शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

संकलकों की असमय मौत पर एक शोकांजलि .....!

मैं डूबा तो था अपने दिल्ली संस्मरणों में मगर अचानक एक गतिरोध आ गया ....चिट्ठाजगत बंद हो गया ..अब यह स्थाई बंदी है या अल्पकालिक मुझे पता नहीं है मगर मैं इन संकलकों की व्यथा कथा समझ सकता हूँ ...सबसे पहली बात तो यही है कि ये एक बिल्कुल दया भाव/हितैषिता की भावना से वशीभूत /परोपकार  वाले "चैरिटी शो " के उपक्रम  है ..बिना किसी आर्थिक आधार  परोपकार के उदाहरण! एक तो दूर दूर तक कोई आर्थिक संभावना नहीं दूसरे मूर्खों की जमात का रोज रोज का उसी डाली के काटने का जूनून जिस पर वे जमे हैं ...मतलब लगभग रोज ही उन्ही  चिट्ठा  संकलकों  की कमियाँ गिनाना जो अगर वजूद में न  होतीं तो महानुभावों की  बातें भी सामने न आ पाती ....इन्ही कारणों से ब्लागवाणी बंद हो गया .....अब कौन कंगाली में आटा गीला करे -एक तो मिलना जुलना कुछ नहीं और रोज रोज लल्लू बरसाती और गजोधर के ताने सुनना ..मारो गोली क्या रखा है इस चैरिटी में ....

लिहाजा ब्लॉगवाणी ठप पड़ गयी  और अब चिट्ठाजगत के भी अवसान के दिन दिख रहे ...हिन्दी ब्लागिंग में यह संकट की स्थिति है ....क्योकि अभी भी हिन्दी ब्लागिंग परवान पर नहीं है और उसे अभी भी चिट्ठा संकलक के सहारे की जरुरत है -एक विश्वसनीय चिट्ठा संकलक की ..मैं अपने कुछ मित्रों से बात कर रहा था कि क्यों न ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत को आर्थिक सहयोग के सहारे फिर से इस मुहिम में लगने का आह्वान किया जाय ...और ये संकलक कोई वार्षिक सहयोग राशि रख दें ....बिना आर्थिक संबल के ऐसी गतिविधियां एक तो संभव नहीं हैं और दूसरे इनका मुफ्त लाभ लेना अनैतिक भी है ...हमारे बनारस में जहाँ ढाई तीन हजार रूपये सालाना लोग पान की पीक के साथ प्रक्षेपित कर देते हैं -अगर इन इन संकलकों को केवल ५०० रूपये सालाना वार्षिक फीस दे दी जाय तो मुझे लगता है कहीं कुछ गलत नहीं है ....अब मुफ्तखोरी बंद की जाय ...अगर हम फीस देकर किसी सेवा का लाभ उठायेगें तो उसके प्रति एक तो जिम्मेदारी का अनुभव करेगें दूसरे हम तब गुणवत्ता की अपेक्षा भी कर सकते हैं ...

इधर ब्लॉगर मीट के नाम पर हम हजारो फूँक दिए जा  रहे है मगर हम इस ओर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं ..क्योकि हमारी गतिविधियों को उजागर करने वाला चुपचाप सेवाभाव से अपना काम किये जा रहा  है मगर उसकी दैनंदिन दिक्कतों से हम मुंह फिराए बैठे हैं ..आईये हम इस पर गंभीरता से विचार करें और पहली प्राथमिकता चिट्ठाजगत और /या ब्लागवाणी को देकर हम इन संकलकों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करें ..मैं और मेरे कुछ मित्र शुरुआती सहयोग से मुंह नहीं मोड़ेगें ऐसा मुझे विश्वास है ....कोई सुन रहा है ? (संकलक तो बंद हैं ! )


83 टिप्‍पणियां:

  1. डॉ साहेब, सुन भी रहे हैं - और ५-७ दिन से मनन भी कर रहे थे........ आर्थिक पक्ष के बारे में........

    बिना पैसे के तो आजकल चेरिटी भी नहीं होती.

    आपके प्रस्ताव का पूर्ण रूपेण अनुमोदन कर्ता हूं.........

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  2. शुक्रिया दीपक जी ,
    पोस्ट पब्लिश होते ही यह सुसमाचार आया है -हिन्दी ब्लागजगत का
    http://hindiblogjagat.blogspot.com/
    -बंधुवर आप पहले लोगों को अपने बारे में जो बताया जा सके बता के कान्फिडेंस में लें और फिर फीस की भी बात कर लें ...मुफ्तखोर न बनायें लोगों को ....

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  3. सत्य वचन , मै भी अनुमोदन करता हूँ . भूखे भजन न होई गोपाला .

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  4. मैं भी सहमत हूँ आपसे. एक वार्षिक शुल्क तो होना ही चाहिए. ब्लॉग लिखने के लिए ना सही, पर प्रचारित करने के लिए तो ज़रूरी है. सरकार भी अपनी योजनाओं के प्रचार के लिए विज्ञापन बनाती है, जबकि योजनाएं लोगों के भले के लिए होती हैं.

