शुक्रवार, 6 मई 2011

परशुराम का आह्वान

आज परशुराम जयन्ती है और इस अवसर पर राजकाज से मेरा अवकाश भी ...सो इसका सदुपयोग करते हुये आज आपसे परशुराम चरित पर तनिक चर्चा का मन है -परशुराम अमर माने गए हैं -यह श्लोक देखिये -
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभिषण:
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः 
मतलब अश्वत्थामा,राजा  बलि ,व्यास ,हनुमान ,विभीषण ,कृपाचार्य और परशुराम  ये सातों विभूतियाँ अमर हैं ..जाहिर है  इनकी प्रासंगिकता चिरकालिक है ,आज भी है! पिछले वर्ष जब मैं दक्षिण -यात्रा पर अर्थात दक्षिणायन था तो डॉ. जे सी फिलिप शास्त्री ने मुझे दक्षिण में भी राजा बलि और परशुराम के प्रताप का कुछ बोध कराया था -जहाँ लोकमानस में इनकी आज भी काफी कद्र है ..उनसे ही पहली बार जाना की कोंकण और केरल उनका ही बसाया हुआ है -ऐसी मान्यता है .वर्णन मिलता है कि उन्होंने कोंकण से लगे समुद्र में अपने फरसे को शमित किया था और एक बड़े भू भाग को समुद्र से मांग  (रिक्लेम ) कर मनुष्य के उपयोगार्थ बनाया था ...गोवा में  परशुराम की भव्य प्रतिमा उनके प्रति राज्य  के सम्मान और समर्पण की संकेतक है .



कौन थे परशुराम ?महज एक मिथकीय चरित्र या कुछ ऐतिहासिकता भी है इनके व्यक्तित्व और कृतित्व   के निरूपण में ? यह एक मुश्किल सवाल है -हम भारत के अतीत के एक बड़े हिस्से को अभी भी ऐतिहासिकता के दायरे  में नहीं ला पाए हैं -मगर हमें यह इतिहास वेत्ताओं की सीमाओं का ही भान कराता है,सत्य का नहीं! हम अगर प्रमाण नहीं इकट्ठा कर पा रहे हैं तो यह कैसे कहा जा सकता है कि लोक मानस में  हजारों सालों से
जीवंत अनेक वृत्तांत सब झूंठे हैं -हाँ बहुत सी बातों में छुपी अतिरन्जनाओं ,समय के साथ की विकृतियों में भी हमें कुछ काम की बातें मिल सकती हैं बशर्ते हम पूर्वाग्रहों से मुक्त आँख कान खोल अपने अतीत का अवगाहन करें ..]

मुझे लगता है परशुराम वैष्णव संस्कृति के एक यशश्वी ध्वजावाहक थे -इनका आविर्भाव हमारे पुराणोक्त त्रेता युग और वह भी इक्कीसवें त्रेताकाल में हुआ था -न जाने मुझे ऐसा क्यों लगता है यह वही समय था -संभवतः ईसा से ५-६ हजार वर्ष पहले जब दक्षिण भारत में अफ्रीका से आये मूल वंशजों का अधिपत्य हो चुका था और एक भरी पूरी संस्कृति अस्तित्व में आ  गयी थी -परशुराम एक उद्भट विद्वान् और पराक्रमी इन दोनों विपरीत से लगने वाली विशिष्टियों के धनी थे और निरंतर अपने राज्य के विस्तार में लगे थे -उन्होंने दक्षिण में अपने तत्कालीन वैष्णवी संस्कृति  के विरोधियों से जमकर लोहा लिया ...बस केवल इक्ष्वाकु वंश जिसके कालांतर में यशस्वी वंशधर  राजा राम हुए को छोड़ते हुए उन्होंने तत्कालीन दुष्ट ,आक्रामक क्षत्रियों का एक बार नहीं अनेक बार नाश किया -उनके धरती पर बढ़ते प्रभुत्व पर विराम लगा दिया ....वह बड़े बड़े आंतरिक युद्धों का समय था ..शायद उत्तर की ओर से धमक रही आक्रान्ताओं की भीड़ से संघर्ष की शुरुआत थी और यह जाकर खुद वैष्णवीं राम के बढ़ते अधिपत्य के साथ समाप्त हुयी -कथायें बताती हैं कि किस तरह परशुराम राम का सम्मिलन हुआ और तब जाकर परशुराम का अभियान थमा -वे पुनः आंध्र स्थित महेंद्र पर्वत पर जाकर ध्यानमग्न हो गए ....वाल्मिकी रामायण और राम चरित मानस में यह प्रसंग /रूपक बड़े ही रोचक तरीके से प्रस्तुत हुआ है -परशुराम का राम से समन्वय वैष्णवों के उत्कर्ष और शैवों के किंचित पराभव का भी द्योतक हो सकता है यद्यपि राम में  शैवों और वैष्णवों दोनों के आमेलन का प्रभाव कालांतर के तुलसी सरीखे चिन्तक और कथाकार दर्शाते हैं ....

