सोमवार, 7 फ़रवरी 2011

सामाजिकता का निर्वाह

समाज में रहते हुए हमें कई जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं -सामाजिकता का तकाजा भी यही रहता है कि हम जहां तक संभव हो एक दूसरे के सुख दुःख दोनों में हिस्सेदार बने -यही मानवीय सरोकार भी है ..यही मानवीयता हममे गहरे सामाजिक संस्कार भी विकसित करती है ....आधुनिक जीवन शैली ने इस मानवीय बोध पर गहरा कुठाराघात किया है मगर फिर भी हम एक धरातल पर  हैं तो मनुष्य ही और मनुष्यता  प्रदर्शित किये बिना भी नहीं रह पाते  ..भले ही इसके कारण कुछ जटिलतायें आ उपस्थित हों ...अब आज ही एक धर्म संकट मेरे सामने आ गया ....

पड़ोस में ही  मृत्योपरांत तेरहवीं के ब्रह्म भोज का निमंत्रण था ...और आज ही मेरे एक परम मित्र के लड़के की बरात में जाने का निमंत्रण ....और दोनों का समय भी लगभग एक ही ....एक जगह खुशी तो दूसरी जगहं गम का माहौल ..वही क्वचिद वीणा नादः क्वचिदपि च हा हेति रुदनम* ...कहीं तो वीणा वादन और कहीं हाहाकारी रुदन ....   और भोजन करने का विशेष आग्रह भी दोनों जगह ....अब क्या किया जाय ? सुबह से इसी उधेड़बुन में लगा  रहा ...मल्हार वाले सुब्रमन्यन साहब की मेरे बारे में की गयी एक फब्ती कि मैं भी गजब का खाऊ इंसान हूँ सहसा याद हो आई और ओठों पर मुस्कान बिखेर गयी ...सचमुच यह  एक जटिल  मुद्दा था ....प्रचलित लोकाचारों के हिसाब से तेरहंवीं में खाना खाने के बाद फिर कहीं और कुछ नहीं खाया जाता ...यह वर्जित है ....मगर विवाह के भोज में व्यंजनों की विविधता का भी स्मरण हो रहा था ...तय यह पाया गया कि मृत्यु-ब्रहम भोज में केवल द्वार पर जाकर चेहरा दिखा दिया जाय ,संवेदना व्यक्त कर खाना न खाने का कुछ बहाना बना कर लौट आया जाय और फिर बरात की पार्टी में चलकर जमकर जीमा जाय ....सो यही प्लानिंग बन गयी .....

मगर तब सब प्लानिंग फेल हो गयी जब अपनी सहजता से झूंठ न बोल पाने की कमजोरी उभर आई और दूसरे ब्रह्म भोज का विविधता भरा मीनू भी निश्चय को डिगा गया ....अब मृत्युभोज और उत्सव भोज के मीनू में कोई अंतर ही नहीं रह गया है ..यहाँ भी कई पकवान थाल की शोभा बढ़ा  रहे थे ..मिठाई में बनारस का देशी घी में बना मशहूर मालपुआ और सजावटी मीठी दही के कुल्हड़ और पनीर इत्यादि के अन्यान्य पकवान ललचा रहे थे..वैसे भी अन्नपूर्णा देवी का अपमान तो करना ही नहीं चाहिए ...मैंने अट्ठासी वर्षीय स्वर्गीय पूज्य  की आत्मा के शान्ति की कामना की और ब्रह्म भोज में शामिल हो गया ....कहना नहीं है कि भोजन सुस्वादु बना था ...अन्नपूर्णा देवी को भरपूर सम्मान देकर पड़ोस से लौटने के उपरान्त विवाहोत्सव में जाने की जैसे इच्छा ही समाप्त हो गयी ... मगर हाय रे सामाजिकता ..फिर तैयार होना पड़ा बेमन से ..कपडे आदि ऐसे पहने गए जैसे कवच और शिरस्त्राण वगैरह का बोझ शरीर पर आन पड़ा हो .....