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  5. is tarah ki sambhawnaon ki talash....
    aur oospar swikriti awasyak hai......
    anytha next-zen hame kritaghn bhi kah
    sakte hain.....

    pranam.

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  6. डॉ अरविन्द मिश्र ,

    असंगठित क्षेत्र होने के कारण ब्लॉगजगत की हालत काफी ख़राब है जिन लोगों ने कोशिश की भी, उन्हें अक्सर हतोत्साहित किया गया है और उस पर तुर्रा यह है कि विभिन्न उद्देश्यों के लिए बनाए संकलकों अथवा सामूहिक चिट्ठे, अक्सर अपने चहेतों को अथवा काम के लोगों को ही प्रोमोट करने में लगे रहते हैं !

    कोई नया आदमी यदि ऐसा काम करने आता है तो या तो उसका मज़ाक बनाया जाता है अथवा अपने काम को सबसे अच्छा बताया जाता है ! हिंदी ब्लॉग जगत की मज़ाक बनवाने को अपना झंडा उठाये ये लोग, सबसे आगे रहने की कोशिश में धक्का मुक्की करते रहते हैं और इस प्रकार हिंदी ब्लॉग जगत का मज़ाक बनवाने में कामयाब रहते हैं !

    जारी...

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  7. नेकी और पूछ पूछ..
    पैसे कहाँ ज़मा कराने हैं...????
    ब्लॉगजगत में मेरा ब्लॉग शामिल नहीं हुआ??? मन उदास है...क्या मैं इतना बुरा लिखता हूँ....:(

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  8. काश आपकी बात सिरे चढ़ जाए. पर दिक़्कत ये कि जो बिना एक धेला दिए भी टांग खिंचाई से बाज नहीं आते वो 500 रूपल्ली देकर तो यूं गाएंगे कि उन्होंने एग्रीगेटर खरीद ही लिया है...

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  9. मैंने शैलेश भारतवासी और रविन्द्र प्रभात के कार्य की काफी तारीफ सुनी है यद्यपि मैं उन्हें व्यक्तिगत तौर पर नहीं जानता हूँ !

    अगर कोई सर्वमान्य व्यक्ति या कमेटी इस काम के लिए आगे आये जो ग्रुप विशेष से न जुड़े हों और जिनमें समाज सेवा का जज्बा हो तो मैं इस पुनीत कार्य पर होने वाले खर्चे का अधिकाँश व्यय का इंतजाम करने का व्रत ले सकता हूँ !

    शर्त मात्र इतनी है कि यह कार्य धनोपार्जन के स्थान पर आम ब्लोगर के लिए किया जाए तो अच्छा होगा !

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  10. आपकी पोस्ट की चर्चा कल (18-12-2010 ) शनिवार के चर्चा मंच पर भी है ...अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव दे कर मार्गदर्शन करें ...आभार .

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  11. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  12. http://mypoeticresponse.blogspot.com/2009/09/blog-post_29.html

    u can read this post and see how against people are for 'pay to read service "

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  13. @लगता है कुछ गलतफहमी हो गयी है ...पोस्ट छपाने के लिए पैसे देने की बात नहीं है ,यह सुविधा है अनेक हिन्दी ब्लागों पर क्या लिखा जा रहा है इसको सहजता से देख पढ़ पाने का और अपनी बात भी ज्यादातर लोगों तक सहजता से पहुँचाने की ..इधर
    निश्चय ही लोगों के दृष्टिकोण में बदलाव आया है ..अब लोग इस पर कुछ खर्चने को तैयार रहेगें ...हाँ मुफ्तखोर सदियों से मुफ्तखोर हैं और रहेगें ...जैसे सदियों से कंजूस और मक्खीचूस लोग रहे हैं ...कुछ लोग आज भी पड़ोसी का अखबार मांग कर पढ़ते हैं ....हम उनकी बात नहीं करते ..
    मैं आह्वान करता हूँ ब्लॉग एग्रेगेटर सामने आयें और अपनी सब्सक्रिप्शन फी जाहिर करें ,आनलाईन पेमेंट या ऑफ लाईन दोनों तरह का पेमेंट आप्शन रखें ....हम तैयार हैं ..हम बाते बहुत करते हैं ,चरितार्थ करने में रूचि नहीं है हमारी ....आईये कुछ करके दिखाएँ ...आज भी कम से कम सौ डेढ़ सौ लोग तैयार मिल ही जायेगें इस सुविधा के लिए पे करने के लिए ...और जो पे न करें उनकी परवाह भी नहीं होनी चाहिए .....
    अग्रीगेटर खुद को कल्पनाशीलता से बहुविध आकर्षक भी बना सकते हैं ...हाँ पोस्टों की रैंकिंग के अनुभव खराब रहे हैं ....उसमें विश्व के टॉप टेन ब्लागों में क्या छप रहा है,समाचार अपडेट , डिक्शनरी आदि आदि यूजर यूटिलिटी आईटम भी रख सकते हैं ...
    कोई तो आगे आये ..मैं बहुत अश्वानित हूँ ..नए वर्ष पर .तक यह व्यवस्था हो जाय तो फिर क्या कहने ?

