सोमवार, 7 मार्च 2011

अथातो न्यूड जिज्ञासा ...(A)

 माओ और लादेन के साथ निर्वसना अरुन्धती -कला या विकृति ?
इन दिनों चर्चित लेखिका अरुंधती राय के एक निर्वसन पेंटिंग को लेकर गर्मागर्म बहस छिड़ी है ...दिल्ली के एक उदीयमान चित्रकार प्रणव प्रकाश ने यह काम अंजाम दिया है ....मगर इस पेंटिंग के पीछे एक नकारात्मक विचार है -चित्रकार अरुंधती राय के कश्मीर मुद्दे  और नक्सली मामलों पर दिए गए वक्तव्यों से खिन्न है -लिहाजा अपनी तूलिका से उसने अपने रोष को व्यक्त किया है . यह एक खतरनाक बात है -असहमतियों का इस तरह प्रस्फुटित होना शायद ही उचित माना जाय ....भले ही न्यूड , पेंटिंग की अन्य विधाओं की भांति एक सृजन कर्म है किन्तु प्रतिशोध की भावना से कला के उदात्त स्वरुप और उद्येश्य को ही बाधित कर देना उचित नहीं कहा जा सकता ....न्यूड या इरोटिका का एक पक्ष सौन्दर्यबोध से जुड़ा है और वह स्वीकार्य हो  सकता  है -मगर अरुंधती राय की यह पेंटिंग किसी भी दृष्टि से सहज कलाकर्म नहीं है ,नारी की निजता और गरिमा पर भी चोट है ....एक बलात्कारी की भी सोच नारी की गरिमा और चरित्र के  हनन की ही होती है ..एक ब्लॉग पर इस मुद्दे को उठाया गया तब मैंने इसके विविध पहलुओं की पड़ताल की और अब जाकर इस  निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ की चित्रकार का यह कृत्य भर्त्सना योग्य है ....किन्तु इस मुद्दे पर प्रायोजित संकीर्ण सोच से ऊपर उठ कर वस्तुनिष्ट तरीके से कोई निर्णय लेना होगा ...
 उत्तमा जी की कामायनी श्रृंखला  की एक चर्चित कलाकृति

अपने ब्लॉग जगत में पेंटिंग -कलाकर्म से जुडी है उत्तमा दीक्षित जी जिनसे मुझे मिलने का सौभाग्य मिला हुआ है और कामायनी थीम पर उनके कुछ न्यूड ब्लागजगत में चर्चा के विषय बन चुके हैं- अब इस नए इस मुद्दे पर मैंने उनकी राय जाननी चाही -मैंने फोन किया तो वे बनारस के व्यस्त सिगरा क्षेत्र में थीं और अगर शापिंग में नहीं तो फिर ट्रैफिक जाम में फंसी हुयी लगीं -अब इन मुद्दों पर सड़क चलते क्या बात करना मगर उनकी सदाशयता कि उन्होंने इतने संवेदनशील मुद्दे को भी सहजता से लिया और अपने विचार व्यक्त किये . उन्होंने कहा -" महज  चर्चा में आने के लिए  किसी भी सेलिब्रिटी को  न्यूड का सब्जेक्ट बनाना अनुचित और आपत्तिजनक है ..और शायद यह आपराधिक दंड के प्रावधानों के अधीन भी आ सकता है -महानगरो के कलाकार कई बार खुद के अच्छे कार्यों के लम्बे समय तक अभिस्वीकृत (रिकगनायिज ) न होते देख भी निराशा में भरकर ऐसे हथकंडो को तात्कालिक नेम और फेम पाने के लिए उठाते हैं जो दरसअल लांग रन में उनके लिए ही प्रतिगामी (काउंटर प्रोडक्टिव )  हो उठते हैं ...ऐसी  तात्कालिक शोहरत पाने की प्रवृत्ति से नए कलाकारों को बचना चाहिए -हुसैन की नक़ल एक नए कलाकार के लिए आत्मघाती हो सकती है अगर उसका काम एक विकृत मानसिकता लिए हुए है ......" 
राजा रवि वर्मा की कालजयी कृति :सद्यस्नाता

जाहिर है मैं उत्तमा जी के विचारों से शब्दशः सहमत हूँ....न्यूड या इरोटिका का उद्येश्य अगर नैसर्गिकता को उभारना हो -शुद्ध सौन्दर्यबोध का उत्प्रेरण  हो तो एक कलाकृति के रूप में उसका स्वागत हो सकता है मगर किसी को नीचा दिखाने ,उसे मात्र दैहिकता तक ला  प्रस्तुत करने और केवल दृश्य रति के लिए ही ऐसे कलाकर्म का प्रोत्साहन निंदनीय है ...नारी पुरुष के  नग्न शरीर की विभिन्न स्थितियां ,कोण  और परिवेश मनुष्य में कई मनोभावों  को उकसा /उपजा सकती है -वह रागात्मक हो सकता  है और बुद्ध का वैराग्य भी -यह दृश्य के साथ ही द्रष्टा की मनःस्थति और अभिरुचि पर निर्भर करता है ...अतिशय देहरति मनोरोग का भी संकेत है -जहाँ कामुकता का व्यामोह/प्राबल्य  कई रोगग्रस्त प्रवृत्तियों के रूप में प्रगट हो सकता है!यह एक व्यसन बन सकता है और मनोचिकत्सा की मांग   भी कर सकता है ..पोर्नोग्राफी साहित्य /चित्र में  अतिशय  रति / बहु स्त्री गमन की प्रवृत्ति ऐसी ही मानसिक व्याधियां हैं .....नारी या पुरुष का शरीर महज वस्तु मात्र नहीं है -बड़े जतन मानुष तन पावा! 

