सोमवार, 19 अप्रैल 2010

किताबें मिली ,कुछ पढ़ीं कुछ अधपढ़ीं !

मेज पर कुछ किताबें पडी हैं ..मतलब पूरी तरह पढी नहीं जा सकी हैं ..पढ़ ली गयी होतीं तो  अब तक शेल्फ में पहुँच चुकी होतीं ...विषय भी काफी डाईवेरसीफायिड है -वैदिक सूक्त संग्रह से लेकर आधुनिक  कविता संग्रह तक ....इनमे सभी में से कुछ न कुछ पढ़ चुका हूँ .मगर पूरा अभी तक कोई भी नहीं कर पाया ...उत्तरवर्ती दिनों में मेरी यह गंदी आदत होती गयी है कि कई जगह मुंह मारने लगता हूँ जबकि एक समय में एक ही जगह (इसे किताब और केवल किताब  के सन्दर्भ में समझा जाय ) ध्यान देना ज्यादा उचित है.मगर एक पुस्तक प्रेमी -बिब्लियोफाईल  ही समझ सकता है कि पुस्तकों का टेम्पटेशन ऐसा ही होता है जो बहुत परेशान   करता है...नई रूप कलेवर में मनमाफिक कोई नई आई नहीं की बस मन उधर ही ललक उठता  है ..... कंट्रोलै नहीं होता .........ऐसा ही कुछ गुजर रहा है इन दिनों इधर ....एक साथ कई किताबों पर ध्यान गड़ा दिए हैं और मगर  कोई पूरी होती नहीं दिख रही हैं .

सीमा गुप्ता जी की विरह के रंग का अपना ही शेड्स है ..उनकी कवितायें विरह की पीड़ा को मुखर करती हैं -विरह जो श्रृंगार का ही एक अनिवार्य और अविभाज्य पहलू है ...सीमा जी कहती हैं कि सुख तो सभी का दुलारा है -दुःख आखिर क्यूं अलग थलग गुमसुम  सा रहे -तो मैंने उसे ही अपना लिया है अपनी कविताओं में ...विछोह का दुःख .... विरह  का दुःख ,अपनों के पराये होते जाने का दुःख ..सर्वं दुखमयम जगत ....तो फिर दुःख से कोई दूरी क्यूं ? दुःख तो अपना साथी है ....अभी कुछ कवितायेँ ही पढ़ सका हूँ ,इस कुशल शब्द शिल्पी की रची हुई  रचनाएं जिसमें विछोह के  भावों को तराश तराश कर संगमरमरी सौदर्य दे दिया  है रचनाकार ने अपने इस पहले कविता संकलन में! पूरी पढने के बाद  ही यह टेबल से हट पायेगी!

 रीडिंग टेबल पर पडी किताबें 

फिर है मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर एक  पुस्तक  -जिसे बनारस के सरयूपारीण परिषद् की आमुख पत्रिका वैदिक  स्वर के एक विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया गया है -यह रामके ऊपर कई बेहतरीन लेखों का संकलन है -लेखकों में राम मनोहर लोहिया भी हैं और विद्यानिवास मिश्र भी ...राम का सीता  -परित्याग,बालि वध सरीखे प्रसंगों की मीमांसा हुई है -और बहुत तार्किकता के साथ लेखकों ने अपने पक्ष प्रस्तुत किये हैं -मित्र के लिए राम छल कपट भी कर देते हैं -बालि जो रावण से भी बड़ा और पराक्रमी योद्धा था इतनी आसानी से मरने वाला नहीं था  -रावण को ही मारने में राम की सब गति दुर्गति हो गयी -तब बालि से सीधे उलझना ठीक नहीं था और उसके पास  प्रतिद्वंद्वी के बल को आधा कर देने का वरदान /हुनर भी था .और सीता के निर्वासन के भी विवेचन प्रभावित करते हैं -इन पर फिर कभी विस्तार से चर्चा .

फंडामेंटल्स ऑफ़  माडर्न अस्ट्रोनोमी विज्ञान प्रसार दिल्ली का प्रकाशन है जिसे वहीं के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ .सुबोध मोहंती ने लिखा है .यह आधुनिक ज्योतिर्विदों की जीवनी और कृतित्व पर एक अच्छी किताब है मगर बहुत ज्यादा समय की मांग करती है अवगाहन का -इसे आद्योप[अंत पढने का मतलब है कई ब्लॉग पोस्टों पर टिप्पणियों के समय को यहाँ स्वाहा कर देना ..देखते हैं ऐसा दुर्योग /सुयोग कब बन पाता है .

