गुरुवार, 30 जून 2016

कहानी संग्रह अधूरे अफसाने-लावण्या दीपक शाह

अभी अभी लावण्या शाह (लावण्या दीपक शाह ) के कहानी संग्रह अधूरे अफसाने को पूरा किया है। चार  बाल कहानियों को समेटे कुल ग्यारह कहानियों के इस गुलदस्ते को लावण्या जी ने अपने सुदीर्घ सामाजिक जीवन के अनुभवों अॉर कुशल लेखनी से अलंकृत  किया है। कहानियों मे जीवन संघर्ष, मानवीय संवेदनाओं को लेखिका ने बखूबी अभिव्यक्ति दी है। कई कहानियों मे वतन अॉर  अपनों से विछोह की जो पीड़ा अभिव्यक्त होती है वह लेखिका के खुद के प्रवासी  जीवन का और अपने  सहधर्मियों के भोगे यथार्थ से अनुप्राणित होने की प्रतीति कराता एक यथार्थ दस्तावेज बन गया है। ज़िंदगी ख्वाब है मे जहां  महत्वाकांक्षी पति अॉर अभिमानी पत्नी की दुखांतिका है ,मऩ मीत पुरुष स्त्री के अादिम अाकर्षण की कथा है जो एक रहस्यपूर्ण परिवेश मे परवान चढ़ती है किंतु यह भी एक दुखांत गाथा है।

जनम जनम के फेरे अपनों और अपनी माटी से विछोह की पीडाभरी दास्ताँ है।  कादंबरी एक नृत्यांगना की संघर्ष गाथा है जिसमें उसके पुरुष कामुकता से उत्पीड़ित होते रहते की व्यथा कथा है।  नारी के शोषण को पुरुष कैसी कैसी रणनीतियां को अंजाम देता है यह कथा उससे खबरदार करती है।  समदर देवा भी नारी के पुरुष द्वारा शोषण की एक मानो एक चिरंतन गाथा  है किन्तु अपने कथानक में उदात्त प्रेम की भी सुगंध लिए है, मुंबई के सागर तट पर पनपती एक सात्विक प्रेम कथा मन को अंत तक बांधे  रखती है।  यहाँ उदात्त चरित्र के पुरुष पात्रों की उपस्थिति मन को गहरे आश्वस्त करती  है कि अभी भी धरा  पर मानवीयता जीवंत है।  लेखिका की यह कथा मुंबई के मछुवारों की जीवन शैली और इस मायानगरी के अँधेरे कोनो को भी आलोक में लेती है।



 कौन सा फूल सर्वश्रेष्ठ है घर में नवागंतुक दुल्हन के सहज होने के लिए जरूरी अभिभावकीय दायित्व को उकेरती है।  स्वयं सिद्धा अनुष्ठानों के आडंबरों से आक्रान्त भारतीय परिवार की कहानी है।  बालकथाओं में संवाद शैली के जरिये प्रमुख भारतीय पुराकथाओं और नायकों  का रोचक वर्णन है जो बच्चों में नैतिकता के आग्रह को तो प्रेरित करता ही है उनकी ज्ञानवृद्धि भी करता है।

लेखिका एक सिद्धहस्त रचनाकर्मी हैं। योग्य पिता की सुयोग्य पुत्री। आदरणीय पंडित नरेंद्र शर्मा जी की विलक्षण प्रतिभा पुत्री को आनुवंशिकता में मिली है।  लावण्या जी आश्चर्यजनक रूप से नारी सौंदर्य की चतुर चितेरी हैं जबकि समीक्षक इसे पुरुष डोमेन में मानता  आया है।  उन्हें नारी तन और मन की एक समादृत समझ है जो प्रशंसनीय है।  पुस्तक पढ़ने की प्रबल अनुशंसा है!

शुक्रवार, 3 जून 2016

अलविदा डेजी!