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  14. आएम मोर दैन हैप्पी :)
    यह तो होना ही था. बहुत पहले मैंने लिखा था कि जब लाखों चिट्ठे होंगे तो संकलकों का महत्व घट जाएगा और डिग व स्टंबल अपॉन जैसी सेवाएँ ही काम, और बेहतर काम आएंगी.
    वैसे भी चिट्ठासंकलकों के तथाकथित हॉट लिस्टें व टॉप पोस्टें हाईजैक्ड ही रहती थीं जिससे हिंदी चिट्ठाजगत् यूँ भी बदनाम होता रहा था.
    हिंदी ब्लॉग डम विल नाऊ नेवर बी सेम अगेन! एंड फार बैटर!

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  15. कोई भी संकलक तब तक नहीं चल सकता जब तक वह व्यवसायिक रूप से न सोचे।

    आर्थिक सहायता के लिये मुझे अपने साथ समझिये।

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  16. मेरा भी समर्थन।
    लेकिन करेगा कौन?
    ब्लॉगजगत से बाहर का कोई रहे तो कैसा हो?

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  17. आपके विचारों से शत प्रतिशत सहमत हूँ .... आभार

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  18. मेरा भी समर्थन।
    लेकिन करेगा कौन?
    ब्लॉगजगत से बाहर का कोई रहे तो कैसा हो?

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  19. डॉ साहेब, सुन भी रहे हैं - और ५-७ दिन से मनन भी कर रहे थे........ आर्थिक पक्ष के बारे में........

    बिना पैसे के तो आजकल चेरिटी भी नहीं होती.

    आपके प्रस्ताव का पूर्ण रूपेण अनुमोदन कर्ता हूं.........

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  20. जब आप संकलक के लिये पैसा देगे तो वो "पे टू रीड " ही हुआ क्युकी आप केवल अपना लिखा छापेगे नहीं दूसरो का पढ़ेगे । संकलक के न होने से पढने मे असुविधा हैं । वैसे जो ज्यादा लिख रहे थे वो आज कल गायब हैं !!! मुझे पैड संकलक चाहिये मे अपनी पोस्ट जिसका लिंक दिया हैं ऊपर उसमे पहले ही कह चुकी हूँ । हां जो भी अपना ब्लॉग उस पर रजिस्टर कराये उनसे पैसा लिया जाना ही चाहिये । लेकिन अभी हाल फिलहाल ये संभव ही नहीं हैं क्युकी १०० रुपया प्रति माह प्रति ब्लॉग का देकर हर कोई संकलक को ये बतायेगा क्या क्या करो !!!!

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  21. बहुत शुद्ध बुद्ध विचार। अभी कोई ब्लाग एग्रीगेटर आया नही और जनता मांग ऊठाने लग गई कि संकलक बाहर को हो?:)

    जय हो। नाचो गिरधारी नाचो।

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  22. @वाह टपक गिरधारी जी ,बात पते की कही और खूब टपके भी समय से बिलकुल ..मगर किया क्या जाय ? ये अग्रीगेटर वाले आ क्यों नहीं रहे ?

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  23. एक तरह से अच्छा ही है, क्योंकि कुछ ब्लोग्स पर जिस तरह गालियों की बौछार और बदतमीज़ियाँ हो रही हैं उसे देखकर लगता है की सड़क के शोहदों के हाथ में ब्लोग्गर उसी तरह लग गया है जैसे बन्दर के हाथ में अस्तुरा लग जाए. अच्छे ब्लोग्स तक तो लोग ढून्ढते हुए पहुँच ही जायेंगे लेकिन इन टटपूंजियों की दूकान तो बंद हो जायेगी.

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  24. एक ब्लौगर श्री राजकुमार ग्वालानी को चिट्ठाजगत बहुत दिनों से खल रहा था. शायद अब ग्वालानी जी को बहुत अच्छा लग रहा होगा.

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  25. सौ फीसदी असहमत !

    कारण नंबर एक -
    मतलब आप हिन्दी ब्लॉग्गिंग का कोई आर्थिक मॉडल नहीं देखना चाहते !

    कारण नंबर दो -
    क्या और किसी भाषाई ब्लॉग्गिंग में भी इसी तरह के पैड संकलक हैं ? निश्चित रूप से नहीं !

    कारण नंबर तीन -
    मतलब कि आप केवल सर्च से आये ट्रैफिक को उतना महत्वपूर्ण नहीं समझते हैं |


    डिस्क्लेमर: कृपया इन कारण-पक्षों के आधार पर अपने प्रस्ताव पर पुनर्विचार करें |
    थोड़ी ठण्ड रखिये गैप भरने के लिए कोई ना कोई जरुर आएगा ......या कोई आर्थिक मॉडल विकसित होगा जरुर ..............पर कब ?

    मैं नहीं जानता !

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  26. प्रणाम करना भूल गया था |
    प्रणाम करता हूँ सर जी !

