बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

पिता जी की पुण्य तिथि पर ...

आज उनकी पुण्य  तिथि है... जीवन में अगर किसी की प्रतिभा ने मुझे गहरे रूप से प्रभावित किया तो वे पिता जी ही थे ..डॉ. राजेन्द्र मिश्र ....आपकी नज़र में यह एक सामान्य सहज पितृ प्रेम हो सकता है ..और मैं भी यही सोचता हूँ कि पुत्र तो पिता की ही एक अनुकृति होता है -आत्मा वै पुत्रो जायते ..वे एक बहुत अच्छे गद्य लेखक और निबंधकार थे....उनकी पुस्तक आधुनिक हिन्दी निबंध के कई लेख /निबंध खासकर मनुवाद का यथार्थ बहुत चर्चित हुआ था ..अपने लेखों में  वे कभी कभी कुछ पद्यात्मक अभिव्यक्तियाँ कर जाते थे ..उन्ही में से कुछ चयनित करके यहाँ प्रस्तुत है ....
...थी नहीं मंजिल कहीं.... 
उम्र गुज़री हसीन सपनो में 
चाँद तारों के सब्ज बागों में, 
डूब गया दिल खुलीं जब आँखें 
कैसी थी साजिश आसमानों में 

रहे पिटते हम विजेता नहीं थे 
हो गए गुमनाम हम नेता नहीं थे 
खुली पुस्तक सी रही यह जिन्दगी 
पढ़ लिया लोगों ने अभिनेता नहीं थे 

बहुत लम्बी है यह रात क्या किया जाए 
नहीं बनती है कोई बात क्या किया जाए 
''आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक''
नहीं है हाथ में इक उम्र क्या किया जाए 

उम्र भर  चलता रहा
मकसद समझ पाया नहीं 
था नहीं राहों का राही 
थी नहीं मंजिल कहीं ...
 आज मेरे पैतृक आवास पर हर वर्ष की भांति उनके पुण्य स्मरण का अनुष्ठान है ..अनुज  डॉ. मनोज मिश्र उसका संयोजन कर रहे हैं .नौकरी के चक्कर में मैं  नहीं जा पा रहा हूँ .. पिता जी अक्सर यही यह उद्धृत करते रहते थे कि पराधीन सपनेहु  सुख नाहीं -नौकरी के बारे में भी यह बड़ी सटीक उक्ति है ..और यही अनुभूति मुझे 
 शिद्दत के साथ हो रही है ....
पुण्य स्मरण....... 

39 टिप्पणियाँ:

Vivek Rastogi ने कहा…

पिता जिंदगी की पहली पाठशाला होते हैं और वे ही सबसे करीब होते हैं, और पिता ही सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं सार्वभौमिक सत्य है यह।

नौकरी की इस सटीक उक्ति को हम भी महसूस करते हैं, और इस बंधन से छूटने को तड़प रहे हैं।

सञ्जय झा ने कहा…

swargiya pujya pitaji ke
'punya-smaran'pe hardik naman....


pranam.

मनोज कुमार ने कहा…

पूज्य पिताजी को सादर नमन!
विनम्र श्रद्धांजलि।

Patali-The-Village ने कहा…

स्व: पिताजी के स्मरण दिवस पर उन्हें हार्दिक नमन|

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

सादर श्रद्धांजलि!

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

पिता-पुत्र का सम्बन्ध इस भौतिक दुनिया में अद्वितीय होता है.कहते हैं कि पिता की छाप पुत्र पर ज़्यादा होने की सम्भावना होती है.पिता अपने पुत्र को मूक-प्यार करता है,वह जताता नहीं है,अनुशासित जो करना होता है उसे !
आपके पैतृक -स्थान पर तो पारंपरिक-अनुष्ठान तो हो ही रहा है,आपने भी इंटरनेटी-आयोजन करके किसी न किसी तरह पिताजी के कार्य-क्रम में भागीदारी कर ली है. वैसे भी पुत्र कहीं से भी पिता से तनिक भी अलग नहीं है !
@खुली पुस्तक सी रही यह जिन्दगी पढ़ लिया लोगों ने अभिनेता नहीं थे... पिताजी की रचना बताती है की वे संवेदनशील भी थे !
उनकी स्मृति को हमारा नमन !

awadh.org ने कहा…

स्व. पिता जी को सादर नमन!
कवितायें सीधी सहज अभिव्यक्तियाँ हैं, संवेदनशील मन की!

