मंगलवार, 10 नवंबर 2009

आज बात संयुक्ता की ( (नायिका भेद )

आईये रस परिवर्तन किया जाय ! विरह के बाद श्रृंगार के संयोग का भी तो आनंद लिया जाय !
जी हाँ ,आज बात संयुक्ता की -


" चुपके से  प्रियतम की आँखों  को पीछे से आ ढँक लेने के बहाने प्रिय से आ लिपटी बाला ...... .फिर उसने मादक अंगडाई ले अपने अनुपम अंगों को दिखला डाला ......... प्रियतम ने तब   भेद भरी  बातों  मे  सहसा इक  आग्रह कर डाला........ . शर्म से हुई छुईमुई बाला ने हँस कर  बात को टाला .........  अगले ही पल  बाला ने गले में प्रीतम के  डाली बाँहों की माला "...........






यह संयुक्ता नायिका है ! प्रिय  आलिंगन में आबद्ध !आह्लाद और प्रेमोन्माद से भरी  हुई !

चित्र सौजन्य :स्वप्न मंजूषा शैल

15 टिप्‍पणियां:

  1. नटत के बाद का रिझन

    यकायक खिलियाब..

    मस्त श्रृंगारी प्रस्तुति ...

    आभार ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. ये …,,,,,, कह कर रूक जाना व अनुपम अन्गो क वर्णन कर फ़िर रूकना ऐसा लगता है कि नायिका की भान्ति आप भी सन्केतो मे ही कुछ दिखाना व कुछ छिपाना चाहते है ऐसी मजबूरी क्यो

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढिया प्रस्तुति-नायिका भेद पहचानना भी जरुरी है। "सौह करे भौहनि हंसे-दैन कहि नटि जाए"
    बार-बार -आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. श्रृंगार का सुंदर वर्णन ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. जीवन की निरंतरता की पूर्व तैयारी, अनुपम! अनुपम! अनुपम!

    उत्तर देंहटाएं
  6. लो जी, अब ऐसी बाला पर किस मुहम्मद गोरी का जी नहीं ललचाएगा:)

    उत्तर देंहटाएं
  7. लघु से अतिलघु हुए जा रहे हैं आप !

    उत्तर देंहटाएं
  8. @अभिषेक ,दरअसल लघुतम में जो महत्तम को देखता है ,वही देखता है !

    उत्तर देंहटाएं
  9. जारी रहिये...आगे इन्तजार है!!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. स्त्रियाँ कितनी चतुर होती हैं.........!!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. आज फुरसत में समस्त छुटे किस्तों को देख रहा हूँ...

    ये श्रृंखला ब्लौग-जगत में संग्रहणीय संकलनों में शुमार होने वाली है...

    उत्तर देंहटाएं
  12. दशरूपक में संयुक्ता नायिका के विषय में तो उल्लेख नहीं है, परन्तु स्वाधीनपतिका नायिका इसके समान ही है. स्वाधीनपतिका नायिका वह है जो अपने पति के स्वयं के समीप और अनुकूल रहने के कारण प्रसन्न रहती है. संयुक्ता नायिका का संस्कृत काव्यशास्त्र में वर्णन न करने का कारण मेरे विचार से यह है कि यहाँ नायिका-भेद रूपक(नाटक) के प्रसंग में किया गया है और संस्कृत नाटकों में नायक-नायिका के आलिंगन का मंचन निषिद्ध है.

    उत्तर देंहटाएं

यदि आपको लगता है कि आपको इस पोस्ट पर कुछ कहना है तो बहुमूल्य विचारों से अवश्य अवगत कराएं-आपकी प्रतिक्रिया का सदैव स्वागत है !

मेरी ब्लॉग सूची

ब्लॉग आर्काइव