सोमवार, 5 अक्तूबर 2009

पिता जी की अंतिम कविता !

आज पिता जी की पुण्य तिथि है ! बल्कि कहिये पुण्य दशाब्दि वर्ष ! देखते देखते दस वर्ष होने को आयें उनसे विछोह के ! उनके व्यक्तित्व के कई  शेड   थे   -तत्कालीन कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में श्री कल्याणमल लोढ़ा  और आचार्य विष्णुकांत शास्त्री जी के साहचर्य में विद्याध्ययन के बाद विगत शती के छठे दशक में वे गाँव क्या आये कि यहीं  गाँव के ही होकर रह गए ! उनकी रचनात्मक ऊर्जा कई दिशाओं में बिखरी -समाज सेवा ,साहित्य प्रणयन ,संगीत की धुन- इन सभी दिशाओं में उनकी दखल बनती गयी -मानस के अनन्य प्रेमी और रामकथा के प्रसार में पूरी तरह  रमे हुए ! क्या सरस्वती ,क्या धर्मयुग ,क्या दिनमान उनकी रचनाएं अपने युग की किन मशहूर पत्र पत्रिकाओं में नहीं  छपी -पर उन्हें चाकरी से एलर्जी थी ! हर कीमत पर स्वतंत्र होकर जिए ! किसी की भी छत्रछाया नहीं स्वीकारी -आज उनके उस उद्धत रूप और किसी मुद्दे पर हम बच्चों की मान मनौवल  और उनका अपने स्टैंड पर नुक्सान सह कर भी अडिग रहना आँखों में आँसू ला देता है !



जौनपुर जिले के अनेक राजनीतिक उच्च पदों को भी उन्होंने सुशोभित किया मगर एक एक कर सभी से त्यागपत्र भी देते गए ! मुझे उनका राजनीति में रहना कभी नहीं रास आया  -मैं आज  जानता हूँ कि राजनीति ने उनकी सृजनात्मक संभावनाओं को कमतर  किया -या यूं कहें कि कभी उन्होंने राजनीति से अनुचित लाभ नहीं लिए -नहीं तो जिस व्यक्ति का प्रशंसक भारत के तत्कालीन प्रधान मंत्री और आज भी कविता कर्म के मर्मग्य  अटल जी रहे हों और सहपाठी आचार्य  विष्णुकांत शास्त्री जी जो हिमाचल प्रदेश और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे हों और श्री माताप्रसाद  जी जैसे मित्र जो अरुणांचल प्रदेश के राज्यपाल रहे -कुछ जुगाड़ कर कहीं  का कहीं तो पहुँच ही गए होते  ! पर उन्हें जुगाड़ से सख्त नफरत थी ! वे मूल्यों की राजनीति करना चाहते रहे और धीरे धीरे राजनीति ने उन्हें खुद से अलग कर दिया !



पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो लगता है कि उनका मूल भाव, अंतस साहित्य को समर्पित था -यह उनकी मौलिकता थी ! संगीत  की उनकी पकड़  भी  एक मुकाम तक पहुँच चुकी थी -जब भी उद्विग्न होते और अक्सर होते ही हारमोनियम पर जम जाते ..सोलो ही - दो तीन  घंटे लगातार आत्मविस्मृत से ! संगीत उन्हें राहत देती थी ! मेरा उनका  जुडाव ख़ास तौर से साहित्यिक सृजनशीलता से था -वे बहुत अधयनशील / स्वाध्यायी रहे  ! वेल रेड ! मुझे गैर पाठ्यकर्म के लेखन की ओर उन्होंने ही उन्मुख किया -बल्कि ऐसा उनके सानिध्य में अपने आप हो गया ! मुझे याद है जब मेरी प्रथम पापुलर साईंस की  रचना "अथ ऊलूकोपाख्यानम" १९८८ के आसपास धर्मयुग में छपी तो वे अपने हित मित्रों को गर्व से सीना फुलाकर दिखाते फिरते रहे और मैं इम्बैरैस्मेंट से कोनो अतरों में छुपता रहा था ! यादे... यादें ...यादें ....उनका दैहिक अवसान अकस्मात और स्तब्धकारी था ! बिलकुल स्वस्थ .निरोग ,मोहक व्यक्तित्व के धनी तो वे रहे ही ५ अक्टूबर १९९९ को काल के क्रूर हाथों ने उन्हें सहसा हमसे छीन  लिया -हृदयाघात से एकदम अप्रत्याशित था उनका जाना -जब मैं भागकर घर पहुंचा था तो अपार जन सैलाब देखकर हतप्रभ था -उन्होंने जीवन भर रूपये पैसे नहीं आदमी कमाए और वही अपार जन समुदाय वहां रोता विलखता उपस्थित था ......