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

हम भी श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं। तभी कहूँ कि आप में साहित्य के प्रति यह अनुराग कहां से आया।
ऐस वक्त न जा पाना सचमुच खलता है। सच है.. पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं।

अनूप शुक्ल ने कहा…

इसी बहाने पुरानी पोस्टें भी पढ़ीं आज फ़िर से पिताजी वाली।

आजकल के हिसाब से देखा जाये तो कम उमर में निधन हुआ आपके पिताजी का। साठ के पहले ही जाना हुआ उनका।

आपके पिताजी की स्मृति को नमन!

अभिषेक मिश्र ने कहा…

सही कहा था उन्होंने 'पराधीन सपनेहु सुख नाही...'
उन विद्वान आत्मा को विनम्र श्रद्धांजलि.

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') ने कहा…

हार्दिक श्रद्धांजलि।

मुझे भगवती चरण वर्मा की चर्चित उक्ति याद आ रही है- आदमी परिस्थितियों का दास है। यह पंक्तियां अक्‍सर हमारे जीवन में खरी उतरती हैं, चाहे-अनचाहे।

janta ki aawaz ने कहा…

Yah Such Hai Maa Baap Se Bada Koi Ho Hi Nahi Sakta ....Aur Jiwan ME Pita Ke Roop Me Ek Aisa adarsh Hame Bhagwan Deta Hai Jo Koi Aur Ho Hi Nahi Sakta .......

वाणी गीत ने कहा…

पुण्य स्मरण एवं नमन !

rashmi ravija ने कहा…

सादर नमन
विनम्र श्रद्धांजलि

दिगम्बर नासवा ने कहा…

बहुत लम्बी है यह रात क्या किया जाए
नहीं बनती है कोई बात क्या किया जाए
''आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक''
नहीं है हाथ में इक उम्र क्या किया जाए

पिता हर कदम पर गुरु होता है पुत्र के लिए ... पर ये भी सच है की उम्र हाथ में नहीं रहती ...
पिता जी की पुन्य तिथि पर विनम्र श्रधांजलि ....

सतीश सक्सेना ने कहा…

पिताजी की स्मृति में सादर श्रद्धांजलि !

प्रकाश गोविन्द ने कहा…

''आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक''
नहीं है हाथ में इक उम्र क्या किया जाए
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पूज्य पिताजी की स्मृति को सादर नमन
विनम्र श्रद्धांजलि

डॉ टी एस दराल ने कहा…

पिता के सदगुण बेटों में नज़र आते हैं ।
आपके पिताश्री को विनम्र श्रधांजलि और नमन ।

ali ने कहा…

विनम्र श्रद्धांजलि !

Arvind Mishra ने कहा…

जनता की आवाज -ईमेल द्वारा
yah Such Hai Maa Baap Se Bada Koi Ho Hi Nahi Sakta ....Aur Jiwan ME Pita Ke Roop Me Ek Aisa adarsh Hame Bhagwan Deta Hai Jo Koi Aur Ho Hi Nahi Sakta ....

एस.एम.मासूम ने कहा…

पुत्र तो पिता की ही एक अनुकृति होता है यह सत्य है और आपका पिता प्रेम देख के ख़ुशी हुई. कुछ दिनों पहले आप के पिता जी .डॉ. राजेन्द्र मिश्र जी के बारे में पढ़ा था और उसके बाद यह समझ लें की उन्हें देखे बिना ही इज्ज़त करने को दिल चाहा. सादर श्रद्धांजलि!

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

श्रद्धेय पिताजी को सादर नमन.

रामराम

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

सादर नमन ...विनम्र श्रद्धांजलि .....

