शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

फेसबुक पर सुहागरात

अभी पिछले दिनों हम एक मित्र के परिवार के साथ सपरिवार  पर्यटन पर निकले थे.मित्र का बेटा गैजेट प्रेमी गीक है. अब खुदा खैर करे अंतर्जाल युग के इन नवयुवाओं का जो नव  मीडिया के रूप में उभर रहे सोशल नेटवर्क साईटों खासकर फेसबुक के ऐसे दीवाने हैं कि उन्हें अगल बगल देखने की फुर्सत ही नहीं रहती -चौबीस घंटों के जागृत पलों में वे बस फेसबुक अपडेट करने पर पिले रहते हैं.....चाहे नाश्ते की टेबल हो या डायनिंग की ,अगल बगल से बिलकुल कटे वे बस फेसबुक का  स्टेटस  अपडेट करने में लगे दिखते हैं मगर यह दोष उन्ही का नहीं है ...हम आप भी जो अंतर्जालीय घेरे में तेजी से आते जा रहे हैं ऐसे ही एक दुर्व्यसन के शिकार हो रहे हैं ....हम खुद घबराए हुए हैं ..मोहकमाये  मछलियान में जिन्दगी का पूर्वार्ध तो  मछली के जाल में फंस कर निपट गया और अब ये मुआ अंतर्जाल बाकी का जीवन लेने पर आमादा दिख रहा है ..मगर हम तो ज़िंदगी के आख़िरी पड़ाव की ओर अग्रसर हैं -नयी पीढी का क्या होगा?

 नयी अंतर्जाल पीढी अपने  भौतिक परिवेश से कितनी  असम्पृक्त  कितनी  असमाजिक  होती जा रही है? ...और अंतर्जाल की आभासी दुनिया में खोखली  सामाजिकता की पेंगे  बढ़ रही हैं ....अंतर्जालीय युवा सुबह आँख खुलते ही फेसबुक पर गुड मार्निंग कह दैनिक कार्यारम्भ करते हैं ....और वहां भी जवाब देने वाले  सैकड़ों हजारों मौजूद हैं ....मेरे फेसबुक मित्रों में अवन्तिका सेन और आराधना मिश्र   ऐसी ही सेलिब्रिटी हैं जो अपना हर काम हर पल हर अंदाज फेसबुक पर अपडेट करती चलती हैं ..दोनों प्रतिभाशाली हैं मगर उनकी सारी प्रतिभा फेसबुक पर तिल तिल चुक रही है .....खाने में क्या क्या खाया ,सब्जी कौन से बनी ,टूथ पेस्ट कौन सा और कब किया....आदि  आदि ..अब हमें या दूसरों को भी क्या  लेना देना इन बातों का ..हू केयर्स ..मगर नहीं, वहां इन बातों पर भी दसियों और कभी कभी तक सैकड़ों कमेन्ट आते हैं .....

हिन्दी ब्लागमंडल भी उधर ही खिसक रहा है ....मैंने पहले भी यहाँ और यहाँ ऐसी आशंकाएं व्यक्त की थीं..अभी कल ही तो  कनाडा वाले प्रख्यात ब्लॉगर समीरलाल  जी ने अपनी श्रीमती जी के जन्मदिन पर उन्हें मिठाई खिलाते हुए एक फोटो के साथ अपने कुछ उदगार क्या व्यक्त किये वहां बधाईयों का जो तांता लगा कि दो सैकड़ा पार हो गया ..अब अपना ब्लागजगत  कहाँ इतना रिस्पांस दे पाता?सामाजिकता में तो बिलकुल फिसड्डी होता जा रहा है यह तो ....अब लोग कहेगें कि ब्लॉग और सोशल नेटवर्क का फर्क ही यही है ...ठीक बात, मगर फेसबुक की ही अगर बात करें तो यह मात्र सामाजिकता के निर्वाह को ही नहीं वरन आपके अनेक कलात्मक अभिरुचियों को प्रगट/प्रदर्शित करने का बड़ा माध्यम बन गया है ..आप अपनी बड़ी बड़ी पोस्ट भी यहाँ 'नोट' सुविधा के अधीन  डाल सकते हैं और फोटो /वीडियो /वेबकैम से तत्क्षण रिपोर्टिंग भी कर सकते हैं ....और भी अनेक सुविधायें यहाँ मौजूद हैं ....और यही कारण है कि गीक लोगों का यह ऐशगाह बन गया है ...किन्तु अपने भौतिक जगत से पूरी तरह नाते रिश्ते  तोड़ कर एक पूरी पीढी ही फेसबुक पर आबाद हो चली है ..

.एक सज्जन अपने विवाह के सात फेरों की भी रनिंग कमेंट्री वहीं फेसबुक पर ही देने में इतने मशगूल थे कि आठवीं की ओर साड़ी की छोर से बंधी सद्य परिणीता को घसीट ले चले तो बड़े बूढों और पंडित जी ने धर पकड़कर   उन्हें यह दुस्साहस करने से रोका ....अब लोग बाग़ इसी टिपियानी शैली में अगर सुहाग रात भी मनाने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं ...वे अपनी चेतना से इस दुनियाँ में होते कहाँ हैं? बस शरीर ही यहाँ रह गया है ...फुरसतिया  ने भी इसे खूब ताड़ लिया है ...खुद को केंद्रबिंदु बनाकर इस प्रवृत्ति पर उनका मजाकिया अंदाज मजेदार रहा ..सब्जीमंडी में पहुंचकर गोभी के दो बड़े फूलों की फोटो फेसबुक पर डाल आभासी मित्रों से यह  पूंछते भये कि कौन वाली खरीदें और जब तक फैसला आता दोनों फूल बिक चुके थे और अब वे ठगे से खड़े थे और ठेलेवाला उनकी तथा उनके मोबाईल की ओर  असहाय और विस्मित भाव से देख रहा था ....भैया फेसबुक का चस्का , इसकी लत कहीं आपकी ज़िन्दगी को ही गोभी के फूल ही  नहीं कितने और फुल  मौकों से वंचित न कर दे .... 