परशुराम का व्यक्तित्व जरा इन अलग अलग काल के मनीषियों की दृष्टि से देखिये -
पुरतः चतुरो वेदाः ,पृष्ठतः सशरं धनु:
इदं ब्राह्मं इदं क्षात्रं शापादपि शरादपि 
(मुख चारों वेदों से सुशोभित ,पीठपर शरों सहित धनुष ,एक ओर तो ब्राह्मण - तेज रूपी  शास्त्र   और दूसरी ओर क्षत्रियोचित शस्त्र ) -यह श्लोक आज के ब्राह्मणों को भी शायद प्रेरित कर सके! अब   देखिये तुलसी परशुराम को किस रूप में देखते हैं -
वृषभ  कंध  अरु  बाहू  विशाला .चारु  जनेऊ  माल   मृगछाला
कटि   मुनि बसन  तून  दुई बांधे .धनु सर कर कुठारु कल काँधे 

..यहाँ तुलसी फरसे को भी समाहित कर लाये ....अब राष्ट्र कवि दिनकर का यह व्यक्तित्व निरूपण देखिये -
मुख में वेद पीठ पर तरकस ,कर में कठिन कुठार विमल 
शाप और शर दोनों ही थे जिस महान ऋषि के संबल 

अर्थात वे ज्ञानार्जित  वचन  और पराक्रम दोनों से अपने विरोधी को श्रीहीन करने में पूर्णतया समर्थ थे.....अतीत में एक  लम्बे समय तक चलने वाले देश के आंतरिक युद्ध के नायक थे परशुराम और इसलिए कई युगों तक उनका प्रभाव बना रहा -यह संभवतः वही दीर्घकालिक युद्ध था जिसमें कभी क्षत्रिय विश्वामित्र और महामुनि वशिष्ठ भी भिड़े थे और विश्वामित्र अकस्मात कह पड़े थे..
धिग बलम क्षत्रिय  बलम ब्रह्म तेजो बलम बलम 
एकेन      ब्रह्मदण्डेन        सर्वस्त्राणि हतानि मे 
(वाल्मीकि रामायण )
कदाचित यह अन्यथा नहीं कि उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुयी राजनैतिक भूमि को स्थिरता देने के लिए आज यहाँ के जन्मना ब्राह्मण परशुराम को अपने जाति के गौरव /शौर्य का प्रतीक माने हुए हैं मगर उन्हें ऐसे महान नायक के गुणों का भी समावेश अपने में करना होगा ...मात्र एक सीमित अजेंडे के परिप्रेक्ष्य में इस महान व्यक्तित्व का आह्वान निश्चय ही इनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि नहीं होगी ....

39 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी जानकारी। आपके ग्यान के आगे नतमस्तक हैं । मिश्रा जी आपसे कभी मिलूँगी मैने कल्पना भी नही की थी। उस दिन अपसे मिल कर बहुत प्रसनता हुयी, मगर अफसोस ये रहा कि अधिक बातचीत नही हो पाई। वैसे मैं आपको पहचान नही पाई थी बताने पर ही पता चला। शुभकामनायें।

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  2. परशुराम तो चिरंजीवी है! आयेंगे फिर किसी दिन, दुष्टो के दमन के लिए !

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  3. विभिन्न कवियों के परशुराम की तुलना रोचक रही। सातों चिरंजीवी हर काल में रहे हैं और रहेंगे। 1857 के परशुराम शायद तात्या टोपे रहे हों जिन्होंने ईस्ट इंडिया कम्पनी का शटर हमेशा के लिये वैसे ही डाउन करा दिया जैसे जामदग्नेय राम ने कार्तवीर्यार्जुन का कराया था।

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  4. yu pee ke baaman to bahinji kee chaupaal me aa baithhen hain .koi bahinji ko kek khilaa rhaa hai koi ..
    gyaanvardhak anaand vardhak lekh ke liye badhaai !
    veerubhai .

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  5. भगवान परशुराम के बारे में आपने विस्तृत और रुचिकर लिखा , अच्छा लगा !