सतीश पंचम ने कहा…

विनम्र श्रद्धांजली।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

पिता की मेधा का सर्वांश पुत्रों में भी है, वे परलोक में भी गर्वमना होंगे।

बी एस पाबला BS Pabla ने कहा…

स्मरण दिवस पर
विनम्र श्रद्धांजलि

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

हर बच्चे के लिए उसके माँ-बाप जीवन में सबसे प्रिय होते हैं .हमारे प्रात:स्मरणीय पिता जी भी इस बात में शामिल हैं .लेकिन सन १९६० में कोलकाता विश्वविद्यालय से पीजी की डिग्री लेने के बाद और कोलकाता में प्राध्यापक की नौकरी छोड़ कोई युवा इस लिए गांव में आ जाय की उसे अपनें पिता , छोटे भाइयों,परिवार की मान-प्रतिष्ठा ,समाज-कुल की सेवा,और लोंगों की शिक्षा-दीक्षा-विकास में अपना सर्वस्व जीवन अर्पित करना है , केवल दूसरों की भलाई के लिए जीना है , इतना बड़ा त्याग केवल अंतर्मन में महसूस किया जा सकता है .आज के दौर में इतनें बड़े त्याग की कल्पना भी नहीं की जा सकती.पूर्व में भी ऐसा उदाहरण कम देखने को मिलेगा.प्रात:स्मरणीय पिता जी नें परिवार-समाज के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया.वे चाहते तो अपनें बच्चों को लेकर महानगरों में रह सकते थे-भौतिक उपलब्धियां पा सकते थे लेकिन उन्होंने सबको साथ लेकर जीना पसंद किया.अपनी माटी के लिए इतना बड़ा समर्पण कम लोंगों में दिखाई पड़ता है.मैं अपनें आप को बहुत भाग्यशाली समझता हूँ की मैनें अपनें जीवन के ३१ साल आपके निर्देशन और छांव में गुजारे. आप मेरे गुरु-पथप्रदर्शक और सच्चे मित्र थे.मेरे लिए आप ज्ञान कोष थे-जो कुछ भी -जिस क्षेत्र से भी मैंने कुछ भी जानना चाह उसका उत्तर हाज़िर रहता था.ईश्वर करे हर पुत्र को आप जैसा पिता मिले.
-----पापा आप हम सबके प्रेरणा स्रोत हैं ,हम कभी भी आप को भूल न पाएंगे.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

पंडित जी!
पिताजी की पुण्य स्मृति को
हम दोनों मित्रों की विनम्र श्रद्धांजलि...!!
सलिल वर्मा
चैतन्य आलोक

shikha varshney ने कहा…

संतान पर पिता का ही ज्यादातर प्रभाव रहता है.
सादर विनर्म श्रधांजलि.

Amrita Tanmay ने कहा…

इस एक रचना से ही पूज्य पिता जी का पूरा व्यक्तित्व जगमगा उठा . संभवत इससे इतर भी उनका उत्तम व्यक्तित्व हो . फिर आप और श्री मनोज मिश्र जी भी उनको ही प्रतिबिंबित कर रहे हैं.दुर्लभ संयोग ..

दर्शन लाल बवेजा ने कहा…

विद्वान आत्मा को विनम्र श्रद्धांजलि...

Bhushan ने कहा…

पिता जी की पुण्यस्मृति पर उऩ्हें नमन. क्या उनका साहित्य आपने इस ब्लॉग पर कहीं समेकित किया है? जानकारी देंगे तो मैं उसे पढ़ना चाहूँगा.

Arvind Mishra ने कहा…

@भूषण जी,
उनकी पुस्तक के कुछ निबंध अंतर्जाल पर डालने की सोच रहा हूँ ! अभी तो नहीं कर पाया -उनकी कुछ कवितायें -यहाँ कविता लेबल में पढने को मिल जायेगीं !

मैं और मेरा परिवेश ने कहा…

पिता जी पर पिछले साल लिखी आपकी पोस्ट मुझे याद आती है। डॉ.माताप्रसाद एवं और भी बहुत से लोगों से जुड़े अनुभव आपने दिये थे। पुण्य सम्ररण के लिए हार्दिक नमन

निवेदिता ने कहा…

पिताजी की स्मृति में सादर श्रद्धांजलि !!!

Jyoti Mishra ने कहा…

may his soul rest in peace !!

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

आदरणीय अरविंद जी

हर सुपात्र सुपुत्र अपने पिता की ही अनुकृति होने में संतुष्टि पाता है …

आप साधुवाद के पात्र हैं …
दिवंगत विद्वान पुण्यात्मा से संबद्ध पिछली तमाम पोस्ट्स के लिए आभारी हूं ।

हृदय में श्रद्धा सागर भर गया है …
साथ ही , कुछ दृग बिंदु भी उपस्थिति दर्ज़ करा रहे हैं …

आपके पूज्य पिताश्री को विनम्र श्रद्धांजलि और सादर नमन !


-राजेन्द्र स्वर्णकार

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…

.




समय निकाल कर मेरी एक पुरानी पोस्ट आए न बाबूजी देख लीजिएगा …

…और सुनिएगा भी !

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

हर विद्वान अपने पीछे एक ऐसी निधि छोड़ जाता है जिसे याद करके उसके नाम को अमर रखता है। आपके पिताजी भी इसी श्रेणी में आते है। उनका स्मरण करके और उनकी लेखनी से हमे अवगत कराने के लिए आभार।

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