रविवार, 3 जनवरी 2010

असुर हैं वे जो सुरापान नहीं करते!

पहले यह अनुरोध : इस आलेख को पढने के पहले कृपया यह और यह  आलेख पढ़ कर आईये -थोडा समय देना  होगा  जिज्ञासु जनों को ...
तस्लीम पर जाकिर ने यह वैज्ञानिक सलाह क्या दी कुछ बिचारे सकते में आ  गए ...अवसाद में डूबते भये! और तत्काल मेरी परदुखकातरता जागृत हुई -ये दुष्ट इंस्टिंक्ट अक्सर लफड़े में फंसाती है मुझे .....मन ढाढस बढ़ाने को हो आया उन सभी कातर जनों  की , जिन बिचारों  की ये वैज्ञानिक गण अक्सर अपनी ऊँट पटांग सलाहों से  ऐसी की तैसी करते रहते हैं ....अब ये भी कोई सीख है कि ठंडक में सुरापान न करो -अरे इस ठंडक में आखिर तन को गरम करने का सात्विक तरीका है क्या ? पुरातन नुस्खा है - सुरा ......और शराब....अब  सुरा तो नहीं छूट सकती ....और  तिवारी जी वाला तरीका कितना असात्विक है न ?.....और अनैतिक भी ..कहाँ कहाँ के कैसे कैसे लोग छिः ..... न जान न पहचान ....अब ऐसे थोड़े ही ..उबकाई भी आती है ..और तीसरा आप्शन शराब ,.....न बाबा  न ये भी फालतू की चीज  है ,हाथ नहीं लगाते....और मैं चिंतन ग्रस्त हो गया ....

किसी ने कहा कि आप नाहक ही पचड़े में पड़ते हैं ...कोयले की दलाली में अक्सर हाथ काले हो जाते हैं... हर मामले में टांग मत अडाया कीजिये -अपने नादान दोस्तों के चक्कर में कितना बदनाम होगें -यी जाकिर भाई को आप क्यों इतना तवज्जो  दे रहे हैं -तस्लीम पर उनकी उस पोस्ट को जरा इस्लाम के नजरिये से तो देखिये -एक छुपे अजेंडे के रूप में वे शराब को न छूने की हिदायत ही तो दे रहे हैं और वह भी वैज्ञानिकों के हवाले से ....मैं स्तब्ध ..क्या क्या सोच जाते हैं लोग ..मगर एक बात पर मुझे ज़ाकिर पर गुस्सा भी आई -लोगों के जीवन के बेहतर क्षणों में  आखिर वाट लगाने का उनका क्या हक़ बनता है ? इस जाड़े पाले में अब लोगों से  एक सात्विक व्यसन को  भी छीन लिया जाय -बात कुछ बनी नहीं! मैंने उन्हें फोन करके अपनी नाराजगी व्यक्त  कर दी .....समीरलाल  जी भी कुछ कह गये हैं.. जरूरी भी हैं  यह ..बच्चे ज्यादा उधम मचायें  तो डांटना जरूरी है -दो बच्चे बिचारे  कहीं और डांट दिए गए हैं ....  और दो दिन से बिना दाना पानी मुंह गिराए उदास से बैठे हैं ....विज्ञ जन समझ गए होगें !

बहरहाल बात मुद्दे की कर ली जाय, भूमिका लम्बी हो गयी .ज़ाकिर की पोस्ट पर अपने गिरिजेश भैया जाकर टीप आये कि मैं कौनो शोध कर रहा हूँ ....सुरा पर ..अब कर तो नहीं रहा था मगर ऊ उकसाए तो आज इतवार का लाभ उठाते हुए कर ही डाला ..... मालूम हुआ कि सचमुच असुर हैं वे जो सुरापान नहीं करते! और सुर वे जो सुरापान करते हैं ! अब इतना तो समझता ही होगा यह बाल...जगत (ओह सारी ये जीभ भी ....जाड़े में लड़बड़ा  सी रही है ) मतलब ब्लॉग जगत  कि सुर माने देवता और असुर माने राक्षस ....तो जो सुरापान (मतलब उत्कृष्ट मादक पेय, हौली वाली गुटखा नहीं ) करे वो देवता है और जो उसे (पाए)  बिना रह जाय वह राक्षस....हाँ यह प्रामाणिक ज्ञान है जो शोध के उपरान्त हासिल हुआ है ....और आप से साझा किये बिना नहीं रहा जा रहा...स्रोत है वाल्मीकि रामायण ......बालकाण्ड का पैतालीसवां सर्ग .....श्लोक संख्या ३६ से ३८ ,प्रसंग समुद्र मंथन.

