मंगलवार, 30 सितंबर 2008

देवी दुर्गा का वाहन सिंह या बाघ !

व्याघ्र वाहिनी माँ दुर्गा !
आज से नवरात्र शुरू हो रहा है -शक्ति पूजा का एक बड़ा अनुष्ठान ! मेरे मन में एक सवाल उमड़ घुमड़ रहा है जिसे मैं आप के साथ बाँटना चाह रहा हूँ -देवी दुर्गा को कहीं तो बाघ और कहीं शेर पर आरूढ़ दिखाया गया है -सबको पता है है कि ये दोनों अलग अलग प्राणी हैं -सभी देवी देवताओं का अपना अलग अलग एक निश्चित वाहन है .इन्द्र का ऐरावत हाथी ,यमराज का भैंसा ,शिव का नंदी ,विष्णु का गरुण ,आदि आदि अरे हाँ पार्वती का व्याघ्र या पति के साथ वे नंदी को भी कृत्य कृत्य करती हैं .वैसे तो मां पार्वती के परिवार में कई वाहन हैं मगर वे चूहे को छोड़ सभी पर ,नंदी-वृषभ ,बाघ और मोर पर भ्रमण करती देखी गयीं हैं .क्या पार्वती का वाहन बाघ और माँ दुर्गा का वाहन शेर है -दुर्गा जी क्या सचमुच शेरावालिये हैं ! मामला पेंचीदा है तो आईये इस मामले की थोड़ी पड़ताल कर लें क्योंकि आज से नवरात्र की पूजा शुरू हो रही है और हमें अपनी अधिष्टात्री के स्वरुप ध्यान के लिए इस गुत्थी को सुलझाना ही होगा ।
पहले तो यह जान लें कि समूची दुनिया में भारत ही वह अकेला देश है जहाँ बाघ और शेर का सह अस्तित्व है .चित्र में आप बाघ और शेर को सहज ही पहचान सकते हैं .अफ्रीका में भी शेर है तो बाघ नदारद ! रूस में बाघ है तो शेर नदारद ! चीन में भी बाघ है पर शेर का नामोनिशान नहीं .भारत का राष्ट्र पशु भी १९७२ तक शेर ही था पर बाघों की गिरती संख्यां से विचलित भारत सरकार ने प्रोजेक्ट टाईगर के साथ ही इस देश का रास्त्रीय पशु भी बाघ घोषित कर डाला ।
तो पहले भारत में कौन आया शेर या बाघ ? कैलाश सांखला जैसे वन्य जीव विशेषज्ञों की माने तो बाघ भारत में सबसे पहले आया .सिन्धु घाटी के लोगों को शेर की जानकारी नहीं थी जबकि उस काल की मुद्राओं पर बाघ की छाप अंकित पाई गयी है .शेर का उल्लेख वैदिक काल से मिलाने लगता है .अब अपने आदि देव शंकर को ही लें -वहां बाघम्बर( व्याघ्र चर्म ) है ,पार्वती बाघ पर आरूढ़ दिखती हैं .कैलाश सांखला जोर देकर कहते हैं कि बाघ भारत में हर हाल में ४५०० ईशा पूर्व से मौजूद है .शेर की मौजूदगी का प्रचुर विवरण सम्राट अशोक के काल से मिलने लगता है .एशियाई सिंहों के बारे में पारसियों को अछ्ही जानकारी थी .ऐसा प्रतीत होता है कि १५०० ईशा पूर्व से भारत में व्याघ्र सत्ता का पराभव और शेर का वर्चस्व शुरू होता है.इसकी पुष्टि संस्कृत साहित्य से भी होती है .शेर की सत्ता स्थापित होने में सम्राट अशोक की भी बड़ी भूमिका लगती है -भारत के स्वतंत्र होने पर सम्राट अशोक की पटना में स्थापित लाट (३०० वर्ष ईशा पूर्व )से ही भारत का रास्त्रीय चिह्न चुना गया जिसमे शेरों को ही प्रमुखता से दिखाया गया है ।अब यह बिल्कुल स्पष्ट है कि भारत में अपनी अपनी सत्ता स्थापित करने की धमाचौकडी बाघ और शेर के बीच आदि काल से चलती रही है -कभी बाघ ऊपर तो कभी शेर ! पर यह तय है कि बाघ ही हमारा आदि साथी है जो इस समय राष्ट्रीय पशु के रूप में ही प्रतिष्ठित है -जब किंग एडवर्ड सप्तम -प्रिंस आफ वेल्स ने १८५७ में बिहार के पूर्णिया क्षेत्र में बाघ का शिकार किया तो वाहवाही में भारतीय बाघ को रायल बंगाल टाईगर का खिताब नवाजा गया .आख़िर वह किसी ऐरे गैरे की गोली का शिकार थोड़े ही हुआ था -तो रायल बंगाल टाईगर भारत में कहीं भी मिलने वाला बाघ है केवल बंगाल तक ही सीमित नहीं ।
तो अब आप ही निर्णय लें कि माँ दुर्गा का आदि वाहन क्या था -मेरी अल्प बुद्धि से तो यह बाघ ही था पर कालांतर के सामयिक परिवर्तनों से उनके भक्त जन भी अपनी अधिष्टात्री को बदल बदल कर वाहन अर्पित करते रहे कभी बाघ तो कभी शेर -पंजाब में तो वे पूरी तरह शेरावालियाँ ही हो गयीं है -इस बार के पूजा पंडालों पर ज़रा गौर करें देवी किस वाहन पर आरूढ़ दिखती हैं -बाघ तो मान शेर पर !वैसे पर वे बाघ पर आरूढ़ हों या शेर पर उनकी शक्तिमत्ता में तो रंच मात्र का फर्क नहीं रहेगा .या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपें संस्थिता ...........

