बुधवार, 4 मार्च 2009

होली है, कबीरा सररररर ! (एक वर्जिन चिन्तन !)

होली का माहौल ब्लॉग जगत में बनने लगा है - और यह संक्रामक है ! दिन चौगुनी रात आठगुनी गति से यह पूरे हिन्दी और भारतीय चिट्ठाविश्व को समेट लेगा -मैं सोचता हूँ कि इस धमाचौकडी के परवान चढ़ने के पहले अपने कुछ निहायत (वाहियात ) किस्म के वर्जिन चिंतन आपसे साझा कर लूँ ! नर नारी कोई संकोच न करें एक तो यह होली की पोस्ट है दूसरे आप दोनों ही जहान के विचार इस मुद्दे पर मौंजू है ! तो आईये इस होली चिंतन में शरीक होईये !

याद है बचपन में जब पूरे गाँव के इज्जतदार बड़े बुजुर्ग गाँव के निर्जन किनारे पर होली जलाने रात में पहुँचते थे तो होलिका दाह कर्म पूरा होने के बाद एक पतला लंबा सा शख्स पता नहीं क्या जोर जोर से गाने सी आवाज में व्यक्त करता था फिर कुछ और लोग भी उसी हुँवा हुँवा में शामिल हो जाते थे ! हर साल का किस्सा यही रहता था ! अब बचपन में यह सब समझ में नही आता था -आठवीं कक्षा के आते आते लैंगिक संदर्भों का मूल ज्ञान होने लग गया था और फिर तो सहसा होली जलाने के बाद के वे समूह गान भी समझ में आने लग गए और मैं बडे बुजुर्गों के सामने शील संकोच से दुहरा होने लग गया -यह गनीमत थी कि उन दिनों होली के प्रकाश के बुझते ही अंधेरे में किसी बड़े बुजुर्ग -बाबा जी ,पिता जी ,चाचा ,काका आदि से आँखे नही मिलती थी और छुपते छुपाते घर आकर कम्बल /रजाई में दुबक लेता था ! अगली सुबह उन सबके सामने भी जाने में हिचक होती थी पर धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो जाता था !

आख़िर उस समूह गान में होता क्या था जिसकी शुरुआत एक वह लीजैण्डरी मैन करता था ? दरअसल वह एक लोक गायन कबीरा की शुरुआत करता था --सुनाने वाले का नाम था बिज्जल जो समाज के कथित निचले वर्ग से थे और लोग उसे सबसे पहले उस लोक गायन की शुरुआत को उकसाते थे ! मत पूँछिये वह कितना अश्लील होता था ! सारे पुरूष और नारी के मूलांगो के अभिधात्मक उल्लेख के साथ ही नर नारी के अनेक गोपन सम्बन्धों ,क्रीडाओं की विविधता और गाँव के फंटूस लोगों लुगायियों के कल्पित सम्बन्धों पर वह तफसरा पेश होता था कि आप यहाँ एक भी झेल नहीं सकते !

जबकि अब यह हिन्दी ब्लागजगत भी ऐसे रूमानी गीत -कबीर /कबीरा के लिए बहुत रिच रा - मटेरियल मुहैया करा रहा है -गाये गए कबीरा में ग्राम्यजन की दमित कामेच्छा शायद एक दिन /रात खुल कर प्रगट होती थीं -और उनकी सेक्स फंतासियाँ भी खुल कर अभिव्यक्त होती थीं ! कोई बिल्कुल भी बुरा नहीं मानता था ! बल्कि उस पल और भी संकोची लोगों को भी कोंच कोंच कर कबीर बोलने को उकसाया जाता था ! कुछ अनगढ़ कबीर बोलने वाले पर ठहाके भी गूजते थे ! किसी को टारगेट भी बनाया जाता था जो सामजिक कामों में हिस्सेदारी के बजाय ज्यादा घर में ही घुसा रहता था !

कबीरा की शुरुआत का वाक्य ही कबीरा सरररर से होता था और अंत भी उसी से ! आज भी यह प्रथा है तो मगर वह जीवन्तता नहीं रह गयी .पिछली बार होली में घर जाने का मौका मिल गया था तो देखा कबीर गाने वाला ही कोई नही रह गया -बिज्जल को स्वर्गवासी हुए भी जमाना गुजर गया ! आज समझ में आता है कि उस एक रात हम परिपक्व होने के पावदान पर अगला कदम रख देते थे ! अनावश्यक संकोच को दूर भगाते थे -वह एक ऐसा रैगिंग सत्र था जो अभिभावकों के ठीक सामने और उनकी देखरेख में होता था -शब्द चित्रों के श्लेष धीरे धीरे समझ में आते जाते थे !