विश्वामित्र राम लक्ष्मण को कुछ वेद पुराण सुना रहे हैं और उसी के तहत समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों के बारे बताते हुए कहते हैं ....
असुरास्तेंन दैतेयाः   सुरास्तेनादितेह सुताः 
हृष्टा: प्रमुदिताश्चासन वारुणीग्रह्नात सुराः (३८)
('सुरा से रहित होने के कारण ही दैत्य 'असुर ' कहलाये 
और सुरा-सेवन के कारण ही अदिति के पुत्रों की 'सुर' संज्ञा हुई.
वारुणी को   ग्रहण करने से देवतालोग हर्ष से उत्फुल्ल एवं आनंदमग्न हो गए )

इसके पहले और बाद के दो श्लोकों में समुद्रमंथन से वरुण की कन्या वारुणी "जो सुरा की अभिमानिनी देवी थी"
के प्रगट होने और दैत्यों द्वारा उसे ग्रहण न करने और देवों द्वारा इन अनिनद्य सुन्दरी को ग्रहण करने का उल्लेख है....
तो अब हमें कोई रोके टोके न..... हम सुर हैं,देवता है और  धरती के सुर -भूसुर अर्थात ब्राह्मण तो बेरोक टोक सुरापान करे -हमारा शास्त्र  इसकी खुली  अनुमति देता है .यह वृत्तांत भी संदर्भित किया जाता है -बिना पढ़े मत कहीं और जाईयेगा.






26 टिप्‍पणियां:

  1. चूँकि सन्दर्भ इतना जबर्दस्त है कि अब इस पर कुछ कहनें को शेष ही क्या है..

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  2. मज़ाक तक ठीक है मगर अगर आप ग्रंथों का सन्दर्भ देते हैं तो कृपया उन्हें पढने समझने के प्रयास भी शुरू करें.

    असुरास्तेंन दैतेयाः सुरास्तेनादितेह सुताः
    हृष्टा: प्रमुदिताश्चासन वारुणीग्रह्नात सुराः

    मुनिश्रेष्ठ ने कहा है तो ठीक ही कहा है.
    मगर इस उपदेश में कहीं भी सुरा को प्रशंसनीय नहीं कहा गया है. सुरापान देवताओं की खूबी नहीं बल्कि उनकी कमजोरियों में से एक थी. जहां देवता सिर्फ सोम और सुरापान करते थे वहीं असुर नियमित मद्यपान करनेवाले मदिरासेवी नशेड़ी थे, हैं और रहेंगे.
    मद्यप्रेमी दुष्ट असुरों द्वारा सामूहिक मदिरापान के दौरान टुन्न हुए अपने गुरु शुक्राचार्य को कच का मांस खिलाये जाने का भी उल्लेख है जिसके बाद शुक्राचार्य ने स्वयं मद्यपान न करने का प्राण लिया और सभी विवेकी ब्राह्मणों को इसका निषेध किया. (असुर इस निषेधाज्ञा से स्वतंत्र ही रहे)

    भूसुर अर्थात ब्राह्मण तो बेरोक टोक सुरापान करे -हमारा शास्त्र इसकी खुली अनुमति देता है
    फिर वही शब्दों की हेराफेरी. मद्यपान के स्पष्ट निषेध से ग्रन्थ भरे पड़े हैं, कभी पढ़कर देखिये.

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  3. @अनुराग जी ,
    यहाँ केवल सुर असुर शब्द की व्युत्पत्ति पर
    ध्यान आकर्षित किया गया है और वारुणी के बारें में भी
    कुछ जानकारी बाटने का उद्यम था जो मंथन से निकली मगर लोगबाग इनके बारे में
    कम जानते हैं या नहीं जानते !
    विकीपीडिया पर तो वारुणी का उपभोग दैत्यों द्वारा किया जाना बता दिया गया है जो गलत है !

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  4. तो ये तय हुआ की ज़ाकिर भाई नें देवताओं और इंसानों, दोनों के सेंटीमेंट्स की परवाह नहीं की !
    अब विज्ञानं को जेब में रखकर ऐसा भी क्या घूमना ( भाई दिनेश शर्मा वत्स जी से साभार ) की चचा ग़ालिब भी याद ना रहे !
    सुरापान अच्छा है या बुरा ये तो पीने और ना पीने वाले जाने ? हम तो सिर्फ इतना जानते हैं की सुरा देश के राजस्व की जान है !

