सच है यह नई बोतल में पुरानी शराब ही है .हाँ पैकिंग और लेबलिंग में कुछ फ़र्क दिखेगा ,क्योंकि ज़माना इसी का है . तो पहले थोड़ी आकर्षक पैकिंग और लेबलिंग हो जाय ,फिर तो वही पुराना सोमरस ही है आकंठ पान के लिए .
पैकिंग और लेबलिंग हमारे आदि पुरखों ने जब प्रकृति को उसकी सम्पूर्णता में निहारा तो स्तब्ध सा हो रहा -जल नभ थल बिजली पहाड़ मेघ वर्षा आंधी तूफ़ान-घबराया सा वह घबराया सा लगा कुतूहल करने -कस्मै देवाय हविषा विधेम ? यानि किस देवता का पूजन स्तवन करे वह? कोई एक तो हो ? उसने सब के सामने शीश झुकाना शुरू किया और इस क्रम में उसने एक चमत्कारिक जडी -बूटी को भी सर नवाया -तस्मै सोमाय हविषा विधेम! -आओं हम उसी सोम का पूजन स्तवन करें ! किस सोम का ? आईये जाने तो -
ऋग्वेद का एक पूरा (नवम) मंडल इस रहस्यमयी औषधि /बूटी जडी /लता (????) को समर्पित है . इस एक वनस्पति को देवता का दर्जा दे दिया गया है जहाँ इसकी प्रशंसा मे अनेक सूक्तियां कही गयी हैं.इसकी स्तुति मे बताया गया है कि कैसे इसके उपभोग से देवताओं के राजा इन्द्र मे इतनी ताकत आ जाती है कि वे असुरों की बड़ी से बड़ी सेना को भी परास्त कर देते हैं .सब देवता सोमरस के दीवाने हैं .इसके आकंठ पान के लिए अनुभवीऔर प्रशिक्षित ब्राह्मणों के द्वारा सोम अनुष्ठान का भी विधान वर्णित है ,मजे की बात है कि ईरानी धर्मग्रन्थ अवेस्ता मे यही सोम ,होम उच्चारित होता है .हम आज भी होम करते हैं और देवताओं को सोमरस की परम्परा मे कोई पेय अर्पित करते हैं -पंचगव्य आदि .मगर सोमरस वाली बात इसमे कहाँ ? आख़िर हम सोमरस का ही अर्पण/वितरण आज के होम आदि अनुष्ठानों मे क्यों नही करते ? मगर हमे मालूम तो हो कि यह सोम है कौन सी बला (निवारिणी) बूटी ? यह संशय रामायण युग मे भी है - राम-लक्ष्मन की प्राण रक्षा के लिए हनुमान हिमालय तक जाकर भी सोम (जो रामायण मे मृत संजीवनी के नाम से वर्णित है ) को जब नही पहचान पाते तो पूरा पर्वत ही उखाड़ लातेहैं।
ऐसी काव्य गाथा है!
मशहूर ब्रितानी लेखक आल्दुअस हक्सले ने अपनी विश्व प्रसिद्ध कृति ब्रेव न्यू वर्ल्ड मे सोम का जमकर उल्लेख किया है -उपन्यास के पात्र तनाव टालने के लिए दनादन सोमा टैबलेट खाते हैं -मतलब सोमरस की परम्परा मे ही सोम टिकिया भी हक्सले के कल्पना लोक मे आ चुकी थी .उपन्यास के पढ़ने के साथ ही मैंने भी सोम बूटी की खोज करीब दो दशक पहले शुरू कर दी थी ,मगर अभी भी कामयाबी नही मिली है .आप मे से क्या कोई मेहरबानी कर मेरी मदद करेंगे? इधर कुछ और तथ्य प्रकाश में आये हैं जिन्हें मैं आपके साथ बाँटना चाहता हूँ .काश मुझे सोम कलश ही मिल जाता तो आप मित्रों में बाँट बाँट कर मन मुदित होता -यह देव दुर्लभ पेय जो है !
