रविवार, 25 अक्तूबर 2009

ब्लागर उवाच -प्रयाग की चिट्ठाकारिता संगोष्ठी

बावजूद कुछ बदइन्तजामियों और बदतमीजियों के विचार स्पंदन की लिहाज से संगोष्ठी जीवंत बनी ! कई विचार बिंदु ऐसे आये कि बकौल मीनू खरे जी की "बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी " कुछ चिंतनशील ब्लागरों की आवाज थी कि एक 'इलाहाबाद घोषणा जैसा कुछ दस्तावेज जारी किया जाय ..मगर मैं चूंकि पहले निकल आया इसलिए पता नहीं कि ऐसी कुछ घोषणा हुई भी या नहीं ! खूंटे से बधे लोग बताएगें ही ! लेकिन मैं मुतमईन हूँ कि इलाहाबाद संगोष्ठी ब्लागजगत के इतिहास में याद जरूर की जायेगी -कई कारण हैं ! अराजकता और खुद को आडीयेंश पर लादने की प्रवृत्ति के बावजूद भी ब्लागरों ने बेलौस कई बातें ऐसी कीं जो आगे के विमर्शों की पूर्व पीठिका बन गए हैं !

 युवा ऊर्जा से लबरेज और सुदर्शन यशवंत अपनी भडास यहाँ सायास रोक लिए और अकस्मात स्वीकारोक्ति कर  पड़े -"हाँ मैं मानता हूँ कि सीमाओं का अतिक्रमण हुआ है ..मगर तब तक उनकी युवा चेतना फिर मुखरित हो आई ,रिबेलियन उबल पडा ,'कभी कभार सीमाओं का अतिक्रमण भी होते रहना चाहिए यह अभिवयक्ति की समग्रता के लिए जरूरी है  " मीनू  खरे जी ने पूरे जिम्मेदारी के बोध के साथ हमें अभिवयक्ति की आजादी की सीमा रेखाओं से परिचित कराया -संविधान गत प्राविधानों से अवगत कराया -कुछ सदाचार और नैतिकता के जरूरी  पाठ पढाये ! क्योंकि हम अपनी जमीन के कानून को जो नहीं तोड़ सकते ! उन्होंने कहा कि भड़काऊ बातें ,व्यक्तिगत प्रतिष्ठा ,मर्यादा और किसी के सम्मान को ठेस नहीं पहुचनी चाहिए! उन्होंने स्वनियमन की भी वकालत की !

बोधिसत्व ने कहा  कि हिन्दी बलाग जगत 'खाए पीये अघाए लोगों की अभिव्यक्ति  का माध्यम है ! और जिनके पास जाया करने को इफरात समय है ! उन्होंने यह भी कहा कि ब्लॉग बहस के उपयुक्त मंच नहीं हैं -वे बहस के लिए ब्लॉग मंच की जरूरत को सिरे से नकार गए ! अविनाश के व्यक्ति + तत्व को देख स्तब्ध रह गया -अगर किसी ने संचालक की ऐसी की तैसी की तो इसी  महनीय काया ने  -पीछे बैठ कर बार बार पोडियम हथियाने को चिग्घाड़ते  रहे -पोडियम पाए तो कुछ ख़ास बोल नहीं पाए ! अप्रस्त्तुत हो उठे मगर अनामियों का समर्थन करते गए ! विनीत ने ब्लॉग को वैकल्पिक मीडिया कहा मगर यह भी जोड़ा कि यहाँ माहौल खराब न किया जाय और यह भी कि बहसों की कोई निष्पत्ति नहीं हो पाती ! भूपेन्द्र ने बहुत ही सधे सहज और जोरदार तरीके से अपनी बात रखी -और चिट्ठों के नियमन के निहितार्थों की ओर भी  संकेत किया ! और यह सवाल भी उठाया कि क्या सचमुच ब्लॉग जगत "पीपुल्स   मीडिया " है ? आभा जी ने ब्लागजगत की गुटबंदी ,खेमेबाजी को आड़े हाथो लिया और यह भी स्वीकार किया कि यहाँ  सचमुच स्वस्थ बहस की कोई गुन्जायिश नहीं है ! मनीषा पांडे ने कंटेंट (अंतर्वस्तु ) की सुरुचिपूर्णता की वकालत की ! सृजनात्मकता की गुहार लगायी ! अब तक कुछ बातें उभर चुकी थीं जो आगे भी विमर्श का एजेंडा बनेगीं  .नोट किया जाय -
अभिव्यक्ति की आजादी पर पहरेदार न बैठाये जायं मगर इस आजादी की भी आचार संहिता तय की जाय
बेनामी की विवशता के पीछे के कारणों को भी जाना समझा जाय ! आखिर उनके  लिए मुखौटा क्यों जरूरी हो जाता है !
बहुत लोगों ने यह भी माना कि वे भगेडू लोग हैं और स्थतियों से पलायन  कर चुके हैं -समाज को फेस नहीं कर सकते तो इन्हें क्यों अहमियत दी जाय ! जबकि दूसरे लोगों ने ब्लागजगत में अनामियों के योगदानों की भी चर्चा की ! 