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  27. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  28. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  29. @ प्रवीण त्रिवेदी ,
    "थोड़ी ठण्ड रखिये गैप भरने के लिए कोई ना कोई जरुर आएगा"
    आपसे ऐसी आशा की उम्मीद नहीं थी मास्साब ! क्या इस उम्मीद में बैठे रहना कि कोई न कोई आएगा जरूर, निरी अकर्मण्यता नहीं कहलाएगी ! हम खुद क्यों न शुरू करके "उस कोई न कोई" में शामिल हो जाएँ ! आशा है सुझाव अवश्य देंगे !
    प्रणाम आपको

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  30. @ सतीश सक्सेना जी

    आपसे इस विषय में बात करना है।

    रामराम.

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  31. आज मैने जाना कि चिट्ठा जगत का इतना महत्व है!

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  32. एक सुदृढ़ संकलक हो, सबके प्रयासों से।

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  33. मेरा भी समर्थन है।

    इसके जरिए सिरियस ब्लॉगिंग होगी नहीं तो बेमतलब की उठापटक लगाने वालों का मजमा हमेशा ही लगा रहता था ।

    कभी कहते थे कि फलां ब्लॉग की रैंकिंग उपर क्यों कर दी गई है कभी कहते थे वह नीचे क्यों ?

    शायद ऐसे लोगों को लगता था जैसे वहां पर कोई रस्सी पकड़ कर बैठा है और वही उपर नीचे किये जा रहा है चिट्ठों को :)

    अब शायद अकल आये ऐसे लोगों को कि मुफ्त के मिली सुविधा पर मीन मेख निकालने में और उसको बात बेबात कोंचने में क्या नुकसान होता है।

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  34. आपसे ऐसी आशा की उम्मीद नहीं थी मास्साब!
    क्या इस उम्मीद में बैठे रहना कि कोई न कोई आएगा जरूर, निरी अकर्मण्यता नहीं कहलाएगी ! हम खुद क्यों न शुरू करके "उस कोई न कोई" में शामिल हो जाएँ !


    @सतीश जी !
    मैंने जो बात कही नितांत स्वयं के सन्दर्भ में कही है ......जाहिर है आप मुझसे ज्यादा आशान्वित हैं इस मुद्दे पर | अपनी क्षमताओं का मुझे भान है ....एक संकलक कितने दिन बिना किसी आर्थिक मॉडल के कैसे चल सकता है ? मैं नहीं समझ सकता ? मैथिली जी और सिरिल जी जैसे आदमी इतने दिनों तक ब्लॉगवाणी को मुफ्त चलाते रहे ...यह उनके कलेजे की बात थी | कई बार इन्तजार और मौन आगे की तयारी के लिए अस्त्र साबित हुआ करते हैं ....!

    यह मास्टर आपसे इस इन्तजार को मात्र उसी सन्दर्भ में लेने की आरजू करता है .....कृपया इसे निरी अकर्मण्यता का नाम ना देने की कृपा करें !
    प्लीज !
    प्रणाम सहित
    आपका प्रिय मास्टर

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  35. प्रवीण त्रिवेदी जी ,

    मैं आपको जनता हूँ कृपया ऐसे बोल कष्ट न दें , आपके शब्दों से ठीक नहीं समझ पाया मैं ...खेद है मगर आप पर कटाक्ष बिलकुल नहीं था गुरुजनों का मान करना आता है मुझे :-)

    कृपया इस गंभीर समस्या में अपनी मूल्यवान सलाह और रास्ता दिखाने की कृपा करें !

    आपका कहना ठीक है बिना मदद कोई कार्य नहीं होता , मगर मदद किसी ने मांगी भी तो नहीं ...मैं अपने आपको इस कार्य के लिए पेश करता हूँ ...

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  36. @ डॉ अरविन्द मिश्र ,
    मेरे ब्लॉग पर दीपक बाबा की टिप्पणी...
    दीपक बाबा said...
    सतीश जी, आपने, परमात्मा की कृपा से, जो उर्जा और साहस है........ उससे लगता है आगामी कुछ दिनों में आप ब्लॉग जगत को कुछ नयापन दोगे......

    कम से कम मेरी ये अपेक्षा है....

    ....
    .....

    आपका व्यक्तित्व भारी पड़ता है ......... कईओं पर .. जो आपसे प्यार करते हैं उन पर भी और जो आपसे नाराज़ रहते हैं उन पर भी ........

    मैं आपके ऊपर एक जिम्मेवारी डालना चाहता हूँ..... (वैसे छोटा हूं, तो अधिकार भी रखता हूं) एक मीटिंग बुलाई जाए....... और इस ब्लॉग जगत में जो गहन अन्धकार छाया है...... जिसकी चर्चा डॉ. अरविन्द मिश्र जी ने की....... उसके निमित कोई रास्ता निकला जाए.....

    “दीपक बाबा की बक बक”

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  37. @ डॉ अरविन्द मिश्र ,.
    अगर मैथिली जी दुबारा शुरू करें तो उनकी मदद को लगभग १ लाख रुपये इंतजाम करने का व्रत मैं लेने को तैयार हूँ ...

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  38. @ ताऊ,
    कुछ करो यार .... .
    इस पोस्ट पर टिप्पणियाँ करके भाई लोग चले जायेंगे और सुबह फिर भूल जायेंगे अथवा आशा लगायेंगे की एक और मैथिली सिरिल पैदा हों ....