अध्ययनों से पता चलता है कि वैदिक काल के बाद यानी ईसा के काफी पहले ही इस बूटी /वनस्पति की पहचान मुश्किल होती गयी .ऐसा भी कहा जाता है कि सोम[होम] अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मणों ने इसकी जानकारी आम लोगो को नही दी ,उसे अपने तक ही सीमित रखा और कालांतर मे ऐसे अनुष्ठानी ब्राह्मणों की पीढी /परम्परा के लुप्त होने के साथ ही सोम की पह्चान भी मुश्किल होती गयी .सोम को न पहचान पाने की विवशता की झलक रामायण युग मे भी है -हनुमान दो बार हिमालय जाते हैं ,एक बार राम और लक्ष्मण दोनो की मूर्छा पर और एक बार केवल लक्ष्मण की मूर्छा पर ,मगरसोम की पहचान न होने पर पूरा पर्वत ही उखाड़ लाते हैं: दोनो बार -लंका के सुषेण वैद्य ही असली सोम की पहचान कर पाते हैं यानी आम नर वानर इसकी पहचान मे असमर्थ हैं [वाल्मीकि रामायण,युद्धकाण्ड,७४ एवं १०१ वां सर्ग] सोम ही संजीवनी बूटी है यह ऋग्वेद के नवें 'सोम मंडल ' मे वर्णित सोम के गुणों से सहज ही समझा जा सकता है .
सोम अद्भुत स्फूर्तिदायक ,ओज वर्द्धक तथा घावों को पलक झपकते ही भरने की क्षमता वाला है ,साथ ही अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति कराने वाला है .सोम के डंठलों को पत्थरों से कूट पीस कर तथा भेंड के ऊन की छननी से छान कर प्राप्त किये जाने वाले सोमरस के लिए इन्द्र,अग्नि ही नही और भी वैदिक देवता लालायित रहते हैं ,तभी तो पूरे विधान से होम [सोम] अनुष्ठान मे पुरोहित सबसे पहले इन देवताओं को सोमरस अर्पित करते थे , बाद मे प्रसाद के तौर पर लेकर खुद स्वयम भी तृप्त हो जाते थे .कहीं आज के 'होम' भी उसी परम्परा के स्मृति शेष तो नहीं हैं? पर आज तो सोमरस की जगह पंचामृत ने ले ली है जो सोम की प्रतीति भर है.कुछ परवर्ती प्राचीन धर्मग्रंथों मे देवताओं को सोम न अर्पित कर पाने की विवशता स्वरुप वैकल्पिक पदार्थ अर्पित करने की ग्लानि और क्षमा याचना की सूक्तियाँ भी हैं ।
मगर जिज्ञासु मानव के क्या कहने जिसने मानवता को सोम कलश अर्पित करने की ठान रखी है और उसकी खोज
मधु ,ईख के रस ,भांग ,गांजा ,अफीम,जिन्सेंग जैसे पादप कंदों -बिदारी कंद सरीखे आयुर्वेदिक औषधियों से कुछ खुम्बियो [मशरूमों ] तक आ पहुँची है.
क्रमशः
23 टिप्पणियाँ:
बडी अच्छी जानकारीं दी आपने, मैंने भी इसके बारे बस सुना ही था, लेकिन यहाँ आने के बाद काफी कुछ जानने को भी मिला, आभार आपका ।
बहस पटरी से न उतरे इसलिए प्रारम्भ में ही बता दूँ कि सोम शराब नहीं थी। शराब बनाने के लिए किण्वन (fermentation)एक आवश्यकता है जब कि सोमरस का पान ताजी अवस्था में किया जाता था।
अच्छी जानकारी भरी श्रृंखला,आगे की प्रतीक्षा.
मिश्रा जी,
चलिए आपने खोज शुरू की, अच्छा लगा. हमें भी टिप्पणी करने को एक ठिया मिल गया, धन्यवाद.
१. गिरिजेश का स्ट्रेस सही है और इसे लगातार ध्यान रखने की ज़रुरत है. सोमार्पण भी आज के पंचगव्य जैसा ही था. ऋग्वेद में सोम को कुचलकर, छानकर दूध के साथ मिलाकर अर्पण करने की बात जगह-जगह पर है.
२. भारत में पारसी लोग लम्बे समय से ईरान से होम (सोम) की बूटी (Ephedra)मंगाते रहे हैं. मुख्य भूमि के मुकाबले वहां इस बूटी का व्यापारिक दोहन होता रहा है.