मदनोत्सव की वह शुरुआत सहसा ही याद हो आयी -कबीर की उद्धतता ,साफगोई और बेलौस बोलने के गुणों के चलते उस लोक पर्व के गीत को उचित ही कबीर के नाम पर रख दिया गया ! पर तब भी कथित भद्र लोग उसे बोलने /शुरुआत करने को किसी निचले तबके के बिज्जल सरीखे व्यक्ति को चुनते थे और ख़ुद बडप्पन की आड़ में मजा लेते थे ! माना तो यह भी जाता है न कि होली और रंग वंग हमेशा से निचले तबके का ही त्यौहार रहा है और रोचक तो यह है कि कबीर भी आज गाँव गिरांव के निचले तबके में या तो फिर उच्च विद्वानों में ही ज्यादा प्रिय हैं !
चलिए इस वर्ग भेद को भूल कर हम अपने इस प्रिय ब्लागजगत के सारे गिले शिकवे भूल कर नई स्फूर्ति और चेतना के साथ होली को मिल जुल गले लग जा के आह्वान के साथ मनाएं !
कबीरा सरररर ........!

35 टिप्‍पणियां:

  1. मैंने होली कम ही खेली है.देखने में अच्छी लगती है..खेलने से दूर ही रहती हूँ.
    और जैसी आप ने बताई वैसी आप की पोस्ट में ही पढ़ी और अंदाजा लगा सकते हैं की पहले मनोरंजन ke साधन यही होते थे और तीज त्योहारों की साल भर प्रतीक्षा इसी लिए होती थी की इस बहाने एक साथ सब का उठाना बैठना हो जाये और कुछ हंसी ठठा भी.
    अरसा हो गया होली देखे हुए..क्यों की इस मौसम में भारत जाना नहीं होता.
    खैर...इस ब्लॉगजगत की होली ताऊ जी ने शुरू की और अब आप ने सामायिक पोस्ट भी प्रकाशित कर दी है...होली की अग्रिम शुभकामनायें आप को और आप के सारे परिवार को..
    -होली के नाम पर गुजिया जरुर याद आती है.

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  2. हमें तो यही लगा है कि होली में ही सब के सब अपने असली स्वरुप में आ जाते हैं. बाकी साल भर सभ्य होने का स्वांग रचते रहते हैं.

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  3. अरविन्द जी होली की ढेर सारी शुभकामनाएं। भारत की विविधता हमें अक्सर आश्चर्यचकित करती रहती है। होलिका दहन की प्रथा की यादें तो हमारे मानस पटल पर भी हैं लेकिन कबीरा कभी न सुना न इसके बारे में सुना था।

    होली गरीबों का खेल माना जाता है? अच्छा? तो क्या उत्तर प्रदेश के लोग इसे हिकारत की नजर से देखते थे, क्या इस त्योहार का शुमार तामसिक त्योहारों में किया जाएगा, तो दिवाली क्या है, राजसी त्योहार और फ़िर सातविक त्योहार कौन सा माना जाएगा- करवा चौथ?
    अब ये किसी भी श्रेणी में आता हो, हमारा तो प्रिय त्योहार है। वैसे कबीरा के बारे में कुछ और भी विस्तृत जानकारी दीजिए, कहां कहां गाया जाता है, कितने टाइम तक गाया जाता था, क्या स्त्रियां भी वहां मौजूद रहती थीं या वो घरों में कबीरा गाती थीं, या उनको इस बात की इजाजत नहीं थी, क्या उनके लिए भी कोई निचले तबके की महिला बुलवायी जाती थी। जरा विस्तार में बताइए

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  4. होली दिल खोल के झूमने और ख़ुशियाँ बाँटने का दिन है, सो खेलो रंग कि होली है!

    ---
    चाँद, बादल और शाम

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  5. ऎ भाई मिशिरा जी, ई क उन सा गीला भुलाने के बतिया कर रहें हँय, आप ?
    भाई हम को गीला माफ़ीक आता हय, सो हमको त गीला न रहने दिजीये,
    जब आप सिकवापुर में आयेंगे, त हम ई गीला आपही को भुलाने क लिये दे देंगे !
    तनि आवा एहर होली में, त पटकींऽऽ !