64 टिप्पणियाँ:

दर्शन लाल बवेजा ने कहा…

आभार इस जानकारी के लिये।

सतीश पंचम ने कहा…

विरोध प्रकट करने हेतु किसी कलाकृति का इस्तेमाल करना मैं बुरा नहीं मानता लेकिन जिस तरह से यहां एक महिला को नग्नावस्था में दिखाकर विरोध प्रकट किया गया है उस नज़रिए को मैं जरूर बुरा मानता हूँ।

लेकिन मामले का दूसरा पहलू यह है भी कि इस मामले को ठीक से समझने पर यूं प्रतीत होता है कि प्रचार पाने की भूख दोनों ओर है चित्रकार की भी और अरूंधति की भी....सो दोनों ही के बीच एक तरह का Symbiotic Relationship है और उसी के तहत दोनों अपने-अपने क्षेत्र में प्रचार प्रसार पा रहे हैं

वैसे कलाकृति के रूप में विरोध करने का बहुत पुराना चलन है। कहीं कहीं मंदिरों में किसी महिला या पुरूष को किसी पशु से संभोगावस्था में लिप्त दर्शाया गया है....साथ ही उस वक्त की प्रचलित लिपि में लिखा भी गया है कि जो कोई इस मंदिर को अपवित्र करने का कार्य करेगा या इस मंदिर की ओर बुरी नज़र से देखेगा उसका कोई पशु ऐसे ही मान मर्दन करेगा जैसा कि इस हाथी / बैल ने इस शख्स का किया है।

जहां तक मुझे याद है मुंबई के 'प्रिंस ऑफ वेल्स' म्युजियम में इसी प्रकार की पशु द्वारा मान मर्दन करते हुए एक प्रस्तर मूर्ति रखी गई है।

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

मिश्रा साहब, विषय वस्तु पर इसे एक निर्भीक, गंभीर लेखन कह सकता हूँ. मगर मैं समझता हूँ कि "उत्तमा" चित्र लेख की महता कुछ कम कर रहा है ! कृपया अन्यथा न लें

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

उत्तमा जी अपनी नग्न चित्रकारी को हकीकत की बयानी कहती हैं.
"जल-प्रलय के समय वस्त्र कहाँ से आये." ..... इस कारण उन्होंने नग्नता उकेरी.
... लेकिन अब तो सभी संसाधन मौजूद हैं फिर क्यों कूँची और रंगों का आश्रय लिया?
यदि उत्तमा जी चाहती तो न्यूड उदाहरणों को पाने के लिये पोर्न प्रभावित मोडल्स की फोटोग्राफी कर सकती थीं. क्यों कूँची को चुना?
एक तरफ सत्य जानते हुए भी प्रसाद ............. सामाजिक बाह्य धर्म को निभा रहे हैं.
दूसरी तरफ उत्तमा जी ................. समझ नहीं आता कि कौन से कला-धर्म को निभा रही हैं?
क्या वे समझती हैं कि नग्नता की दर्शाने की प्रतियोगिता होनी चाहिए.........
यदि कला की उत्कृष्टता का यही एक पैमाना है तो उनसे बढ़कर कलाकार पैदा हो जायेंगे.........
मैं चाहता हूँ कि ....... उत्तमा जी एक बार फिर से विचार करें वे किस दिशा में जा रही हैं?
उन्हें उकसाने वाले हुसैनी मानसिकता के विद्वान् तो काफी मिल जायेंगे किन्तु सही सुझाव देने वाले तो उन्हें शत्रु ही लगेंगे.
उनकी खुद की समझ ही जब जागृत होगी ....... उस समय की प्रतीक्षा रहेगी.

ashish ने कहा…

नग्नता को कला की श्रेणी में मै तो किसी भी दृष्टी कोण से नहीं मानता . चाहे वो हुसैन हो या उत्तमा जी .

दिगम्बर नासवा ने कहा…

आपकी बात से सहमत हूँ ... नारी की गरिमा रहनी चाहिए ... गलत को गलत सिद्ध करने के लिए एक और गलत की जरूरत नहीं होती ... वैसे आशीष जी की बात का मैं भी समर्थन करता हूँ ...

डॉ टी एस दराल ने कहा…

इस तरह कला का दुरूपयोग करना सही नहीं ।
विचारों का मतभेद हो सकता है । लेकिन व्यक्तिगत तिरस्कार इस तरह , तौबा तौबा !

लगता है पोस्ट कर्ता ने अमृता शेरगिल की खुद की बनायी पेंटिंग्स नहीं देखी है! यह एक आर्ट है! इतनी हाय तोबा क्यों ? ने कहा…

ur comment on naari blog was out of context and its good that you have realized it and have given the post and link

रचना ने कहा…

आर्ट यानी कला अमृता शेरगिल ने अपने न्यूड चित्र खुद बनाये थे
न्यूड पेंटिंग्स आर्ट का एक फॉर्म मात्र हैं
न्यूड पेंटिंग्स मे औरत के शरीर नहीं देखा जाता हैं , लोग पेंटर के ब्रुश से उभरे हुए चित्र को देखते हैं
न्यूड पेंटिंग बहुत प्रचलित फॉर्म हैं और हर पेंटर किसी न किसी समय इस फॉर्म को जरुर प्रदर्शित करता हैं ।


अब बात करते हैं हुसैन कि , उनका विरोध मात्र इस लिये हुआ क्युकी उन्होने हिन्दू धर्म के देवी देवताओ की ही न्यूड बनायी ।


फेसबुक और ट्विटर पर अश्लील चित्रों कि भरमार हैं और उनको आर्ट ना ही कहा जाये तो बेहतर हैं । सोशल नेट्वोर्किंग कि साइट्स हैं



मुझे प्रकरण नहीं पता हैं
लेकिन
प्रतिभा की पोस्ट मे साफ़ लिखा गया हैं कि

" यहां तो यह भी स्पष्ट नहीं है अरुंधती ने यह चित्र स्वयं बनवाया या यह उस चित्रकार के दिमाग का खुराफात है।"

यानी कहीं न कहीं ये चित्र अरुंधती को "सही " करने के लिये बनाया गया हैं और अगर ऐसा हैं तो इसकी जितनी निंदा की जाए कम हैं ।


ये हमारे समाज का आइना हैं कि अगर आप किसी नारी से असहमत हैं तो उसके शरीर से वस्त्र उतार ले । उसकी निजी जिन्दगी को उजागर करे ।



हिंदी ब्लॉग जगत मे भी ऐसे प्रकरण हुए हैं
एक बार नहीं कई बार ।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

अरुन्धती के न्यूड का कला से दूर दूर तक का संबंध नहीं है।

Rahul Singh ने कहा…

बेहतर हो कि इस मसले पर कम बात की जाए.

