गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

बैठे ठाले एक चिट्ठाकार चर्चा -पहली कड़ी

इधर मुम्बई के हादसे ने कुछ ऐसा कर डाला था की ब्लॉग जगत से भी अरुचि सी हो गयी थी और अभी भी थोड़ी बहुत यह अरुचि बनी हुयी है ! ऐसा होने में दृश्य मीडिया की भी काफी भूमिका रही पर मैं इसके लिए उन्हें नही कोसता -दृश्य मीडिया ने भले ही अपने काम को बहुत जिम्मेदारी से अंजाम नही दिया मगर उसके पत्रकारों ने जान जोखिम में डाल कर ख़बर हम तक पहुंचाई -काफी कुछ सच दिखाया -जिन परिस्थितियों में वे काम कर रहे थे उसमें आचार संहिता का पालन बहुत मुश्किल था और समय भाग सा रहा था .और दुश्मनों के विरुद्ध जनमत इकट्ठा करने में तो दृश्य मीडिया ने उत्प्रेरक की भूमिका निभायी है,कमाल कर दिखाया है -टाईम्स ग्रुप्स ने तो आतंकवाद के विरुद्ध एक जेहाद सा छेड़ रखा है .मगर खौफनाक दृश्यों और मौजूदा हालातों ने मन काफी उचाट सा कर दिया और शायद हम बहुतों की स्थिति ऐसी है कि हमें मनोरोगविद -सायिकियाट्रिस्ट की सलाह लेनी चाहिए ।
मेरी मुश्किल यह है कि मुम्बई हादसे के तुंरत बाद से मैं सायिकियाट्रिक मोड़ में चला गया और चिडचिडेपन का शिकार हो गया -तब से मैंने कई ब्लागों पर इसी मोड में टिप्पणियाँ करता रहा हूँ और सचमुच बहुत आभारी हूँ अपने तमाम सहधर्मियों का कि वे मुझे झेलते आरहे हैं .अब नाम नहीं लूगा पर अपने कई ब्लॉग मित्रों का मैं क्षमां प्रार्थी हूँ -और इस पोस्ट की भी अग्रिम क्षमा मांग ले रहा हूँ क्योंकि अभी भी मैं आक्रान्तता मोड से पूरी तरह से उभर नहीं पाया हूँ .पर यह पोस्ट मेरे पटरी पर लौट आने का एक सायास प्रयास है -शायद काम बन ही जाय ।
जब हम चिट्ठाचर्चा में इतनी रूचि ले रहे हैं तो क्या यह उचित नही है कि बीच बीच में कुछ चिट्ठाकार चर्चाएँ भी कर ली जायं . साहित्य में कृतित्व के साथ व्यक्तित्व वर्णन की भी परिपाटी रही है -अनूप जी इस बात से इत्तेफाक रखेंगे .वैसे यह विवादित मुद्दा है -कई स्वनामधन्य विद्वानों का कहना है कि साहित्यकार का कृतित्व क्या कम नहीं जो उसके निजी जीवन में भी ताकझांक की जाय ? भाई क्या मतलब कि आपका पसंदीदा रचनाकार /ब्लॉगर कैसा है ,सुंदर देहयष्टि का स्वामी /स्वामिनी है या नही है ? क्या खाता पीता है ,कहाँ जाता सोता है -दयालु है या मरकहा है आदि आदि! कोई ये जरूरी नही है कि वह लिखता अच्छा है तो होगा भी अच्छा ही ! कई संयोग हो सकते हैं -लिखता अच्छा है तो दिखता बुरा है ,लिखता ख़राब है तो दिखता देवदूत है .इस बिन्दु पर किसी ब्लॉगर बन्धु /बांधवी ने चर्चा छेड़ी भी थी .पर अपुन का मानना है कि कुछ तो व्यक्तित्व (केवल चेहरा मोहरा ही नहीं )का असर पड़ता ही है -कविता कर के तुलसी ना लसे कविता पा लसी तुलसी की कला !
पर मैं यह प्रलाप कर क्यों रहा हूँ ?-मित्रों मैं अपने आक्रान्तता मोड से उबरना चाहता हूँ इसलिए अनाप शनाप बैठे ठाले ये प्रलाप किए जा रहा हूँ और आपको झेलना पड़ रहा है .मुआफी माई बाप !! तो ऐसे ही मेरे मन में इक खयाल आया कि क्यों न चिट्ठाचर्चा की तर्ज पर कुछ नामवर और कुछ बदनामवर चिट्ठाकारों की चर्चा ही की जाय कभी कभी ! यानी कोई क्या सोचता /सोचती है अपने ब्लागजगत के सहधर्मियों के बारे में -इस विधा की भी ब्लागजगत में प्राण प्रतिष्ठा क्यों ना की जाय ? मगर यह काम यथा सम्भव वस्तुनिष्ठता से हो तो बेहतर, मगर हम लाख दावे करें कुछ न कुछ भावनिष्ठ्ता तो हमारे विवरणों में आयेगी ही -पर इतना जोखिम तो उठाना ही पडेगा ।