आज मन बहुत संतप्त है।  डेजी हमेशा के लिए हमें छोड़ कर चली गयी।  सत्रह सालों का ही साथ था उसका।  लगभग दो दशक।  मुझे याद है कि वर्ष 1999 में जब मैं वाराणसी में कार्यरत था , बच्चों मिकी और प्रियेषा की जिद पर डेजी हमारे घर आयी। एक रुई के गोले  के मानिंद वह थी और बच्चों के लिए खिलौना।  हमारे लिए भी आनंद का स्रोत। सभी का मन उसी में लगा  रहता। उत्तरोत्तर वह अपने कौतुक से लोगों का ध्यान आकर्षित करती।  आने वाले हमारे अतिथियों को वह अपना अतिथि मानती थी। स्वतःस्फूर्त  स्वागत करती। बड़ी होने के साथ उसकी मासूमियत और हमसे  लगाव ने  उसे  हमारी चहेती बना  दिया।  



डेजी ने  कई ट्रांसफर भी झेले।  अनेक सामाजिक समारोहों ,व्याह शादियों  में शरीक हुयी।  जिन शादियों में वह गयी उन जोड़ों  की संताने भी आगे चल उसकी  मुरीद हुईं । लगभग दो दशक के  कालखण्ड में वह कई घटनाओं का साक्षी बनी. बच्चे उसे बहुत चाहते थे मगर वह बच्चों  से दूर रहती।  छेड़खानी उसे बिलकुल पसंद नहीं थी. घर में प्रियेषा  उस पर ज्यादा फ़िदा रहतीं।  मिकी का उस पर रोब  चलता।  वह कमांड किसी का मानती  तो बस मिकी का। हाँ अटैच वह सबसे अधिक गृहिणी संध्या पर ही रही -आजीवन ! आखिर उसके खाने पीने का पूरा ख्याल वे रखतीं। अन्नदाता को भला कौन भूलेगा! 

मेरे घर लौटने पर उसका उसका लट्टू की तरह नाच कर मेरा स्वागत करना कभी नहीं भूलता। अब पहले प्रियेषा अपनी पढ़ाई को लेकर दिल्ली गयीं और मिक्की भी आजीविका  के लिए बंगलौर चले गए ! अब डेजी के साथ केवल हम दोनों रह गए थे। २०१२ के सितम्बर में मेरा फिर ट्रांसफर यहाँ सोनभद्र हुआ तो वह हमारे साथ यहाँ आ गयी।  एक पल भी पत्नी संध्या का विछोह उसे सहन नहीं था। थोड़ी देर के लिए भी घर से बाहर जाने पर वह आसमान सर पर उठा लेती।  अब उसे साथ लेकर ही आना जाना पड़ता। अब डेजी हमारी लायबिलिटी बनती जा रही थीं।  एक बात कहूँगा -कुत्ते बहुत केयर की मांग करते हैं -बच्चे पिल्लों पर मोहित हो पाल तो लेते हैं मगर झेलना मां बाप को पड़ता है . हम ट्रेन बस से अकेले टूर पर चले जाते  मगर  डेजी के लिए AC कार हायर करनी होती  ....
बचपन के उपरांत जबसे मुझे कुछ जानने समझने का शऊर आया मैंने दुख सुख दोनो तरह की घटनाओं को तटस्थ भाव से लेने का आत्मसंयम विकसित करना शुरू किया। यह मुश्किल है किन्तु अभ्यास से संभव है। जीवन मृत्यु, भाव अभाव, हानि लाभ से जुड़ी घटनाओं में मन को स्थिर रखने में गीता के नियमित पाठ से मुझे काफी सहायता मिली। मगर डेजी के मृत्यु ने मुझे गहरे संस्पर्श किया। मैं विचलित हो उठा।एक कुत्ते की मौत पर इतना मर्माहत हो उठना?इसी विश्लेषण में लगा हूं।जो समझ पाया हूं वह यह है कि यह एक निरीह, मासूम के अवसान पर प्रतिक्रिया है। और अपनी असहायता जनित आक्रोश की पीड़ामय अभिव्यक्ति भी कि उसकी जान बचाने के लिए यहां सोनभद्र में चिकित्सा की समुचित व्यवस्था नही हो सकी। 

ऐसा लगता है कि अगर शारीरिक संरचना को छोड़ दें तो भावनात्मक रूप से स्त्री पुरुष में कोई भेद नहीं है। हां पुरुषों को आंसुओं पर नियंत्रण रखना, कठोरता का प्रदर्शन आदि संस्कारगत सीखे हैं। जार जार रोने वाले पुरुष उपहास के पात्र बनते हैं। उन्हे तो पाषाण हृदय होना ही समाज में श्रेयस्कर माना गया है। इसके विपरीत रोना धोना, अधीरता, कातरता स्त्री मूल्यों के रुप में समाज में समादृत हैं। डेजी के अवसान ने मेरे ऊपर लागू इन बाह्य व्यावहारिक परतों को उधेड़ दिया। मन कातर हो उठा। समग्र आत्मसंयम काफूर हो उठा। निर्बल असहाय निरीह और मूक की पीड़ा में इतनी ताकत है।