वैदिक सूक्त संग्रह गीताप्रेस की है और मुझे बहुत ल्योर/टेम्प्ट  कर रही है -सूक्त एक ही अर्थ -भाव प्रकृति वाले कई मन्त्रों के समूह  को कहते हैं -पंचदेव सूक्त में लोक जीवन में प्रथमपूजा के अधिकारी गणेश  का स्तवन सहज ही ध्य्तान आकर्षित करता है =
श्रीगणपति-स्तवन
“ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम्।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः श्रृण्वन्नूतिभिः सीद् सादनम्।।”   (ऋग्वेद २।२३।१)
(हे अपनी गणों में  गणपति (देव) ,क्रान्तिदर्शी कवियों में श्रेष्ठ कवि ,शिव -शिवा के प्रिय ज्येष्ठ पुत्र ,अतिशय भोग और सुख आदि के दाता आप हमारी स्तुतियों को सुनते हुए  यहाँ विराजमान हों .....) मैंने तो अपनी ओर से गणेश का आहवान कर दिया है और उनकी कृपादृष्टि के आकांक्षी हैं .
..
इस वैदिक सूक्त -संग्रह से चयनित मन्त्रों को यहाँ भी समय समय पर जरूर प्रस्तुत करूंगा! अब आज्ञां दें ताकि मैं इन पुस्तकों का पारायण कर सकूँ अन्यथा ये अधपढी ही  रह जायेगीं !


दावात्याग:प्राप्त पुस्तकों की यहाँ समीक्षा नहीं की गयी है ...

27 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. ओह हमारी तो टेबल पर हमेशा किताबों का कब्जा रहता है। कानून के साथ इतर पुस्तकें भी। फिर एक दिन उन सभी को अलमारी में भेज दिया जाता है। जब वक्त मिलता है फिर निकाल लेते हैं। अभी जब बाहर गया तो दो पुस्तकें साथ ले गया था। दोनों बहुत पहले की पढ़ी हुई थीं। उन में से एक को फिर से पढ़ गया। ऐसा लगा जैसे पहली बार पढ़ रहा हूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. "Vakratunda mahakay, suryakoti, samaprabha,
    Nirvighnam kurumedev, sarvkaryeshu sarvada."

    wish you speedy completion of the unfinished books, so that you can spare some time in continuing with this post.

    Looking forward for the next episode of this post.

    Best wishes.

    उत्तर देंहटाएं
  4. विरह के रंग- पढ़ने में ही मैं भी व्यस्त हूँ. हर रचना रोकती है..इसलिए बहुत धीमी गति से पढ़ी जा रही है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत बढिया, "विरह के रंग" सीमा जी बहुत श्रेष्ठतम रचनाओं का संकलन है जो बार बार पढने को उत्प्रेरित करता है. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम

    उत्तर देंहटाएं
  6. कहाँ से लायें समय इन किताबों के लिए ।
    वैसे पढना एक अच्छी आदत है।

    उत्तर देंहटाएं
  7. जब भी कि‍ताबें सहेजता हूँ ऐसे ही भावुक हो जाता हूँ।

    उत्तर देंहटाएं
  8. अच्छी प्रस्तुति...पुस्तकें सच में मन को आकर्षित करती हैं....

    उत्तर देंहटाएं
  9. आप अपनी पुस्तकों को पढनें के लिए समय निकल पा रहें है यह बड़ी बात है,वरना ब्लाग पर अवतरण के बाद यह स्वप्न सरीखा है.

    उत्तर देंहटाएं
  10. किताबों को लेकर मेरी दीवानगी भी कुछ-कुछ ऐसी ही है. जहाँ अपने मन की किताब देखी खरीद लिया. कुछ किताबें मेरे पास भी आधी पढ़ी रखी हैं, निपटा नहीं पा रही हूँ...कारण बहुत से हैं. इन पुस्तकों में प्रमुख हैं-- The Argumentative Indian by Amartya Sen, The Position of Women in Hindu civilazation by A.S. Altekar, The History of Civilization in India by R.C. Dutt etc. इन सबके कुछ चैप्टर पढ़े हुये हैं.
    मेरी आपको सलाह है कि वैदिक सूक्त संग्रह केवल बाँचे ही नहीं...मंत्रों की व्याख्या करने वाली किसी पुस्तक का जुगाड़ कर लें तब पढ़ें. क्योंकि वैदिक मंत्रों की अलग-अलग सैकड़ों व्याख्याएँ की गई हैं. वैसे तो गीताप्रेस की पुस्तकें अच्छी होती हैं, पर ये वाली कौन से राइटर की है, नहीं मालूम.
    और चिन्ता मत कीजिये आपके इस कथन और उसके स्पष्टीकरण को हम वैसे ही समझ रहे हैं जैसा आप कह रहे हैं---"उत्तरवर्ती दिनों में मेरी यह गंदी आदत होती गयी है कि कई जगह मुंह मारने लगता हूँ जबकि एक समय में एक ही जगह (इसे किताब और केवल किताब के सन्दर्भ में समझा जाय ) ध्यान देना ज्यादा उचित है."

