शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

आज चर्चा में हैं दो नायिकायें -गुप्ता और लक्षिता!

आज दो नायिकाओं  का वर्णन जिनमें बहुत कुछ गोपनीयता के आवरण में है -ये हैं गुप्ता और लक्षिता ! गुप्ता उस नायिका को कहते हैं जो प्रिय मिलन को गोपनीय रख पाने में सफल हो रहती है जबकि लक्षिता का गोपन प्रेम किसी के द्वारा देखदेख सुन लिया जाता है.गुप्ता प्रिय से मिलन के चिह्नों का कोई अन्य कारण बताकर अपने गुप्त प्रेम को छिपाने में कैसे सफल रहती है इसका राकेश गुप्त जी ने किस प्रकार रोचक चित्रण किया है-




पौ फटने से भी पहले ही 
पनघट को मैं चली हठीली ;
संध्या की रिमझिम के कारण 
राह बनी थी कुछ रपटीली ;
संभल न पाई , छलकी गागर ,
हुई शिखा से नख तक गीली
सखी ,साक्षिणी बन संग चल तूं
न हों सासू जी नीली पीली


जब नायिका के प्रिय मिलन का भेद किसी को पता हो जाता है यानि उसका गुप्त मिलन अन्य के द्वारा लक्षित हो उठता है तो उस स्थिति में ही नायिका लक्षिता कहलाती है -
राकेश गुप्त का यह विवरण तो देखिये -


चली कामिनी पूजा करने 
लेकर नीराजन की थाली .
अटक गयी संकेत कुञ्ज में ,
जहां अवस्थित थे वनमाली .
देख लौटते स्वेद -स्नात हँस 
बोली नर्म -सखी मतिवाली -
"धन्य!आज की जीभर  तुमने 
इष्टदेव की पूजा ,आली!"

33 टिप्‍पणियां:

  1. यह दोनों नायिकायें मेरी दृष्टि में नहीं आयी थीं साहित्य में । राकेश जी ने इतनी सहजता से विवरण दिया है कि न पूछिये -
    गुप्ता तो वाकविदग्धा भी है । बेहतर तर्क इकट्ठा करती है, और साक्ष्य भी झट से उपजा लेती है । सखि बेचारी !

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  2. बहुत रोचक और सुंदर श्रंखला लगती है. पीचे से पूरी पढनी पडेगी। धन्यवाद।

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  3. `सखी ,साक्षिणी बन संग चल तूं
    न हों सासू जी नीली पीली'

    भई, ये तो बुरी बात है, ब्याहता और.......

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  4. वाह-वाह। गुप्ता और लक्षिता...!
    देखे हैं मैने आसपास। बस जानता नहीं था कि यही नाम है इनका। बताने का शुक्रिया।

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  5. बहुत सहज और उम्दा चित्रण!!

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  6. खेद है कि संस्कृत में इन नायिकाओं के विषय में भी वर्णन नहीं मिला. हाँ, जैसे कि मैंने पिछली पोस्ट की टिप्पणी में कहा था कि व्यंजना वृत्ति के प्रसंग में ऐसी नायिकाओं के उदाहरण बहुत देखने को मिले. यहाँ प्रस्तुत दूसरी कविता व्यंग्य का उदाहरण कही जा सकती है. जिसे ध्न्यालोककार ने "ध्वनि" कहा है.
    राकेश गुप्त जी की कविताएँ बहुत रसभरी हैं. आपकी इस श्रृंखला से मुझे तीन-चार नयी नायिकाओं के विषय में जानने को मिला.

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  7. राकेश गुप्त जी की कविताओं के साथ स्वप्ना जी की तस्वीरें पूरी प्रविष्टि को एक अर्थ प्रदान करती हैं ...बहुत आभार आप सबको ...!!

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  8. अरविन्द जी,
    आपकी कृपा से अब हम अपने आस-पास की नायिकाओं को इन्हें के नामो से बुलाने लगे हैं....
    सिर्फ पढ़ने से क्या फायदा....व्यवहार में भी तो लाना चाहिए...
    बहुत अच्छा सीरियल चल रहा है...
    धन्यवाद....

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  9. shrimant! aapka andaaz bha gaya! bahut khoob! kya kahana!
    aagrah ke saath nimantrn hai, mere saajha-sarokaar ki nai post zaroor padhen.