सतीश सक्सेना ने कहा…

मुझे राहुल सिंह जी की बात ठीक नज़र आती है ! शुभकामनायें आपको !

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

इस पोस्ट में अंकित उत्तमा जी के विचारों से पूर्णतया सहमत।

Arvind Mishra ने कहा…

@प्रतुल जी ,
"उन्हें उकसाने वाले हुसैनी मानसिकता के विद्वान् तो काफी मिल जायेंगे किन्तु सही सुझाव देने वाले तो उन्हें शत्रु ही लगेंगे. "
क्या कहने! मैं अब कुछ बोलूँगा तो आप बोलेगे की बोलता हूँ -यह दुनियां इतनी ही नहीं है जिसे हम अपनी दो छोटी छोटी आँखों से देख लिया करते हैं :) आई डोंट थिंक लेडी वुड बी इम्प्रेस्ड विथ दिस सोर्ट ऑफ़ इम्पैथिक स्टेटमेंट ... :) सही इज दिफेरेंट!
आप आये इधर भी बहार आई :)

Arvind Mishra ने कहा…

@सतीश पंचम जी,
मुझे लगता है नारी पशु संसर्गों के चित्रण के पीछे कोई दंडादेश नहीं है बल्कि मानवीय परवर्जन या कल्पनाशीलता की ही अभिव्यक्ति है!
आज भी ऐसी पोर्नो -अभिव्यक्तियाँ आम बात हैं !

Arvind Mishra ने कहा…

@प्रतुल जी ,
सही इज दिफेरेंट!=
*शी इज डिफ़रेंट

Arvind Mishra ने कहा…

@राहुल जी एक संक्षिप्त सा कमेन्ट देकर अपनी उपस्थिति भर देना चाहते थे....और उस लिहाज से वही कमेंट फिट था ..मगर सतीश जी भी जेंटलमैन दिखने का मौका नहीं चूके ... :)
अभी तो कितने और भद्र पुरुष हैं जो उजाले में दिखना ही नहीं चाहते ...बस अँधेरा पा फास्ट हो जाते हैं .....हा हा नो पन ईंटेन्डेड!

अभिषेक मिश्र ने कहा…

"ये हमारे समाज का आइना हैं कि अगर आप किसी नारी से असहमत हैं तो उसके शरीर से वस्त्र उतार लें। उसकी निजी जिन्दगी को उजागर करें।"

रचना जी के इस विचार से सहमत हूँ.

विकृत मानसिकता का परिचायक है ये(यदि तात्कालिक प्रचार की भावना ना भी हो तो.

Arvind Mishra ने कहा…

@क्या बात है अभिषेक जी !वाह !
रचना जी के विचारों से सहमत होने वाले अभी भी ब्लॉग जगत में हैं:)
जाहिर है ब्लॉग जगत का भविष्य उज्जवल है (नो पन ! )

राज भाटिय़ा ने कहा…

हम तो राहुल सिंह जी की बात से सहमत हे जी

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सौन्दर्य अपनी सीमायें कब लाँघ जाता है, पता ही नहीं चलता है।

अनूप शुक्ल ने कहा…

इस पोस्ट के माध्यम से यह पता चल गया कि कौन सी पेंटिंग आजकल चर्चा और तथाकथित विवाद में है।

जब कलाकार ने खुद कहा है कि उसने किस मन से यह पेंटिंग बनायी तो इससे साफ़ है कि इसका कला से कुछ लेना-देना नहीं है। यह विरोध प्रकट करने का उसका तरीका है। जैसे लोग किसी के प्रति गुस्सा जाहिर करने के लिये पुतले बनाते हैं, जलाते हैं वैसे ही उसने अरुंधती राय की पेंटिंग बनायी। विरोध का यह तरीका एक घटिया तरीका है।

उत्तमा जी से सहमत होने में कोई हर्ज नहीं है। रचना जी की बात भी काबिलेगौर है। अच्छा मौका है कि हम राहुलजी और सतीश सक्सेना जी से भी सहमत हों ले। :)

और सब ठीक लेकिन एक बात किंचित आश्चर्यजनक लग रही है कि आपको नारी, न्यूडिटी और सौंन्द्रर्यबोध पर अपनी बात कहने के लिये किसी के (उत्तमा जी) विचार का सहारा लेना पड़ा। क्या हो रहा है यह सब भाई! आप तो खुदै इस मामलें सक्षम, समर्थ विद्वान हैं। हालांकि पोस्ट खतम करते-करते आपका आत्मविश्वास लौट आया लेकिन इस मसले पर अपनी बात कहने के लिये आप किसी दूसरे का सहारा लें यह बात जरा हजम नहीं होती ! :)

चौपाई लिखने में फ़िर आप गड़बड़ा गये।
बड़े जतन मानुष तन पावा
ये सही नहीं भाई! सही चौपाई है:
बड़े भाग मानुष तनु पावा :)

Shiv ने कहा…

हम डॉक्टर दराल, रचना जी, द्विवेदी जी, राहुल सिंह जी, सतीश सक्सेना जी, राज भाटिया जी, प्रवीण जी और आपसे सहमत हैं.