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  39. इस समय संकलकों का बंध होना शायद कोई तकनिकी समस्या है। अभी तक किसी संकलन नें आर्थिक समस्या की बात नहिं की है।
    यदि कोइ भुगतान आधारित संकलक की बात होती है तो मैं सहमत हूँ। लेकिन हमें स्थापित संकलको का भी मंतव्य चाहिए।
    यदि भुगतान से ही संकलक सही चलने का हमारा मानना है तो प्राथमिकता भी चिट्ठाजगत को मिलनी चाहिए। एक तो वह पुराना व स्थापित है। और वह अब तक निस्वार्थ सेवा देता रहा है। एक बार वे स्थिति स्पष्ठ करें तो कोई सार्थक हल मिले और बहुमूल्य सुझाव भी प्राप्त हो सकते है।

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  40. एग्रीगेटर मै बनाता हुं बिलकुल फ़्रि भी होगा, लेकिन यह सब मेरे अकेले के बस का नही, अगर लोग साथ मै जुडे तो यह काम हो सकता हे,

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  41. हंसराज "सुज्ञ" जी ने जो कहा, हम भी उसी से सहाम्त हैं.....

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  42. अरविन्द भाई,
    मेरा अनुरोध है ,
    -कृपया ब्लागवाणी और चिटठा चर्चा के संचालकों से संपर्क करें उनकी मदद करने के उद्देश्य से संपर्क करें ....

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  43. .
    .
    .
    आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

    आपकी चिन्ता जायज है... जो लोग यह कह रहे हैं कि हिन्दी ब्लॉगिंग संकलकों के बिना ही ठीक रहेगी, वे सही नहीं हैं... पुराने ब्लॉगर व पाठक तो फिर भी पोस्टों तक पहुंच ही जायेंगे किसी न किसी तरह... पर एकदम नये पाठक व ब्लॉगर को दिक्कत होंगी...

    क्या कोई जानकार यहाँ पर यह बतायेगा कि ब्लॉगवाणी जैसा संकलक चलाने का सालाना खर्च कितना होता होगा...

    यदि यह खर्च इतना है कि सौ-सवा सौ समर्थ ब्लॉगर इसे आसानी से वहन कर सकते हैं... तो शुरूआत के तौर पर कम से कम तीन साल के वार्षिक अंशदान के साथ इसे शुरू किया जाये... मैं ऐसे किसी भी 'सामूहिक प्रयास' के साथ रहूँगा...

    यह भी कहूँगा कि ऐसे प्रयास में 'पहिये का आविष्कार' दोबारा से करने की जहमत न उठायें हम लोग... सबसे बेहतर तो यह रहेगा कि ब्लॉगवाणी के संचालकों से ही संकलक का 'ब्रॉड फ्रेमवर्क' व आवश्यक सॉफ्टवेयर खरीद लिये जायें व चलाये जायें... क्योंकि यह फार्मेट आजमाया-चलाया हुआ है... सर्वर भरोसेमंद व अधिक क्षमता का चयनित हो, बस...



    ...

    उत्तर देंहटाएं
  44. .
    .
    .
    और हाँ,

    'सुज्ञ' जी का कहना भी सही है, दोनों स्थापित संकलकों ब्लॉगवाणी व चिट्ठाजगत का ही आर्थिक भार वहन कर उन्हें और समर्थ व क्षमतावान बनाया जा सकता है।


    ...

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  45. सतीश जी ,इस पोस्ट से यह उजागर हो गया है कि आज की तारीख में ब्लागरों का बहुमत 'पे टू रीड ' सुविधा के लिए तैयार है -अब बस इंगित संकलक अपना प्रस्ताव ला दे बस .....और फटाफट हम पंजीकृत हो लें .......तब तक 'हिन्दी ब्लॉगजगत' से काम चलाते हैं जिन्होंने अपनी सुविधा के लिए एक सुन्दर सा संकलक तैयार किया है -लिंक ऊपर है .वे भी इस काम को लेने में तैयार नहीं हो रहे हैं और हिन्दी ब्लागिंग की मीडियाक्रिटी से दुखी लगते हैं ....
    आप सभी ने इस कामन कंसर्न के मुद्दे पर सकारात्मक दृष्टि अपनाई ,समर्थन में खड़े हुए -यह कैमराडेरी बनी रहे !

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  46. प्रवीण शाह जी ,
    जी हाँ ,अब समय आ गया है कि ये दोनों संकलक अपने प्रस्ताव के साथ आ जाएँ और हम सब उनके अनुरोध को स्वीकार कर हिन्दी चिट्ठाकारिता के एक नए अध्याय का आगाज करें -लेट्स बी रेशनल एंड रिस्पान्स्बल .....

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  47. संकलक की कमी तो महसूस होती है पर गाली गलौज सह के वे चलते भी तो कैसे ?

    कमी उनमें भी थी कि या तो वे कुछ खास चिट्ठों के पक्षधर थे / या फिर पक्षधर जैसे लगते थे ?