ब्लॉग विश्व के पीछे की एक न्यस्त अर्थव्यवस्था की ओर भी संकेत कर आगाह किया गया -हम जिस स्पेस का इस्तेमाल इतना बढ़ चढ़ कर कर रहे हैं उसपर हमारा सचमुच कितना हक़ है ? 

ज़ाकिर अली रजनीश ने बेनामी खुरापतियों की जम कर खबर ली और ब्लागजगत से ढोल की पोल के खुल जाने  की कथा सुनायी ! कुछ जुमले भी उठे -"ब्लॉग इंडीविजुअलिटी के उत्सवीकरण का षड्यंत्र है " मैंने तुंरत इसे ट्विटर पर ट्वीटियाया  भी  ! अब इसका भाष्य आप करते रहिये मेरा माथा तो गरम हो चुका ! और यह भी कि सरलीकरण के मेले /उत्सव ठीक नहीं हैं -इस जुमले को  ठीक से याद है तो इरफान ने उछाला ! इरफान का गुबार इस पर भी फूटा कि हम किसी भी मुद्दे पर आर्गनाईज नहीं हो पा रहे हैं और यह ठीक बात नहीं है (अटल जी की स्टाईल ) उन्होंने विगत एक महीने के सबसे ज्यादा पढ़े और पसंद किये गए दस चिट्ठों की चर्चा की और उसमें आखिर में यानि दसवां यह ब्लॉग भी रहा -मगर मेरी  सारी खुशफहमी  काफूर हो गयी जब रवि रतलामी जी अनाहूत माईक पर आ धमके और कहा कि ब्लागवाणी का आंकडा विश्वसनीय नहीं है -फिर भारत में कौन से और किसके आंकडे विश्वसनीय हैं रवि जी ?