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  6. ऎ भाई मिशिरा जी, ई क उन सा गीला भुलाने के बतिया कर रहें हँय, आप ?
    भाई हम को गीला माफ़ीक आता हय, सो हमको त गीला न रहने दिजीये,
    जब आप सिकवापुर में आयेंगे, त हम ई गीला आपही को भुलाने क लिये दे देंगे !
    तनि आवा एहर होली में, त पटकींऽऽ !

    ईस्मईलिया त छुटिये गईल हो ! :)

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  7. बहुत बधाई होली पर्व की आपको, आपके परिवार और खासकर ब्लाग परिवार को.

    आपने सही खाका खींचा हैं. हुबहु हमारे बचपन की भी यही यादें हैं पर अफ़्सोस अब कुछ भी नही बचा है. शायद अल्पना जी का यह कहना सही है कि उस समय मनोरंजन के साध्न यही लोक गीत और सांग हुआ करते थे.

    वो गीत और गायन शैळी आज भी अंदर तक गुदगुदाती है. शायद अब यादों मे ही रहेगी. मैने कई बार कोशीश की उसको जीवंत देखने की पर कहीं किसी दूर दराज के गांव मे भी नही मिलती अब वो बात.

    रामराम.

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  8. यौन संबंध भी जीवन का एक आवश्यक अंग हैं। आखिर तो उन के लिए कोई स्थान, समय रखना ही होता है। बहुत सी गड़बड़ तो इन्हें छिपाने से ही होती है।

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  9. होली तो होली है..मतवालों की टोली है. मौसम में ही मस्ती घुल जाती है तो हम आप क्या...बढ़िया आलेख...कबीरा...सर्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र्र

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  10. मिश्र जी आज पता चला कि होलियाना एक संक्रामक रोग है जिसका असर ब्लॉग जगत में दिखने लगा है . अपने भी बढ़िया पोस्ट लिख दी . अग्रिम शुभकामना होली पर्व की

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  11. @अनिता जी आपने तो सवालों की पूरी पिचकारी ही उडेल दी ! हाँ होली को गरीबों का नहीं तामसी वृत्तियों के ही चलते शायद निचले तबके के प्रमुख त्यौहार के रूप में मनाने का इतिहास रहा है -कबीर या कबीरा कहा कहाँ गाया जता है यह फिलहाल मुझे नही पता पर उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में यह खूब प्रचलित है -कुछ हिन्दी फिल्मों ने भी सररररर से कुछ गाने भी चुने हैं ,औरते सामने से नहीं छुप कर सारा नजारा करती थीं /हैं ! यह पुरुष गान है ! पर औरतें आपस में इसका संदर्भ देकर ठिठोली करती है ! अब बस इतना ही ! आपका भी कबीर गाने का इरादाहो रहा है क्या ? (होली है )

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  12. आपकी स्मृति की रेखाएं सही दिशा में चिंतन कर रही हैं वास्तव में होली को दमित वासनावो का प्रकटीकरण का उत्सव मानने में कोई संकोच नहीं है
    कबीरा की शुरुवात कैसे हुई है पता नहीं लेकिन धार्मिक रूप से देखें तो इसका आख्यान प्रहलाद के बचने व होलिका के दहन के पश्चात् आसुरो का हर्षोल्लास का पर्व था हो सकता है उन्हें ये बाद में पता चला हो की प्रहलाद तो बच गया है मरी होलिका है खैर जो भी हो आसुरी प्रवितियों के प्रकटीकरण का अच्छा अवसर है इसी कारण दैवी शक्तियों के होली खेलने के समय इस कबीरा नामक गीत की गए परंपरा का कहीं जिक्र मैंने नहीं पाया
    दमित काम वासना वो भी वसंत में निकल जाये तो अच्छा मान कर ही क्या बड़े व क्या बच्चे सभी उन्मुक्त सेक्स के शाब्दिक प्रकटीकरण में कोई बुरी बात नहीं देखते खास तौर से होली की शाम को ग्रामीण अंचल में एक दूसरे के घरों के सामने इन शाब्दिक लैंगिक उपमानों को कबीरा के माध्यम से लक्षित करने उसके बाद पैर छु कर अबीर गुलाल लगा कर गले मिलाने के बाद संभवतः ऐसी ही अनुभूति इन कबीरा के गायकों को होती है जैसे कम वासना के शमन के पशात विश्रांति की
    भंग की तरंग में ऐसे गानों को वास्तव में कोई बुरा नहीं मानता भले ही इसमें लक्षित कोई भी हो

