बुधवार, 28 अक्तूबर 2009

आज बच्चन जी की एक और कविता -तब रोक न पाया मैं आँसू !

तब रोक न पाया मैं आंसू !
जिसके पीछे पागल होकर
मैं दौड़ा  अपने जीवन भर ,
अब मृगजल में परिवर्तित हो मुझपर मेरा अरमान हंसा
तब रोक न पाया मैं आंसू !

जिसमें अपने प्राणों को भर
कर देना चाहा अजर अमर ,
जब विस्मृति के पीछे छिपकर मुझ पर मेरा वह गान हंसा
तब रोक न पाया मैं आँसू 

मेरे पूजन -आराधन को
मेरे सम्पूर्ण समर्पण को
जब मेरी कमजोरी कह कर मेरा पूजित पाषाण हंसा
तब रोक न पाया मैं आँसू
प्रतिनिधि कवितायें -हरिवंश राय बच्चन 
राजकमल पेपर बैक्स प्रकाशन 

25 टिप्‍पणियां:

  1. मिश्रा जी इतनी सुन्दर कविता पढ्वाने के लिये धन्यवाद । कितनी सही और सुन्दर अभिव्यक्ति है
    मेरे पूजन -आराधन को
    मेरे सम्पूर्ण समर्पण को
    जब मेरी कमजोरी कह कर मेरा पूजित पाषाण हंसा
    शुभकामनायें

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  2. जिसमें अपने प्राणों को भर

    कर देना चाहा अजर अमर ,

    जब विस्मृति के पीछे छिपकर मुझ पर मेरा वह गान हंसा

    तब रोक न पाया मैं आँसू

    " बच्चन जी की इस बेहद भावुक कविता की प्रस्तुति पर आभार....मुझे बेहद पसंद है.."
    regards

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  3. bachchan ji ki kavita share karne ke liye aapka bahut aabhaari hoon.........

    kavita bahut achchi lagi....

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  4. "जब मेरी कमजोरी कह कर मेरा पूजित पाषाण हंसा" हमभी चिंताग्रस्त हो रहे हैं.
    इस कविता को उद्धृत करने के लिए आभार.

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  5. Bachchan ji kee kavita ..ati sarthak,shabdon kee sundarta liye ..arthpoorn hoti hain...

    English kee vidwaan hote huve bhee hindi main unka maharath...kabile tareef hai..

    naman hai un mahaan kavi ko !!
    Thanx for sharing Arvind ji !

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  6. मेरे पूजन -आराधन को
    मेरे सम्पूर्ण समर्पण को
    जब मेरी कमजोरी कह कर मेरा पूजित पाषाण हंसा ।

    बहुत ही भावपूर्ण प्रस्‍तुति, जिसके लिये आपका आभार

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  7. अक्सर जब वो होता है जो मन नहीं चाहता ........ या जिसके साथ अपना सब कुछ जोड़ा होता है वो ही साथ नहीं देता तो आंसू बरबस निकल ही आते हैं ............ मन को भिगोती हुयी रचना ..........

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  8. लोक की बोली में लिखी बच्चन साहब की यह कविता जगत की सच्चाई का बयाँ करती है |

    कविता की शक्ति यही है | आत्म-समीक्षा कराती है |

    आभार...

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  9. मेरे पूजन -आराधन को
    मेरे सम्पूर्ण समर्पण को
    जब मेरी कमजोरी कह कर मेरा पूजित पाषाण हंसा
    तब रोक न पाया मैं आँसू
    जब समर्पित प्रेम को कमजोरी कहा जाये तो
    ऐसे में कौन रोक पायेगा अपने आंसू ...
    इतनी सुन्दर कविता चुनने के लिए बहुत आभार ...

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  10. अच्छा है जी, मरीचिका समझ तो गये अंतत। हम तो अभी भी विभ्रम में हैं!

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  11. बेहद सुंदर कविता प्रस्तुत की आपने..बहुत बहुत धन्यवाद!!

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  12. कभी आप भावुक मन लिए बैठे हों और आँसू बहाना ढूंढ रहे हों तब ऐसे में यह कविता उसको राह दिखा देती है। बेहद ही सशक्‍त रचना। आपको बधाई यहाँ पढवाने के लिए।

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  13. बच्चन जी को पढ़वाने के लिए शुक्रिया !

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  14. शुक्रिया इस खूबसूरत कविता को यहाँ पढ़वाने के लिए

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  15. अंतिम पंक्ति सच नहीं.....ऐसा नही हो सकता ............

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  16. शाम को दूरदर्शन पर आप के द्वारा मत्य पालन के बारे में दी गयी जानकारी सुना .............मत्य पालन के बारे में कुछ नही जानता हूँ ......"मछलिया" कहानी पढी है .....!

    उत्तर देंहटाएं
  17. शाम को दूरदर्शन पर आप के द्वारा मत्य पालन के बारे में दी गयी जानकारी सुना .............मत्य पालन के बारे में कुछ नही जानता हूँ ......"मछलिया" कहानी पढी है .....!

    उत्तर देंहटाएं
  18. बहुत पहले पढ़ी थी ये कविता...

    चलिये, इसी बहाने मिश्र जी के मूड में बदलाव तो आया।

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  19. बहुत ख़ूबसूरत और उम्दा रचना लिखा है बच्चन जी ने ! उनकी लेखनी को सलाम!

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  20. 'मृगजल' शब्द की ब्याख्या दें। कस्तूरी की तुलना में अर्थगुरु लगता है क्या ?

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  21. भावपूर्ण कविता.
    आभार पढ़वाने हेतु.

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  22. बच्चन की कविताओं का आकर्षण दुर्निवार है - हटता ही नहीं/घटता ही नहीं ।

    ’मृगजल’ के उपयोग से अर्थ में गुरुता तो आ ही गयी है । अरमान मृगजल हो गये हैं-मरीचिका-से । हैलुसिनेसन्स लाफ्टर (Hallucination's laughter) - अजीब है न !

    कविता का आभार ।

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