कुछ और जुमले /नारे -जो रचेगा वही बचेगा और बेनामी आभासी जगत के ठलुए हैं यथार्थ जगत के भगेडू ,फिर उनकी परवाह क्यों ? गरिमा से तार तार हो चुके मंच पर अफलातून जे ने अपनी भारी भरकम उपस्थिति दर्ज कराई ! माहौल को कुछ थामा उन्होंने ,कहा आत्ममुग्धता के शिकार हैं ब्लागर ! सच ही सब कुछ नहीं है उसकी सकारात्मकता भी तो हो !  उन्होंने भी बेनामियों की विवशता भी महसूस मगर टिप्पनी में पोर्नोग्राफी डालने  वालों की खबर ली ! पोर्नो शब्द का उच्चारण होते ही अब तक पार्श्व  में जा बैठी युवा ब्लागर टीम समवेत स्वरों में चिल्लाई -वंस मोर वंस मोर ! अफलातून जी शायद छुपे श्लेष को समझ नहीं पाए और दुगुने उत्साह से उस पोर्नोग्राफी की टिप्पणी -घटना का बयान करने लगे ! एक बात दिखी ,अफलातून जी के सहजता से  उनकी एक मासूम  युवा चेल्हआई भी वजूद में है ! अब मैं भी उसमें सम्मिलित हो गया हूँ ! उनसे युवा जो ठहरा ! पहले दिवस का अवसान पर चलते चलाते प्रियंकर जी भी आये जिन्होंने दुहराया कि बेनामियों को लेकर चिंतायें तो वाजिब मगर इस सिद्धान्त के वे पक्षधर आन्ही है कि उनको प्रतिबंधित किया जाए ! आभासी जगत निजता का भी सम्मान करे ! ब्लॉग जगत और वास्तविक जगत के मुद्दों के  घालमेल से बचने की भी हिदायत उन्होंने दी ! पहला दिन बीत चुका था ! और हाँ  चाय पानी की समय समय पर मिलती रही ,हाल भले न सभा के अनुकूल रहा हो !

24 टिप्‍पणियां:

  1. एक आयोजन के सकारात्मक पक्ष पर विशेष रूप से यह कहना चाहता हूँ कि इस आयोजन के बाद भी जितनी प्रतिक्रियाएँ आईं( और लगातार आ रही है ),कार्यक्रम के दौरान जितनी रुचि वहाँ उपस्थित और हम जैसे अनुपस्थित लोगों ने ली , कार्यक्रम का जैसा लाइव प्रस्तुतिकरण ब्लॉग्स पर हुआ ,जितनी तस्वीरें हम लोगों ने देखीं मित्रों से फोन पर और एस एम एस के माध्यम से सम्वाद हुआ , कार्यक्रम के चलते चैट और टाक से जानकारी का आदान-प्रदान हुआ, भोजन आवास के बारे मे चर्चा हुई, मुद्दों पर सीधे सुझाव दिये गये और सम्बन्धित लोगो तक प्रतिक्रियाएँ पहुंचाई गई यह मैने आज तक किसी साहित्यिक,संस्थागत या राजनीतिक कार्यक्रम के आयोजन मे नही देखा । अखबारों मे तीन कालम की खबर और टीवी पर दो मिनट की क्लिपिंग से ज़्यादा आज तक किसी कार्यक्रम को तवज़्ज़ो नही मिली ।इस बात से अन्य लोग ईर्ष्या भी कर सकते हैं । इस आयोजन मे मिलने वाले न सिर्फ पहले से परिचित हैं बल्कि नेट के माध्यम से उनमे रोज ही सम्वाद होता है ।यद्यपि यह इस माध्यम पर उपस्थित "हज़ारो"ब्लॉगरों के बीच एक छोटा सा समूह है । यह सिर्फ और सिर्फ इस ब्लॉगर परिवार के आपसी सम्बन्ध की वज़ह से है और इसे कोई भी महान साहित्यकार ,पत्रकार ,राजनेता या प्रशासनिक अधिकारी नही समझ सकता । मै एक लेखक /कवि हूँ और विगत 30 वर्षों से ऐसे आयोजन कार्यक्रम अटेंड कर रहा हूँ । यहाँ जुडे भी एक उल्लेखनीय समय तो हो चुका है इसलिये मै कह सकता हूँ कि यह एक ऐसा समाज है जिसने यह सब अपने श्रम और ज्ञान तथा निरंतरता से अर्जित किया है इसलिये इसकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती ।यह् समाज बहुत ज़्यादा निराश भी नहीं होता न बहुत ज़्यादा उत्साहित होता है , न ज़्यादा उद्वेलित होता है न भयभीत होता है । इसका संतुलन ही इसकी विशेषता है । हम क्यों न इसके उजले पक्ष को सँवारते हुए इसके उज्वल भविष्य की कामना करें।

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  2. bahut kuch pata laga is charcha se...... padh kar logon ke views bhi pata chale..... bahut achchi lagi yeh charcha...

