंबर 2012

अथातो लंगोट जिज्ञासा!


पहली बार इस  लंगोट पोस्ट को फीड ने लिया ही नहीं -पडी रही है, फिर ट्राई करके देखता हूँ! 

नैतिक चेतावनी:यह एक निहायत फालतू और दिमागी फितूर की पोस्ट है, समय जाया करना हो तभी पढ़ें!
दीवानों मस्तानों की फरमाईश कि चड्ढी चर्चा पार्ट टू भी लिखी जाय.मैंने भी हंसी हंसी में हामी भर दी थी ..सोचा कभी लिख भी दी जायेगी .जब इतना प्रेम मनुहार से कहा जा रहा है तो ..फिर सोचा कि इन दिनों चूंकि तामस भाव का प्राबल्य है तो यह चर्चा भी निपटा ही ला जाय ..क्या पता कब मन सात्विक राजस हो उठे और यह चर्चा धरी की धरी रह जाय ..अब मूड का भी क्या भरोसा.पचपन में बचपन की अठखेलियाँ खेलने लगता है नालायक. अपने संतोष त्रिवेदी जी हैं न लंगोट के पड़े पक्के हैं.उन्होंने पिछली पोस्ट पर इस दिव्य परिधान का महात्म्य छेड़ ही तो दिया-अब यह उनका प्रधान वस्त्र रहा है तो जाहिर है  जिसका जो भी प्रधान होता है वह उसी को बार बार दिखाता फिरता है.जबकि मैंने कई ज्ञात और ओबियस कारणों से पिछली पोस्ट में लंगोट की चर्चा मुल्तवी कर दी थी.मगर संतोष जी की लंगोट निष्ठा से प्रभावित हुए बिना न रह पाए थे .

उपर्युक्त लिंकित पोस्ट पर आप लंगोट के साक्षात दर्शन भी कर सकते हैं!बचपन से ही मैंने लंगोट को चड्ढी का जोडीदार देखा समझा मगर पहना नहीं.चड्ढी जहाँ कम उम्र तक ही अनुमन्य थी लंगोट बड़े बच्चों - किशोरों का स्वीकृत परिधान था.अन्तःवस्त्र की श्रेणी में होने के बाद भी इनका खुला प्रदर्शन एक शगल था मानों यह वह तत्कालीन टैग लाईन थी जो लोगों को प्रगटतः खुद के यानी पहनने वाले के निरापद चरित्र के बारे में आश्वस्त करती थी .. पहलवानों का तो यह एक विशिष्ट अंग वस्त्रं था ही और निश्चित ही नियंत्रित मर्दानगी के प्रदर्शन से जुड़ा था..मगर मुझे लंगोटधारियों का परोक्ष व्यवहार उनके प्रत्यक्ष आचरण से हमेशा चुगली खाते दिखा.लम्बी लंगोट और फिर उसका लाल रंग..मतलब डबल अलंकारिक विज्ञापन..राग दरबारी के कैरेक्टर पहलवान भी लंगोट प्रेमी है जो छत पर लंगोट अभ्यास में पकडे गए थे.मैंने आज तक जो लंगोटें देखीं सभी लाल रंग की ही रही हैं ..