यहाँ यह बिलकुल अप्रासंगिक नहीं  उद्धृत कर देना कि संतकवि तुलसी ने अपने समय ही कुछ ऐसी ही तत्कालीन प्रवृत्तियों पर लोगों को  चेताया था ..." तुलसी अलखै का लखे राम नाम भज नीच ...." आज भी पास बैठे लोगों को फेसबुक पर  पिले देख  ऐसी ही कोफ़्त होती है कि अगल बगल की जीवंत और ठोस रंगीनियों को छोड़ कहाँ के गैर वजूदी संसार में रमे हो यार ...सुना है एक प्रेमिका ने प्रेमी से इसी मुद्दे पर शादी के पहले ही तलाक ले लिया:)..और प्रेमी ने यह बात भी फेसबुक पर डाल दी ..मगर उसका दुर्भाग्य कि जिस सांत्वना की उम्मीद उसे थी वह भी साथ छोड़ गयी और इन दिनों वह फेसबुक पर बुझी फुलझड़ी मंगलौरी के नाम से शायरी करता दिख जाता है ....फेसबुक लोगों का जीवन तबाह कर रहा है लोग मरने मारने पर उतारू हैं ...यह मनुष्य की ज़िंदगी में प्रौद्योगिकी की धमक का एक दहशतनाक मंजर है ....

मेरे एक  बड़े उच्च अधिकारी फेसबुक पर ही मेरे ही लिस्ट में  मेरे सौभाग्य से आ गए हैं ..एक अत्यंत प्रतिभाशाली और विनम्र व्यक्तित्व है उनका .. मेरी हर घोर मानवीय चूकों पर ध्यान नहीं देते मगर बारीक नज़र रखते हैं और गाहे बगाहे इसका अहसास भी मुझे करा देते हैं ...अब उनकी सदाशयता क्या सभी नौकरी शुदा फेसबुकियों  को उनके नौकरीदाता दे सकते हैं? कभी भूल से बॉस को फेसबुक में न रखिये नहीं तो उनकी गुडबुक से एक दिन पत्ता कटा ही समझिये ..नौकरी से भी हाथ धोना पड़ सकता है ..कईयों की जा भी चुकी है ..कई और मुद्दे है सोशल नेट्वर्किंग के जिनकी चर्चा हम जल्दी ही करेगें ...

75 टिप्‍पणियां:

  1. समय रहते चेतावनी दे दी है आपने लेकिन अंतर्जाल तो फैलता जा रहा है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. मुझे भी इस फेसबुकिया-लत ने काफ़ी कचोटा है ! एक बार आठ दिन के लिए बिलकुल 'मृत' हो गए थे, पर आप जैसे लोगों की चाह से फिर लौटा और आलतू-फ़ालतू टैग-विशेषज्ञों को निपटाया और अब यदा-कदा ही विचरण होता है.
    आराधना मिश्र भी दो दिन पहले फेसबुक को बाय-बाय सा कर चुकी हैं.प्रवीण पाण्डेय जैसे निष्ठावान-ब्लॉगर कब का इन चकल्लसों से छुटकारा पा चुके हैं.

    फेसबुक से उपयोगी तो ट्विटर है.फेसबुक महज़ नेटवर्किंग के लिए तो उपयोगी हो सकता है पर इसे व्यसन में तब्दील करने से ,आभासी को वास्तविक मान लेने से यह बहुत बुरा सिद्ध हो रहा है !

    आप भी थोड़ा किनारे हो लें,महाराज !

    उत्तर देंहटाएं
  3. @त्रिवेदी महराज ,
    आराधना मिश्र अंतिम अपडेट के मुताबिक़ किचेन में थीं ..पंद्रह घंटों से वही हैं !

    उत्तर देंहटाएं
  4. किनारे हो लें ||

    खूबसूरत प्रस्तुति |

    त्योहारों की नई श्रृंखला |
    मस्ती हो खुब दीप जलें |
    धनतेरस-आरोग्य- द्वितीया
    दीप जलाने चले चलें ||

    बहुत बहुत बधाई ||

    उत्तर देंहटाएं
  5. आराधना का नया अपडेट भी आ गया.. :)

    काश के ब्लॉग पे कमेन्ट को लाईक करके भागने का ओप्शन भी होता.. :-/

    उत्तर देंहटाएं
  6. मुख-पुस्तिका की महिमा अपरम्पार है, अगर आपके पास खाली वक्त बेशुमार है...

    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  7. ये उस नींद की गोली की तरह है जो अनिद्रा में लोग लेते हैं. अकेलापन का ऐसा इलाज जो बीमारी को और बढाता ही है. अपने बगल में बैठा कोई बेहोश हो या मर जाए तो खबर नहीं... फेसबुक पर कोई छींक दे तो कमेन्ट पहले कर आते हैं !