गुरुवार, 25 सितंबर 2008

बिग ब्रदर से बिग बास तक का सफर -कहीं कुछ घपला है !

बिग बॉस की अधिष्ठात्री शिल्पा शेट्टी
इस समय भारत में रियलिटी शो के नाम पर बिग बॉस का डंका बज रहा है .यह अभी पिछले वर्ष इंग्लैंड में चर्चित हुए बिग ब्रथर रियल्टी शो की ही भोंडी/देशी नक़ल मात्र है जिसमें शिल्पा शेट्टी नाम्नी अभिनेत्री को नस्ल भेदी टिप्पणियों से रूबरू होने का मामला सारी दुनिया में काफी उछाला गया था . दरअसल बिग ब्रदर शब्द से ही सुप्रसिद्ध ब्रितानी उपन्यासकार जार्ज आरवेल के मशहूर नॉवेल ,1984 की याद जाती है। `बिग्र ब्रदर इज वाचिंग यू´ (देखो, खूसट दादा/बुड्ढा देख रहा है) इसी उपन्यास से निकला हुआ वह जुमला है जिसका इस्तेमाल प्राय: निजी जीवन में किसी के हस्तक्षेप-ताक झांक के प्रयासों के समय किया जाता है। यह वाक्य-जुमला निजता में हस्तक्षेप के विरुद्ध कुछ न कर पाने की असहायता को भी इंगित करता है।
कभी जॉर्ज आर्वेल जैसे युग द्रष्टा ने प्रौद्योगिकी की रुझान को भांप लिया था और यह पूर्वानुमान कर लिया था कि कालांतर में ऐसी जुगते जरूर बन जांयेगी जिससे हर किसी को हर वक्त वॉच किया जा सकेगा .निजता जैसी बात नही रह जायेगी -यह भविष्य का एक खौफनाक मंजर था -लोग ऐसी दुनिया की सोच से ही खौफजदा हो गए थे -यह भी कोई बात हुयी -सोते जागते ,खाते पीते ,काम केलि तक भी कोई आपको ताक रहा है -देख रहा है .और हाँ आज के मोबाईल ,क्लोज सर्किट कैमरा आर्वेल की उस दूर दृष्टि पर ही मुहर लगा रहे हैं .आज नियोक्ता से बच के आप नहीं रह सकते .....वह हर वक्त आपको घूर सा रहा है !
मगर इस दहशतनाक मंजर को भी रियल्टी शो के जरिये मनोरंजक बना देने की सूझ सचमुच अप्रत्याशित है -बिग ब्रथर और बिग बॉस जैसे शो के जरिये आज लोगों की निजता भी अब बिकाऊ बन गयी है -लोग अपनी निजता भी बेंच रहे हैं और हमारे आप जैसे फालतू लोग ऐसे चरित्रों से तादात्म्य बनाते हुए इन प्रयासों को हिट बना रहे हैं-भारत में कोलोर चैनेल पर बिग बॉस इस समय टी आर पी में हिट जा रहा है -हद तो यह है कि इसके ज्यादा तर पात्र अपने वास्तविक जीवन में अपराधी या नकारात्मक छवियों वाले रहे हैं -मगर रील की अपनी रीयल लाईफ में वे हिट जा रहे हैं -क्या यह लोकरुचि में एक खतरनाक बदलाव का संकेत तो नही है -हम जरायम पेशा लोगों को तो कहीं अपने हीरो के रूप में तो नही देख रहे हैं -क्या पारंपरिक आदर्शों के दिन लद चुके क्या सचमुच अब हमारे सामने अब मोनिका बेदी और राहुल महाजन जैसों का ही आदर्श अपनाने को रह गया है ?कहीं आम लोगों /दर्शकों की सुरुचि प्रियता को को संगठित तरीके से विनष्ट तो नही किया जा रहा है ? क्या जीवन मूल्यों में सायास रद्दोबदल से व्यावसायिकता का नया घिनौना खेल तो नही शुरू हो गया है ?
बिग ब्रदर से बिग बॉस तक का सफर हमें इन बातों को सोचने के लिए मजबूर कर रहा है ! आपकी राय क्या है ?