Arvind Mishra ने कहा…

अनूप जी ,
अर्धाली दुरुस्त करने हेतु आभार
जब पुरुष कवच कमजोर होने लगें तो नारी को ढाल बनाने में हर्ज क्या है :)
सौवें अन्तराष्ट्रीय वर्ष पर अब उसकी भी खाल मोटी हो चली है ..अबला अकहान रही वो!
देख तो रहे हैं न्यूड का नामा सुन कर लोग भाग खड़े हुए हैं और बिना बहस मुबाहिसा सहमत हुए जा रहे हैं ! :)

Arvind Mishra ने कहा…

**अब अबला कहाँ रही वो

सञ्जय झा ने कहा…

kal post dekha ..... aaj padha aur
sabhi se sahmat hokar ja rahe hain...

pranam.

प्रवीण शाह ने कहा…

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देव,

प्रणव प्रकाश चाहे जो कुछ कहें...

मुझे तो उनकी पेंटिंग कुछ इस तरह समझ में आई...

'सर्वहारा का हित' नामक वस्त्र पहने माओ, 'इस्लाम के सिद्धांतों व स्वयं इस्लाम की रक्षा' नामक वस्त्र धारण किये लादेन तथा 'मानवाधिकार, पर्यावरण रक्षा' आदि बडी-बड़ी बातों को धारित करती हुई अरूंधति अपने जीवन काल में ही अनावृत हो गये... दिख गया सभी को, कि अंदर से कैसे हैं ये लोग, कितने खोखले हैं यह... यही दिखता है मुझे तो इस पेंटिंग में !...

कला की यही तो खूबी है कि कलाकार के हाथ से निकलने के बाद हर कोई उसे अपनी सोच के हिसाब से इन्टरप्रैट कर सकता है... मिसाल के तौर पर मुझे यह पेंटिंग अच्छी लगी... जैसा मैंने देखा ऊपर समझा भी दिया है... कोई जरूरी नहीं कि हर कोई मेरे जैसा ही देखे या देखना चाहे... मुझे उनकी परवाह नहीं... ठीक इसी तरह जो उसे अश्लील मान, नारी की गरिमा के विरूद्ध मान, विरोध कर रहे हैं, उनकी अपनी सोच है, उन्हें मेरी परवाह नहीं करनी चाहिये... यही जिंदगी है...चित्रकार को चर्चा में रहने का मौका मिल रहा है व इसी बहाने कुछ लोग कला को समझने का प्रयास भी करेंगे, यह और अच्छी बात है... यानी पूरे प्रकरण से कुछ पोजिटिव ही निकल कर आ रहा है... :)

अब आते हैं दूसरे मुद्दे पर... मैं जानता हूँ कि मेरे ऐसा कहने पर कुछेक बहन-बेटी पर उतरने वाले भी मेरे पीछे पड़ेंगे... पर 'न्यूड' खुद में एक आर्ट फॉर्म है... यदि आप कला की विधिवत शिक्षा लेते हैं तो पहले आप मानव देह के विभिन्न अंगों को बनाना सीखते हैं... इसके बाद नंबर आता है नग्न मानव देह को कागज पर उतारना सीखने का... जब तक आप यह सही तरह से नहीं सीखेंगे, आप वस्त्र धारण की हुई मानव आकृतियाँ भी सही तरीके से नहीं बना पायेंगे... जो लोग उत्तमा जी के चित्र पर आपत्ति जता रहे हैं साफ सी बात यह है कि उन्हें कला की समझ नहीं है व किसी चित्रकार से भी कभी उनका परिचय नहीं रहा है... हमें यह समझना होगा कि मानव देह में कुछ भी हेय नहीं है... देह का अपना सौंदर्य था, है, और रहेगा... कोई बाहर से कुछ भी कहता रहे 'देह' आपकी सोच में, आपके सबकांशस में रहती है हमेशा... कितनी देह दिखाई जाये कितनी नहीं... पढ़े लिखे अनपढ़ अगर इसका निर्णय करने लगेंगे (जैसा कुछ कर भी रहे हैं) तो एक समय ऐसा आयेगा कि स्त्री के चित्रण के नाम पर केवल बुरके जैसे परिधान में लिपटी आकृति को ही चित्रांकित करने दिया जायेगा... क्या आप ऐसा चाहते हैं ?





...

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

.

यदि मानवदेह पर ही चित्रकार अभ्यास करके सीखता है और उसकी कल्पनाशीलता इतना ही जोर मारती है तो
हुसैन जैसे कलाप्रेमियों से कहूँगा कि वे 'एक मुल्ले का पूर्ण नंगा चित्र ईमानदारी के साथ बनाएँ. खतने का ध्यान रखते हुए...
और उत्तमा जी चाहूँगा कि वे 'स्त्री नग्न चित्रों' में स्वयं की छब को उतारें... यदि ऐसा हुआ तो वे इस युग की लक्ष्मीबाई कहलायेंगी.

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प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

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एक हुसैन-युग की कविता आज़ याद आ रही है, सुनें :

सुन बे फ़िदा हुसैन !
चित्रकारी आप करते
मन मुताबिक़, हैं...न !
माधुरी दीक्षित का तू ही
है बड़ा... सा फैन.
बीती जवानी अब बुढापे में करे बेचैन.

रख हृदय में ले तू जितनी
माधुरी दीक्षित की चाहत.
और जितने भी बना ले
चित्र उसके, फिगर में रत

बर्दाश्त कर सकता
मैं तेरी ... ये हिमाकत.

किन्तु जब तू छोड़
औरत, माँ को अपनी
बनाता है चित्र नंगे ... दूसरों के
भूल जाता
कौन के तू देश रहता?

माँ यहाँ की शारदा है .. ज्ञान की
जो कुछ नहीं बोलेगी तुझसे
.......... जान बालक.

किन्तु उसके सगे बालक
सामने होने न देंगे
माँ बहिन बेटी को नंगा.
........ चित्र में ही क्यों न हों.

हिम्मत नहीं तेरी.
बना ले
माधुरी के
पूर्ण नंगे, चित्र
जिसकी कर सके तू
जीतेजी उसके, नुमाइश.