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  3. अच्छी रपट है। आशा के अनुकूल है। यह एक बड़ा आयोजन था। जो हिन्दी ब्लागिरी के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हुआ है। ब्लागवाणी का आंकड़ा वाकई विश्वसनीय नहीं है। उस पर जितने पाठक बताए जाते हैं मेरे स्टेट काउंटर में प्रतिदिन उस से दस गुना से अधिक होते हैं।

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  4. वाह जी अभी अभी दिवेदी जी के ब्लाग से आयी हूम्म वहाँ भी यही चर्चा थी मगर आपकी जानकारी विस्त्रित है आपको बहुत बहुत बधाई

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  5. maaf kigiyaega maine kahi bhi nahi kaha ki blogging vaikalpik media hai..maine to yae kaha ki ise kisi ke baraks khadi karne ki jarurat hi nahi hai.na media ke na sahitya ke,yae bas blogging hai.. dushri baat maine yae bhi nahi kaha ki yaha mahaul kharaab na karen,yae kaha ki blog ko jis tarah se anargal bataya gaya hame uske beech stri,samajik sarokaar ko jo kuch bhi likha jaa raha hai un sandharho ki talaash karni chaahiyae..mujhe mention karne ke liyae shukriya..dost ke system me hindi font nahi hai,maaf karengen.

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  6. कोटिश: धन्यवाद अरविन्द जी. बहुत अच्छी रिपोर्टिंग है.आपने मेरी प्रस्तुति के कंटेंट को हूबहू कोट किया है इसके लिए भी आभारी हूँ वर्ना एक ब्लॉग (गाहे-बगाहे) पर न सिर्फ मेरी प्रस्तुति के कंटेंट को मिसकोट किया गया बल्कि मेरे नाम के आगे वो टॉपिक लिख कर मेरी बाक़ायदा आलोचना भी की गई जिस टॉपिक पर मैं बोली ही नहीं. मैने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दुरुपयोग पर प्रस्तुति की थी परंतु इस स्वतंत्रता के दुरुपयोग का शिकार सेमिनार से लौटते ही मैं स्वयँ हो जाऊँगी इसकी आशा नही थी.

    वस्तुनिष्ठ रिपोर्टिंग के लिए एक बार फिर आभार.

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  7. main jyada purana blogger nahi, jabki blog na jane kabka create karke rakha tha.. kaafi achha laga saari jaankari padhkar..

    main samjhta hoon ki ye pahla akhil bhartiya sammelan tha lekin kaafi achha hota agar ladne aur prachaar ke saath saath humne kuch buniyaadi muddon ki baat ki hoti..

    jaise ise logo tak kaise pahunchaye..kya koi print blog bhi hona chhaiye jo in saare chitthon ko ikattha kare aur unhe jan manas tak pahunchaye...

    jaise naye blog aggregators laye jayen. kuch innovative thouhts janmanas ke samne laye jaayen aur apne vichaaron ke saath saath hum janta ko bhi sun saken...

    ityadi ityadi :D shayad kuch aisa :) http://pupadhyay.blogspot.com/2009/10/blog-post_25.html

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  8. @ ब्लागरों ने बेलौस कई बातें ऐसी कीं जो आगे के विमर्शों की पूर्व पीठिका बन गए हैं ! - अमृत वचन।
    तत्त्वदर्शी प्रभु! आप का व्यक्ति + तत्त्व दर्शन विलोड़ित कर गया। बेवाकी, खुशमिजाजी और कहनी खरी खरी! आप से अति प्रभावित तो पहले ही था लेकिन मिलने के बाद लगा कि शायद मेरा बड़ा भाई जीवित बच गया होता तो . . सेंटी हो रहा हूँ। सिद्धांतहीनता है - थोड़ी औपचारिकता तो बनी रहनी चाहिए।
    ________________________________
    आयोजकों की थोड़ी तारीफ कर दीजिए न ।