शनिवार, 20 सितंबर 2008

कविता :अंधकूप से बाहर !

मेरी पहली विज्ञान कविता को आप सुधी मित्रों का अनुमोदन क्या मिला ,मैं अब आपे से ही नही उस अंधकूप से भी बाहर आ गया ,सो लीजिये झेलिये इस दूसरी को भी !
अब हूँ मैं अंधकूप से बाहर


अब हूँ मैं अंधकूप से बाहर
जिसके आकर्षण से आबद्ध
असहाय सा अप्रतिरोध्य ,
खिंचा था सहसा ही उस ओर
उस गहन गुम्फित क्रोड़ में

मगर आश्चर्यों का आश्चर्य
निकल आया हूँ अब उस पार
अप्रतिहत ,बिना हुए अवशेष
उसकी एकात्म दिक्कालिकता
भी न कर सकी मुझे आत्मसात

जाने क्यूं अनुभव करता तथापि
मैं एक नवीन ऊर्जा का संचार
इक पुनर्ननवीं वजूद का सहकार
हर पल ऊर्जित आवेश से लबरेज
मैं आ गया हूँ अब अंधकूप से बाहर



टिप्पणी -
कहते हैं अंधकूप में काल और समय का कोई वजूद ही नहीं होता ....सब कुछ रूका सा , चिरंतन ठहराव लिए -जो कुछ भी उसमें पहुंचा कालातीत हुआ -पर यदि बचा तो .......वह होगा अंधकूप की ही बिना पर अजस्र ऊर्जा से आवेशित -मेरे इस कवि अस्तित्व की ही तरह !

सोमवार, 15 सितंबर 2008

'काम' पर एक काम की पुस्तक !