कल्पना कर चित्र गढ़ना
ख्वाइश तेरी
है अगर तो
बना मेरी सोच से तू
तो तुझे मानूँ
मैं मजनूँ
माधुरी का.
सच्चा प्रेमी
चित्रकारी का.

"अल्लाह तुम्हारा खड़ा नंगा
दीखता परदे के पीछे
उस अँधेरे में
'वहाँ पर'
है जहाँ पर,
रोशनी का गोल घेरा."

[यदि उत्तमा जी इस पथ पर चलती रहीं तो मैं उन्हें ऎसी-ऎसी कल्पनाएँ सुझाउँगा चित्र बनाने की वे महान चित्रकार तुरंत बन जायेंगीं.]
और आगाह करता हूँ कि जब मैंने हुसैन पर रहना की थी तब काव्य-क्षमता अधिक मेच्योर नहीं थी और अब ..??... सोच लें.
कैसी प्रसिद्धी पानी हैं उन्हें? फैसला उनके हाथ में...

.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

# हुसैन पर रहना
@ हुसैन पर रचना

Arvind Mishra ने कहा…

@प्रतुल जी
आपके मानदंड के मुताबिक़ तो अमृता शेरगिल को आज की रानी लक्ष्मीबाई का खिताब मिलना चाहिए -
वैसे एक महान वीरांगना का के नाम को यहाँ खीचने की सोच मुझे हैरान कर रही है -पुनर्विचार करना चाहें !

Arvind Mishra ने कहा…

@प्रवीण शाह जी -
आपकी बातें तर्कपूर्ण है मगर फिर भी साध्य की प्राप्ति में साधन की शुचिता का ख्याल रखना चाहिए !

सोमेश सक्सेना ने कहा…

अच्छा मुद्दा उठाया है आपने... मैं देर से आया पर अच्छा ही रहा, दूसरों के विचार भी पढ़ने को मिल गए.
मैं आपसे सहमत हूँ इस मसले पर. बस ये कहना चाहता हूँ कि इन मुद्दों पर बात क्यों न की जाए?
अक्सर विभिन्न ब्लॉग पर इस तरह की टिप्पणियां पढता हूँ के ये मत देखिए, ये मत पढ़िए, ये मत बोलिए आदि...
आखिर क्यों? सबकुछ हमेशा अच्छा तो नहीं होता और न ही ऐसा मान लेने से कुछ अच्छा हो जाएगा.
ब्लॉगर केवल बुद्धि-विलास और हास परिहास के लिए तो नहीं होता, उसके कुछ सामाजिक सारोकार भी तो होने चाहिए न?

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

'लक्ष्मीबाई' अब केवल नाम न रहकर 'वीरता' का पर्याय हो गया है.
और दूसरे, मेरा उद्देश्य भटकी सोच को सही दिशा देना था.
खैर, विद्वता तो विपक्षी सोच के भी कम नहीं दर्शा रहे.
हर व्यक्ति का अलग-अलग परिवेश में सांस्कृतिक पोषण होता है... इस कारण मत-विविधता दिखती है.
फिर भी आपने एक सार्थक बहस चलाकर हम सभी को लपेट लिया है. साधुवाद.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

.

क्षमा, मुझे भी अब लग रहा है कि 'वीर स्त्री' के लिये मुझसे अनुचित स्थान पर 'लक्ष्मीबाई' नाम प्रयुक्त हो गया है.

.

Shiv ने कहा…

बहस करने के बाद सहमत होकर समय क्यों जाया किया जाय? बात-बात में सहमत होने से हिंदी ब्लागिंग का स्वर्णकाल शुरू हो जाएगा:-)

Suresh Chiplunkar ने कहा…

डॉ साहब, देर से आ पाया, क्षमा…

बिना किसी लाग-लपेट, पाखण्डवाद और कूटनीतिक बयान के, मैं खुल्लमखुल्ला कहना चाहता हूं कि मैं इस पेंटिंग(?) से पूरी तरह सहमत हूं…
=====

"पेंटिंग" के सामने प्रश्नवाचक चिन्ह इसलिये लगाया क्योंकि यहां विद्वतजन उसे पेंटिंग मानकर बहस कर रहे हैं, जबकि वह एक "उचित और करारा" जवाब भर है, कोई कलाकृति नहीं…। और कृपया भाई लोग इसमें "नारी-वारी" न देखें… यह एक विशुद्ध राजनैतिक चित्र है… "शठे-शाठ्यम समाचरेत" शैली में। :) :)

Arvind Mishra ने कहा…

@चिपलूनकरजी,
तो फिर यह न्यूड नहीं है सारा मजा किरकिरा !

Satish Chandra Satyarthi ने कहा…

चिपलूनकर जी की बात में दम है...
मैं इस तरह के कला प्रदर्शन का विरोधी हूँ चाहे वो हुसैन जी ही क्यों न करें...
पर जो 'कला' और 'अभिव्यक्ति' की स्वतंत्रता के झंडाबरदार है उन्हें इसे भी कला के रूप में स्वीकार करना चाहिए....
उपन्यासकार समीर लाल 'समीर' को पढ़ने के बाद

अमित शर्मा ने कहा…

कला पक्ष के बारे में तो क्या कहे चूँकि जानते नहीं .................... पर अरुंधती जैसे नग्न(अश्लील, प्रचार-पिपासु, देश-द्रोही) व्यक्तित्व को सही मायने में चित्रित किया है ( नर/नारी को नहीं ) ......................... पर सोचने लायक बात यह है कि यह कलाकार नारी देह को ही क्यों नंगे बनाते है ???? जबकि कला तो पुरुष देहयष्टि में भी मुखरित होनी चाहिये !!!! ......................... बेशर्म अरुंधती को ही नकाब हीन क्यों किया गया, हरामखोरी पे उतरे गिलानी/जिलानी, दिग्विजय को साथ क्यों नहीं लिया .