    वे ऐरे गैरे नत्थू खैरे सभी की बकवास के प्रति बेपरवाह और बेनामियों / छद्मनामियों के लिए पर्याप्त सहिष्णु थे जोकि मुझे व्यक्तिगत रूप से इसलिए खराब लगता था कि खुराफातों का फिल्टरेशन क्यों नहीं किया जा रहा ?

    वे फ़ोकट में चल रहे थे सो फोकटिया /चिल्लपों मचाने वालों की क्यों सहते ? पर आगे जो भी संकलक आये ,भले ही पैसे के साथ आये,कुछ नार्म्स के साथ आये तो बेहतर वर्ना गंगू तेलियों की बाढ़ राजा भोज को जीने ना देगी !

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  48. अरविंद जी,
    आपके प्रस्ताव का अनुमोदन करता हूँ !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  49. मुझे यहाँ रवि रतलामी जी की बात सर्वाधिक विज्ञान सम्मत नजर आ रही है। कोई नया संकलक आ भी जाए तो भी उस का महत्व उतना नहीं हो सकता जितना कभी नारद,चिट्ठाजगत और ब्लागवाणी का रहा है। चिट्ठाजगत बंद नहीं हुआ है मुझे कल शाम उन के यहाँ से नये चिट्ठों के स्वागत की मेल मिली है। लगता है कोई तकनीकी लौंचा है। ब्लागवाणी भी अभी हरिशरण नहीं हुई है,केवल कृत्रिम कोमा में है,चाहें तो उसे क्लिक कर के देख लें। हो सकता है यहाँ जो सुझाव आर्थिक सहायता या शुल्क का आ रहा है वह ब्लागवाणी के संचालकों को पसंद आए और कोमा टूट ले।

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  50. अपसे पूरी तरह सहमत हैं। शुभकामनायें।

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  51. मैंने कल ही 'समयचक्र' पर यह टिप्पणी की थी उसी बात को दुबारा बोल रहा हूँ.
    काफी दिनों तक ब्लोगिंग से दूर रहने के बाद जब वापस ब्लोगिंग शुरू की तो बड़ी निराशा हुई.. कोइ एग्रीगेटर ही नहीं. दुनिया आगे जा रही है.. हिन्दी ब्लोगिंग पीछे..
    मैं तो कहूँगा कि ये अगर वास्तव में हिंदी को बढ़ावा देना है वेब पर तो हमें हमें थोडा खर्च करने को भी तैयार रहना चाहिए. कुछ लोग मिलके आगे आयें और अंग्रेजी के डिग और टेक्नोरैटी जैसा एक प्रोफेशनल हिन्दी ब्लॉग एग्रीगेटर तैयार करें और इसके प्रयोग के बदले ब्लोगर्स से थोड़ा शुल्क लिया जाए जिससे इसके पीछे मेहनत करने वालों को ये न लगे की बैठ के बेगारी कर रहे हैं.
    ब्लॉगिंग: ये रोग बड़ा है जालिम

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  52. सज्जनों ब्लागवाणी चिट्ठाजगत की आर्थिक मदद होने को आतुर होने से पहले पता तो करें कि उन्हें आपकी मदद स्वीकार्य है कि नहीं?

    आपको सचमुच लगता है कि ब्लागवाणी, चिट्ठाजगत, नारद आदी के बंद होने कारण आर्थिक है?

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  53. @अनाम भाई ,प्रयास शुरू हो गए हैं -हम सामूहिक उत्थान के ही पक्षधर हैं -एकला चलो रे नहीं भाता मुझे!मित्रगण परिचित हैं ! सतीश जी भी जुटे हैं और देखिये तो कितने लोग तैयार हैं आज कमर कस के!

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  54. संकलकों की असमय मौत पर एक ऑंसू मेरा भी।


    मेरे विचार में अब तक जो भी ब्‍लॉग संकलक बंद हुए हैं, उनका कारण किन्‍हीं व्‍यक्ति विशेष को अत्‍यधिक वेटेज अथवा परेशान करने के कारण होने वाली छीछालेदर है। जहॉं तक चिटठाजगत की बात है, तो इसका कारण भी न तो तकनीकी है और नही आर्थिक। मैं आप लोगों को हतोत्‍साहित नहीं कर रहा हूँ, सिर्फ वस्‍तुस्थिति से अवगत करा रहा हूँ क्‍योंकि हर सिक्‍के के दो पहलू होते हैं। और सच दोनों ही होते हैं। जब तक हम ईमानदारी पूर्वक दोनों पहलुओं का अध्‍ययन नहीं करेंगे, मुझे नहीं लगता कि हम कोई भी कार्य ठीक ढंग से कर पाऍंगे।

    और जहॉं तक एक एग्रीगेटर के खर्चे की बात है, एक बार विनय प्रजापति से इस बारे में मेरी बात हुई थी। इसे बनाने में लगभग 30 हजार रूपये का खर्च आएगा और इसका सालाना खर्च लगभग 15 हजार रूपये है।

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  55. ब्लॉग संकलक से संवंधित अरविन्द जी की पीड़ा जायज है . किन्तु असमय बंद होते संकलकों का एक मात्र कारण आर्थिक नहीं कहा जा सकता , बंद होने के पीछे कुछ मजबूरियां रही होंगी ....संकलक के खर्चे का जहां तक सवाल है जाकिर भाई की बातों से मैं सहमत हूँ , क्योंकि इस दिशा में मेरी कई विशेषज्ञों से बात हुयी है, विनय ने भी मुझसे वही कहा जो जाकिर भाई ने बताया है . मैं तो यही कहूंगा की कुछ सार्थक सोचा जाए , उद्देश्य पवित्र है अवश्य सफलता मिलेगी !