    उत्तर देंहटाएं
  8. rapchik kahiye tapchik kahiye........
    bahut sundar chintan karti post aur
    tippani bhi majedar.........

    PD or Abhishkji se sahmat......


    pranam.

    उत्तर देंहटाएं
  9. नेटवर्क जोन में आने के बाद से फेसबुक एडिक्ट तो मैं भी हो गया हूँ. रही बात फेसबुकिया प्रेम की तो मुझे लगता है कि आज के 'लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप्स' में वो दिन दूर नहीं जब दो पक्ष फेसबुक पर ही आपसी सहमती से स्टेटस 'सिंगल' से 'मैरेड' कर फेसबुक पर ही मिलते रहा करें !

    फेसबुक पर भी अलग-अलग ग्रुप्स के ऑप्शंस होने चाहिए ताकि अपने मित्रों और सहकर्मियों को एक-दुसरे से पृथक रखा जा सके

    उत्तर देंहटाएं
  10. sarcasm at its height :P
    fb addiction is pervasive these days.... detox is needed

    उत्तर देंहटाएं
  11. अब यहाँ टिपियाना भी फेसबुकिया हो चला है.थोड़ी-थोड़ी देर में लोग झाँकने आते हैं और टिपिया देते हैं या मुसक्या कर चल देते हैं.
    सोचो,प्रेमचंद,निराला,तुलसीदास बाबा और हाँ कबीर भी अगर फेसबुक में होते तो शायद हम उन्हें जान भी न पाते.हाँ,केशवदास जी ज़रूर पापुलर होते !

    @ अरविन्द मिश्र महाराज, हम तो एक आराधना मिश्र को थोड़ा जानते हैं जो दो दिन पहले बज़ में एलान किये थे.हो सकता है कोई दूसरी हों जो किचन में घुस गई हों !
    बहरहाल ,आप तो ड्राइंग रूम में ही बैठें ,किचन में न झांकें !

    उत्तर देंहटाएं
  12. शायद आज का जीवन जीने का एक ही सूत्र रह गया है -- टाइम पास . जिनके पास करने को बहुत काम है वो भी टाइम निकाल कर टाइम पास में लगे हुए हैं. बड़ों के पास अपना तर्क है अपने बचाव के लिए तो फिर युवा भी अपना तर्क गढ़ कर ही पूरी आजादी ले रहे है. हाल जो है वो जगजाहिर है. अब समाज का कैसा रूप बनता जा रहा है ..हम आये दिन रु-ब-रु हो ही रहे है. बिखरती उर्जा..बिखरता समाज..

    उत्तर देंहटाएं
  13. फेसबुकिया तो आगे जाकर परेशानी का सबब बनेगी ... लोगों को सारा सुखचैन फेसबुक में ही दिखेगा ... बहुत बढ़िया भावभिव्यक्ति ...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  14. @Arvind Mishra महाराज ,एक भयंकर भूल हुई है मुझसे ! दर-असल मैं आराधना चतुर्वेदी की बात कर रहा था,ये आराधना मिश्र को मैं नहीं जनता !भूल के लिए क्षमा-प्रार्थी हूँ !

    उत्तर देंहटाएं
  15. भाई साहब यकीन मानिए "ग्रे मेटर"ज्यादा होता है इन फेसबुकियों में .जिसके जितने ज्यादा फेसबुक पर दोस्त वह उतना ही प्रतिभावान .बुद्धि शाली .आप भी तो गीक हैं .यारों के यार .बधाई इस अभिनव पोस्ट के लिए .

    उत्तर देंहटाएं
  16. असली अफीम असली एल्प्राज़ोलम यही है भैया .

    उत्तर देंहटाएं
  17. हम भी फेसबुक में हैं इक एहसास "मैं भी हूँ" की तर्ज पर. मुह फेर लिया है. वास्तव में जिस कदर आजकल के युवा मशगूल हैं, मुझे तो बड़ा आश्चर्य होता है.

    उत्तर देंहटाएं
  18. इसका भी वक्त के साथ कोई ना कोई नया तोड आ ही जायेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  19. सर बाढ़ का पानी और जवानी दोनों ही बहुत खतरनाक होते हैं |लेकिन आपकी इस बेमिसाल पोस्ट पर ढेर सारी बधाईयां भी कम हैं |अद्भुत लिखा है आपने लेकिन इस उम्दा लेख का कच्चा माल वहीं यानि फेसबुक से मिला |दीपावली की शुभकामनाएं

    उत्तर देंहटाएं
  20. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  21. बहुत ही अच्छा लगा यह आलेख। अभिषेक ओझा जी और अमृता तन्मय जी के विचारों से सहमत।

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  22. ये मुख पुस्तिका लत है पर जबरदस्त है :).

    उत्तर देंहटाएं
  23. ये नशा बढ़ता ही जा रहा है ... युवा लोगों को पसंद भी बहुत आ रहा है ... आने वाले समय में इससे दूर रहना बहुत मुश्किल होगा ...

    उत्तर देंहटाएं
  24. sahi hai kabhi baton me gadi choot jaya karti thi ajkal facebook ke chakkar me gobhi choot jati hai:)bahut accha lekh...