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

नारी ब्लॉग से इस विषय में पता चला था परन्तु मैं अपने विचार वहां प्रकट करने का साहस नहीं कर पाया था पर अब आपके समक्ष वैचारिक उदंडता कर ही दूँ . मेरे हिसाब से यदि चित्रकार ने अपने दिल की भड़ास निकलने के लिए अरुंधती जी का यह नग्न चित्र बनाया है तो उसे दण्डित किया जाना चाहिए और अगर ये चित्र अरुंधती जी की सहमति से बना है तो हम जैसे कम अक्ल आम जनों के लिए चित्र की मूल प्रति भी उपलब्ध कराई जाय ताकि हम मूल चित्र को गहराई से निहार कर ये जांच सकें की चित्रकार असल की कितनी नक़ल कर पाया है.



भई अपना तो मानना है की नग्न चित्रकला विचारने के लिए नहीं बल्कि निहारने के लिए होती है.

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

खजुराहो की कला के आयाम भी देखने चाहिये..ऐसे चित्रों के आने के उपरांत कम से कम किसी वर्ग की साजिश कह कर किये जाने वाले साधारणीकरण को धक्का लगेगा।

Udan Tashtari ने कहा…

बड़े लोगों की बड़ी बड़ी बातें...जाने क्या उद्देश्य होता है.....

हमारी समझ से परे है.

Arvind Mishra ने कहा…

आखिर पंच जमावड़ा हो ही गया और महत्वपूर्ण विचार आये और पोस्ट सार्थक हुयी -
स्पष्ट है विषय पर विभाजित मत है -मगर कुछ उभार -बिंदु निम्नवत हैं -
अरुंधती राय को लेकर एक वैचारिक तबका बहुत क्षुब्ध है -ऐसी नारी सनातन व्यवस्था में स्वीकार्य नहीं रही है -और उसका नाक कान सुरक्षित नहीं है -सरकार को फ़ौरन उन्हें जेड प्लस सुरक्षा मुहैया उपलब्ध करानी चाहिए -रामदेव जैसी ...
मैंने चर्चा केवल न्यूड के उदात्त रूप को लेकर करनी चाही थी जो महज निजी भड़ास को निकालने का जरिया न होकर उत्कृष्ट मुक्ताभ नग्न सौन्दर्य को जस का तस प्रस्तुत करने को अभीप्सित थी -
अमित ने कहा नारी ही क्यों पुरुष भी क्यों नहीं ? नारी चित्रकार इसका जवाब दें तो ज्यादा उचित होगा ...
विचार शून्य ने नाम के विपरीत एक अद्भुत विचार प्रस्तुत किया कि नग्न देह निहारने के लिए होती है विचार करने के लिए नहीं -मगर यह भी तो एक मुखर विचार है :)
पंचों की राय सर माथे -आप सभी को बहुत आभार !हाँ चित्रकार ही नहीं आया अब तक :) कोई उलझन होगी :) :)

Uttama ने कहा…

बहस में देरी से भाग लेने के लिए क्षमा-याचना। यह देरी बे-वजह नहीं थी, मेरी सभी की बात सुनने की इच्छा थी। लोग जानकारी न होने की वजह से आम तौर पर कला पर चर्चा से बचते हैं। अरविंद जी ने यह पहल की है। विद्वानों ने चर्चा में भाग लिया है और अपनी बातें कही हैं। कलाकारों और कला के बारे में हम कुछ ज्यादा ही बोलने की आदत पाले हुए हैं। बोलने में बुराई नहीं लेकिन इस बात का तो ध्यान रखा जाना जरूरी है कि हम लोगों को अपनी बात समझा भी पाएं। एक सज्जन ने शायद मेरी प्रोफाइल देखे बगैर ही कमेंट कर दिया। वह जानते नहीं थे कि मैं चित्रकार हूं, न कि फोटोग्राफर। आगरा में एक मनोचिकित्सक हमारे पारिवारिक मित्र हैं। एक बार उनसे चर्चा हो रही थी कि क्यों लोग महिलाओं पर टिप्पणियां ज्यादा करते हैं जबकि न्यूड चित्र तो पुरुषों के भी रचे जाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि हम पुरुष अपनी कुंठाएं उजागर करने में जल्दबाजी करते हैं। कलाकार महिला हो तो यह कुंठाएं और बढ़ जाती हैं। या कोई कलाकार न्यूड महिला फिगर बनाए तो भी हमारा हाल यही होता है। मैंने कई शो किए, हजारों लोगों से बातचीत हुई और मेरा निष्कर्ष यही है कि प्रगतिशील लोगों के साथ ही औसत मानसिकता के लोग भी कला को कलाकार का विषय मानते हैं और चाहते हैं कि उसे रचने की आजादी दी जाए। कलाकार यदि सच्चा और ईमानदार है तो वही कला निखरकर आएगी जो लोगों को समझाएगी और आनंदित करेगी। मकबूल फिदा हुसैन हों या ताजा मामले वाले प्रणव प्रकाश, महज चर्चा पाने के लिए न्यूड रचें तो जरूर विवाद फैलाइये लेकिन यदि मेरी तरह ईमानदार प्रयास हो तो कम से कम उसे समझने के बाद बोलने की जहमत उठाइये। जयशंकर प्रसाद की कामायनी में प्रलय के पश्चात का चित्रण है, अब बताइये कि प्रलय में सब नष्ट हो गया हो तो वस्त्र दिखाना कहां तक उचित है। श्रद्धा और मनु को वस्त्र विहीन दिखाना ही ठीक है। अब श्रद्धा का सौंदर्य दिखाना आसाना हो जाता है और मनु का शरीर सौष्ठव। यह मकबूल की वह कलाकृति नहीं है जिसे दर्शक को समझाने और उकसाने के लिए सरस्वती लिखा जाए। प्रणव थोड़ा चूक गए, उन्हें अरुंधती की मानसिकता यदि खराब लगी तो उसका न्यूड चित्रांकन करते। यहां अरुंधती न्यूड भी बनानी पड़तीं तो गलत नहीं था। अरविंद जी ने बिल्कुल ठीक कहा है कि असहमतियों का इस तरह प्रस्फुटित होना शायद ही उचित माना जाए, भले ही न्यूड , पेंटिंग की अन्य विधाओं की भांति एक सृजन कर्म है किन्तु प्रतिशोध की भावना से कला के उदात्त स्वरुप और उद्देश्य को ही बाधित कर देना उचित नहीं। पंचम जी की बात से फिलहाल समापन करती हूं कि कला की आलोचना का हमारे यहां पुराना चलन है। इसमें मुझे सिर्फ इतना जोड़ना है कि हम अपनी तरफ नहीं देखते, अपना आचरण सुधारे बिना बोलते हैं। जब कलाकार की बात आ जाए तो बोलने की यह आदत ज्यादा जोर पकड़ लेती है। हम कलाकार हैं, हमें अपने मन का करने की आजादी है और आग्रह है कि इसे बरकरार रखें। तानाशाही का पतन मिस्र में हाल ही में हुआ है और लीबिया में यह संकट में है। बाकी बातें बाद में।