और ब्लॉगर बंधुओं से भी आग्रह है कि वे यदि कबिरा निंदक राखिये वाला जज्बा ना भी रखते हों तो भी कृपा कर आवेश में न आयें या यदि उन्हें कोई आशंका हो तो पहले ही निराकरण कर लें या फिर नाम काटने का आग्रह कर , यदि उन्हें लगता हो कि संभावित सूची में उनका नाम भी हो सकता है .
तो श्रीगणेश मैं ब्लॉग जगत के दो आदरणीय शख्सियतों से कर रहा हूँ जिनके प्रति मेरे मन में असीम आदर /सम्मान है -ये हैं सारथी के आदरणीय शास्त्री जी औरउन्मुक्त जी ! ध्यान दें मैं यहाँ इन दोनों महानुभावों का जीवन चरित नहीं लिखने जा रहा हूँ पर इन्हे लेकर मेरे मन में जो भाव है उसे आप से साझा करना चाहता हूँ -करना चाहता हूँ चिट्ठाकार चर्चा !
अथ श्री चिट्ठाकार चर्चा !
ये दोनों ही चिट्ठाकार व्यक्तित्व के मामले में दो ध्रुव हैं बिल्कुल अलग थलग ! एक अपना सब कुछ सार्वजनिक करने को सहज ही उद्यत रहता है ,आतिथेय बनने को भी सदैव तत्पर यानी अपने शास्त्री जी तो दूसरे उन्मुक्त जी के बारे में आज तक जासूसी करने के बाद भी मुझे पक्का कुछ नही मालूम हो सका कि ये कहां के रहनेवाले हैं ,इनका असली नाम क्या है ? कोई कहता है कि ये इलाहाबाद में एडवोकेट हैं तो कोई कहे है कि ये दिल्ली केआस पास कहीं के हैं -इनकी अतिशय विनम्रता या जीवन दर्शन है कि लोगों को उनके काम से जाना जाय .ये हमारे उन आदि पूरवज मनीषियों की ही परम्परा में हैं जिन्होंने कितना ही रच डाला पर नाम पता भी ठीक से उद्धृत तक तक नही किया -आज साहित्य और इतिहास के विद्वानों को बड़ी मुश्किल होती है उनके काल निर्धारण में ,उनकी असली पहचान स्थापित करने में ! कालिदास ,कौटिल्य, पातंजलि ऐसे ही कोटि के विद्वान् रहे -कितने पुराणकारों ने विपुल सर्जना के बाद भी अपना नामोंल्लेख तक नही किया .उन्मुक्त जी उसी परम्परा का निर्वहन कर रहे हैं .पर कभी कभी बहुत खीझ सी होती है इस अतिशय विनम्रता से .मैंने उन्हें विज्ञान कथाओं के राष्ट्रीय परिचर्चा में लाख बुलाना चाहा पर वे नही आए -शायद कहीं गोपनीयता भंग न हो जाय -पर भला आज की दुनिया में यह भी कोई बात हुई ? चलिए संतोष इस बात का है कि हम उनके रचना जगत से समृद्ध हो रहे हैं ! और उनकी भी विज्ञान कथाओं में बड़ी रूचि है -अज्ञेयवादी हैं और इस कारण भी मैं उनसे मन से जुड़ा हूँ !
शास्त्री जी की भी सदाशयता का मैं कायल हूँ -वे वेल रेड विद्वान् हैं भौतिकी के विशेषग्य और उतना ही विनम्र .पर उनके अपने कुछ आब्सेसन भी हैं जैसे वे इसाई धर्म के प्रति अनुरक्त है .भगवान में प्रबल श्रद्धा है !! तो ये दोनों बड़े ब्लॉगर कई मायनों में उत्तर और दक्षिण ध्रुव सरीखे हैं पर ये दोनों बहुत वरिष्ठ ,प्रणम्य ब्लॉगर साथी हैं -समूचे ब्लागजगत को इन पर गर्व है ! मेरा नमन !
आगे देखिये किसका नाम मन में कौंधता है -यह आप भी हो सकते हैं ! करिये धड़कते दिलों से इन्तजार अपनी बारी आने का !