    उत्तर देंहटाएं
  25. कल 22/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  26. TOI/mumbai has published a news of a survey of face book and such social site users, it has found a relation between the gray matter in the brain, of the social network users and those who seldom use such sites, the gray matter in users group was more than other users, this it said was because people using these sites, are always concerned about presenting themselves.A new prespective towards the users of this site

    उत्तर देंहटाएं
  27. आलेख अच्छा है

    पर इसका जिम्मेदार कौन है मेरे हिसाब से आपकी पीढ़ी के लोग ...आपकी पीढ़ी के लोगो की महत्वाकांक्षी सोच जो अपने अधूरे सपनो को अपनी संतानों से पूरा करने की उम्मीद रखते हैं या फिर सिर्फ ये सोच लेते हैं की हम ज्यादा से ज्यादा हमारी संतानों को दे सके तो काम करो बिना सोचे समझे की संतान को क्या जरूरत हैं

    उन्हें अकेले छोड़ देना इस समस्या का बड़ा कारण है

    एक और वजह ये भी है की आज की तारिख में जब इंसान को सिर्फ झूठ ही सुनने को मिलता है असल जिंदगी में तो वो झूठ इंसान एक झूठी दुनिया में सुन कर इस बात से संतुष्ट होता है की ये सिर्फ मेरी ही गलती होगी अगर कुछ गलत होता है तो

    दो बाते जो और बोलना है

    उनमे से एक ये की मेरी सबसे अच्छी या यूँ कहे की एकमात्र मित्र जिससे मै खुल कर मिलता हूँ वो मुझे आज से ५ साल पहले चेट पर मिली थी.. मेरे बुरे वक्त में मेरे सारे अपने नाते रिश्ते और सच्ची दुनिया के दोस्तों ने साथ छोड़ दिया था पर उस दोस्त का साथ आज भी वैसा ही कायम है तो मै आभासी दुनिया के रिश्तों पर यकीं करता हूँ

    दूसरा ये की आप किसी का भी उदाहरण दे रहे हैं नाम के साथ तो कृपया उस व्यक्ति की अनुमति ले ले या फिर नाम की जगह कुछ और लिख दे... क्यों की आप ना चाह कर भी उस व्यक्ति का अपमान कर रहे हैं जो की आप आप ही की पोस्ट के कमेन्ट में तीन चार जगह देख चुके हैं

    उत्तर देंहटाएं
  28. TOI/mumbai has published a news of a survey of face book and such social site users, it has found a relation between the gray matter in the brain, of the social network users and those who seldom use such sites, the gray matter in users group was more than other users, this it said was because people using these sites, are always concerned about presenting themselves.A new prespective towards the users of this site

    उत्तर देंहटाएं
  29. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    उत्तर देंहटाएं
  30. हम ब्लॉग जगत के मित्रों को ही समय नहीं दे पाते..फेसबुक के लिए समय कहां से निकालें! अभी तक तो लत नहीं लगी है। भविष्य में भी उम्मीद कम ही थी .. अब आप ने और भी सावधान कर दिया...धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  31. सात फेरों की रनिंग कमेंट्री कहाँ जाकर रूकी?
    चेतावनी के लिये आभार ..

    उत्तर देंहटाएं
  32. अगर ये लत ना बने...और समय नियोजन हो तो निस्संदेह अच्छी साइट है..पर अक्सर लोग अकेलापन दूर करने के लिए इसका सहारा लेते हैं और ज्यादा अकेले होते चले जाते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  33. सुख और आनंद की चाह में आदमी नई दिशाओं की तरफ़ और नई राहों पर आगे बढ़ता ही है। ईमानदारी से लेकर बेईमानी तक और योग से लेकर भोग तक वह जो कुछ भी करता आया है , उसके पीछे बस यही एक कामना है।
    अब लोग फ़ेसबुक पर बतिया रहे हैं तो इसके पीछे भी यही उम्मीद है कि शायद थोड़ा सुख और थोड़ा आनंद यहां हाथ आ जाए।
    कुछ पाने की आशा में ही ज़्यादा खो रहा है इंसान।

    उत्तर देंहटाएं
  34. फेसबुक एप्लीकेशन मोबाइल में बाय डिफाल्ट होने के बावजूद उसे शुरू से ही डिसेबल करके चल रहा हूँ। जानता हूँ कि इसकी लत लग गई तो फिर उबरना मुश्किल है :)

    उत्तर देंहटाएं



  35. आदरणीय अरविंद जी

    निराले हैं आपके अंदाज़ !
    आपकी हर पोस्ट पढ़ता हूं … आपके बहुरंगी रूप को नमन !

    फेसबुक पर समय का क़त्ल मुझसे तो नहीं हो पाता …
    बस, घुसता हूं … और तुरंत निकलने की करता हूं …
    हालांकि कई प्यारे मित्र हैं अवश्य वहां भी !


    आपको सपरिवार
    दीपावली की बधाइयां !
    शुभकामनाएं !
    मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  36. अभी तक तो बचे हुए हैं फेस बुक की लत से ... आगाह करने के लिए धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  37. समय रहते चेतावनी दे दी है आपने .. शायद कुछ सुधर जाएं !!