    मुझे लगता है इनके बारे में बहुत कम लोगों को पता होगा ! उनका चरित्र भले ही पौराणिक हो मगर उस चरित्र को सफल रूप में प्रस्तुत करना, हमारी संस्कृति और सामाजिक स्वरुप के लिए नितांत आवश्यक है ! शायद यह लेख, इस प्रकार की हानियों की कुछ हद तक भरपाई करेगा !

    इस अनूठे लेख के लिए आभार!

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  6. लिखित इतिहास लेखकों के पूर्वाग्रह से प्रेरित हुए बिना नहीं रह सकता , इसलिए सिर्फ पुस्तकों में दर्ज इतिहास के अतिरिक्त और भी सच्चाइयाँ हो सकती है ..
    बहुत कुछ नवीन जानकारी मिली इस पोस्ट से ...
    परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनायें !

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  7. परशुराम के क्रोध के परिपेक्ष्य में एक नकारात्मक छवि जनमानस में बिठा दी गयी है.आपके पोस्ट से उनकी महानता स्पष्ट हो रही है...आभार

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  8. शानदार पोस्ट।
    परशुराम जयंती के अवसर पर आपका यह आलेख ज्ञानवर्धक होने के साथ-साथ उनके बारे में और जानने के लिए प्रेरित करता है।

    विकिपीडिया से यह जानकारी मिली...

    पूर्वकाल में कन्नौज नामक नगर में गाधि नामक राजा राज्य करते थे। उनकी सत्यवती नाम की एक अत्यन्त रूपवती कन्या थी। राजा गाधि ने सत्यवती का विवाह भृगुनन्दन ऋषीक के साथ कर दिया। सत्यवती के विवाह के पश्‍चात् वहाँ भृगु जी ने आकर अपने पुत्रवधू को आशीर्वाद दिया और उससे वर माँगने के लिये कहा। इस पर सत्यवती ने श्‍वसुर को प्रसन्न देखकर उनसे अपनी माता के लिये एक पुत्र की याचना की। सत्यवती की याचना पर भृगु ऋषि ने उसे दो चरु पात्र देते हुये कहा कि जब तुम और तुम्हारी माता ऋतु स्नान कर चुकी हो तब तुम्हारी माँ पुत्र की इच्छा लेकर पीपल का आलिंगन करें और तुम उसी कामना को लेकर गूलर का आलिंगन करना। फिर मेरे द्वारा दिये गये इन चरुओं का सावधानी के साथ अलग अलग सेवन कर लेना। "इधर जब सत्यवती की माँ ने देखा कि भृगु जी ने अपने पुत्रवधू को उत्तम सन्तान होने का चरु दिया है तो अपने चरु को अपनी पुत्री के चरु के साथ बदल दिया। इस प्रकार सत्यवती ने अपनी माता वाले चरु का सेवन कर लिया। योगशक्‍ति से भृगु जी को इस बात का ज्ञान हो गया और वे अपनी पुत्रवधू के पास आकर बोले कि पुत्री! तुम्हारी माता ने तुम्हारे साथ छल करके तुम्हारे चरु का सेवन कर लिया है। इसलिये अब तुम्हारी सन्तान ब्राह्मण होते हुये भी क्षत्रिय जैसा आचरण करेगी और तुम्हारी माता की सन्तान क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण जैसा आचरण करेगा। इस पर सत्यवती ने भृगु जी से विनती की कि आप आशीर्वाद दें कि मेरा पुत्र ब्राह्मण का ही आचरण करे, भले ही मेरा पौत्र क्षत्रिय जैसा आचरण करे। भृगु जी ने प्रसन्न होकर उसकी विनती स्वीकार कर ली। "समय आने पर सत्यवती के गर्भ से जमदग्नि का जन्म हुआ। जमदग्नि अत्यन्त तेजस्वी थे। बड़े होने पर उनका विवाह प्रसेनजित की कन्या रेणुका से हुआ। रेणुका से उनके पाँच पुत्र हुये जिनके नाम थे रुक्मवान, सुखेण, वसु, विश्‍वानस और परशुराम।

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  9. गंभीर, ज्ञान वर्धक आलेख.

