सोमवार, 7 दिसंबर 2009

और ये है सोलहवीं नायिका ....अनुशयाना!

नायिका भेद शास्त्र के एक लोकप्रिय लेखक हुए हैं भानुदत्त. उनके  अनुसार अनुशयाना वह नायिका है जो प्रिय मिलन में बाधा उत्पन्न हो जाने से उदास है और यह नायिका तीन प्रकार  की होती है !पहली तो वह जो वर्तमान के  मिलन स्थल के नष्ट हो जाने से दुखी हो जाती है और दूसरी इस आशंका से की कालांतर में किसी भी कारण (जैसे किसी अन्य से विवाह के कारण )पूर्व प्रेमी से किसी उपयुक्त मिलन स्थल के अभाव के कारण मिलना न हो सकेगा ! और तीसरी अनुशयाना  नायिका वह जो किसी बाधा के समुपस्थित हो जाने से संकेत/ अभिसार /मिलन स्थल पर न पहुँच पाने की व्यथा से उद्विग्न हो गयी है !

 
अनुशयाना  के भानुदत्त के तृतीय प्रभेद को लेकर राकेश गुप्त जी ने कितना मार्मिक  काव्य वर्णन किया है ,आप भी देखें -
लता कुञ्ज से पड़ा कान में 
मृदु वंशी -रव जब श्यामा के,
विकल अधीर हुए तन मन सब 
पिया- मिलन को तब कामा के ;
दारुण दृष्टि ननद की उलझी 
बेडी बन पग में भामा के ;
पीती रही विवश हो ,बाहर 
गिर न सके आंसू श्यामा  के



पुनश्च:यह श्रृंखला  अभी  समाप्त नहीं हुई है- अभी  चंद नायिका उपभेद रह गए हैं ! तत्पश्चात पंचो की राय पर नायक भेद भी चर्चा में आएगा ही और तब जाकर उपसंहार के बाद यह श्रृखला समाप्त होगी ! लिहाजा धैर्य बनाये रखेगें !

15 टिप्‍पणियां:

  1. आशना हो तो आशना समझे
    हो जो नाआशना तो क्या समझे?

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  2. अरविंद भैया- बहुत बढिया जानकारी दे रहे हैं नायिका के वि्षय मे, जब नायिका भेद सम्पुर्ण हो जाएगा तो मैं इन नायिकाओं के विषय मे दो चार लाईन लिखना चाहुंगा, बहुत बढिया विषय है। आभार

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  3. आपकी प्रस्तुति और राकेश जी की पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगी..धन्यवाद

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  4. इति प्रथमोsध्याय:।
    शंख ध्वनि।

    अनुशयाना शब्द की व्युत्पत्ति भी बता दीजिए।
    ई गुप्ता जी बड़े रसिया रहे होंगे। अहो गुप्त लोगों की गुप्त बातें !

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  5. पीती रही विवश हो ,बाहर
    गिर न सके आंसू श्यामा के

    श्यामा का बन जाना अनुशयाना भी खूब है ...!!
    सुन्दर प्रस्तुति ....!!

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  6. मिश्र जी की जय हो!
    कुछ दिनों तक अनुपस्थित क्या रहा...ये भेद कितने आगे चले गये। अभी एक-एक करके पढ़ा है।
    राकेश जी की उद्धृत कविताओं ने मन मोह लिया है। कुछ जानकारी दें तो कृपा हो कि क्या ये कवितायें पुस्तक की शक्ल में उपलब्ध हैं? यदि हैं तो प्रकाशन आदि का जो पता चल जाये तो असीम कृपा होगी इस अकंचन पर।

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  7. अनुशयाना का वर्णन मैंने पहली बार देखा. अच्छा लगा. यह जानकर भी खुशी हुयी कि आप नायक-भेद पर भी लिखने वाले हैं. तो प्रतीक्षा रहेगी. और आप भी तैयार रहियेगा क्योंकि उस पर बड़ी तीखी टिप्पणियाँ मिलने वाली हैं हमारी ओर से.
    पुनश्च, किसी ने अनुशयाना की व्युत्पत्ति पूछी है तो मूलशब्द "अनुशयान" की व्युत्पत्ति है = अनु+शी+शानच्‌ , खेद प्रकट करता हुआ, इसका स्त्रीलिंग शब्द है= अनुशयाना, जो कि एक नायिका-भेद है. वह नायिका, जो कि अपने प्रेमी से न मिल पाने के ख्याल से खिन्न रहती है.

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  8. वाह भाई ..
    '' बहुत कठिन है डगर पनघट की ..''
    उस पर भी ..
    '' ननदी मुरहिया मुस्की मारे .. ''
    फिर भी कुशलता ..
    '' पीती रही विवश हो ,बाहर
    गिर न सके आंसू श्यामा के ''
    .........गुप्ता जी तौ बड़े ताडू साबित भये ..
    आभार ,,,,,,,,,,

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  9. एक और नायिका जो दुखी है. क्या अधिकांश नायिकाओं के प्रारब्ध में दुख ही हैं????

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  10. aap ne kabhi khud...naayikaa hoker dekhaa hai...

    naayikaa honaa kabhi khud bhi mahsoos kiyaa hai...

    mere blog pe ek baar aayein...

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