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  9. खट्टे-मीठे अनुभवो के बावज़ूद ऐसे आयोजन होते रहने चाहिये।सीखते सीखते ही सीखते हैं सब्।

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  10. @काहें मुझे भी सेंटी कर रहे हैं गिरिजेश !
    अरे वो तारीफ भी होगी पहले डांट फटकार तो पूरी हो जाने दें !
    बड़े भाई का रौद्र रूप भी तो दिखे -स्नेह तो उसका सहज स्थायी भाव ही है वह खान भागा जा रहा है !

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  11. कई सारे पक्ष-विपक्ष उभर कर आ रहे हैं पोस्ट-दर-पोस्ट, ब्लौग-दर-ब्लौग....शायद इतना आनंद तो इस कमाल के आयोजन में शामिल होकर भी नहीं आता, जितना इन तमाम पक्ष-विपक्ष को देखकर आ रहा है।

    रोचक प्रस्तुति मिश्र जी !

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  12. मुझे लगता है कि प्रतिभागी यदि अपनी रिपोर्ट्स लेकर २३ की रात बैठते,चर्चा करते तो २४ को और भी कुछ मिलता।शायद ’इलाहाबाद घोषणा’ भी ।
    विनीत की टिप्पणी शामिल होकर रपट पूरी बन जाती है ।

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  13. बड़ी पैनी निगाह रखने का विचार था इस आयोजन पर...लगता है मोतिया बिन्द उतर आया है मुझे...धुंधलका छा गया है इतनी बातें साफ साफ जानकर...वरना तो काला चश्मा पहनना समझाईश है ऐसी हालातों में. :)

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  14. अच्छा तो यह रौद्र रूप है । हम सोचे मज़ाक कर रहे हैं ।

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  15. रिपोर्टिंग की दृष्टि से बिल्कुल सौ टका खरी बात कही आपने. पर यूं तो जो कुछ इधर उधर पढने मे आरहा है उससे मायूसी ही हो रही है.

    रामराम.

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  16. आजकल सारा ब्लॉगजगत इलाहाबादमय हो रहा है। लोग अपने अपने ढंग से समीक्षा कर रहे हैं। आपकी रिपोर्ट में मूल्यांकन और खबर दोनों ही संतुलित ढंग से हैं।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

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  17. आपने तो पर्दा हटा दिया सम्मलेन के कुछ छुपे छुपाये तथ्यों पर से बधाई
    और हां ऐसे समय में भी आपकी बात मजाक सूझती है क्या लोगो को :)

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  18. ब्लागवाणी का कोड लिखते समय विश्वसनीय कोड ही लिखा था मैंने. बहरहाल रवि जी ने समझ और रिसर्च करके ही कहा होगा. अगर वो बतायेंगे तो यह भी जान लेंगे कि विश्वसनीय क्यों नहीं है.

    बहरहाल ब्लागवाणी के आंकड़े आपके ब्लाग पर सारे आने वालों की जानकारी नहीं होते. वह सिर्फ उनके बारे में हैं जो ब्लागवाणी से आपके पास गये. ब्लागवाणी कोई स्टेट क्लैक्टर नहीं है. वैसे क्या यह समझना भी इतना मुश्किल था?

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  19. "...ब्लागवाणी का कोड लिखते समय विश्वसनीय कोड ही लिखा था मैंने. बहरहाल रवि जी ने समझ और रिसर्च करके ही कहा होगा. अगर वो बतायेंगे तो यह भी जान लेंगे कि विश्वसनीय क्यों नहीं है.

    बहरहाल ब्लागवाणी के आंकड़े आपके ब्लाग पर सारे आने वालों की जानकारी नहीं होते. वह सिर्फ उनके बारे में हैं जो ब्लागवाणी से आपके पास गये..."