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  10. अनेक मिथों को तोड़ता हुआ महत्वपूर्ण आलेख ( इसे बुकमार्क किये बिना गुज़ारा नहीं है !! ), मुझे लगता है कि आप मिथकीय चरित्रों पर ऎसी ऋँखला लिखने में सक्षम हैं, सो शुभस्य शीघ्रम ! मैं आपसे इसे उपरोक्त ऋँखला की पहली कड़ी मान लेने का आग्रह कर रहा हूँ । निश्चय ही हिन्दी डाटाबेस को ऎसे विद्वतापूर्ण आलेखों की ही ज़रूरत है । मन प्रसन्न हुआ, पर उत्कँठायें बढ़ गयीं हैं, आगे की कड़ियों की प्रतीक्षा में...

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  11. @डॉ. साहब ,
    उत्साह वर्धन के लिए आभार ..
    मगर कुछ खंडन मंडन हो तो बात बने न
    एक अकेला ?

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  12. @अनुराग शर्मा ,
    तात्या टोपे की परशुराम होने की संकल्पना कितनी सच सी लगती है !
    @अमृता तन्मय ,
    सच कहती हैं -परशुराम को बात बात पर क्रोध करने वाला समझा जाता है ..
    उनके व्यक्तित्व के कई पहलू इस छोटी से पोस्ट की फलक के बाहर हैं ..
    @देवेन्द्र जी ,
    आपने तो पूरा पुरान ही बान्च दिया :) महत्वपूर्ण यह है कि वे जमदग्नि के पुत्र थे
    जमदग्नि सप्त ऋषियों में हैं -भार्गव कुल की प्रशस्त पुराणोक्त वंश परम्परा रही है ...
    पिता की आज्ञा पर इन्होने माँ का सर काट दिया था ....सहत्रार्जुन का वध किया था ..
    मगर बहुत सी कथाएं दरअसल तथ्यगत होने के बजे भावगत ज्यादा है ...
    परशुराम का व्यक्तित्व भी मिथकीय कुहांसे से घिरा है और उस पावर का चश्मा मिल ही नहीं रहा कि
    इसका भेदन हो सके !

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  13. ......अब तक तो हमें यही समझ आया कि परशुराम ब्राम्हणों के आराध्य बना कर सीमित कर दिए गए ...............तभिये तो पिछले छ: सात सालों से अवकाश मिल रहा है .....इस दिन !

    आपका लेख का जवाब नहीं !
    जय जय !

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  14. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  15. भाई , परशुधर का दक्षिण-संदर्भ से अवगत कराने के लिये आभारी हूँ।

    परशुराम तालाब और रेणुका झील हिमाचल के सिरमौर जिले में हैं, चित्र ये हैं, गया था वहाँ http://www.awadh.info/2010/04/blog-post.html

    अमर कुमार जी की माँग सही है, ऐसे चरित्रों पर आप चालू होवें, एक स्वस्थ माहौल का भी सूचक होगा।

    क्या आपको नहीं लगता कि तुलसी ने परशुराम के च्रित्र को जाने-अनजाने अगम्भीरता भी दे डाली??

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  16. सुन्दर प्रस्तुति ।
    अच्छी जानकारी ।
    ब्रह्म का ज्ञान और पराक्रम का मिश्रण बहुत प्रेरणादायक है ।

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  17. कहता है इतिहास, जगत में हुआ एक ही नर ऐसा।
    रण में कुटिल काल सम क्रोधी, तप में महा सूर्य जैसा।।

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  18. परशुरामजी के चरित्र के बारे में इतनी जानकारी .....ऐसे ज्ञानी और पराक्रमी व्यक्तित्व के विषय में अच्छा लगा पढ़कर ...... आभार

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  19. एक अरुणाचल में भी परशुराम कुण्ड है ऐसा कहीं पढ़ा था. पंडीजी, तनिक और विस्तार दीजिये इसे.

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  20. Arvind जी, परशुराम जी naam sunkar ही ubaal aataa रहा है. इसलिए इस lekh को padhkar भी ubad रहा हूँ.
    परशुराम जी की प्रासंगिकता आज इस सन्दर्भ में बढ़ जाती है कि वे ब्राह्मणों को एकजुट कर पाने में सफल हो जाएँ और आरक्षण को पूर्णतया समाप्त करवाने के लिए अपने संगठन का जोरदार दबाव बना पायें. मैं पिछले १९-२० वर्षों से तो खुद देख रहा हूँ कि ब्राह्मणों की कितनी और क्या दुर्दशा हुई है... उसे बयाँ नहीं किया जा सकता. समाज में समानता लाने की सरकारी जी-तोड़ कोशिशें ज़ारी हैं. उनका नतीजा आज .... एक तरफ देखता हूँ – जब योग्यता से घटकर कोई कार्य करता दिखे. चौकीदार, जमादार... बर्तन मांजने वाली ब्राहमनी, झाडू लगाने वाला तिवारी... आदि-आदि..... ...... मैं यह नहीं कहता कोई कार्य बुरा है या किसी कार्य को करने का ठेका केवल शूद्र का है... लेकिन यह विषमता क्या स्वीकार्य है कि मूर्ख-जड़बुद्धि आरक्षण की सुविधा पाकर तो ऊँचा अधिकारी हो जाए... और मेधावी सामान्य कोटि का जीव ताउम्र जीविकोपार्जन के लिए, रोजगार के लिए अपने सम्मान से समझोता करता रहे...