डेजी पाम स्पिट्ज की प्रजाति की थी . इस प्रजाति के पालतू कुत्ते औसतन  बारह वर्ष और अधिकतम सोलह वर्ष जीते हैं । इस  लिहाज से उसने अपनी पूरी  उम्र हमारे साथ बिताई। लगभग दो वर्षों से उसमें उम्र वार्धक्य के लक्षण दिखने लगे थे।  फिर पैरों में सन्धिवात और बार बार दिगभ्रमित  होना भी आरम्भ हुआ।कैनाइन कॉग्निटिव डिफिशिएंसी सिंड्रोम! विशेषज्ञ बताते हैं कि  मनुष्य का दस वर्ष कुत्ते के एक  वर्ष के बराबर होता है! इस तरह डेजी १७० वर्ष की सबसे उम्रदराज सदस्य थी हमारे परिवार की। आज उसके विछोह ने हमें आघात सा दिया है।  एक प्रिय का लम्बे समय साथ रहकर हमेशा के लिए चला जाना बहुत सालता है।  हम सभी दुखी हैं।  खासतौर पर उसकी मासूमियत और  हमारी असहायता कि हम उसके प्रयाण को रोक पाने में असमर्थ रहे हमें बहुत संत्रास  पंहुचा रही है। मगर नियति को भला कौन टाल  सकता है! अलविदा डेजी! 

रविवार, 24 अप्रैल 2016

शिवजी के ललाट पर बालचंद्र क्यों हैं ,पूर्णचन्द्र क्यों नहीं?

कौस्तुभ ने पूछा है कि शिवजी के ललाट पर बालचंद्र  क्यों हैं ,पूर्णचन्द्र क्यों नहीं? अब सवाल है तो उत्तर भी होना चाहिए।  किसी को यह भी लग  सकता है कि भला यह भी कोई सवाल है? अर्धचंद्र है तो है अब इसकी क्या मीमांसा? देवी देवताओं के मामले में ऐसा हस्तक्षेप वैसे भी लोगों को पसंद नहीं है। मगर जो जिज्ञासु हैं उन्हें तसल्ली नहीं होती। जिज्ञासु लोगों के साथ एक समस्या और भी है वे प्रायः तार्किक भी होते हैं -एक तो करेला दूसरे नीम चढ़ा :-) . किन्तु  यह भी सत्य है कि यदि जिज्ञासु न होते तो आज मानव जहाँ है वह नहीं होता।  जिज्ञासुओं ने ज्ञान की गंगा को हमेशा प्रवाहित किये रखा है।  

चन्द्रमा हमेशा से मनुष्य की जिज्ञासा और श्रृंगारिकता को कुरेदता रहा है। कारण चन्द्रमा कौतुहल का विषय रहा है।  यह घटता बढ़ता  रहता है। कभी कभी तो अचानक लुप्त हो जाता है।  कभी दिन में दीखता है कभी रात में। हजारो वर्ष पहले से यह कौतूहल  का केंद्र रहा और इस आकाशीय पिंड को लेकर अनेक सवाल पूछे गए होंगे. तब हमारे पूर्वज ज्ञानियों ने अपने तत्कालीन ज्ञान के आलोक में और स्टाइल में  उन सवालों के जवाब दिए होंगे।  कहना नहीं है उन दिनों की जवाब की कथा शैली थी जो आज भी हमारे बीच पुराण कथाओं के रूप में हैं।  हाँ पुराण कथाओं की ज्ञात अद्यतन वैज्ञानिक जानकारियों के सहारे आज पुनर्रचना की जाय तो कितना अच्छा होगा। 

हाँ यह बताता चलूँ कि हजारो वर्ष पहले हमारे पूर्वजों को अच्छा खगोलीय ज्ञान था।  जब यूनान में मात्र १२ राशियों से अनेक खगोलीय गणनाएँ होती थीं तभी हमारे यहाँ 27 नक्षत्रों को आसमान में पहचान दी जा  चुकी थी।  अब धरती और चन्द्रमा  की अपनी धुरी और एक दूसरे के सापेक्ष पारस्परिक गति से चन्द्रमा का उसके अट्ठाईस दिन से कुछ अधिक के दिन की विभिन्न अवस्थाओं और आसमान में स्थिति को पूर्वजों ने भली भांति जान समझ लिया था तो  आम आदमीं तक इस ज्ञान को पहुंचाने के लिए को रोचक कथाएं गढ़ीं।  जिनमें एक तो दक्ष प्रजापति और उनकी सत्ताईस  पुत्रियों की कथा है जिनका व्याह चन्द्रमा से हुआ -अब २७ पुत्रियां यहीं नक्षत्र ही तो थे।  