    सिरिल जी, ब्लॉगवाणी पर मुझे भरोसा है. मैंने इनके आंकड़ों पर उंगली नहीं उठाई थी. बात कुछ स्पष्ट करना होगा.

    अब समझ में आया कि राजनेता लोग क्यों बोलते हैं कि उन्हें 'मिस-कोट' किया गया.

    जब इरफान जी ने ब्लॉगवाणी के टॉप पोस्टों (आमतौर पर सभी विवादित, जिनमें जनता को ज्यादा मजा आता है) की सूची दी तो मैंने कहा कि इन्हें टॉप का पैमाना न मानें. इन पोस्टों में सिर्फ तात्कालिकता है. टॉप पोस्टें तो शब्दों का सफर जैसे ब्लॉग को मानें जिसे 600 से ज्यादा लोग सब्सक्राइब कर पढ़ते हैं. तो उसमें ब्लॉगवाणी में टॉप न भी हो तो उसके नियमित पाठक 600 से ज्यादा तो हैं ही. भले ही वो ब्लॉगवाणी की टॉप लिस्ट में नहीं आता हो. फिर ये भी बताया कि विवादित पोस्टों का जीवन क्षण भंगुर होता है. उन पर दोबारा कोई नजर नहीं मारेगा. जबकि सार्थक पोस्टों पर गूगल सर्च इत्यादि से लोग बाद में भी आते हैं.

    क्या मैंने गलत कहा?

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  20. सिरिल जी सही कह रहे हैं, यह अंदाजा लगाना इतना मुश्किल तो न रहा होगा.

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  21. रवि जी, आप पर विश्वास है इसलिये कहा कि आपने समझ कर ही कहा होगा. अब जब बात का परिपेक्ष्य समझ आया तो और साफ हो गई. यह बिल्कुल सही है जो चीजें ब्लागवाणी पर हिट नहीं है, उन्हें होना चाहिये. लेकिन जो हैं उनमें हमारी ही ब्लागर बिरादरी आइना देखिये.

    दिक्कत कोटेशन से नहीं, उसे ले उड़ने वालों से होती है. आपने देखा ही होगा कि ब्लाग पर बात जब भी निकलती है तो बड़ी दूर तक जाकर ही दम लेती है. इसलिये तुरंत बताया कि आंकड़े वहीं है जो ब्लागर्स ने बनाये हैं.

    ब्लागवाणी को एक ब्लागिंग इनेब्लर टूल के रूप में देखना चाहिये मैं भी उसे इसी रोल में देखता हूं तो फबता है. अगर कोई अपने ब्लाग का सारा अस्तित्व ही ब्लागवाणी में देखे तो एक ब्लाग-रीडर और नेट-यूज़र के तौर पर मेरे लिये दुखदायी है.

    पीछापकड़ों के दिये संताप से संतप्त होकर वह टिप्पणी लिख मारी, अगर आपको तकलीफ हुई हो तो माफ कीजियेगा.

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  22. @जब वह बात - "ब्लागवाणी के आंकडे प्रश्नगत मामलों में विश्वसनीय नहीं है" कही गयी थी तो उसमें ब्लागवाणी के प्रति उपेक्षा जैसा ही ध्वनित हुआ था -तब इन तकनीकी बारीकियों को भी सही संदर्भ में नहीं बताया गया -अगर ये बारीकी भी स्पष्ट कर दी गयी होती तो बात भ्रामक नहीं लगी होती !
    मेरे जैसे कितने ही ब्लॉगर और गैर ब्लॉगर वहां थे जिन पर यही इम्प्रेशन पड़ा की ब्लागवाणी एक विश्वसनीय अग्रीगेटर नहीं है !
    अपनी अल्प समझ के लिए मुझे भी खेद है .लेकिन आशा करता हूँ की तकनीकी पहलुओं के जानकार सार्वजनिक स्थलों पर आम समझ की बोली भाषा में बात करें !

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