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  13. होली की इस प्रविष्टि पर हम तो भीतर ही भीतर रस ले सकते हैं. अपना संकोची स्वभाव तो होली की इस रंग-रंगीनी से भागता ही रहता है.
    और बड़ों की इस श्लेष-संगति में अपना तो माथा खो गया ही ठीक. हम तो कुछ नहीं समझते सच में और देखे-पढ़े-सुने जाते हैं चुपके-चुपके.
    होली की शुभकामनायें.

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  14. मुझे भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के अपने गाँव में होलिका दहन के समय कबीरा या ‘जोगीरा’ गाने वालों के बीच जाने का अवसर मिलता है। जिस दिन होलिका स्थल पर हरा बाँस गाड़ कर ‘सम्मत’ बनायी जाती है उसी दिन से गाँव की कीर्तन मण्डली फाल्गुन के पूरे महीने भर के लिए ‘फाग मण्डली’ में बदल जाती है। देर रात तक ढोलक और झाल बजाकर अनेक उत्कृष्ट फाग गाये जाते हैं। संयोग और विप्रलम्भ श्रृंगार व कामुक हास्य रस के अनेक पद सुनने को मिलते हैं। महीने भर के इस गायन को ‘फगुआ’ कहा जाता है। इसका उत्स होलिका दहन की रात और अगले दिन होली के रंग गुलाल (अबीर) के साथ उड़ता हुआ देखने को मिलता है।
    हर गाँव में एक दो धुरन्धर गवैया होते हैं। जैसे हमारे गाँव में रामदुलारे जी थे।

    कबीरा/जोगीरा गाने की प्रथा हमारे क्षेत्र में इतनी पुष्ट है कि जो बच्चे निहायत शरीफ और सुसंस्कृत कहे जाते हैं वे भी इस अवसर पर संकोच त्याग कर अपनी सुप्त भावनाओं को वाणी प्रदान कर पाते है। मेरे खयाल से आधुनिक समाज में स्कूल स्तर पर यौन शिक्षा देने की जो वकालत की जा रही है तथा यौन सम्बन्धी बातों के प्रति किशोर वय के बच्चों को सहज बनाने की जो जरूरत समझी जा रही है, पुराने जमाने में इस जरूरत को पूरा करने के लिए भी वसन्त ऋतु के इस पर्व में इस विषय शामिल करके इसे शिक्षा का एक माध्यम बनाया गया होगा।

    जहाँ तक कबीरा की विषय वस्तु की अश्लीलता और इसे निचले तबके द्वारा अधिक प्रयोग करने की बात है, तो इसका सम्बन्ध शिक्षा के स्तर से जुड़ा हुआ है। हर वयस्क व्यक्ति के भीतर यौन सम्बन्धी विचार और संवेग होते ही हैं। सवाल उसे प्रकट करने के तरीके का है। पढ़े लिखे लोग इसी भावना को "रंग बरसे भीगे चुनर वाली..." जैसे प्रसिद्ध गीत से व्यक्त कर लेते हैं जहाँ सोने की थाली का जेवना, लौंग-इलायची का बीरा और बेला-चमेली की सेज का लुत्फ़ ‘गोरी का यार’ उठाता है और ‘बलम’ तरसता रह जाता है। इसी भाव को जब खाँटी देसी तरीके से कबीरा के माध्यम से कहा जाता है तो हमारे हिसाब से अश्लील होते हुए भी उस समाज में वह सहज ही हो जाता है। बनारस के अस्सी घाट पर आयोजित होने वाले होली के कवि-सम्मेलन को आपने जरूर सुना होगा?