विवाह लड़के का था ..खूब आवाभगत और खाने पीने का पुख्ता प्रबंध था ..लड़के के पिता ठहरे अपने जिगरी दोस्त ही ....तुरंत खाने की पेशकश होने लगी ...अब क्या बहाना बनाऊं....खुशी के मौके पर यह कैसे कह दूं कि तेरहवीं   का खाना खाकर आया हूँ ...अब हर जगह सच बोलना भी कोई  जरुरी तो नहीं ....अनावश्यक सच तो कतई नहीं ....अब ब्रह्मभोज के अवसर पर भी कैसे कह सकता था कि आज ही एक विवाह का भी निमंत्रण है इसलिए खाना तो वहीं खाऊंगा ....नहीं बोला जाता न ऐसा...वे क्या सोचते ..मिश्रा जी भी कैसे आदमी हैं ..अब भाई, बद अच्छा बदनाम बुरा!अब बदनामी? ..न बाबा न ...

अब सामाजिकता का तकाजा देखिये की दोनों जगह खाना  खाकर लौटना पड़ा है ....लोकाचार के उल्लंघन का दोष हुआ सो अलग ..पता नहीं कैसे निकार हो सकेगा उसका .....सच है मन  भले न दस बीस होता हो पेट जरूर दस बीस हो सकते हैं ......


 *भर्तृहरि के एक प्रसिद्ध श्लोक का अंश!
पूरा श्लोक यूं है -
क्वचिद विद्वत गोष्ठी ,क्वचिद सुरमात्त कलहः
क्वचिद वीणा नादः क्वचिदपि च हाहेति रुदितम 
क्वचिद रम्या रामा ,क्वचिदपि ज़रा जर्जर तनु 
नजाने संसारे किममृत्मय: किम विषमयः 
(कवि ने इस विरोधाभास् पूर्ण जगत /जीवन पर विस्मयपूर्ण  कटाक्ष सा किया है -
कहीं तो विद्वान् विमर्श रत हैं तो कहीं सुरा मद से मत्त कलह का दृश्य है ,कहीं उत्सवपूर्ण 
वीणा की ध्वनि गूँज रही है तो कहीं कारुणिक रुदन है ,कहीं तो रमणीय काया है तो कहीं ज़रा -जर्जर शरीर !
कवि का विस्मयपूर्ण प्रेक्षण है कि इस संसार में क्या अमृत मय और क्या विषमय है ? ) 
मूल श्लोक में और अर्थ निष्पत्ति में त्रुटि संकेत के लिए विद्वानों,खासकर अरुण प्रकाश जी का आह्वान है!उन्होंने अपने संग्रह से मुझे इस चिर अनुसंधानित श्लोक को नोट कराया था ! )



27 टिप्‍पणियां:

  1. कोई बात नहीं. दोनों ही बातें ज़रूरी हैं अपनी अपनी जगह, सोचना कैसा.

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  2. सही किया...
    हमारे यहाँ बिहार में एक कहावत है....."हाथ सूखा बाभन भूखा"...
    मेरे बारे में भी लोग यही कहा करते हैं.....
    चलिए निर्वाह अच्छे से हो गया सामाजिकता का...

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  3. वाह रे पंडित जी पहले तो आपकी बेबाकी से किये गए भोजन की स्वीकारोक्ति को सादर नमन
    जिसे आपने सामाजिकता का निर्वाह बताया है वाह और कुछ नही केवल जिव्हा व रसना के परम भक्ति भाव को दर्शाता है
    अब इस उम्र में मथुरा के चौबे वाली परंपरा का निर्वाह न करे रसना की बात ना सुने पेट की बात माना करे यह कोई जरूरी तो नहीं की ज्ञान का उपासक व जिज्ञासु इस सीमा तक अन्नपूर्णा का भक्त व रसेंद्रियो का भी जिज्ञासु निकल जाए
    अब समझ में आ गया कि आखिर इतने प्रकार के विचार व लेख आपके दिमाग में कहाँ से आते है निश्चित रूप से वे पेट के रास्ते से ही आते होंगे
    आपने पंडितो की सहज भोजन परायणता का अच्छा चित्रण व निर्वाह दोनों किया है
    माँ अन्नपूर्णा आप पर अपनी कृपा बनाए रखे तथा आपकी जठराग्नि प्रदीप्त रहे यही माँ से प्रार्थना है
    आमीन

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  4. कथांत से लगता है कि सुब्रमनियन जी का पर्यवेक्षण शत प्रतिशत सत्य है :)

    बहरहाल द्वि-भोज के उपरान्त के घटनाक्रम पर कथा का मौन कौतूहल का विषय है :)

    भोज आयोजक अनजाने ही एक दर्शन उदघाटित कर जाते हैं कि मृत्यु और विवाह ( दोनों ही घटनायें ) नवजीवन में प्रवेश और 'आनंद कारज' हैं !