स्वागत है इस नए अवतार का
विगत दो दिनों मैं आभासी जगत के इतर की दुनियावी जिंदगी में इतना मसरूफ था कि 'टाईमस आफ इंडिया' में अपनी पसंद की एक ख़बर 'थर्टी ईयर्स आन ,ज्वाय आफ सेक्स बैक इन न्यू इनकार्नेशन ' को आपसे लाख शेयर करने के बावजूद ऐसा ना कर सका .और बात आयी गयी हो गयी .मगर जब आज मैं आभासी जगत में फिर वापस आया तो कुछ हटके ने एक झटका लगा ही दिया -उस पुस्तक पर उनकी पोस्ट पहले से मौजूद थी .और फिर मुझसे भी रहा नहीं गया और कुछ आपसे इस मामलें में बतियाना जरूरी हो गया ।
वात्स्यायन के कामसूत्र की कालजयी क्लासिकी की तो कोई सानी ही नही है मगर जिस एक पुस्तक नें मुझे काम पर काम की बातें बताईं वह थी एलेक्स कम्फर्ट द्वारा लिखी गयी यही किताब -जॉय आफ सेक्स .मैंने १९७२ में आयी प्रथम संस्करण वाली इस काम की पुस्तक को १९८२ में ख़रीदी थी और उन दिनों मैं प्राणीशास्त्र से प्रयाग विश्वविद्यालय में डाक्टरेट कर रहा था -डाक्टरेट बोले तो किसी भी जैव अजैव समस्या के तर्क संगत विवेचन का उन दिनों भूत सर पर चढ़ा रहता -वैज्ञानिकों की जगह हमारे लिए देवता तुल्य थी और उसमें भी जीव विज्ञानी अपने धर्मगुरू ही थे .जॉय ऑफ़ सेक्स के लेखक कोई सेक्स विज्ञानी न होकर कीट विज्ञानी थे .अलेक्स कमफर्ट नामक यह -तितली विज्ञानी सेक्स जगत में क्या कर रहा था ?बस जिज्ञासाओं को लग गए पंख और हमने सिविल लाईन्स जाकर कथित भद्र जनों की यह वर्जित पुस्तक खरीद ही तो ली। और आद्योपांत -कामा हलंत फुलस्टाप सब बांच डाला .और इसके लेखक और पुस्तक का मुरीद हो गया .और यह मेरे सीक्रेट शेल्फ को तब से आज तक सुशोभित कर रही है .और जब सुना कि इसका नया संकरण इतने सालों के बाद आ गया है तो लगा कि जैसे वह बीती जवानी सहसा ही लौट आयी है ।यह काम विषयक मामलों की एक प्रमाणिक वैज्ञानिक नजरिये से लिखी पुस्तक है और लेखक ने बड़े परिश्रम से तथ्यों को जुटाया और सचित्र प्रस्तुत किया है .
यह पुस्तक जिसकी मैं जोरदार सिफारिश करता रहा हूँ दरअसल जब आयी थी तब की पीढी के लिए काम विषयक मामलों के स्तरीय ज्ञान की एक बेड रूम बाईबल मान ली गयी थी .छपने की बाद ही इसकी लाखों प्रतियाँ रातो रात बिक गयी थी.अकेले इसी पुस्तक ने लेखक को अरबपति बनादिया था .अब बताया जा रहा है कि इस पुस्तक में काम रसायनों -फेरोमोन आदि की जानकारी देकर इसे अद्यतन कर दिया गया है .क्योंकि उस समय विज्ञान की दुनिया में ये जानकारियाँ नहीं थीं .इसे सूसन क्विल्लिअम जो एक मनोविज्ञानी हैं ने नए संस्करण में ढाला है .इस किताब को अब दम्पतियों के लिए ख़ास तौर पर तैयार किया गया है .पहले यह पुरुषों की ओर ज्यादा उन्मुख थी .जो नए विषय जुड़े हैं उनमें इन्टरनेट पर सेक्स परामर्श ,फोन और चैट सेक्स ,सेक्स दुकानें ,और गर्भावस्था के दौरान रति क्रिया खास हैं.कुछ पहलू हटा दिए गए हैं जिन्हें अब क़ानून की नजर में प्रतिबंधित कर दिया गया है जैसे घोडे की सवारी के दौरान सेक्स ,चलती मोटर सायिकिल पर सेक्स आदि कई देशों में कानूनन प्रतिबंधित है .अब यह २८८ पृष्ठ की भरी पूरी पुस्तक है .
इसके बारे में कहा जा रहा है कि यह सेक्स के प्रति समकालीन वैश्विक चिंतन का प्रतिनिधित्व करेगी और काम सम्बन्धों की चुकती रूमानियत और आनंदानुभूति को वापस लायेगी
सेक्स आज भी एक टैबबू है -मैंने यह शिद्दत के साथ महसूस किया है कि यौन शिक्षा की जरूरत बच्चों की बजाय बड़ों को अधिक है .मुझे आश्चर्य होता है कि दो चार बच्चों को जनने के बाद भी लोग कई काम की बातें नही जानते .मैं उन लोगों से सहमत नही हूँ जो सेक्स को केवल संतति वहन का जरिया ही मानते हैं .इससे जुडी मनोग्रंथियाँ कितने ही दम्पति के जीवन में विष घोलती आयी है.और हम समाज में उसे छुपाते ढापते आए हैं क्योंकि हमारी गुडी गुडी इमेज पर कही दाग ना लग जाए .यह एक व्यापक विषय है इस पर देर सवेर यहाँ या साईब्लाग पर चर्चा तो होगी -क्योंकि अभी तो मैं जवान हूँ और जॉय ऑफ़ सेक्स के चलते और भी जवान महसूस कर रहा हूँ ।
कोई दिल्ली वाले मित्र मुझे इसे उपहार में देना चाहेंगे /चाहेंगी प्लीज ! वहाँ यह आ चुकी होगी और बनारस तथा ईलाहाबाद या लखनऊं में आने तक मुझे सब्र नहीं है.

बुधवार, 10 सितंबर 2008

टिप्पणियाँ ही टिप्पणियाँ : कुछ और चिंतन !