ZEAL ने कहा…

चित्रकार मानसिक रूप से विक्षिप्त लगता है ।

अनूप शुक्ल ने कहा…

उत्तमाजी की टिप्पणी और उनके तर्क से सहमत!

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

अच्छा हुआ जो एक बार पुनः आया। उत्तमा जी से पूरी तरह सहमत हूँ।

कलाएँ भाव-स्थितियों की व्याख्याएँ हैं, इस मनु-श्रद्धा सन्दर्भ में प्रसाद जी ने शब्द से किया, उत्तमा जी ने कूची से। जिसे कुछ लोग नग्नावस्था का चित्रण कह रहे हैं वह भाव-सघनता के व्यक्तीकरण के रूप में देखा जाना चाहिये।

Neeraj Rohilla ने कहा…

अरविन्दजी,
हमें तो कुछ बुरा नहीं लगा कामायनी वाली पेंटिंग में और अरूंधती वाली पेंटिंग के बारे में अभी तक राय कायम नहीं हो पायी है, सो उस पर विचार मुल्तवी।

बाकी इस विषय पर संयत रूप से विचार रखने और अपने ब्लाग पर एक बहस आमन्त्रित करने के लिये आभार । उत्तमा जी का जवाब पढकर काफ़ी कुछ सोचने का मौका मिला ।

आभार,

Arvind Mishra ने कहा…

@शुक्रिया उत्तमा जी ,आपने एक कला सर्जक के पक्ष को प्रभावपूर्ण तरीके से रखा -यह आवश्यक था ....
सभी चर्चा प्रतिभागियों का आभार !

Uttama ने कहा…

सार्थक चर्चा के लिए सभी का आभार। कला में नग्नता पुराना विषय है और उस पर मंथन का मंथा हुआ दौर चलता रहे, यह बेहद अच्छी बात है। अरविंद जी का एक बार फिर आभार। मेरे विचारों में एक कलाकार की छिपी हुई शिकायत भी थी। परेशान इसलिये थी कि हम कलाकार क्यों बे-वजह कठघरे में खड़े कर दिए जाते हैं। उसके लिए भी जो किसी तथाकथित कलाकार ने चर्चा बटोरने के लिए रचा। यहां जो चित्र रचा गया है, वह मात्र चर्चा में आने के लिए रचा गया है। उसका रंग और आकृति संयोजन सृजन में गंभीरता का स्तर बता रहा है।

क्षितिजा .... ने कहा…

देरी से आने के लिए माफ़ी चाहूंगी मिश्रा जी .... पोस्ट पढ़ी और कमेन्ट भी ... सभी विद्वान् हैं यहाँ .. फिर भी कोशिश करुँगी अपने विचार रखने की ...

बात जहां से आपने शुरू की थी सबसे पहले वो ... अरुंधती रॉय की न्यूड पेंटिंग .. चाहे कुछ भी हो लेकिन अपना विरोध प्रकट करने का ये कोई तरीका नहीं है ... ये चित्रकार की बीमार मानसिकता दर्शाता है ...

दूसरी बात महिलाओं के न्यूड चित्र बनाने को ले कर.... मैंने कहीं पढ़ा था की दुनिया ke sabhi जानवरों में जितनी भी जातियां हैं उनमें मनुष्य जाति को छोड़ कर सभी में नर जादा सुंदर होता है .. चाहे मोर हो .. शेर हो .. या कोई भी साधारण सा जीव जंतु ... लेकिन कवल मनुष्य जाति मैं मादा को सुंदर बनाया गया है... और ये बात पुरातन समय से चित्रकार जानते थे ... पुराणी कला कृतियों में उसका प्रदर्शन साफ़ दिखाई देता है उनमें आजतक किसी ने नहीं कहा की वो वल्गर हैं...क्यूंकि जिन कलाकारों ने वो बने थीं ... वो केवल सुन्दरता दिखाना चाहते थे ... पुरुष की यदि न्यूड पेंटिंग है भी तो किसी का ध्यान उस पर नहीं जाता और कोई कमेन्ट भी नहीं करता ... 'अपवाद' की बात छड़ें तो ;) ....

अब बात महिला चित्रकारों की ... तो मुझे लगता गई जितनी संवेदनशीलता से एक महिला .. एक महिला का न्यूड चित्र बना सकती है उतना कोई पुरुष नहीं बना सकता ... क्यूंकि वो हमेशा स्वयं को उसकी जगह रखेगी ... कोई भी ऐसी baat jisse एक नारी के सम्मान को ठेस पहुंचती हो .. कभी भी नहीं करेगी ..wo kabhi bhi kewal nudity dikhane ke liye chitra nahi banayegi ... इसका उद्धरण उत्तमा जी की पेंटिंग मैं साफ़ दिख रहा है ... और क्या कहूँ ...

शुभकामनाएं

Arvind Mishra ने कहा…

@आपका दृष्टिकोण प्रशंसनीय है क्षितिजा जी ....बहुत स्पष्ट और बुद्धिगम्य विचार हैं ...