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  5. @अरुण जी ,
    समझ रहा हूँ ब्रह्म ईर्ष्या हो रही है न :) प्रभु इस ब्रह्म तेज को संभालो ,डर लगता है!
    @अली सा ,
    मौके के अनुरूप और औचित्यपूर्ण कितना अच्छा शब्द चुना है आपने -
    द्वि -भोज =दो बार भोज और ब्राह्मण (द्विज ) द्वारा किया गया भोज ...
    बाकी लोग भले और शब्दार्थ निकालें द्विज शब्द का सही व्युत्पत्ति .बोध मुझे आज ही हुआ
    जो लगभग एक ही समय दो बार भोजन कर सके वही द्विज है .....असली ब्राह्मण !

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  6. ब्राह्मणों ने तो फिर भी भोजन की सीमा बांध रखी है। उधर कई परदेसी गोरों को खाते देखा है। दिन भर कुछ न कुछ चरते रहते हैं, फिर भी बेचारों को भारत का सुस्वादु भोजन कहाँ नसीब?

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  7. कई बार विवाहों में ऐसा हुआ है, बस एक पकवान खाकर निकल लेते हैं हर जगह। आजकल डाइटिंग में लोग इतना कम खा रहे हैं कि उनके बीच खपा जा सकता है और सामाजिकता का निर्वाह भी किया जा सकता है।

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  8. आप भी धन्य हैं महाराज ! एक ओर सामाजिकता के निर्वाह में दुविधा का चित्रण, दूसरे अपनी भोजन भट्टता का और तीसरे जीवन के विरोधाभासों का भर्तृहरि के श्लोक द्वारा उद्घाटन एक साथ. भर्तृहरि ने तीन शतक लिखे हैं. और उनका 'नीति शतक' मैंने पूरा पढ़ा है. 'श्रृंगार शतक' और 'वैराग्य शतक' नहीं पढ़ा है. उपर्युक्त श्लोक संभवतः वैराग्य शतक का है.
    अरुण प्रकाश जी की एक उक्ति सटीक लग रही है "अब समझ में आ गया कि आखिर इतने प्रकार के विचार व लेख आपके दिमाग में कहाँ से आते है निश्चित रूप से वे पेट के रास्ते से ही आते होंगे" :-)

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  9. अभूतपूर्व लेख लिखा है आपने अरविन्द जी!

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  10. चलिए कोई खास बात नहीं है,मैं ऐसे कई लोंगो से परिचित हूँ जिनसे अक्सर यह होता है और खास बात यह कि उनमें कोई अपराध बोध भी नहीं होता.

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  11. बढ़िया प्रसंग. ऐसे मौके पर जो उचित लगा वह आपने किया.

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  12. नेताओं और सरकारी अफसरों के लिए द्विभोज (अली जी से साभार उधार लिया गया ) आम बात है ! मगर इसे इस उदारता से स्वीकार/बयान करना सबके लिए संभव नहीं !

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  13. सही है सामाजिक निर्वाह आवश्यक है ..आपने ठीक ही किया.

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  14. तटस्‍थ भाव से ग्रहण करते रहें, स्‍वस्‍थ्‍य रहें.

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  15. अब सामाजिकता का तकाजा देखिये की दोनों जगह खाना खाकर लौटना पड़ा है ....लोकाचार के उल्लंघन का दोष हुआ सो अलग ..पता नहीं कैसे निकार हो सकेगा उसका ....

    चिंता ना किजिये, यही द्वैत है. आपने इस प्रसंग के जरिये द्वैत को बहुत ही उत्कृष्ट्ता से अभिव्यक्त किया है जो आपके हि बस की बात है. बहुत ही बेहतरीन.

    रामराम.

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  16. चलिए दोनों जगह सामाजिकता का निर्वाह कर ही लिया आपने. :)

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  17. भाई मिस्र जी , लोकाचार का तो पता नहीं , किन्तु भोजन का अनादर कहीं नहीं करना चाहिए ।
    वैसे भी एक बुजुर्ग की मौत को हमारे यहाँ तो शोक से नहीं ख़ुशी से मनाया जाता है । लड्डू खिलाये जाते हैं । स्वर्ग सिधारने पर ग़म किस बात का ?