देखा यह जाता था कि एक चंद्रमास में चन्द्रमा का ठहराव रोहिणी नक्षत्र में ज्यादा समय तक रहता  था। सवाल आया ऐसा क्यों ? जवाब था कि दक्ष की पुत्री और अपनी इस पत्नी रोहिणी  से चन्द्रमा का लगाव ज्यादा था। अब कथा और आगे बढ़ी।  जिसमें चन्द्रकलाओं के  रहस्य को समझा दिया गया -कुपित दक्ष ने  चन्द्रमा को शाप दे दिया कि तुम्हारा रूपाकार और तेज घटता जाएगा।  अब इस शाप से मुक्ति के लिए चन्द्रमा को अंततः शिव जी की शरण में जाना पड़ा ,उन्होंने आश्वस्त किया कि शाप का प्रभाव पूर्णतः तो नहीं खत्म होगा मगर तुम्हे अपना  पूर्ण स्वरुप भी मिलता रहेगा।  हमेशा के लिए क्षय नहीं होगा ! कहते हैं तभी से शिव के ललाट पर चन्द्रमा आश्रय लिए हैं।  

मगर शिव के ललाट पर बालचन्द्र (crescent moon ) ही क्यों? मैं किसी और मिथकीय कथा को ढूंढ रहा हूँ शायद कोई उत्तर वहां मिल जाय।  मगर पूर्णचन्द्र विश्व की कई सभ्यताओं में अपशकुन द्योतक हैं-ज्वार भाटा लाने वाले हैं और कभी कभी तो अचानक लुप्त हो कर भयोत्पादक भी रहे हैं। ग्रहण के चलते।  आज हमें ग्रहण की वैज्ञानिक जानकारी है मगर कभी इसके लिए भी राहु केतु राक्षसों की कथा रची गयी थी।  अब भला शिव अपशकुन सूचक ,भयोत्पादक चन्द्रमा के रूप को शिरोधार्य क्यों करेगें ? उन्हें तो निर्विकार निर्विघ्न बालचंद्र ही प्रिय हैं! आप को इस विषय पर और जानकारी मिले तो कृपया साझा करने  का अनुग्रह करेगें!

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

आतंकवाद की अंतरंग पौधशाला


मैं देख रहा हूँ मेरे कुछ मुट्ठी भर तथाकथित प्रगतिशील फेसबुकिया मित्र प्रत्यक्ष, परोक्ष और कुछ घुमा फिराकर, कभी दबी जुबान कभी मुखर होकर भी देशविरोधी तत्वों को सपोर्ट कर रहे हैं। उनकी निजी कुंठाओं , दमित इच्छाओं को शायद ऐसे मौकों की तलाश रहती है जब वे अपनी दबी रुग्ण मानसिकता और विचारों का समर्थन, वैलिडेशन कुछ अपने सरीखे दिग्भ्रमित लोगों से करा कर संतोष पाते है । ये दमित इच्छाओं के मसीहा अपने निज जननी, देश के सम्मान को भी अपनी कथित अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर दांव पर लगा देते हैं। वस्तुतः ये देश के गद्दारों को अपने कृत्य से बढावा दे रहे हैं। ईश्वर उनका भला करे।

एक सामान्य परिपाटी रही है कि किसी भी संगठन संस्थान/ कार्यालय /विभाग की गड़बड़ियों का जिम्मेदार उसके मुखिया को प्रथमतः माना जाता है -उत्तरदायित्व उसका ही होता है। कन्हैया कुमार जेएनयू के छात्रसंघ के अध्यक्ष हैं , उनकी प्रमुख उपस्थिति घटना के पहले और बाद में भी प्रमाणित है। टीवी चैनलों पर भी उन्होंने अपना स्पष्ट मत व्यक्त नहीं किया ,मुखरता नहीं दिखी , आधेमन से ही उन्होंने अपनी निष्पक्षता बयान की बल्कि कहीं कहीं वे विकृत सोच वालों के पक्ष में दिखे,न्यायिक प्रक्रिया शुरू हो गयी है उस पर टिप्पणी न्यायालय का अपमान है ,हाँ वे अगर निर्दोष पाये जाते हैं ,काश वे हों तो सबसे अधिक खुशी मुझे होगी कि साधारण बिहारी परिवार से निकले इस संघर्षशील और मेधावी युवा का जीवन इन विकृत सोच वालों की सोहबत में बर्बाद होने से बच गया ! मेधावी रोहित वेमुला को हम खो चुके हैं।  काश फिर ऐसा न हो!