३. संजीवनी को सोम कहना शायद ठीक नहीं है. ज़रुरत है इन दोनों को ढूँढने, पहचानने की
Sorry, the correct link for ephedra in previous comment is:
http://en.wikipedia.org/wiki/Botanical_identity_of_Soma-Haoma
राहुल सांकॉत्यायन ने भांग का सेवन कर उस का मन और शरीर पर प्रभाव लिखा है और बाद में कहा है कि वैदिक सोम यही है।
बहुत अच्छा और जानकारी प्रदान करने वाला लेख....
क्या बात है मिश्रा जी हमने सोचा भी नही था की इस विषय पर इतनी बढ़िया और ग़ूढ जानकारी मिलेगी...बहुत बहुत धन्यवाद आपका
वेद में जिस सोमरस की उपासना की गयी है, वह निश्चित ही कोई दुर्लभ ओषधि रही होगी. भले ही संजीवनी बूटी सोमलता ही हो या कुछ और, परन्तु मैं आपकी इस बात से शत-प्रतिशत सहमत हूँ कि ब्राह्मणों या वैद्यों के एक वर्ग ने इसकी पहचान गुप्त रखी और धीरे-धीरे इसके विषय में लोगों का ज्ञान सीमित होता गया. केरल प्रदेश में अब भी कई ऐसे घराने हैं जो जड़ी-बूटियों से इलाज करते हैं, लेकिन इसकी जानकारी अपने वंशजों के अतिरिक्त किसी को नहीं देते.
ऋग्वेद में "सोम" को इन्द्र का रस या इन्द्रिय संबन्धी रस कहा गया है।
सोम: इन्द्रियो रस: (ऋ.8/3/20)
हमारे सिर की एक संज्ञा कलश या द्रोण है। इस द्रोण कलश में भरा हुआ रस (सेरीब्रो स्पाईनल फ्ल्यूड)ही सोम है। जो कि मस्तिष्क और मेरूदंड के समस्त नाडी संस्थान को सींचता रहता है। यह मस्तिष्क की वापियों(वेंट्रिकल) में उत्पन होता, ओर मस्तिष्क और सुषुम्ना की सूक्ष्मतम नाडियों का पोषण, परिमार्जन करता हुआ उसमें सर्वत्र ओतप्रोत रहता है।
शरीर-यज्ञ से संबंन्ध रखने वाली परिभाषाओं में सोमरस ही मस्तिष्क और सुषुम्ना में व्याप्त रस है, जो कि अमृ्त का स्त्रवण करता रहता है। आयु,प्राण,चेतना,देवत्व आदि सात्विक तत्वों की संज्ञा ही अमृ्त है-----ब्राह्मण ग्रन्थों में इन परिभाषाओं को स्पष्ट स्वीकार करके इनके अभिप्राय बताए गए हैं।
मनुष्य में प्राण शक्ति का उद्रेक ही अमृ्त है जो कि वीर्य की शुद्धता पर निर्भर है।
प्रजापतेर्वा एते अन्धसी यत्सोमश्च सुरा च
तत: सत्यं श्रीज्योर्ति: सोम:
अनृ्तं पाप्मा तम: सुरा ।। (शतपथ ब्राह्मण)
समुद्र मंथन का वह उपाख्यान जिसमें "सोम" सहित अन्य पदार्थों का प्रकट होना बताया गया है....वो भी इसी ओर इंगित करता हैं कि सोम कोई वास्तविक जडी बूटी न हो कर के वरन मस्तिष्क और सुषुम्ना में व्याप्त रस का ही नाम है। क्यों कि वैदिक परिभाषा में पुरूष का एक नाम समुद्र है।
पुरूषो वै समुद्र: (जैमिनीय उप.)
बाकि इस मंथन में आपके हाथ कुछ लग जाए तो पात्र जानकर उस सोम पान में भागीदार हमें भी जरूर बना लीजिएगा। ऎसा नहीं कि बाद में पता चले कि मिश्र जी अकेले ही सारे सोमरस का भोग लगा चुके:)
सोमरस और संजीवनी बूटी को लेकर संशय बना हुआ है ....