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  21. डॉ. अमर कुमार जी से पूर्णतः सहमत हूँ। आप लिखिए। खंडन मंडन के लिए हम जैसे बहुत हैं तो।

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  22. एक samay था जब माया और कांशी ने समाज में इतना विष-वमन किया था कि 'ब्राह्मण' नामक जंतु एक वर्ग-विशेष को फूटी आँख नहीं सुहाता था.... ब्राह्मण ने तो जबकि अन्य वर्णों के व्यक्तियों को भगवान् बनाकर पूजा.. चाहे वह क्षत्रीय कुल में जन्मे 'श्रीरामचंद्र हों' अथवा वैश्य कुल में पाले यादवेन्द्र 'श्रीकृष्ण' हों. और एक दम taazaa udaaharan 'Guru Ambedkar जी ने 'Baalak BheemRao' को apnaa naam dekar उसे 'harijnaonon का devtaa' (matlab भगवान्) बना diyaa. ....किन्तु ब्राह्मण ने अपनी पूजा नहीं की... इसलिए वह सम्मानित रहा जैसे वह अपने कुल को श्रेष्ठतम मानकर अहंकार से भर गया खुद को poojne lagaa वह patangaamii हो गया, धर्म से chyut हो गया..... उसका दंड vartmaan में इस आरक्षण roop में bhog रहा है..arvind जी, सन १९९४ में कोलिज के समय मेरे मन का आक्रोश भी अपने शिक्षकों के सम्मुख कुछ इस कदर निकला था :


    कब तलक हाथ पर हाथ धरे बैठोगे?
    भर अहंकार मन में कब तक ऐंठोगे?

    ब्राह्मण कहलाकर हुए तुष्ट क्या तुम हो?
    मिथ्या प्रपंच रच बने दुष्ट या तुम हो?
    या मान लिया खुद को ब्रह्मा अवतारी?
    कर चार वर्ण वर्णों का ही व्यापारी?

    या उच्च बने वर्णों में तुम इतराये?
    क्या भूल गए अपनी सब मर्यादायें?
    क्या धृति क्षमा दम को तुमने पहचाना?
    या बिना समझ सोचे ही सब अपनाना?

    है धैर्य धर्म का प्रथम लक्ष बतलाया.
    मनु ने अंतिम फिर क्रोध शमन सिखलाया.
    क्या इसलिए हो गए शीत तुम इतना.
    कटु वचन बोल जाए चाहे जो जितना.

    है नहीं कभी भी क्रोध किसी पर करना.
    चाहे दुष्टों के हाथ लिखा हो मरना.
    अपराधी पर भी दया भाव को रखना.
    ब्रह्म-हत्यारे से भी प्रतिकार न करना.

    यह सहनशीलता या तेरी कमजोरी?
    सह रहे निम्न वर्णों की सीनाजोरी.
    कांशी जैसे आकर धमका देते हैं.
    आरक्षण से रक्षण करवा लेते हैं.

    फिर निम्न जातियों को भड़का देते हैं.
    उनको समाज से अलग-थलग कहते हैं.
    इस वर्ण-व्यवस्था रूपी मानव देह से
    पैरों को तन से पृथक-पृथक कहते हैं.....

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  23. एक महान ऐतिहासिक/पौराणिक विभूति को संकीर्ण राजनीतिक और जातीय खांचे में बाँधने के प्रयास दुखद हैं. अरुणाचल के लोहित जिले में भी एक परशुराम कुंड है जहाँ जनवरी में मेला भी लगता है. शायद मकर संक्रांति और सूर्योपासना से भी संबंध हो इसका.

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  24. भगवान परशुराम के बारे में पढ़ना अच्छा लगा... डॉ अमर की बात पर गौर करिएगा...

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  25. भगवान परशुराम के बारे में पढ़ना अच्छा लगा... डॉ अमर की बात पर गौर करिएगा...