खैर इस वर्ष हम उनकी पुण्य स्मृति दशाब्दी मना  रहे -साल भर उनकी स्मृति में कई रचनात्मक कार्यों की रूप रेखा बन उठी है ! मेरे चाचा ( पिता जी के छोटे भाई ) नासा में वैज्ञानिक रह चुके डॉ सरोज कुमार मिश्र भी इस हेतु पधार रहे हैं -अगले माहों उनकी पुण्य दशाब्दी से जुडी रपट और उनकी कुछ रचनाएँ यहाँ भी आयेगीं ! वे एक श्रेष्ठ गद्य लेखक भी रहे -उनके चुनिन्दा लेख भी यहाँ मैं दे सकूंगा -मगर अभी तो उनकी अंतिम कविता जो उनकी मेज पर उनकी ही हस्तलिपि में एक कार्ड पर मिली थी मैं यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ -


.........अब दिन  लगा ढलने !
जन्म के साथ ज्योति जगी संभावनाओं की 
चाँद और तारों से भविष्य लगा सजने 
'बालू से भी तेल' के संघर्ष में दिन रीत गये 
कुछ नहीं  हाथ तो विवेक लगा जगने
आदि और अंत मध्य केवल प्रतीक्षा रही ,
सम्मोहन ,वशीकरण सिद्ध नहीं  सपने 
चुम्बकीय कामना के इन्द्रधनुष लुप्त हुए 
लौट चलो घर अब दिन लगा ढलने 

यह कुछ अनगढ़ सी कई जगह करेक्शन की हुई  कविता थी जो उनकी मृत्यु  के उपरांत  उनकी मेज पर पडी मिली , वे  इसे फेयर  भी नहीं कर पाए थे  ! शायद जाने का पूर्वाभास या यूं कहें कि जीवन की निस्सारता समझ आ गयी थी उन्हें !

35 टिप्‍पणियां:

  1. श्रद्धांजलि।
    जाने क्यों यह दोहा याद आ गया:
    'गोरी सोवे सेज पर मुख पर डाले केश
    चल खुसरो घर आपने साँझ भई चहुँ देस'
    ..
    ..
    कोई औलिया थे क्या उनके जीवन में ?

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  2. अरविंद जी, पिता जी ने इच्छित जीवन जिया। वे और भौतिक उपलब्धियाँ हासिल कर सकते थे। लेकिन उन्हों ने वही कीं जो उन्हें चाहिए थी। वे अपने आस पास से जुड़े थे। यह बहुत बड़ी बात थीय़ उन के बारे में आने वाली सामग्री की प्रतीक्षा रहेगी।

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  3. पिताश्री को सादर नमन. उनका जीवन हर मायने मे अनुकरणीय था. जो जीवन की जितनी गहरी समझ रखते हैं उनके लिये भौतिक पद, धन इत्यादि उतने ही गौण होते हैं.

    रामराम.

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  4. आदरणीय पिता जी को हमारी भी श्रद्धांजलि
    लौट चलो घर अब दिन लगा ढलने
    बेहद भावनात्मक स्तर पर मन को स्पर्श करते उनके ये अंतिम शब्द ना जाने क्या कह गये.....

    regards

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  5. पिताजी को विनम्र श्रद्धांजलि ...पिता का अचानक चले जाना किस तरह स्तब्ध और व्यथित कर जाता है ...शब्दों में नहीं बताया जा सकता ... उनकी इस अंतिम धरोहर कविता प्रस्तुत करने का बहुत आभार ..!!

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  6. पूज्य पिताश्री के बारे में जानकर अच्छा लगा । उनकी स्मृति को प्रणाम।

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  7. मेरी भी श्रद्धांजलि,आज मेरे भी बाबूजी की पुण्य तिथी है।

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  8. शायद जाने का पूर्वाभास या यूं कहें कि जीवन की निस्सारता समझ आ गयी थी उन्हें - मैं भी यही कहने वाली थी.


    ..विनम्र श्रद्धांजली.

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  9. पूज्य पिताश्री की रचना अच्छी लगी . पुण्यतिथि के अवसर पर श्रद्धांजलि और नमन करता हूँ .

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  10. 'उन्होंने जीवन भर रूपये पैसे नहीं आदमी कमाए और वही अपार जन समुदाय वहां रोता विलखता उपस्थित था '
    यह एक पंक्ति उनके प्रभावशाली और लोकप्रिय व्यक्तित्व का बखान कर रही है.
    दस वर्ष अवश्य हुए होंगे मगर स्मृतियाँ ताज़ा रहती हैं हमेशा ,जैसे कल ही की बात हो.
    unki likhi antim कविता kahti है की उन्हें भी पूर्वाभास हो गया था की अंतिम समय निकट है..
    unhen हमारा नमन और श्रद्धांजलि .

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  11. पूज्य पिताश्री को नमन. हमारी श्रद्धाजलि

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  12. हार्दिक श्रद्धांजलि। इस फर्स्ट हैण्ड कविता में भी कहीं अनगढपन नहीं झलकता।

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  13. "चुम्बकीय कामना के इन्द्रधनुष लुप्त हुए
    लौट चलो घर अब दिन लगा ढलने "

    शायद अंतिम पंक्तियाँ । त्यागमय, आदर्शमय जीवन के प्रतीक-पुरुष को यह अनुभव होना आश्चर्य कैसा ! एक अम्लान जीवन-साधना ।

    हमें प्रतीक्षा रहेगी, उनकी रचनाधर्मिता के उत्कृष्ट स्वरूपों की ।

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  14. जन्म के दिन फूल की थाली बजी
    दुख कटा , सुख के दिन आये.....