    उत्तर देंहटाएं
  38. फ़ेसबुक के बारे में अजीम शाइर कट्टा कानपुरी ने अर्ज किया था:
    मै कोई अदना शायर नहीं मेरे चाहने का वो वाला मतलब मत निकाल
    मैंने तो तुझे सिर्फ़ ’लाइक किया है’ किसी फ़ेसबुक के स्टेटस की तरह।


    फ़ेसबुक एक सुविधा है। अब यह प्रयोग करने वाले पर है कि वह इसका कैसे उपयोग करता है।
    नयी-पीढ़ी पुरानी पीढी से इसका कोई मतलब नहीं है। प्रयोग करने वाले की रुचि पर निर्भर करता है कि वह कैसे इसका उपयोग करता है। ई-स्वामी का एक लेख ध्यान में आता है जिसमें उन्होंने यह बताया था कि चीजें (और शायद आदतें भी) अपना उपयोग कराती हैं। फ़ेसबुक की सुविधा को प्रयोग करना सहज है, आसान है इसलिये लोग इसका जमकर उपयोग करते हैं। जब इसकी परेशानियां पता लगेंगी तो लोग इससे कट भी जायेंगे। इसमें कोई परेशानी की बात नहीं!

    बाकी आपका शीर्षक बहुत संस्कारी टाइप का है। किसी खराब संस्कार वाले ने इस पोस्ट को लिखा होता तो शायद लिखता- फ़ेसबुक पर बलात्कार। :)

    उत्तर देंहटाएं
  39. अनूप शुक्ल को सादर समर्पित...

    ब्लॉगर ने पहचाना ब्लॉगिया संस्कार
    शीर्षक अच्छा हो तभी आते हैं यार।

    उत्तर देंहटाएं
  40. देवेन्द्र पाण्डेय जी को प्रतिसमर्पित:
    शीर्षक अच्छा है इसई लिये तो ब्लॉगर की तारीफ़ की। इसई लिये तो बताया कि कोई ऐसे-वैसे संस्कार वाला ब्लॉगर होता तो कित्ता इस-उस तरह का शीर्षक लिखता। और फ़िर शायद कोई इस शीर्षक के साथ पोस्ट लिखता-

    १.फ़ेसबुक के बहाने कहासुनी
    २.फ़ेसबुक पर जूतालात
    ३.फ़ेसबुक जो न कराये
    ४.फ़ेसबुक और सामाजिक चेतना
    ५.फ़ेसबुक पर कटाजुज्झ

    उत्तर देंहटाएं
  41. फेसबुक मेरे लिए बहुत-बहुत महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसके माध्यम से हमारे हॉस्टल के सीनियर्स जूनियर्स और बैचमेट्स मिले, मानो हॉस्टल के पुराने दिन लौट आये. क्योंकि अमूमन ऐसा होता है कि पुरुष तो विवाह के पश्चात भी अपने मित्रों से सम्बन्ध बनाए रखते हैं, लेकिन लड़कियों को चूंकि ससुराल जाना पड़ता है, इसलिए उनका अपनी सहेलियों से मिलना बहुत कम हो जाता है. वैसे तो मोबाइल एक सुविधा है, लेकिन महँगी भी पड़ती है और बहुत सी चीज़ों को शेयर नहीं कर सकते. अब हम एक-दूसरे के हाल-चाल आराम से जान सकते हैं. मेरी कुछ सहेलियाँ जो विवाह के पश्चात विदेश चली गयी हैं, उनसे फेसबुक के माध्यम से ही संपर्क बना हुआ है. इसलिए मैं इसे कम से कम शादीशुदा औरतों के लिए एक अच्छा माध्यम मानती हूँ, भले ही अभी बहुत से लोगों तक पहुँच नहीं है.
    इसके अलावा फेसबुक पर ऐसे समूह हैं, जहाँ हम अपनी रूचियाँ साझा कर सकते हैं, ये आपने खुद ही कहा. मैं खुद ही कई ऐसे समूहों से जुड़ी हूँ, जिसमें से एक यूनुस जी, सागर नाहर जी और पवन झा जी का 'श्रोता बिरादरी' नाम का ग्रुप है, जहाँ कभी-कभी ऐसे दुर्लभ गीत सुनने को मिल जाते हैं, जिन्हें हम रेडियो के ज़माने में भी नहीं सुन पाए थे. लगता है कि विविध भारती के दिन लौट आये हैं.
    जैसा आज फेसबुक के लिए कहा जा रहा है, वैसा ही कभी ब्लॉगिंग के लिए कहा जाता रहा होगा, बात वही है कि ये सब तो सिर्फ़ माध्यम हैं, प्रश्न ये है कि आप इसे कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं. अति हर चीज़ की गलत होती है, इसलिए समय-समय पर स्वयं का मूल्यांकन करना चाहिए. हम बाजारवादी सोच, पूंजीवाद, उपभोक्तावाद, टी.वी. के विपरीत प्रभावों की विवेचना करते समय भूल जाते हैं कि इसके शिकार तो हम खुद ही जानबूझकर होते हैं. हम इतनी तो समझ रखते ही हैं कि खुद को एक निश्चित सीमा तक ही इन चीज़ों का उपयोग करने दें.
    हर नया माध्यम, हर नया आविष्कार अच्छा भी होता है और बुरा भी विज्ञान के बारे में दशकों से एक निबंध लिखते रहे हैं 'विज्ञान वरदान है या अभिशाप' ये तो हम पर निर्भर है कि हम इन्हें इस्तेमाल करते हैं या इनके द्वारा इस्तेमाल होते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  42. मित्रों आप सभी ने बड़ी ही वैचारिक जीवन्तता के साथ इस मुद्दे को लिया है ..बस कुछ असहमतियां है जिनपर ही मैं कुछ अपनी बात कहूंगा !
    @अनूप जी ,
    जरुर ही यह कोई संस्कार का ही मामला है जहाँ सुहागरात भी बलात्कार दिखती है ,,
    वैसे कईयों का अनुभव ऐसा ही रहता है ....आप भी? यही हैरत है!
    ठीक बात की है आपने ..यह माध्यम भर है मगर माध्यम मनुष्य पर भारी पड़ जाय तो चिंता स्वाभाविक है!
    @आराधना ,
    अच्छा तो आप चतुर्वेदी वाली आराधना हैं ..अरे भाई यहाँ कन्फ्यूजन हो गया था बंधुओं को ..आपके नाम से अक्सर ऐसा क्यों होता है ?
    आपकी भी बात से सहमत हूँ ..चिंता केवल इस बात की है कि प्रौद्योगिकी मनुष्य की सहजता छीन रही है ...यह स्पष्ट है ....मनुष्यता का विस्थापन इन मशीनी माध्यमों से तो हामारा अभीष्ट नहीं है न ?