पता नहीं लंगोट का लाल रंग से क्या रिश्ता है? शायद ब्रह्मचर्य का रंग ,निषेध का रंग लाल है इसलिए ही लंगोट भी लाल.लाल रंग से मेरी विरक्ति बचपन से ही इसी लंगोट के चलते शरू हुयी थी.उन्ही दिनों मास्टर साहब कक्षा सात में संस्कृत व्याकरण पढ़ाते हुए लंग लकार पढ़ाते थे और मुझे बरबस लंगोट की याद आ जाती थी ..अजब सा असहजता वाला संयोग आ जुड़ा था यह.पहनी हुयी लंगोट ,शरीर के एक सहज अंग को बुरी तरह कम्प्रेस करती हुयी लंगोट और सूखने के लिए छोडी गयी हवा में लहराती लंगोट..हर ओर बस लंगोट ही लंगोट. और कई लंगोट पहने लोगों की आपसी गहन यारी दोस्ती..गजब का जमाना था वह.मुझे इस परिधान से न जाने क्यों शायद इंस्टीनक्टइव विरक्ति थी इसलिए आह मैं कभी भी किसी का लंगोटिया यार नहीं बन पाया,वैसे कभी कभार कुछ पुराने साथी संगी मिलते ही जब कहते हैं कि यार हम तो कभी लंगोटिया यार हुआ करते थे तो मैं असहज हो उठता हूँ.
कभी लंगोट पहनी ही नहीं तब कैसे हुए लंगोटिया यार?बहरहाल एक बार एक लंगोटिया बाबा का गाँव में आगमन हुआ ..जैसा कि उन दिनों की कस्टमरी थी -बाबा की बड़ी आवाभगत हुयी और वे गाँव में ही ठहर गए ...बचपनकी यादें आश्चर्यजनक रूप से ताजा बनी हुयी हैं -एक दिन बड़ा कोलाहल हुआ.घर के बड़े बुजुर्ग बच्चों को उस कोलाहल से दूर कर रहे थे.किस्सा कोताह यह था कि बाबाकी लंगोट ढीली होने की शिकायत कुछ किशोरवयी लड़कों ने कर दी थी और बाबा फरार थे.उनकी लंगोट नीम की एक निचली टहनी पर लहराती उनकी याद लोगों को अब भी दिला रही थी.एक सज्जन ने इतने बड़े काण्ड के बाद भी उसे बाबा की यादगार मान सरमाथे लगाया.भागते भूत की लंगोट ही सही.
उन्हें पहलवानी का शौक भी था तो अगली बार के पचईयां(स्थानीय त्यौहार) के अखाड़े में वे वही लंगोट पहन के उतरे मगर प्रतिद्वंद्वी पहलवान के पहले दावं में ही चित्त हो गए.मैं भी उस मुठभेड़ का चश्मदीद बना था..कुछ बड़े बूढ़े ज्ञानी लोगों ने उन्हें लाख समझाया कि वह लंगोट उन्हें सही नहीं ( अनुकूल नहीं हुयी ) इसलिए उसका त्याग करना ही श्रेयस्कर होगा..मगर वे माने नहीं और बार बार हारते रहे कुश्तियों में. जीते तभी जब लंगोट बदली ...क्या पता बाबा की लंगोट के ढीली होने का ही असर रहा हो यह :) एक अभिशप्त लंगोट .....
मानव अंग विशेष,लंगोट और सांप इन सभी के आचार व्यवहार में साम्य है-अचानक फैलना सिकुड़ना इन सब में कामन है ..जाहिर है ऐसी गतिविधि भयोत्पादक भी है..यह जरुर कोई आदि (वासी) परिधान रहा होगा जो वस्तुतः एकलिंग -प्रतीक रहा होगा.आदिम अनुष्ठानों में संयोग,जोड़ी चयन की अभिलाषा प्रगट करने की एक प्रतीक पाताका! मगर कालांतर में किन्ही अज्ञात आश्चर्यजनक कारणों से इसे लिंग गतिविधियों का शमनकारी वस्त्र मान लिया गया .. जो भारतीय मनीषा की एक बड़ी चूक लगती है .और यही कारण है कि कई पीढियां लंगोट-ब्रह्मचर्य से जोड़कर किये गए प्रयोग परीक्षणों में बुरी तरह असफल होने के बाद भी संकोचवश असलियत को दीगर मानवता के सामने जाहिर नहीं कर पायीं .गांधी जीने जरुर कुछ साहस दिखाया और अपनी असफलता स्वीकारी -जाहिर है अपने ब्रह्मचर्य के प्रयोगों में उन्होंने भी लंगोट उपकरण का प्रयोग किया ही होगा -मगर अपनी असफलता की ईमानदार स्वीकारोक्ति की .जबकि आपको आज भी कई ऐसे नर पुंगव मिल जायेगें जो लंगोट का महात्म्य बघारते नहीं अघायेगें.इनसे दूर रहिये..हाँ पहलवानों के लिए यह कसा हुआ परिधान उनकी सुविधा के हिसाब से और प्रतिद्वंद्वी की परिधान-पकड़ कमजोर बनने के लिए मुफीद है ..मगर ब्रह्मचर्य के लिए न बाबा न .... 


लगता है इस पोस्ट की भी लंगोट सीमा अब लंघ उठी है इसलिए इस लंगोट महात्म्य पर अभी तो विराम ..फिर कभी कुछ नए लंगोट तथ्य आपसे साझा किये जायेगें! एक लंगोट -यात्रा संस्मरण यहाँ भी

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