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  5. शराब(एलकोहल) तो दवाईयो मै भी डाली जाती है, युरोप ओर अन्य ठण्डे देशो मै वोदका ओर शराब खुब चलती है,जब नशे के रुप मै पी जाये तो गलत है, लेकिन अपनी अपनी सोच है..... गलत तो बहुत कुछ है?कल हम ने तसलीम पर यह पोस्ट पढी ओर ;)कर आ गये

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  6. अनुराग जी की टिप्पणी हमें प्रेरित कर रही है कि इस विषय पर एक पोस्ट लिख ही दी जाए :)

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  7. हल्के अन्दाज में कही गयी बात यूँ ही नहीं बिगड़ जाती। कुछ न कुछ शरारत के बीज तो इसके भीतर होते ही हैं। बस खोजी नजर चाहिए।

    अब यदि कोई मेरे जैसा साधारण बुद्धि का व्यक्ति पढ़ेगा तो आपके बारे में यही सोचेगा कि पण्डित जी अपनी प्यास बुझाने का बहाना खोजने के लिए शास्त्रों का समुद्र मन्थन कर आये हैं और मद्य निषेध के तमाम श्लोकों को दरकिनार करते हुए ई वाला खोज लाए हैं।

    हम तो फिर भी नहीं मानेंगे जी। आप सुरापान करके मोक्ष प्राप्त कीजिए। हम तो असुर ही भले हैं।

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  8. मजेदार है जी।
    वैसे सुर और असुर के बारे में भाषा विज्ञान का मत पुराणों से हटकर कुछ अलग सा है। कभी शब्दों के सफर में होगी चर्चा।

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  9. धन्य हैं आप ..? बाल काण्ड पढ़ आये थे मगर इहाँ तो सुराकांड चाल रहा है ...जिसको पीना है वो पीएगा ही ...कोई लाख नुक्सान बताये ....अब चाय पीने के कितने दुष्परिणाम रोज पढ़ते हैं मगर लत है जो छूटती नहीं ....वैसे ही किसी के लिएसुरा भी हो सकती है ...
    आपको पीनी थी ...मैडम परमिसन नहीं दे रही होंगी जो इतना शोध कर लाये ....:):)

    वैसे पंडितों का एक सबसे बड़ा गुण ....जब वे यजमान के घर पूजा पाठ कराने जाते हैं तो पूजन सामग्री की लम्बी चौड़ी लिस्ट होती है मगर जब अपने घर में पूजा हो तो जो सामग्री आसानी से उपलब्ध हो जाए उसी से काम चला लेते हैं ....ये बिलकुल प्रमाणित है ...मैं समझ नहीं पा रही सुरा की इस पोस्ट पर मैं पंडित और यजमान का उदाहरण क्यों लिख रही हूँ ...? इसका इस पोस्ट से क्या सम्बन्ध ..?

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  10. @सिद्धार्थ भाई ,
    हा हा हा ....संगम तीरे एक समागम
    ...फिर भी न हुयी दरकार जाम की ,
    और न ही इंतजाम सरकार की
    हुए भी तो बस एक चाय के लिए बदनाम ,
    बच्चन ने लिखी मधुशाला मगर पी न खुद हाला
    हम भी क्या पीएगें निकलेगा नहीं क्या दीवाला
    आयी डोंट ड्रिंक मेरे काबिल मित्र .....

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  11. अजित जी और वत्स जी पोस्ट लिखने की बात कह चुके हैं। अब हम बस प्रतीक्षा करेंगे।
    देखिए, बिना जात पात का खयाल किए दारू सबको समान रूप से टल्ली करती है। जात पात की भावना को दारू जगत में लाने का मैं औपचारिक रूप विरोध करता हूँ।
    दारू मैं भी नहीं पीता लेकिन दारू पर जितना ग़ैर दारू बाजों ने बढ़िया रचा है उतना दारू बाजों ने नहीं ! ऐसा क्यों है - शोध का विषय है।
    अनुराग जी से सहमत हूँ।
    वैसे दारू ही नहीं किसी भी नशे में आदमी के भेदाभेद विवेक की ऐसी तैसी हो जाती है। लेकिन दारू को अधिक निन्दा इसलिए मिली कि इससे घर परिवार अधिक बरबाद हुए।
    इसका सम्मोहन ही ऐसा है। अब देखिए न नशे के एक दूसरे कारक की भी चर्चा हुई है लेकिन उसकी तरफ किसी का ध्यान ही नहीं गया।

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  12. आपने तो उदाहरण भी प्रस्तुत किया वो भी इस प्रकार की कुछ कहना ही नही..सही है देखेगे अभी तक तो असुर की संज्ञा में ही है हम..बढ़िया प्रसंग...धन्यवाद अरविंद जी!!