    मेरे गाँव में तो कुछ दलित जाति के कलाकार लड़के और मर्द अपने बीच से एक लड़के को स्त्री वेश में सजाकर (नचनिया बनाकर)ढोल मजीरा ले गाँव-गाँव में एक-एक दरवाजे घूमकर कबीरा/जोगीरा गाते और नाचते हैं। इससे वे अच्छा ईनाम बटोरते हैं। इस मण्डली को नाचते-गाते देखने के लिए घर-घर की महिलाएं झरोखे और खिड़कियाँ खोल लेती हैं।

    यह दृश्य इतना अद्‌भुत होता है कि इसे कोई ‘मिस’ नहीं करना चाहता। इसीलिए मैंने आजतक एक भी होली अपने गाँव से बाहर नहीं मनायी। शायद इस बार छोड़ना पड़े। घर से दूर जो आ गया हूँ।

    मिश्राजी, यह कमेण्ट तो एक पोस्ट आइटम बन गया। कुछ श्लील और सुपाच्य जोगीरा शामिल करते हुए एक पोस्ट जल्दी ही सत्यार्थमित्र पर पोस्ट करता हूँ।

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  15. होली अब आ ही गई ...
    और ऐसा कबीरा वर्णन
    पहले ना देखा ना सुना ही कभी ..
    भारत विविधता से भरपूर है !
    - लावण्या

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  16. मै तो खुब होली खेलता था, बहुत ही ऊधम मचाना, लेकिन सभ्य रह कर , ओर जब थोडी अकल आई तो यहां आ गया, ओर फ़िर कभी नही खेली होली....
    मिश्रा जी फ़िर से यादे ताजा करने के लिये आप का धन्यवाद

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  17. हमारे लिये तो ये कबीरा सररर नया ही है पहली बार सुन रहे हैं कबीरा के बारे में। होली का जो मजा इंडिया में आता था वो यहाँ कहाँ। इसलिये अपनी होली तो होली, आपको होली की रंगारंग बधाई।

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  18. सिद्धार्थ जी आपने न केवल अच्छी जानकारी दी है वरन अच्छे तरीके से दी है -शुक्रिया ! पूरी पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी !

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  19. मैंने तो इस के बारे में आज ही विस्तार से पढ़ा ..रोचक लगा ..होली के रंगों के संग और भी बहुत कुछ जानने को मिला अदभुत है हमारी संस्कृति और हर त्योहार शुक्रिया अरविन्द जी होली की ढेर सारी शुभकामनाएं

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  20. इसे पढ़कर ठंडी होली गर्म हो चली है।

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  21. सही बात कही आपने, समय की मार अगर सबसे ज्‍यादा किसी पर पडी है, तो वह हमारी परम्‍पराऍं ही हैं। वैसे मैंने तो कभी होली नहीं खेली, फिर कबीरा सरररररर सुनने का सौभाग्‍य कहॉं से मिलता। हॉं, दूर से होली देखने का आनन्‍द जरूर लिया है।

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  22. जो चाहिए था वो मिल गया आपकी पोस्ट में.. जो सोचा भी नही था वो भी मिला... होली क़ी फागुनी बयार सबको अपने रंग में रंग देती है.. हमने मस्ती तो खूब क़ी है.. चाहे होली हो या दीवाली...

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  23. वास्तव में अनावश्यक संकोच को दूर भागने की ठेठ देसी शैली थी यह. आज तो मनोभावों को दबा कर रखना ही सभ्यता की निशानी है.

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  24. वाह, केकरे हांथे कुंवर बर सोहे, केकरे हांथे मजीरा!
    अवध में होरी खेलें रघुबीरा!

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  25. यादें तो बस यादें ही हैं. होली की शुभकामनाएं!

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  26. होली ही तो एक ऐसा त्योहार है जहां ऊंच-नीच की दीवार तोडी जाती है, सभ्यता का मुखौटा उतारा जाता है और दिल खोल कर खाया, पिया और बोला जाता है - जब कहते हैं:
    आज मीठी लगे है तेरी गाली रे..........

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  27. आपको परिवार सहित होली की बहुत शुभकामनाएं और घणी रामराम.

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  28. ता एगो हमरे तरफ से शाकाहारी कबीरा लेई लेवल जाए आप लोग-

    चूरा करे चुरूर-मुरुर,दही लपालप
    हमार तू चिंता मत करा, मारा गपागप......जोगी जी सररर...

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  29. ता एगो हमरे तरफ से शाकाहारी कबीरा लेई लेवल जाए आप लोग-

    चूरा करे चुरूर-मुरुर,दही लपालप
    हमार तू चिंता मत करा, मारा गपागप......जोगी जी सररर...

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