सबसे बड़ा सवाल यह है कि देश सर्वोपरि या जेएनयू ? आखिर पुलिस क्यों नहीं कर सकती कैम्पस में सर्च आपरेशन? मेरी गट फीलिंग थी कि वहां आपत्तिजनक सामग्री और अनधिकृत लोग हो सकते हैं। जो कुछ देशद्रोही गतिविधि हुई है वह एक लम्बे समय से चल रही आपत्तिजनक गतिविधियों की ही परिणति है।मगर हम समय रहते यह देख न सके। विश्वविद्यालय परिसर की शुचिता के आड़ में देश विरोधी गतिविधियाँ कुछ गुमराह छात्र चलाते रहे हैं -ये वही छात्र हैं जिनमें से अधिकाँश नशे की आदत पाले हुए हैं। ड्रग्स का बेधडक इस्तेमाल करते हैं। रॉ के एक पूर्व अधिकारी ने इसकी पुष्टि की है।

खुली सोच और बोलने की आजादी जैसे फिकरों , छद्म बौद्धिकता और तरह तरह के बौद्धिक प्रपंच के चलते जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय का माहौल विगत कई दशकों से इतना विषाक्त होता गया है कि अच्छे खासे सांस्कृतिक माहौल से निकल कर वहां पहुंचे छात्र भी ब्रेन वाश के शिकार हो जाते हैं। सनसनी सम्भाषण (डेमोगागी) , मार्क्सवाद ,वामपंथ ,आज़ादी , नशाखोरी के चलते उत्पन्न मनोभ्रमों (पैरानायड़) और उन्मुक्त यौनचारों के चुंबकीय आकर्षण पाश इन युवाओं को दिग्भ्रमित कर एक वायवीय दुनिया में ले जाते हैं -आतंकवादी बनाने का प्रोसीजर भी ऐसा ही कुछ है।

नतीजा सामने है -जिस देश का ऋणी होना चाहिए आज यहाँ के छात्र उसकी बर्बादी का जश्न मना रहे हैं ! वह भी एक गरीब देश की जनता की गाढ़ी कमाई से काटे टैक्स के पैसे से। जेएनयू में छात्रों के रहने सहने का लगभग सारा बोझ ही इस देश की गरीब जनता उठाती है। विश्वविद्यालय के विकृत सोच के प्रोफ़ेसर भी बिगड़े छात्रों का कन्धा थपथपाते हैं ! एक गिलानी पकड़ा गया मगर कई और ऐसे हैं वहां ! जेनयू अलुमिनी देश के कई हिस्सों में पसरे हुए हैं और गरीब जनता की गाढ़ी कमाई से रोटी तोड़ रहे हैं। इनका संज्ञान लेना होगा -क्योंकि आतंकवाद की इस अंतरंग पौधशाला को खाद पानी देंते रहने का मतलब है परजीवी विष बेलों को पनपाते जाना ! चेतो भारत चेतो!

जेएनयू से देशद्रोहियों को बाहर करो और कैपिटल पनिशमेंट दो! एक नागरिक के नाते यह मेरी मांग है। अगर इन्हें इसी तरह इग्नोर किया गया तो सचमुच हम अपनी सम्प्रभुता खो देगे। फ्रीडम आफ एक्सप्रेसन के नाम पर तुम पाकिस्तान की जय जयकार करोगे? सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को चुनौती दोगे? कश्मीर की फ्रीडम की आवाज बुलंद करोगे? भारत की बर्बादी की जंग करोगे? इन सभी को पकड़ो और देशद्रोही की तरह बर्ताव करो।नहीं तो अब कैम्पस में जनता घुसेगी और इन देशद्रोहियों को उनके अन्जाम तक पहुंचायेगी।

जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।
मैथिली शरण गुप्त

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