सबसे पहले तो ये दो उद्धरण जो टिप्पणियों के बारे में हिन्दी ब्लॉग जगत के दो पुराधाओं द्वारा अभी कहे गए हैं -
निवेदन
आप लिखते हैं, अपने ब्लॉग पर छापते हैं. आप चाहते हैं लोग आपको पढ़ें और आपको बतायें कि उनकी प्रतिक्रिया क्या है.
ऐसा ही सब चाहते हैं.
कृप्या दूसरों को पढ़ने और टिप्पणी कर अपनी प्रतिक्रिया देने में संकोच न करें.
हिन्दी चिट्ठाकारी को सुदृण बनाने एवं उसके प्रसार-प्रचार के लिए यह कदम अति महत्वपूर्ण है, इसमें अपना भरसक योगदान करें.
-समीर लाल


-- हिन्दी चिट्ठाकारी अपने शैशवावस्था में है। आईये इसे आगे बढाने के लिये कुछ करें. आज कम से कम दस चिट्ठों पर टिप्पणी देकर उनको प्रोत्साहित करें!!
- शास्त्री जे सी फिलिप
ये दोनों ही आग्रह सच्चे मन से किए गए हैं -पर मुझे दुःख हुआ जानकर कि समीर जी की उक्त आशय की टिप्पणी को भी कुछ लोगों ने अन्यथा ले लिया .हम सभी यह जानते हैं कि समीर जी अपने लिए यह भिक्षा नहीं मांग रहे थे -यह लोगों से उनका एक विनम्र उनुरोध भर था .पर खल जनों ने ले लिया उन्हें आडे हाथों !
टिप्पणियाँ एक पारस्परिक संवाद का जरिया हैं ! और निश्चय ही वादे वादे जायते तत्व्बोधः के अनुसार हिन्दी चिट्ठाजगत की गुणवता में उत्तरोत्तर सुधार का संबल भी !यह अपने हिन्दी चिट्ठाजगत में अभी तो एक बहु वांछित गतिविधि होनी चाहिए जिससे सख्य भाव /भातृत्व भाव बढे और हम वसुधैव कुटुम्बकम के भाव की भी प्रतीति कर सकें ।
यह अपने पूर्वाग्रहों ,विशेषता (इलीट) बोध की संकीर्णता से ऊपर उठने का भी एक सुअवसर है -वैसी ही संकीर्णता जिससे बचने का उद्घोष इस वैदिक ऋचा में हुआ है -
अयं निजः परोवेति गणना लघु चेत्साम
उदार हृदयानाम तु वशुधैव कुटुम्बकम !
( यह मेरा यह तेरा तो क्षुद्र मानसिकता वाले करते हैं उदार लोगों के लिए तो यह जगत ही परिवार सा है !)
तो क्या हम उदार हृदय नहीं हैं ! अपनी लघुता में ही आत्म मुग्ध बने रहना चाहते हैं ?अपने ही परिवार की सुध हमें नहीं है ?
चलिए आप थोक में टिप्पणियाँ न करे -समय नही है ,दुनिया में और भी गम /काम हैं इक ब्लॉग्गिंग के सिवा ......पर जनाबे आली कोई अगर आपके लेखन की लगातार चारण परमपरा में गुणगान किए जा रहा है तो आख़िर एकाध बार तो पसीजें हुजूर ! यह इक तरह से शिष्टाचार भी तो है -आप के घर कोई विशिष्ट व्यक्ति कई बार आये और आप उसके यहाँ जाने तक को अपनी तौहीन समझे या समय न होने की बहानेबाजी करते जाएँ -यह क्या उचित है ?यहाँ हर ब्लॉगर विशिष्ट है -सकल राम मय सब जग जानी !
इक दूसरे को सम्मान देना ,प्रत्युपकार करना यह आज के सभ्य समाज के ब्लू बुक में भी है -आप अपनी लम्बी लम्बी पोस्टें ठेलें जा रहे हैं ,टिप्पणियों से आत्म विमुग्ध होते जा रहे है पर दूसरों के लिखे पर टिप्पणी करना आपको गवारा नहीं है -क्योंकि आप विशिष्ट है ,आपके पास समय नहीं है ,और ब्लॉगर तो गधे हैं रेंके जा रहे हैं उन्हें साहित्य की समझ नही है आदि आदि बहाने आपने ख़ुद गढ़ रखे हैं .अरे भाई ! जब इतना समय नहीं तो काहें इतनी लम्बी पोस्ट कर रहे हैं ! क्या उसमें से कुछ क्षण निकाल कर शिष्टाचार ही वश दूसरे को पढ़ लेने और इक शब्द की टिप्पणी ही करने को समय नहीं निकाल सकते आप ? समीर जी और शास्त्री जी का कहना बिल्कुल दुरुस्त है कि इससे प्रकांतर से हिन्दी चिट्ठाकारिता का ही विकास होगा ! क्या आपको इस संभावनाशील अभिव्यक्ति के माध्यम को विकसित करने में कोई रूचि नहीं ? क्या आप अपनी कोई प्रतिबद्धता नही समझते ?? क्या महज आत्म परचार ,आत्मोन्नति ही आपका लक्ष्य है ??
मुझे तो दूसरे क्या लिख पढ़ रहे हैं यह जानना , टिप्पणी करना अच्छा लगता है -पर मैंने भी महज कुछ प्रवृत्तियों को चेताने के लिए सविनय अवज्ञा आन्दोलन आरम्भ कर दिया है ! जो १० बार विजिट ( सन्दर्भ :शास्त्री जी )करने के बावजूद भी आपके घर ना आए उसके लिए करें सविनय अवज्ञा आन्दोलन -बोले तो गांधीगीरी ! जिससे उनका आसन तो डोले ...गुरुडम तो चरमराये !
मित्रों , मैं आपको पढ़ना चाहता हूँ और टिप्पणी भी अनिवार्यतः करना चाहता हूँ क्योंकि आप मुझे पढ़ते है और अपनी स्नेह भरी ,प्रेरणा भरी ,आत्मीयता से ओतप्रोत टिप्पणियाँ भी करते हैं -यह अनुग्रह मेरी संवेदनाओं को गहरे संस्पर्श करता है -मैं कैसे इतना अनुदार हो सकता हूँ कि आपको आभारोक्ति के चन्द शब्द ना कहूं -पर यदि मुझसे कोई अनदेखी हो जाए तो कृपा कर मुझे टोंके और यदि चाहते हैं कि मैं आपको पढू या मेरी प्रतिक्रया -टिप्पणी आपके लिए मायने रखती है तो कहें जरूर मैं यथा सम्भव आप तक अवश्य आउंगा -आप मेरा इन्तजार कर सकते हैं -मैं कृतघ्न नहीं हूँ ! और ना ही किसी विशिष्टता बोध से ग्रसित ही और समय भी निकाल ही लिया जायेगा ! माफ़ करिएगा आपका काफी समय जाया किया पर शायद यह जरूरी था ....!