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  10. .
    .
    .
    'गुप्ता' तो हर नायिका रहना चाहती है पर 'लक्षिता' बन जाती है...
    क्या किया जाये मुआ प्यार चीज ही ऐसी है...
    इसी लिये तो कहते हैं कि "इश्क और मुश्क छुपाये नही् छुपता।"

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  11. पुराने लोग कुछ अधिक ही स्वेदासक्त/स्वेदाक्रांत थे। क्या करते भारत भू की भयानक गरमी, उफ!
    लेकिन अब और लक्षणों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। एयर कंडीसनिंग का जमाना है और नॉन ए सी वाले भी मॉल में चले ही जाते हैं। गाँव वालों के अलावा शहरियों की भी बात होनी चाहिए।
    ... बिजली की कमी है लेकिन तब भी भागती तेज जिन्दगी में पसीने पर कौन ध्यान देता है !

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  12. waah waah .........aaj to dono hi nayikaon ka bahut hi sundar chitran kiya hai aur sath mein rakesh gupt ji ki rachnaon ne to char chaand laga diye hain.

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  13. बड़ी देर हो गयी इन नायिकाओं से मिलने में , क्या करूँ ये जो
    लोकानिक-रस्साकशी चल रही थी , इसी ने फंसाए रखा ...
    ऐसी स्थिति में इस 'गुप्ता' ने थोड़ी राहत दी , 'लक्षिता' के चक्कर
    में नहीं पड़ा , क्या पता इसकी वजह से किसी की '' अन्यसंभोग-दुखिता''
    जैसी शिकायत बने या फिर कोई खुद को ''खंडिता'' जैसा महसूस करे ...
    इसलिए जमाना तो यही कहता है 'गुप्ता' से गलबहियाँ की जाय ...
    आपके नायिका विमर्श ने मुझे भी कितना समझदार बना दिया !!!
    .............................आर्य , आभार ...................................

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  14. चलिये आप की हां मै हां मिला लेते है

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  15. अजी हम तो बड़े खुश हुए, लगा कि आज तो हमारे बारे में ही कुछ लिखा जा रहा है लेकिन यह क्‍या यह तो गुप्‍त नायिका निकली। अच्‍छी जानकारी दी, बधाई।

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  16. बहुत सुन्दर नायिकायें। कोई सानी नहीं।
    परिवेश में खोजने का यत्न करते हैं!

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  17. ये नाम्करण भी कुछ अजीब नही है अब भला गुप्ता जी को गुप्ता भाभी कहने पर भाभी जी क्या सोचेगी
    आपको सभी गुप्त बन्धुओ खास तौर से भाभियो से खेद प्रकट कर के ही लेख लिखना चाहिये था
    पता नही कैसे कुछ लोगो को आस पास ये नयिका भेद वाली नयिकाये तत्काल मिल भी जा रही है तथा इन शब्दो का वाक्य प्रयोग करने का अवसर भी मिल जा रहा है मै तो इन बन्धुओ के भाग्य से इर्ष्या कर रहा हू तथा सोचता हू इन बन्धुओ के यहा जा कर मुहल्ले मे इन नयिकाओ के भेद को नजदीक से समझू लेकिन हाय ऐसे नसीब कहा

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  18. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  19. Acne affects the majority of people in adolescence. Here arises the following question. If most people have acne within a certain period of life, perhaps it should not be viewed as a disease but as a routine case? Moreover, it may be considered an illness not having acne, but its absence in adolescence?
    A reasonable approach to this question is the following:
    - Single non-inflammation pimples can be considered as normal. In this case it is sufficient to comply with general recommendations.
    - Mild acne can be considered as a disease that requires treatment and as a state that does not need treatment. The determining factor in this situation is the attitude of the person who has acne.
    If a person has mild acne that causes psychological distress, in this case it’s necessary to treat acne.
    If the acne is mild and do not cause psychological problems, there is no need to treat it. However, you must comply with general recommendations.
    - Moderate to severe acne requires mandatory treatment, since in these cases acne usually causes psychological problems. Also it is likely to bring small and large scars.
    Source: [url=http://popularacnetreatment.blogspot.com/]Acne treatment[/url]

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