    ".........अब दिन लगा ढलने !"
    आज हमारे बीच नहीं हैं तो क्या हुआ.....
    एक कविता मेरी ओर से----

    नियति का खेल
    बड़ा अजीब होता है
    बच नहीं सकता है कोई इससे
    इस जगत में।
    जगत भी एक बगिया है
    ईश्वर इसका माली है
    इस बगिया का हर अच्छा पुष्प
    जिसे वह समझे........
    यह अपनी पूर्णता ओर है
    सभी पुष्पों में उसे सबसे पहले
    तोड़ लेता है
    उसके तोड़ने के पीछे
    संभव है पुष्प के विकृत होने से बचाने का भाव हो ।

    आप नहीं हो हमारे साथ
    आपका जीवन दर्शन तो है ......!

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  15. पिता जी को हमारी विनम्र श्रद्धान्जलि.

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  16. हर कीमत पर स्वतंत्र होकर जिए ! किसी की भी छत्रछाया नहीं स्वीकारी....

    उन्होंने जीवन भर रूपये पैसे नहीं आदमी कमाए ....

    बहुत उत्तम व्यक्तित्व के धनी....
    कविता के अद्भुत भाव को पकड़ते

    मेरा शत् शत् नमन है उन महान पुरुष को

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  17. अपनी शर्तों पर जीना भी एक बहुत बड़ी उपलब्धि होती है। आपके पिताजी को नमन!

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  18. उन्‍हें हार्दिक श्रद्धांजलि !!

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  19. विनम्र श्रद्धांजलि!
    कविता अच्छी लगी. "लौट चलो घर अब दिन लगा ढलने" से "चल खुसरो घर आपने" की याद आ गयी.

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  20. मिश्रा जी आप के पुज्या पिता जी को मेरी तरफ़ से श्रद्धांजली, जीना इसे ही कहते है, धन्य है आप के पिता,जो जिये तो शान से
    आप का धन्यवाद

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  21. लौट चलो घर अब दिन लगा ढलने \ पूज्य पिताजी की यह अंतिम पंक्तिया कितना कुछ कह देती हैं ।

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  22. पिता जी को हमारी भी श्रद्धांजलि..नमन !

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  23. बहुत मार्मिक अभिव्यक्ति. आदरणीय पिताजी के बहुआयामी प्रेरक व्यक्तित्व को नमन....मेरी तरफ़ से श्रद्धांजलि!!

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  24. उनसठ की उम्र तो जाने की नहीं होती। अच्छे लोग, न जाने, जाने की जल्दी में क्यों होते हैं?
    आपके पिताजी को मेरी दिल से श्रद्धांजलि।

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  25. अतयंत ही मार्मिक व संवेदनशील अभिव्यक्ति। पुत्र की भावभीनी श्रद्धांजलि पिता की दार्शनिक (जीवन का मर्म समझाती) कविता को 'काम्प्लीमेंट' सा कर रही है।

    "आदि और अंत मध्य केवल प्रतीक्षा रही" -- प्रभावी दर्शन। उनकी अन्य रचनायें पढने की आतुरता है।

    स्वप्निल

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  26. कल मैंने प्रतिक्रिया दी थी ... वो नहीं दिख रही है ?
    एक बार पुनः

    जो व्यक्ति आचार्य विष्णु कान्त शास्त्री और श्री माता प्रसाद जी जैसे विद्वानों के संपर्क में रहा हो, उनके व्यक्तित्व को सहज ही समझा जा सकता है !
    पूज्य पिताजी को नमन और हमारी श्रद्धांजलि !

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  27. श्रद्धांजलि!!!
    अतयंत ही मार्मिक व संवेदनशील अभिव्यक्ति.

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  28. आह...!

    उनकी अन्य रचनाओं की प्रतिक्षा रहेगी मिश्र जी।

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  29. पूज्य पिताजी के विराट व्यक्तित्त्व से
    परिचित करवाने के लिए, आपका आभार
    उन्हें मेरे श्रध्धापूर्वक - नमन -
    - आगे उनकी वाणी पढने की उत्कंठा रहेगी
    ना जाने क्यों,
    मुझे मेरे पापा जी की याद आ गयी ....
    सादर, स स्नेह,
    - लावण्या

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  30. पिता जी को हमारी श्रद्धांजलि ........मन को छूती हुयी उनकी रचना बहुत कुछ कह गयी .........

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  31. श्रद्धेय पिताजी उस निस्वार्थ पीढी के नेता थे जो अब स्मृतियों में ही हैं. आज के नेताओं से बिल्कुल अलग. वे कर्म से सिद्धांतवादी थे जबकि आज केवल वचन से. कोटि कोटि नमन.

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  32. इस एक कविता से ही उनकी साहित्यिक व मानसिक गहराई का अंदाजा हो रहा है. ऐसी महान हस्ती को विनम्र श्रद्धांजलि.

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