मंगलवार, 24 नवंबर 2009

प्रेमातुर नायिका है अभिसारिका!(नायिका भेद -९)

किसी निश्चित समय और स्थान पर प्रियतम से मिलने के लिए जाने वाली प्रेमातुर नायिका अभिसारिका है !चित्रकारी के संदर्भ में  एक प्रासंगिक विवरण जो नेट पर भी मौजूद है इस प्रकार  है -
"अभिसारिका ऐसी नायिका है जो किसी भी जोखिम की परवाह न करते हुए अपने प्रेमी से मिलने निकल पड़ती है। उसे विभिन्न कवियों ने अलग-अलग नाम दिया है। पहाड़ी (हिमाचली) कलाकारों का वह प्रिय विषय रही है। कृष्ण अभिसारिका और शुक्ल अभिसारिका दो तरह की नायिकाएँ हैं जो चांद की स्थिति के अनुसार कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष के दौरान अपन प्रेमी से मिलने निकलती हैं। एक आकर्षक चित्रकारी में कृष्ण अभिसारिका ने नीला दुपट्टा ओढ़ रखा है और वह रात में अकेली जा रही है। अंधेरी रात है और बादल छाए हुए हैं और रुक रुककर बिजली चमक रही है। जंगल में सांप हैं और भूत-पिशाच तथा डाइनें घूम रही हैं। जंगल के भय से बेखौफ- तूफान, सांपों, अंधेरों के आतंक की तनिक भी परवाह न करते हुए नायिका प्रेमी के प्रति जनून लिए उसकी तलाश में निकल पड़ी है।" 




-वाह ,ऐसी नायिका की हिम्मत के क्या  कहने !निर्भय ,सापो से भी घिरी मगर  कितना समर्पित है वह अपने प्रेम और प्रियतम के प्रति ! राकेश गुप्त ने ऐसी नायिका की तारीफ में कुछ पंक्तियाँ यूं लिखी हैं ...
दो उन्नत उरोज आतुर थे
आलिंगन में कस जाने को ;
फड़क रहे अधरोष्ठ पिया के 
प्रियतम के चुम्बन पाने को ;
चंचल थे पद चक्र  कामिनी -
अभिथल तक पहुचाने  को  ;
तन से आगे भाग रहा मन 
मनमोहन में रम जाने को 


अभिसारिका जैसी  स्थितियां सामन्यतः अनूढा और परकीया में ही दृष्टव्य हैं .राधा का कृष्ण प्रेम  परकीया ही है!
चित्र सौजन्य :स्वप्न मंजूषा शैल  

 


17 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर! अभिसारिकाएँ न हों तो पृथ्वी पर मानव जीवन शेष हो जाए।

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  2. नायिका भेद की क्षृंखला का यह भाग भी रोचक लगा.

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  3. राकेश गुप्त जी भी खूब लिख गये.

    रोचक!!

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  4. जहाँ उत्कट-विकट प्रेमोन्माद वहां कहाँ भय किसी भी वन्य, अरण्य अथवा जन का...!!!

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  5. यह जानकारी भी रोचक लगी अब आगे क्या होता है.....देखते हैं..!!

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  6. राधा भी अभिसारिका थी ...रोचक जानकारी ...!!

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  7. यह ठीक है कि नायिका प्रिय से निर्भय हो निकल पड़ती है, पर प्रतिकूलताओं में उसके पास एक और भी अस्त्र है, नायक को ही अपने पास बुला लेना - अभिसारिका के लक्षण तो यूँ रहे -
    "जो मन्मथ पीड़ित हो प्रिय के पास स्वयं ही जाती
    या उसको निज पास बुलाती अभिसारिका कहाती ।"

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  8. क्या बात है ....वाह .... रोचक ....
    सोचें तो... अभिसारिका विभाजन में निगोड़ा चाँद भी आ गया ...अहिल्या - प्रेमी कहीं का !
    भैया ! उदहारण खोजने लगा तो लिंगेतर हो बैठा और 'तुलसीदास' याद आ गए ...
    यानी ... मुर्दे की नाव ... सांप की रस्सी ... आदि-आदि ...
    इनकी भी कोई समान्तर- कोटि बनाइये न !
    दिलचस्प ... ...

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  9. ब्लॉग जगत का श्रंगार साहित्य बढ़ रहा है इसी बहाने।
    इस शमा को जलाए रखें।

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  10. वाह ! ये पोस्ट संभवतः इस श्रृंखला की सबसे बढ़िया पोस्ट लगी.

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  11. सोहनी ने कच्चे घडे के सहारे नदी पार करने की चेष्टा की थी॥

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  12. अरविन्द जी मैं प्रस्तुत हूँ अपनी टिप्पणी लेकर. अभिसारिका नायिका के विषय में दशरूपककार की निम्नलिखित कारिका है -"कामार्ताऽभिसरेत्कान्तं सारयेद्वाऽभिसारिका" अर्थात्‌ जो नायिका कामपीड़ित होकर या तो स्वयं नायक के पास अभिसरण करे, या नायक को अपने पास बुलाये, वह अभिसारिका कहलाती है. इसके उद्धरण में उन्होंने अमरुकशतक का एक पद्य दिया है, जिसमें नायिका की उत्सुकता, भय, रोमान्च आदि का वर्णन किया है. अभिसारिका नायिका के वर्णन के प्रसंग में प्रेम में डूबी(दीवानी) स्त्री के मनोभावों का बड़ा ही सुंदर चित्रण संस्कृत के कवियों ने किया है. मुझे इनमें सबसे रोचक (romantic) "मृच्छकटिकम्‌" में वसन्तसेना का चारुदत्त के प्रति अभिसरण का लगता है.
    अभिसरण निस्सन्देह परकीया नायिका का ही होता है क्योंकि छुप-छुप के मिलने तो वही जायेगी. स्वकीया(पत्नी) को छुपकर मिलने की क्या आवश्यकता?
    नायक के इस प्रकार छुपकर मिलने के भी प्रसंग संस्कृत-साहित्य में है, पर उसे अभिसरण नहीं कहा जाता. इसी पक्षपात पर मुझे गुस्सा आता है.

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  13. प्रगल्भित प्रस्तुति ..सचमुच आप विषय की अधिकारी विद्वान् हैं ..आपसे बहुत कुछ नया जाने को मिल जात है ! आभार !

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