मदन शर्मा ने कहा…

आदरणीय अरविन्द जी! जो बात गलत है वो सदैव गलत ही होगा. सच्ची कला तो वो है जिसका आनंद पुरे परिवार के साथ उठाया जा सके. आप स्थिर मन से सोचिये क्या हम ऐसी पेंटिंग्स अपनी पुत्री के साथ देख सकते हैं? उनके सवालों का जबाब दे सकते हैं ? यदि नग्न चित्रण में कला दिखती है तो हम वस्त्र क्यों पहनते हैं. क्या नग्न होना ही प्रगतिशीलता है. यदि यह उचित है तो फिल्मो में सेंसर क्यों? प्ले बाय जैसी पत्रिका पर प्रतिबन्ध क्यों ?

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

नग्नता* प्रतिष्ठित करने का अब चला चलन
है स्टिकी चेपी वाली नारी सम्मानित जन.
'उपभोग वस्तु' आवश्यकता होती मौलिक.
है भोगवादि कल्चर की नारी सिम्बोलिक.
मैं क्यों न कहूँ कटु उक्ति, देखता हूँ सब कुछ.
अब नहीं हुवे संकोच देखने में दो कुच. ....


'नील परिधान बीच सुकुमार' की बात करने वाले प्रसाद जैसे कला मर्मज्ञ को नीचा सिद्ध करने वाली आज़ की 'उत्तम कला' मर्मज्ञा उस परिधान को ही अंतर्धान किये दे रही हैं. धन्य है आज़ की अ-संकुचित सोच.
आदिवासी तक अपने समय में पेड़-पत्तों से तन ढककर अपनी शिष्टता का परिचय दिया करते थे. लेकिन सर्वसाधन-संपन्न भोगवादी मानसिकता अपने अतीत स्त्री-पुरुषों को निहायत जाहिल मान बैठी है.
मैं मदन शर्मा जी बात पर अपनी सहमती दर्ज करता हूँ.

Arvind Mishra ने कहा…

प्रतुल जी ,
व्यक्ति के सोच पर उसके लालन पालन बचपन के अनुभवों ,पारिवारिक सोच और परिवेश आदि का बड़ा प्रभाव होता है ...
मगर व्यक्ति को अभ्यास से वस्तुनिष्ठता की और उन्मुख होते रहना चाहिए ....
दोष नग्नता में नहीं उसे देखने वाली दृष्टि में है .....हम कई टैब्बूज और वर्जनाओं से ग्रसित होते हैं -कला का आस्वादन कलाकार की दृष्टि से भी क्यों न करें ...
न्यूड और इरोटिका भी अपनी अपनी पसंद का मामला है -कुछ लोग व्यक्त कुछ करते हैं मगर बंद कमरों में तन को रौंद डालते हैं
हमें ऐसे पाखंडियों से बचना चाहिए ....दोहरे मानदंडों से बचना चाहिए .....
बाकी तो एक शैतान आपके भी दिल में है और एक मेरे में भी -
मुझे पता है -बरगला नहीं सकते मुझे आप ! :)

Arvind Mishra ने कहा…

निसर्ग की खूबसूरत चीजें -आसमान तारे चंदा और वादियाँ सभी तो निर्वसन होकर ही सौन्दर्य की राशियाँ ,अजस्र स्रोत हैं ..
फिर नर नारी तन के समग्र सौन्दर्य को निहारने में ऐसी क्लैव्यता क्यूं? विह्वल संकोच क्यूं ?

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

अरविन्द जी, सबसे बड़ा कलाकार तो परमात्मा है जो नग्न ही सृजता है फिर क्यों उसपर मानवीय सभ्यता आवरण चढ़ाती इतराती है?
जल प्रलय आ चुकी है. उत्तमा जी एक नयी सचित्र कामायनी की रचना कर सकती हैं. [जापान में सुनामी]

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

श्रद्धा मनु के स्थान पर वे कोई वस्त्रहीन जापानी पानी में डूबते-उतराते जाकर तलाश सकती हैं.

प्रतुल वशिष्ठ ने कहा…

'उत्तमा कामायनी' ही होगी भविष्य की मौलिक यथार्थवादी रचना.
उसके न केवल पाठक होंगे अपितु दर्शक भी होंगे.

ali ने कहा…

रोजी के चक्रव्यूह में फंसा मैं ज़रा विलम्ब से बज पा रहा हूं सो खेद है ! नैसर्गिकता बनाम कला / नग्नता और मनोविकार पर कहने को बहुत कुछ है पर इतने सारे टिप्पणीकारों को पढ़ने के बाद अपनी टिप्पणी को यह कह कर समेट रहा हूं कि शिव जी की पहली टिप्पणी और उत्तमा जी से सहमत !

mukti ने कहा…

मैं आजकल भूमिगत हूँ. इस पोस्ट से सारा वृत्तांत ज्ञात हुआ. आपसे और उत्तमा जी से सहमत हूँ. अनौचित्य नग्नता का नहीं, अपितु उसके पीछे के मंतव्य का है.

AKHILESH ने कहा…

me na to koi chitrakar hu na hi kala se mera koi door door tak ka rishta.lekin itne comments padne ke baad me ye to kahi sakta hu ki pranav ji ne jis manshikta aur uddesya ke saath(for publicity)ye banayi thi usko hum sabne jane-anjane hi sahi par pura jaroor kar diya hai.-----AKHILESH AWASTHI,ENGG.STUDENT.

veerubhai ने कहा…

अरुंधती रॉय और महबूबा मुफ्ती खेलती तो आतंकवादियों की गोद में ही हैं लेकिन वह उनका अपना चयन है .बहर्सूरत उनके कपडे उतारे जाए प्रताड़ना के लिए इससे हम सहमत नहीं हैं एक बेहतरीन विमर्श प्रस्तुत किया है डॉ ,अरविन्द ने

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