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  13. हम भूसुर
    हमने ही रचे सारे पुराण
    सारी श्रुतियां
    क्या एक सुरा पुराण
    न रच देते?
    पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए।
    जब लोग ऐसे किसी नशे को अपनाते हैं तो बहुत सी चीजें गढ़ लेते हैं।

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  14. मैंने तो पचडो में पड़ना ही छोड़ दिया , बस य़ेस सर और नो सर में ही जमाने के हिसाब से जबाब देना सही रहेगा, या फिर अपने सुमन जी की तरह सिर्फ 'nice ' बोल दो, बाकी दुनिया गई भाड़ में ! :)

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  15. सिर्फ़ इतना ही कहुंगा कि इस भयानक ठंड के मौसम के हिसाब से सामयिक पोस्ट है.:)

    रामराम.

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  16. अपुन तो ओ अभी तक मदिरा को इसी लिये हाथ नहीं लगाये थे कि हमें लगता था मदिरा पीने से आसूरी शक्तियां प्रभावी हो जाती हैं.. परन्तु आप का लेख पढ कर हमारी आंखें खुल गई... मगर आप का लेख बहुत देर से आया.. अब तो मदिरा ना पीने की आदत पड गई है.. हम असुर ही भले... हा हा
    रिर्सच के लिये आभार

    लिखते रहिये
    मोहिन्दर कुमार
    http://dilkadarpan.blogspot.com

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  17. "अब इतना तो समझता ही होगा यहबाल...जगत (ओह सारी ये जीभ भी ....जाड़े में लड़बड़ा सी रही है ) "
    जाड़े में या और किसी वजह से?

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  18. क्या सर खाली सुर असुर की चर्चा करके निकल लिए न ......आप भी पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं जाईये हम तो आरोपियाएंगे ही ...हमारे जैसे भैंसासुर के लिए तो आपने एक शब्द भी नहीं कहा , ..एक पोस्ट हमें भी सब्जेक्ट बना के लिखने का वादा करते हैं तो हम भी अपने आरोपियाने का आरोप वापस लेते हैं ....

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  19. पोस्ट का हेडर पढ़ के ही आज बस मन बना लिया है गुरु !!! आज तो ४ पेग पक्के !!! दिल्ली में ठण्ड ज़बरदस्त है ! और तो और आज सुरेश भाऊ के लेख ने पहले ही मन बनवा दिया रक्खा है !

    http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2008/10/blog-post.html

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  20. अहा, मेरे मन की बात...हम तो ग़ालिबन...छोड़िये!

    "दारू पर जितना ग़ैर दारू बाजों ने बढ़िया रचा है उतना दारू बाजों ने नहीं" गिरीजेश जी का कथन पढ़कर सोच रहा हूं कि ग़ालिब से भी बेहतर किसी ने लिखा है क्या इस शराब पर?

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  21. "सोम," "सुरा" और "मदिरा" तीन भिन्न पेय पदार्थ हैं. सोम एक ओषधीय पेय पदार्थ होता है, जिसका पान देवता करते थे. इसमें नशा नहीं होता है. इसे "सॉफ्टड्रिंक" कहा जा सकता है. नशीले पेय पदार्थों की श्रेणी में "मदिरा" और "सुरा" को रखा जा सकता है, जिसपर आपने एक रोचक पोस्ट लिख डाली है. पर इस बात पर आश्चर्य होता है कि जो खुद नहीं पीता, वही ज़्यादा वक़ालत करता है.
    हास्य-व्यंग्य के लेखन में आपका जवाब नहीं.

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  22. रोचक सी पोस्ट....!

    ऊपर जो लिंक दिये आपने...बेहतरीन...!

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  23. Wives treat their hubby as 'sur'. Now as per your description, majority of men are 'Asur' . hmm...Tough to comprehend that you guys are sur or asur?

    "....हम भी क्या पीएगें निकलेगा नहीं क्या दीवाला
    आयी डोंट ड्रिंक मेरे काबिल मित्र ....."

    The other day , in a routine gossip , i mentioned to your wifey..."Nice meeting your Asur hubby".....oops....i cannot narrate further...

    Smiles..

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