    उत्तर देंहटाएं
  11. अब हमारे पास समय नही है, पांच दस साल बाद देखे गे, लेकिन आप ने बहुत सुंदर लिखा

    उत्तर देंहटाएं
  12. सभी किताबें अच्छी हैं ,पूरी पढ़ लिजीये फिर समीक्षा में सार बताएं..

    उत्तर देंहटाएं
  13. लगातार अच्छी किताबें पढ़ रहे हैं आप और उसका असर भी नजर आ रहा है ....

    @ चिन्ता मत कीजिये आपके इस कथन और उसके स्पष्टीकरण को हम वैसे ही समझ रहे हैं जैसा आप कह रहे हैं--
    हम भी ...:)

    उत्तर देंहटाएं
  14. @ चिन्ता मत कीजिये आपके इस कथन और उसके स्पष्टीकरण को हम वैसे ही समझ रहे हैं जैसा आप कह रहे हैं------

    Laakh koshih ke baad bhi dil 'kitaabon ke paripekshya" mein baat samajhne ko tayyar nahi.

    Hey hey hey Chillax !

    I'm just kidding...Okay?

    उत्तर देंहटाएं
  15. किताबें पढ़ना और इतनी अच्छी तरह से पढ़ना की उस पर कुछ लिखा जा सके --बहुत बड़ी बात है।

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत किताबें सहेज कर रखें है...जब किताबें ज़्यादा और बढ़िया से बढ़िया होती है तो वास्तव में चयन बड़ा मुश्किल होता है..बढ़िया चर्चा..

    उत्तर देंहटाएं
  17. @ किताबें पढने और मुंह मारने जैसी दो अलग बाते हैं ...किताब में सम्बन्ध में ऐसे शब्द उनके प्रति श्रद्धा का भाव नहीं जगा सकते ...और जब मन में किताबों के प्रति श्रद्धा और सम्मान ही नहीं हो तो लाख अच्छी से अच्छी किताब पढ़ ली जाए ... विचारों को शुद्ध नहीं कर सकती ..क्यूंकि शुद्धता , श्रद्धा और सम्मान अंतर्मन और इंसान की प्रवृति पर निर्भर करता है ...किताबों पर नहीं ...

    दुबारा पढ़ी आपकी पोस्ट तो लगा कि पहला कमेन्ट पर्याप्त नहीं था ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  18. Kitabon se aisa prem mujhe bhi virasat me mila hai ...nisandeh aapke swadhyaay ka gyaan ham tak bhi pahunchega..!!

    Aapke snehashish ki bahut bahut aabhari hun in dino vyastata is kadar bad gai hai ki sakriyata banaae rakhana mushkil ho gaya hai ...lekin aapka anuraag aur aashish khich hi laya :)

    उत्तर देंहटाएं
  19. वाणी जी ,
    आप जैसे शुद्धतावादियों के लिए वह पोस्ट नहीं थी -वह हम जैसे मृतकों के लिए थी जिनकी जगहें नरक में आरक्षित हो चुकी हैं -हमें स्वर्ग की ख्वाहिश नहीं है ...ना स्वर्गम ना पुनर्भवं....

    उत्तर देंहटाएं
  20. किताबे तो साथ ही रहती है मेरे भी ..यही एक ऐसी आदत है जो जाते से भी नहीं जाती ...समीक्षा का इन्तजार रहेगा शुक्रिया

    उत्तर देंहटाएं
  21. काश , मुझे भी बिब्लियोफाजी का शौक होता !!!

    उत्तर देंहटाएं
  22. @अमरेद्र ,
    अपुन के मुलक में महज लफ्फाजी चले है -!

    उत्तर देंहटाएं
  23. जब कभी अकेले रहना होता है तो बिस्तर पर पुस्तकें पसरी होती हैं और उन्हे सरका कर सोने की जगह बनानी होती है। :)

    उत्तर देंहटाएं
  24. आपकी ये पोस्ट आज ही देखी, हैरान हूँ केसे रह गयी.......अपने काव्य संग्रह को आपकी टेबल पर देख कर गर्व महसूस कर रही हूँ , बहुत बहुत आभार दिल से की आपने मेरी इस पुस्तक को यहाँ और वहां दोनों जगह स्थान दिया
    regards

    उत्तर देंहटाएं
  25. आपकी ये पोस्ट आज ही देखी, हैरान हूँ केसे रह गयी.......अपने काव्य संग्रह को आपकी टेबल पर देख कर गर्व महसूस कर रही हूँ , बहुत बहुत आभार दिल से की आपने मेरी इस पुस्तक को यहाँ और वहां दोनों जगह स्थान दिया
    regards

    उत्तर देंहटाएं

यदि आपको लगता है कि आपको इस पोस्ट पर कुछ कहना है तो बहुमूल्य विचारों से अवश्य अवगत कराएं-आपकी प्रतिक्रिया का सदैव स्वागत है !

मेरी ब्लॉग सूची

ब्लॉग आर्काइव