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  56. सुझाव से सहमति.
    फ़ीस लें परन्तु ब्लॉग पंजीकृत करने की कुछ शर्तें भी रखें.पहचान वेरीफाई कर के वास्तविक प्रोफाईल वाले ब्लोगों को शामिल किया जाये.
    सर्वाधिक हिट्स/पसंद/नापसंद/लोकप्रिय/टिप्पणियाँ/आदि के बटन हटाये जाएँ.
    --

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  57. जाकिर रजनीश की बात से सहमति कि संकलकों द्वारा किसी व्यक्ति विशेष को अत्याधिक वेटेज या परेशान किया गया इसलिये संकलकों की छीछालेदर की गई। बन्द हो चुके एक्रीकेटर के पीछे भाग दौड नहीं करनी चाहिये।

    यदि किसी एक्रीकेटर को आर्थिक सहायता दी जाय तो मृतक संकलक के बजाय चिठ्ठाजगत को दी जाय। वरिष्ठ ब्लागर मिल कर चन्दा एकत्रित करें और एक पर्यवेक्षक टीम बनाकर खर्चे पर निगाह रखें।

    या फिर जाकिर रजनीश की गाइडेन्स में नये एक्रीकेटर को बनाया जाय। 15 हजार बनाने के और 45 हजार तीन साल चलाने के कुल साठ हजार हुये जिसे पुराने चिठ्ठाकार से 1 हजार और नये चिठ्ठाकार से 5 सौ के हिसाब से चन्दा कर लेना चहिये। इतना हम सब मिल कर इकठ्ठा कर सकते है।

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  58. "पुराने चिठ्ठाकार से 1 हजार और नये चिठ्ठाकार से 5 सौ के हिसाब से चन्दा कर लेना चहिये। इतना हम सब मिल कर इकठ्ठा कर सकते है"
    @अनाम भाई बात आपकी बिलकुल दुरुस्त है किन्तु ऐक्रीकेटर को ऐग्रीगेटर लिखें नहीं तो अगला कोई एलीगेटर लिख देगा!

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  59. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  60. यदि कोई अग्रीगेटर संचालक भी अपना पक्ष रखते तो सभी लाभान्वित होते। क्या कोई वरिष्ठ ब्लॉगर पुराने संचालकों से अपना पक्ष रखने का अनुरोध कर सकते हैं? क्या उन्हें अब तक की सेवा के लिये अभार-प्रस्तुति की जा सकती है? मेरे जैसे अनेकों नये लोगों को तो यह पता भी नहीं है कि लम्बे समय तक इन संकलकों द्वारा ब्लॉगर सेवा करने वाले लोग हैं कौन।

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  61. `इन संकलकों को केवल ५०० रूपये सालाना वार्षिक फीस दे दी जाय '

    सहमत.... पर अपना दृष्टिकोण जताने के लिए अनानिमस जैसी कायरता समझ में नहीं आई :(

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  62. मेरे विचार से इस परेशानी का सबब आर्थिक नहीं है बल्कि... सही सही सबब बताना तो मुश्किल है लेकिन लगता है कि और बातों के अलावा तकनिकी भी है... कोई भी स्क्रिप्ट जब बार-बार ब्लॉग अपडेट करेगी तो ब्लोग्गर जैसी संस्थाओं को भी परेशानी आ सकती है...

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  63. मुझे बहुत मज़ा आया यह पोस्ट पढ कर :-)

    पिछले वर्ष रचना जी द्वारा प्रस्ताव किये जाने और चिट्ठाचर्चा डोट कॉम की तैयारी में कथित प्रायोजकों की चर्चा भर किए जाने पर ’वरिष्ठ’ ब्लॉगरों की जो तिलमिलाहट सामने आई थी उसके परिप्रेक्ष्य में आर्थिक सहयोग का प्रस्ताव/ आश्वासन हास्यास्पद ही लगता है.

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  64. @ सतीश सक्सेना

    > जिन लोगों ने कोशिश की, उन्हें अक्सर हतोत्साहित किया गया है

    > अक्सर अपने चहेतों को अथवा काम के लोगों को ही प्रोमोट करने में

    > कोई नया आदमी ...काम करने आता है तो या तो उसका मज़ाक बनाया जाता है अथवा अपने काम को सबसे अच्छा बताया जाता है!

    > हिंदी ब्लॉग जगत की मज़ाक बनवाने को अपना झंडा उठाये ये लोग, सबसे आगे रहने की कोशिश में धक्का मुक्की करते रहते हैं और इस प्रकार हिंदी ब्लॉग जगत का मज़ाक बनवाने में कामयाब रहते हैं!