    हां एक ही टाइम पर दोनों भोज अवश्य परेशानी में डालने वाली बात है ।

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  18. शायद ऐसे ही अवसरों के लिए कहा गया है - "अप्रिय सत्य न बोलो". सामाजिकता के निर्वहन में शरीर को तो कष्ट उठाना पड़ ही जाता है.

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  19. क्वचिद विद्वत गोष्ठी ,क्वचिद सुरमात्त कलहः
    क्वचिद वीणा नादः क्वचिदपि च हाहेति रुदितम
    क्वचिद रम्या रामा ,क्वचिदपि ज़रा जर्जर तनु
    नजाने संसारे किममृत्मय: किम विषमयः

    (कवि ने इस विरोधाभास् पूर्ण जगत /जीवन पर विस्मयपूर्ण कटाक्ष सा किया है -
    कहीं तो विद्वान् विमर्श रत हैं तो कहीं सुरा मद से मत्त कलह का दृश्य है ,कहीं उत्सवपूर्ण
    वीणा की ध्वनि गूँज रही है तो कहीं कारुणिक रुदन है ,कहीं तो रमणीय काया है तो कहीं ज़रा -जर्जर शरीर

    ....True !!


    Arvind K.Pandey

    http://indowaves.instablogs.com/

    http://indowaves.wordpress.com/

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  20. पंडित जी! अब शादी में कौन पूछता है कि आप कहीं तेरहवीं का भोजन करके तो नहीं आ रहे, अतः झूठ बोलने से भी बच गये आप.. हाँ मन से झूठ बोलने पर तो कोई नियत्रण नहीं..
    जब कॉमन मेन्यू हो तो हमलोग अलग अलग बाँट लेते थे, बड़ा वहाँ चाला जाये और छोटा उनके यहाँ.. लेकिन जब दो बार खाना पेट अफोर्ड करता है तो क्यों बेचारे को दबाना!! अच्छा रहा यह भी!!

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  21. आपने तो दो जगह भोजन ही किया.
    लोग आजकल पता नहीं क्या क्या खा रहे हैं, कितनी जगह खा रहे है और पचा भी रहे हैं.

    बढ़िया आलेख.शुभ कामनाएं.

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  22. होना यह चाहिए कि हम अपनी परम्परा में बदलाव लाएं। मृतक के घर दसवें और तेरहवीं जैसे अवसरों पर अपनी संवेदना और सहानुभूति व्यक्त करे और मृतकभॊज की प्रथा ही छोड दें। अकसर यह देखा गया है कि मृतक के परिवार वाले मृतक की सेवा में पिसे जाते हैं और उसके मरने के बाद इन सामाजिक ढकोसलों में।

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  23. शादी मे तो सब के यहां भोज बनता हे, लेकिन किसी के गुजरने पर? जी जब मेरे पिता जी ओर फ़िर मां गुजरी तो मैने हलवाई को घर बिठाया ओर करीब डेढ सॊ लोगो का खाना दोनो बार बनवाया, कारण जो लोग दुर से आये थे, उन के लिये तो खाना जरुरी था, फ़िर आसपडोस वालो ने भी हम सब का साथ दिया इस दुख की घडी मे तो क्या सब भू्खे ही जाये, बस ओर कोई कारण नही हो सकता, ओर इस भोज मे खुशी नही होती एक दुसरे का ख्याल रख कर एक सुबिधा के तॊर पर बनाया जाता हे, जिन पडोसियो ने हमे कई दिन तक खिलाया क्या हम उन्हे धन्यवाद के तॊर पर एक बार खाना नही खिला सकते?

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  24. सामाजिकता का निर्वहन करना सच में कितना ज़रूरी लगता है..... सामाजिक जीवन में विरोधाभासों की कोई कमी नहीं......

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  25. आपकी ऐश है, आपकी संगति में बिगड़ने के पूरा खतरा है ....
    मुझे नहीं मोटा होना :-))
    मैं तो चलूँ ...)

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  26. कोई बात नही खा लिया तो खा लिया हमने कौन सा देखा था आपको। सुबझमनियम जी ने सही कहा है अब हमे भी पता चल गया। बधाई।

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