शुक्रवार, 5 सितंबर 2008

एक विज्ञान कविता !

क्या यह विज्ञान कविता है ? या फिर महज बकवास है ,पढिये और बताईये !
हाँ यह स्वकीया है -
मैं जानता हूँ !
मैं जानता हूँ हो तुम गहन भावों से परिपूर्ण
इक कोना मगर रह गया है अभी भी तुम्हारा
सर्वथा निर्वात और अपूर्ण ,
अंधकूप की तरह खींचे जा रहा है जो मुझे
हर पल छिन और निरंतर अपनी ओर
मैं चाहता हूँ कि अनिभूतियों का कोई कोना
रहे तुममें अनछुआ ,अतृप्त और अपूर्ण
इसलिए ही शायद खिंचता ही आ रहा हूँ
हर पल अबस सा बस तुम्हारी ओर
भरने को अधीर उस अंधकूप के तम को
और
हो जाने को फिर उस पार अक्षत , अविकार
तुम भी अब बेबस लाचार , देखती चुपचाप
नियति के इस मिलन को निरुपाय
यह भी मैं जानता हूँ !
अंधकूप -तारों की वह स्थिति जब वे अपने ही आकर्षण से उस सीमा तक जा पहुंचते हैं कि प्रकाश की कोई किरण तक उनसे बाहर नहीं पाती और वे अदृश्य से हो जाते हैं मगरउनकी आकर्षण शक्ति असीम हो उठती है और अपने परिवेश से कुछ भी अपने में खींच कर समा सकती है -कहते है कि उसमें दिक्काल की सारी सीमायें मिट जाती है -समय रुक जाता है -पर वह ऊर्जा का अजस्र स्रोत भी है !
इस विनम्र प्रयास में कवि अपनी प्रेयसी को अंधकूप के रूप में देखता है और सहज ही उसमें समा जाना चाहता है पर निकलने को भी आशान्वित है !

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