    इस बात पर आपसे पूर्णतया सहमत

    वैसे ’ये लोग’ आजकल गायब क्यों हैं? :-)

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  65. @ Kajal Kumar

    जो बिना एक धेला दिए भी टांग खिंचाई से बाज नहीं आते वो 500 रूपल्ली देकर तो यूं गाएंगे कि उन्होंने एग्रीगेटर खरीद ही लिया है...

    बिल्कुल सही है जी :-) कई तो यह विचार बनाए बैठे हैं :-D

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  66. इस बार के चर्चा मंच पर आपके लिये कुछ विशेष
    आकर्षण है तो एक बार आइये जरूर और देखिये
    क्या आपको ये आकर्षण बांध पाया ……………
    आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (20/12/2010) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  67. @ Raviratlami

    वैसे भी चिट्ठासंकलकों के तथाकथित हॉट लिस्टें व टॉप पोस्टें हाईजैक्ड ही रहती थीं जिससे हिंदी चिट्ठाजगत् यूँ भी बदनाम होता रहा था.

    इस कडवी सच्चाई से अच्छे अच्छे लोग मुंह चुरायेंगे

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  68. @ प्रवीण शाह

    पुराने ब्लॉगर व पाठक तो फिर भी पोस्टों तक पहुंच ही जायेंगे किसी न किसी तरह... पर एकदम नये पाठक व ब्लॉगर को दिक्कत होंगी...

    यह चिन्ता सामयिक है

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  69. इस पोस्ट के समस्त टिप्पणीकारों की महती टिप्पणीयों का संज्ञान लेते हुये ताऊ अदालत यह सूचित करती है कि आप नाहक चिंता ना करें. "चिट्ठाजगत" कहीं नही जा रहा है. जैसा कि आप समस्त ज्ञानी जन जानते होंगे कि पिछली साल भी इस माह में चिट्ठाजगत इसी तरह बंद था. उसका कारण है कि इनका सर्वर बाहर है जहां आजकल सन आऊटेज और क्रिसमश की छुट्टियों के चलते यह व्यवधान आया करता है.

    अत: समस्त महानुभाव से अनुरोध है कि व्यर्थ की चिंता छोडे एवम जनवरी के प्रथम सप्ताह तक आप सबका प्यारा राजदुलारा चिट्ठाजगत उसी शान से आपकी सेवा में हाजिर होगा.

    हां जिन लोगों को पेड सर्विस चाहिये वो चाहें तो अपना पैसा ताऊ के खाते में जमा करा सकते हैं. क्योंकि ताऊ को ठंड बहुत लग रही है, थोडी गर्मी आ जायेगी.:)

    रामराम

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  70. इस पोस्ट के समस्त टिप्पणीकारों की महती टिप्पणीयों का संज्ञान लेते हुये ताऊ अदालत यह सूचित करती है कि आप नाहक चिंता ना करें. "चिट्ठाजगत" कहीं नही जा रहा है. जैसा कि आप समस्त ज्ञानी जन जानते होंगे कि पिछली साल भी इस माह में चिट्ठाजगत इसी तरह बंद था. उसका कारण है कि इनका सर्वर बाहर है जहां आजकल सन आऊटेज और क्रिसमश की छुट्टियों के चलते यह व्यवधान आया करता है.

    अत: समस्त महानुभाव से अनुरोध है कि व्यर्थ की चिंता छोडे एवम जनवरी के प्रथम सप्ताह तक आप सबका प्यारा राजदुलारा चिट्ठाजगत उसी शान से आपकी सेवा में हाजिर होगा.

    हां जिन लोगों को पेड सर्विस चाहिये वो चाहें तो अपना पैसा ताऊ के खाते में जमा करा सकते हैं. क्योंकि ताऊ को ठंड बहुत लग रही है, थोडी गर्मी आ जायेगी.:)

    रामराम

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  71. मित्रों ,इस विचार विमर्श के लिए बहुत आभार ,मैं अंतिम निवेदन करता हूँ कि संकलकों की पेड़ सर्विस के लिए प्रस्ताव चिट्ठाजगत या विश्वसनीय स्तर से आरंभ हो और मुफ्तखोरी अब बंद की जाय ....
    मैं तो अपने सब्सक्रिप्शन के लिए तैयार बैठा हूँ ,सतीश सक्सेना जैसे बादशाह मित्र पूरे उपक्रम को ही संभालने को तैयार हैं -
    इस स्वर्णिम अवसर हाथ से निकल जाने देना उचित नहीं है !

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  72. मैं इस प्रस्ताव से असहमत हूँ ...मुफ्तखोरी का इलज़ाम लगने के बाद भी ..
    क्यूंकि जब बिना किसी शुल्क दिए ही लोंग इसकी विश्वसनीयता पर शक कर रहे हैं ...
    पैसे देने के बाद तो बाकायदा हक़ के साथ गली गलौज किया जा सकेगा !

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  73. पोस्ट का अपनी जगह महत्व तो है ही , मज़ा आया टिप्पणी पढ़ने में । सभी विदवत जनों को प्रणाम।अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

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