अफीम गांजा आदि मादक पदार्थों की श्रेणी में आते हैं तो सोमरस भी हुआ तो नशा ही ...
सोमरस और संजीवनी बूटी के अंतर को स्पष्ट करे तो जानकारी और लाभप्रद हो जायेगी ....!!
आपकी प्रोफाइल का चित्र बदला, तब ही लग गया हमें कि इस तरह की प्रविष्टियाँ आयेंगी ।
अध्यवसाय प्रकट हो रहा है अब अपनी पूरी प्रखरता से !
ठंढ का प्रकोप बहुत क्या इतना हुआ है की मिसिर जी उठते-बैठते सोमरस में ही डूब-उतरा रहे हैं...:):) !!
@गिरिजेश जी...ताड़ी को क्या कहेंगे...जो सूर्योदय से पहले की होती है ???
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आदरणीय अरविन्द जी,
एक बड़ी समस्या है पुनरूत्थानवाद, वेदवाद, महान प्राचीनतमसंस्कृतिवाद, सनातनधर्मश्रेष्ठतावाद, देववाद, सुर-असुरवाद, धार्मिक कर्मकान्डवाद, पोंगापंथवाद आदि आदि वादों के साथ कि वे बड़े Apologetic हैं... मानते ही नहीं कि हमारे पुरखों मे कुछ मानवीय कमजोरियां भी थीं... लपेट देते हैं उनको कल्पित, आज के मानव की समझ के बाहर मंतव्य, द्रव्य और गुणों की चाशनी में... मानना ही नहीं चाहते कि सोमरस और कुछ नहीं, साधारण मदिरा मात्र था... और श्रेष्ठ देवगण भी इसे पीते थे... पढ़ रहे हैं कि आप क्या कहते हैं आगे...
वैसे आदरणीय विजयशंकर चतुर्वेदी जी ने भी चीरफाड़ की है इस 'सोमरस' की...
तुझे सोमरस कहूं या शराब...भाग-१
तुझे सोमरस कहूं या शराब...भाग-२
तुझे सोमरस कहूं या शराब...अन्तिम भाग
आपकी पोस्ट और शास्त्री जी की टिप्पणी पढ़कर अत्यन्त लाभान्वित महसूस कर रहा हूँ। हार्दिक धन्यवाद।
@ अदा जी, ताड़ी को ताड़ी कहेंगे।
:)
@ प्रवीण जी
अपने पुरखों का गुण गायन करने में बुराई नहीं। अन्ध प्रशंसा और स्वर्णिम अतीत के कॉंसेप्ट का मैं भी विरोधी हूँ। समस्या यह है कि पुराने लोगों ने रूपकों का इतना खुल कर प्रयोग किया कि असल बातें धुँधला गईं। रही सही कसर जानने वालों की गोपनीयता ने पूरी कर दी। विजयशंकर चतुर्वेदी जी ने मूल ऋचा न देकर अनुवाद में सोम से शराब बहाने की बात लिखी है। मूल न देने पर अनर्थ होते हैं। इसी ब्लॉग की एक दूसरी पोस्ट पर एक सज्जन ने एक ऋचा का अनुवाद प्रस्तुत कर समुद्र किनारे दारुकाबन होने की बात कह दी।
पता नहीं उनका मतलब दारू से था कि काबा से था कि लकड़ी से था लेकिन ऋचा में 'काबन' जैसा कुछ भी नहीं है। ...
ध्यान से पढ़ने पर सोम और सुरा और शराब में फर्क साफ पता चलता है। मैंने पहले ही कहा है शराब बनाने के लिए 'किण्वन' आवश्यक है जो कि सोमरस के लिए आवश्यक नहीं था।
उसके गुण या प्रभाव अगर शराब से मिलते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह शराब है या उसमें बस वही गुण हैं।
हाँ, 'वत्स' जी की बात भी विचारणीय है।
अरे जरा महुआ-महारानी की ओर भी ध्यान दें हुजूर ..
गिरिजेश जी से निवेदन है की गांव वाले किण्वन को समझाएं .. क्या यह भी काव्य
विषय हो सकता है ! हो तो डायरी खोलें आर्य !