35 टिप्‍पणियां:

  1. MR ARVIND
    this is my suggestion that you should please continue अथ श्री चिट्ठाकार चर्चा !
    its hig time we had some one who could perhaps just read 2 blogs once a week in totality and then write an impersonal review on them even if its once a month also it would be good becuse then we can discuss at lenght on various issues raised by these bloggers . if the bloggers whose blog who review can also participate in discussion it will be very very good.
    this is one charcha which is missing .
    in case of poets/ peom blogs if a person of zakir callibre can review them periodically and review and discuss the problems that have been in focus in the poems then the sheli of the poet can be given and problems which the poet brings outr can be discussed
    poems are not just romantic cribings but on blog people are writing much more then that

    i hope this comment will be treated as a suggestion and its being written in english as i feel i can communicate better in english

    hats of to this effort and PLEASE continue this may be in a separate blog all together and i will like to join it if its a comunity blog to help in designing of the blog etc if you feel so

    regds

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  2. इस नये उद्यम के लिए शुभकामनाएँ (प्रतिफल विहीन)!
    आज कि चर्चा सार्थक लगी. आभार.

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  3. अच्छा है जी चिठ्ठाकार चर्चा। जमाये रहें। रचना सिंह जी सही लिख रही हैं।

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  4. बहुत बढ़िया पहल लगी आपकी यह अरविन्द जी ..इसको लिखते रहे ...

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  5. पहल निःसन्देह स्वागत योग्य है, लहजा कुछ अतिरिक्त सावधानी से परिपूर्ण लगा पर आप कहीं बेहतर जानते-समझते हैं. हम तो आपकी सशक्त लेखनी से निकली हर बात को पढ़ने की इच्छा रखते हैं.

    ब्लॉग जगत में कम लोग हैं जो पूरी शालीनता का निर्वहन करते हुए भी खुलकर सच कह पाते हैं. आप उनमें अग्रिम पंक्ति में हैं.

    शुभकामनाओं के साथ.

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  6. अच्छा लगा पोस्ट को पढकर. जारी रखें.

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  7. सारथी जी के बारे में लिखने का धन्यवाद!

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  8. आप के श्री-मुख से यह चर्चा भी गंभीरता पूर्वक नया विचार पेश करने में सफल होगी.....ऐसी मेरी आशा है!!!!

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  9. आपकी मन:स्थिति को सहज ही समझा जा सकता है ! एक तरह से कहें तो आप सभी भारतियों को प्रतिनिधितव कर रहे हैं ! सभी की हालत आप जैसी ही है ऐसे मे जो विषय आपने चुना है वो बिल्कुल उप्युक्त है !