    उत्तर देंहटाएं
  43. @इन्दुपुरी जी की प्रतिक्रिया (अहो भाग्य आप पधारीं बनारसी बाबू के यहाँ ....यह टिप्पणी काफी सारवान है इसलिए यहाँ दे रहा हूँ और प्रत्युत्तर भी ..बिना अनुमति के ..कृपा कर अन्यथा मत लीजिएगा! )
    बाबु!नमस्ते
    सचमुच यह धीरे धीरे नशा बनता जा रहा है ,इतना कि ना कहीं आना नही कहीं जाना पसंद रहा अब तो. .......... हमारे अपने घर मे रहते भी दुसरे को अकेला कर देते हैं हम. जो आपके अपने हैं आपके सुख दुःख के साथी है,जीवन मे काम भी जो ही आयेंगे हमने उनको अकेला नही छोड़ दिया?
    निसंदेह पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद यह सब बेस्ट ओप्शन है.अकेले होते हुए भी हम अकेले नही रहते.किसी नाम के पास जलती हुई हरी बत्ती ही किसी के पास होने का अहसास कराती है.अकेलेपन के अहसास को दूर करती है. आज जब बच्चे अपनी अपनी दुनिया मे रम चुके हैं.नेट का यूज बेस्ट महसूस हो रहा है पर............लगता है एडिक्ट होती जा रही हूँ. फेसबुक नही जमा.बहुत अच्छे लोग मिले और गंदी औरते भी.जितने फ्रेन्ड्स चुने उससे ज्यादा को ब्लोक किया.यहाँ आ कर लगा सचमुच जाल है यह. लिखने के मुख्य काम से भटक रहे हैं हम.इसलिए........ ब्लोगिंग की मेरी अपनी खूबसूरत दुनिया ज्यादा बेहतर है.
    वहाँ कोई आये न आये ,पढ़े न पढ़े बस मैं होती हूँ और........पास बैठा मेरा कृष्ण .जो हाथ पकड़ कर कहता है 'चल यहीं बैठ थोड़ी देर. लिख मैं पढ़ रहा हूँ.'
    वैसे मैं परिवार के बच्चों को फेसबुक पर जाने से रोकती हूँ.उन्हें करियर बनाना है भाई. और खुद ने भी समय देना कम कर दिया है हा हा हा

    उत्तर देंहटाएं
  44. @आराधना ,
    इंदु पुरी जी की टिप्पणी भी देखिये ...
    @इंदु पुरी जी ,
    बिलकुल सहमत हूँ आपसे ..और ब्लाक तो मैंने भी दर्जनों को किया ..मगर गंदी औरतें कम गंदे
    लडके ज्यादा .....
    फेसबुक अच्छा है मगर अच्छे से ज्यादा बुरा बनता गया है ....
    सावधानी अपेक्षित है ..मेरी बत्ती कभी हरी होती ही नहीं ..बुझी रहती है !

    उत्तर देंहटाएं
  45. @@@@....आततायियों ने फेसबुक पर मेरी बत्ती गुल कर रखी है ..और मूछे गुनहगार बना दी गयीं है..उसके बाद आँखें ....और फिर कल्पनाएँ लोगों की बाप रे !

    उत्तर देंहटाएं
  46. तो यदि घर में पति - पत्नी - बच्चों को आपस में बात करनी हो - तो क्यों न एक दूसरे से फेसबुक पर मिलें ??? :) :) :)