बाकी बकौल हिमांशु जी ----
'' आपकी प्रोफाइल का चित्र बदला, तब ही लग गया हमें कि इस तरह की प्रविष्टियाँ आयेंगी ।
अध्यवसाय प्रकट हो रहा है अब अपनी पूरी प्रखरता से ! ''
--------इस पोस्ट का आनंद और फिर टिप्पणी का,आनंद दूना हो गया-----
ईश्वर की कृपा से बचपन से ही गीता पढने व सुनने को मिला । मेरे पूज्य पिता जी गीता के अच्छे ज्ञाता हैं , उन्हें पूरी गीता कंठस्थ है । मैं संस्कृत का विद्यार्थी होने के कारण भी बहुधा गीता का लाभ पाता रहा । अब तक कुल मिलाकर 20सों बार पूरी गीता पढ चुका हूं और तो और अब तो ज्यादातर मंत्र याद भी हो गये हैं । आपने कर्ण सिंह के बारे में बताया , तो एक बहुत ही पुरानी घटना मुझे भी याद आ गई । यही कर्ण सिंह ने हमारे एक आयोजन में गीता का गलत तरीके से व्याख्यान दिया जिसपर पूरी संस्कृत भारती ही नहीं अपितु मेरठ के स्वामी विवेकानन्द जी ने भी असहमति जतायी थी । अबतक कर्ण सिंह से कई मुलाकात हो चुकी है पर उस एक ही घटना ने कर्ण सिंह के प्रति मेरी आस्था खतम कर दी थी ।
खैर कभी आइये हमारे भी ब्लाग {संस्कृत जीवन} जो पूरी तरह से संस्कृत में ही है । आपको अच्छा लगेगा ।
यह सोमरस
कई सदियों से आज तक जो मादक बस्तु बनाने के लिए नेपाल में, मगर,गुरुंग,तमांग,शेरपा राइ, लिम्बू , जातियां जड़ी बूटियां से ही बनाते हैं सायद सोमरस वह ही होसकता है क्योंकि यह जाती वन जंगल हिमालय पर्वत का निवासी है उसमे ४,५, जड़ी बूटी से निर्मित होती है और वह जड़ी बूटी है (आर्हू ,कुरीला,बुकिफुल इतना ही मुझे मालूम है आखिर में चावल,कोड़ा का आटा लगताही है ) से बनाते है और यह व्हिस्की ब्रांडी से भी सेहत के लिए उत्तम है ( इसमें बिलकुल केमिकल नहीं है )
यह सोमरस
कई सदियों से आज तक जो मादक बस्तु बनाने के लिए नेपाल में, मगर,गुरुंग,तमांग,शेरपा राइ, लिम्बू , जातियां जड़ी बूटियां से ही बनाते हैं सायद सोमरस वह ही होसकता है क्योंकि यह जाती वन जंगल हिमालय पर्वत का निवासी है उसमे ४,५, जड़ी बूटी से निर्मित होती है और वह जड़ी बूटी है (आर्हू ,कुरीला,बुकिफुल इतना ही मुझे मालूम है आखिर में चावल,कोड़ा का आटा लगताही है ) से बनाते है और यह व्हिस्की ब्रांडी से भी सेहत के लिए उत्तम है ( इसमें बिलकुल केमिकल नहीं है )
श्रंगार रस , वीर रस , वीभत्स रस हास्य रस आदि रस मनुस्यो के मुख से उत्पन्न होते है एवं मनुष्यो के कानो द्वारा पिये जाते है और इनके पभाव भी अवश्य ही होते है वैसे ही वेद मे एक रस है जो देव पीते है उसे सोम रस कहा जाता है।
सोम रस वनानें की विधि पत्थर का खल और पत्थर का ही मूसल लीजियै मूसल को खल मे तल से ऊपर लटकता हुआ पहली दो अगुलियों एवं अंगूठे से मूसल का ऊपरी अंन्तिम सिरा पकड़े ,अब इस मूसल को मूसल के ऊपरी अन्तिम हिस्से को केन्द्र मे रखते हुये नीचे के हिस्से को इस प्रकार वृत्र गति दे कि मूसल खल के अन्दरूनी हिस्से मे लगातार स्वासतिक कृम से गतिमान हो , तव इसमे से जो ध्वनि उत्पन्न होती है यही सोम रस होता है ।
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