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  26. इस माहौल में ऐसी बातें सार्थक हैं ही, कुछ हद तक अनूठी भी. जब जयंतियों का एक ही स्‍वरूप रह गया है, जुलूस निकालकर जन-बल और शक्ति-प्रदर्शन.

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  27. महान विभूति एवम गुरू परशुरामजी को कोटि कोटि नमन
    'गणेशजी' को एक दन्त कर देने वाले,
    भीष्म और दानवीर कर्ण के गुरू परशुरामजी के ऊपर यह सुन्दर लेख लिखकर आपने लेखनी को कृतार्थ किया.
    गुरू वह है जिससे सद्ज्ञान की प्राप्ति हों जिससे ह्मारा यथार्थ कल्याण हों.इसके लिए हमें सर्वप्रथम शिष्य बनकर गुरू की कृपा प्राप्त करनी होगी और उनके द्वारा दिए ज्ञान को अनुसंधान कर अच्छी तरह से समझकर आत्मसात करना होगा .
    सुन्दर लेख के लिए बहुत बहुत आभार.आगे भी आप गुरू परशुरामजी द्वारा प्रदत्त ज्ञान से हमें अनुग्रहित करते रहेंगें,ऐसी आशा है.

    मेरे ब्लॉग पर आयें,आपका हार्दिक स्वागत है.

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  28. बहुते गजब लिखे हैं जी। ऐकरा बदे सर्टीफ़िकेटवा की कोनू दरकार नाही लगत बा।

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  29. अरविन्द जी प्रणाम,

    बचपन में परशुराम के चरित्र को राम लीलाओं के लक्ष्मण-परशुराम संवाद के जरिये से जाना जहाँ परशुराम एक बोखलाए क्रोधी ब्रह्मण के रूप में नज़र आते हैं जो लक्ष्मण के व्यंग बाणों का शिकार हो अंततः भगवान् राम के समक्ष नतमस्तक होता है. तब मुझे परशुराम एक खलनायक ही लगते थे जो शायद आज भी मेरे जैसे अनेक लोगों को लगता हो. रामलीलाओं से पैदा हुयी परशुराम जी की इस नकारात्मक छवि को आप जैसे कलम के धनी लेखक अपने इस प्रकार के लेखों से सुधार सकते हैं. परशुराम जयंती के अवसर पर लिखा गया एक बेहतरीन लेख. धन्यवाद आपका और एक बार फिर से प्रणाम.

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  30. हमारी भी जानकारी परशुरामजी के अत्यन्त क्रोधित ब्राह्मण से आगे नहीं थी । आभार आपके द्वारा प्रस्तुत इस विस्तृत जानकारी पर...

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  31. इस आलेख के लिये आभार.

    मेरे बचपन में मुझे समाज और अध्यापकों से यह शिक्षा मिली थी कि सारी पौराणिक कथायें महज कपोल कल्पना है. लेकिन जैसे जैसे मैं प्राचीन भारत के इतिहास का अध्ययन करता जाता हूं वैसे वैसे लगता है कि कई पौराणिक कथाओं के पीछे वास्तविक इतिहास छुपा हुआ है.

    परशूराम की कथा के पीछे निश्चित रूप से काफी कुछ इतिहास है. जरूरत इस बात की है कि कुछ लोग इस विषय पर गहन अध्ययन एवं अनुधान करके विषय के एतिहासिक भाग पर प्रकाश डालें.

    सस्नेह -- शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
    http://www.Sarathi.info

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  32. परशुराम की जानकारी के लिए आभार। परंतु परशुराम जयंती पर छुट्टी की बात हज़म नहीं हुई। भारत में तो हर वर्ष तीन सौ पर्व होंगे ही... तो क्या आप पैंसठ दिन ही.....:)

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  33. बहुत सुन्दर पोस्ट.
    आप सक्षम हैं इसलिए ज़रूर लिखें. आपके माध्यम से और लोग ऐसी विभूतियों के बारे में जान पायेंगे तो ज्ञान का बहुत बड़ा उपयोग होगा.

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  34. परशुराम जी का व्यक्तित्व वास्तव में बाकी सभी ऋषिजनों से अलग था...आपने कुछ और बातें विस्तार में बताई बहुत अच्छा लगा...बढ़िया जानकरी ..इस सुंदर आलेख ले लिए बधाई

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  35. बहुत सुन्दर, जानकरी से पूर्ण और ज्ञानवर्धक आलेख! बेहतरीन प्रस्तुती!

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