    उत्तर देंहटाएं
  47. तब तो ये मेरा रिकार्ड हो गया कि अभी तक किसी को ब्लाक करने के नौबत नहीं आयी. कारण स्पष्ट है कि मैं दोस्त ही बहुत सोच-समझकर बनाती हूँ. फेसबुक पर चैटरूम में नहीं जाती हूँ क्योंकि वहाँ अदृश्य रहकर चैट करने की सुविधा नहीं है. चैटरूम में तब जाती हूँ जब मेरी प्राणप्रिय सहेली, जो कि शादी के बाद विदेश चली गयी है, ऑनलाइन होती है. मैं बिलकुल अनजाने लोगों से बात नहीं करती, सिर्फ़ अपने हॉस्टल और यूनिवर्सिटी के दोस्तों से ही बात करती हूँ, वो भी मेसेज से.
    और हाँ, जब ये लगता है कि फेसबुक हावी हो रहा है तो कुछ दिन के लिए उससे दूर हो जाती हूँ. मैं भी अकेली हूँ और अपने दोस्तों से इसी माध्यम से जुड़ी हूँ, लेकिन मेरे लिए मेरी पढ़ाई सबसे पहले है और जब इस पर असर पड़ने लगता है तो मैं अपना फोन तक बंद कर देती हूँ, फेसबुक क्या चीज़ है :)
    एक बात और है, जब मेरे घर कोई मेहमान आया होता है, तो मैं सबसे पहले नेट बंद करती हूँ, अगर वो ऑन है और मैं किसी से ज़रूरी बात नहीं कर रही हूँ तो. मुझे ये बिलकुल नहीं पसंद कि किसी से बातें करते हुए मेरी उंगलियाँ लैप्पी के कीबोर्ड पर या फोन के कीपैड पर चल रही हों और मैं खुद भी अपने लिए ऐसा बर्दाश्त नहीं करती और सामने वाले से कह देती हूँ कि या फिर मुझसे बात करे या मेसेज ही कर ले.

    उत्तर देंहटाएं
  48. और ये फेसबुक के आततायी कौन हैं :)

    उत्तर देंहटाएं
  49. मजेदार बात ये है कि हम आपके इस लेख तक फेसबुक से ही पहुँचे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  50. जब काफ़ी सारा काम कर लेते हैं,थकते हैं,

    तभी इस फेसबुक को आरामगाह समझते हैं...!

    उत्तर देंहटाएं
  51. बहुत सच कहा है..इसका नशा बढता जा रहा है..

    उत्तर देंहटाएं
  52. शीर्षक भीड़ खींचने के लिएय अच्छा है मगर बात वही है जिसे कई बार कई तरह से कहा जा चुका है.. नुक्सान ब्लॉग्गिंग के या फेसबुक के नहीं, अति के हैं!! और अति सर्वत्र वर्जयेत!!

    उत्तर देंहटाएं
  53. समय रहते चेतावनी देने के लिए आभार!
    आप ने सही कहा है, खुद के निर्णय करने कि क्षमता प्रभावित होती है|

    उत्तर देंहटाएं
  54. .
    .
    .
    देव,

    एक fad है यह, बहुत ज्यादा दिन नहीं चलेगा देर-सबेर उबर ही जायेंगे सभी इससे भी... ज्यादा टेंशन नहीं लेने का... :)


    ...

    उत्तर देंहटाएं
  55. हमारा ब्लागजगत ज़रूर रेस्पांस देता है जी। ज़रा आप भाभीजी को बड्डॆ केक तो खिलाइये :)

    उत्तर देंहटाएं
  56. बहुत बढ़िया लेख.....

    जो सोवत है सो खोवत है....
    जो जगत है सो पावत है......

    यह चिंतनीय अवश्य है....लेकिन आज का युवा वर्ग जागृत है.....और अपवाद तो हर जगह होते हैं....जैसे इसका नशा चढ़ा है वैसे ही उतर भी जायेगा

    उत्तर देंहटाएं
  57. हम तो फ़ेसबुक के तलबी हैं जब समय होता है तो नहीं तो परिवार को समय देना ज्यादा श्रेयस्कर समझते हैं, हाँ कहीं घूमने गये तो लाईव एक दो फ़ोटो चढ़ा दिये, तो कुछ दोस्तों से पता चल जाता है कि कुछ अच्छी सी जगह छूट न जाये।

    उत्तर देंहटाएं
  58. जाल में फंसते हुए जानकार लोग :)

    उत्तर देंहटाएं
  59. मंगल मय हो सबको दीपों का त्यौहार ,दीपों का आकाश .एक आदि डिलीवरी भी करवा दो फेसबुक पर एयर इंडिया की तरह .

    उत्तर देंहटाएं
  60. साहित्य वाले ब्लॉग वालों को दोयम दर्जे का मानते हैं। ब्लॉग वाले फेसबुक वालों को!
    यह चलेगा। तकनीकी उन्नति सबको रौन्देगी।

    उत्तर देंहटाएं
  61. मेरे फेसबुक मित्रों में अवन्तिका सेन और आराधना मिश्र ऐसी ही सेलिब्रिटी हैं जो अपना हर काम हर पल हर अंदाज फेसबुक पर अपडेट करती चलती हैं ..दोनों प्रतिभाशाली हैं मगर उनकी सारी प्रतिभा फेसबुक पर तिल तिल चुक रही है .....खाने में क्या क्या खाया ,सब्जी कौन से बनी ,टूथ पेस्ट कौन सा और कब किया....आदि आदि .

    अरविन्द जी आज यूँ ही इधर चली आई ....
    हैरान हूँ आपको इतना समय कैसे मिलता है यह देखने के लिए कि
    कौन अभी किचेन में है ....और कौन .....:))

    उत्तर देंहटाएं
  62. @हरकीरत जी,
    अहो भाग्य आपका आना हुआ इधर ....
    अब आप फेसबुक पर खात खोलें तो आपको
    सवाल का जवाब खुद मिल जायेगा ...
    अगर पहले से हैं तब तो मुझे ताज्जुब है
    आप कैसे अनभिज्ञ हैं इस रहस्य से ...
    बाकी पोस्ट की निष्पत्ति यह नहीं है आप
    ऊपर ही रह गयीं ..बहरहाल, शुक्रिया !

    उत्तर देंहटाएं
  63. फ़ेसबुक एक निहायत घटिया और पतनशील चीज़ है । ब्लॉग यदि निश्छल प्रेम है तो ये कुत्सित आत्म-रति से अधिक कुछ नहीं । अगर ये बिछड़े दोस्तों को मिलाती है तो पुराने घाव भी हरे कर जाती है और कुल मिलाकर एक निहायत घृणित और पातक प्रवृत्ति की ओर उन्मुख समाज की सहचरी है । जो इसका संग करते हैं उनकी गति तो देवता भी नहीं जानते । ये कुटैव निःसंदेह त्याज्य है ।

    उत्तर देंहटाएं
  64. ब्लॉग भी एक नशा है लेकिन जिसे आप संझा के झुटपुटे में या जब कभी अनुकूल हो

    अंजाम देते हैं लेकिन ये फ़ेसबुक तो
    ऐसी ही है जैसे हर वक्त खीसे में बोतल दबाए घड़ी -घड़ी घूँट भरने की आदत । कोई निष्ठावान, सत्यकाम ब्लॉगर इसका सेवन यदि करता है तो वो तमाम ब्लॉग बिरादरी से छल करता है और अवश्यमेव एक प्यासे, घायल पंछी की भाँति तड़फड़ाता हुआ गुमनामी के नामालूम अँधेरों को प्राप्त होता है जहाँ न तो कोई अवंतिका है और न ही आराधना । तब वो मूर्ख अपने खोये समय पर पश्चाताप करता हुआ अहर्निश विलाप किया करता है । आपने यूँ समाज को चेता कर एक पुण्य कार्य संपन्न किया है ।

    उत्तर देंहटाएं
  65. @धांसू मुनीश जी धाँसू ,आपने तो बस अपनी बात की धाक जमा दी .....बेलौस बिंदास ....मजा आ गया .....शुक्रिया ! पसंद आई यह स्टाईल ....दीपावली की शुभकामनाएं .....

    उत्तर देंहटाएं
  66. बिरहमन की गति बिरहमन जानै...बैद मिला नहीं कोय । ये अशआर मेरे दिल की गहराइयों की पैदाइश हैं बंधु चोट तो करेंगे ही । फिर कहता हूँ आपने एक ज्वलंत मुद्दा उठाया है शुक्रिया ।

    उत्तर देंहटाएं
  67. आजकल लोग मेल मुलाकात में इसीलिए विश्वास नहीं रखते , क्योंकि सारा मिलना मिलाना तो फेसबुक पर हो जाता है । किसी से बात भी नहीं करते क्योंकि फेस्बुइक पर चैट तो हो ही जाती है । असल में कोई दोस्त हो न हो , फेसबुक पर तो हजारों तथाकथित फ्रेंड्स बन ही जाते हैं ।

    इस फेसबुक ने लोगों को निकम्मा बना दिया है । अब तो ब्लोगर्स भी ब्लोगिंग से थक हार कर फेसबुक में ही घुसे रहते हैं । इंसान कितनी जल्दी अपनी कमजोरियों के वश हो जाता है !

    उत्तर देंहटाएं
  68. । ‘न्यूयार्क पोस्ट’ ने लगभग 1000 फेसबुक और ट्विटर प्रयोक्ताओं के बीच किये गये सर्वे के आधार पर यह यह निष्कर्ष निकाला है कि इन सोशियल नेटवर्किग साइटों से दूर रखे जाने पर इनका प्रयोक्ता ड्रग एडिक्ट जैसा ब्यवहार करने लगता है और कई मामलों में वे डिप्रेशन का शिकार तक होते पाये गये हैं।
    .
    दीपावली की हार्दिक शुभकामनाऐं!!

    उत्तर देंहटाएं
  69. ये कमबख्त फेसबुक चीज है ही ऐसी.... अब देखिये न आप भी कहाँ बच पाए हैं इससे.... हर दिन के नास्ते- खाने से लेकर, बस में हैं या ट्रेन में.... ये सब कुछ तो डाल ही देते हैं.... अब बाकी क्या रह गया है करने को... खैर कोई बात नहीं, आप मूली और मक्के के भुने दाने का मज़ा लीजिये..... ;)

    उत्तर देंहटाएं
  70. अच्छी जानकारी दी आपने ! फेसबुक बाला ही ऐसी हे की कोई भी इस से बच नहीं सकता !
    इन्टरनेट और computer दुनिया की मजेदार जानकारी पाने के लिए मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत हे ! एक बार जरुर पधारे ! और अपने विचार दे और इस ब्लॉग से जुड़े ! मुझे खुसी होगी !
    मेरे ब्लॉग का पता हे !
    इन्टरनेट एंड pc रिलेटेड टिप्स
    क्या आपका फेसबुक अकाउंट किसी ने खोला है ? अब आप इसका पता लगा सकते हे मोबाइल और ईमेल के जरिये से .......


    उत्तर देंहटाएं

यदि आपको लगता है कि आपको इस पोस्ट पर कुछ कहना है तो बहुमूल्य विचारों से अवश्य अवगत कराएं-आपकी प्रतिक्रिया का सदैव स्वागत है !

मेरी ब्लॉग सूची

ब्लॉग आर्काइव