    आपकी अपनी एक प्रवाहमयी और मन्त्रमुग्ध कर देने वाली शैली है तो अच्छा है उस भाषा का रसास्वादन हम साथी ब्लागरो के बारे मे जानते हुये करेंगे !

    आपको बहुत शुभकामनाएं ! दोनो विभुतियों के बारे जानना अच्छा लगा !

    राम राम !

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  10. आपने सही काम चालू किया है . जारी रहे . और मौज लेते रहें . टेंशनियाने से कुछ होने वाला नहीं है . हर काम बिना टेंशन के बेहतर हो सकता है . वैसे हमारी यह छोटे मुँह बडी बात है . पर क्या करें अपने बडों को इस मूड में नहीं देखना चाहते हम . ज्यादा बोलने के लिये माफी चाहते हैं .

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  11. जब तक मुंबई में वो घिनौने लोग दहशत फैलाते रहे, मुझसे एक भी दिन काम नहीं हो पाया. उस दौरान में दिन भर आफिस में बैठकर इंटरनेट पर टीवी देखता रहा... फिर जब सारे आतंकवादी मारे गये तो राहत सी मिली... फिर अपना रुका हुआ काम निपटाया... लेकिन बाद के घटनाक्रम को देखकर गुस्सा बढ़ जाता है... मुझे नहीं पता कि क्या किया जा सकता है, लेकिन अब यकीनन पहले जितना liberal और generous रहना मुश्किल लग रहा है...

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  12. तनाव से कभी कभी बहुत अच्छी चीजें जन्म लेती हैं। जैसे यह चिट्ठाकार चर्चा। आप ने बहुत बढ़िया काम शुरू किया है। इसे जारी रखिए।

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  13. मुम्बई के हादसे के बाद ५९ घंटे टीवी पर ' सब देखते हुए दिमाग पर असर हमारे भी हुआ -और अब पड़ोसी देश के चेन्नेलों पर जब उन का यह बयान देखती हूँ कि भारतीय अपने आप सिंगापुर आदि देश में रोजगार हेतु गए गरीब पाकिस्तानियों को पकड़ कर उनसे ये सब करा रहे हैं उन के देश को बदनाम करने के लिए '-तो सुन कर ही खून खोल उठता है..
    पहले जैसे भाव अब उन लोगों के प्रति रह ही नहीं गए.
    आप ने जो चर्चा शुरू की है वो जारी रखीये.आभार सहित .

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  14. यह क्या अरविंद भाई। लगता है कि आप ‘आक्रांतता मोड’ से पूरी तरह नहीं उबरे! आपने दो चिठाकारों की चर्चा का वादा किया और उन्मुतजी को त्रिशंकु ही छोड दिया।

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  15. बढ़िया काम है चिट्ठाकार चर्चा। हम लोग निरंतर में कच्चा चिट्ठा स्तम्भ लिखते थे। हर अंक में दो ब्लागर का परिचय। निरन्तर के बाद यह स्थगित हो गया। अपने ब्लाग पर भी मैंने तमाम ब्लागर साथियों के बारे में लिखा। हमेशा से यह मेरी योजनाओं में रहा। लेकिन फ़िलहाल यह स्थगित ही रहा।

    आप शुरुआत करिये। लिखना शुरू कर ही दिया है। चिट्ठाचर्चा के लिये अगर कहेंगे तो निमंत्रण भेज देते हैं। लिखिये धांस कर।

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  16. निरंतर का लिंक ये रहा
    http://www.nirantar.org/0305/kachha-chittha

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  17. सदाशयता से की गई प्रत्‍येक पहल और कही गई प्रत्‍येक बात असंदिग्‍ध रूप से सराहना ही पाती है । आपकी भूमिका में आपकी व्‍यक्तिगत ईमानदारी साफ-साफ अनुभ्‍वा होती है । आपके मन की आप जानें पर आपके शब्‍द आपके लिए साधुवाद से कम कुछ भी अर्जित नहीं करते ।
    शुभ-कामनाएं ।

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  18. एक अच्छा प्रयास है - मुँबई की त्रासदी से मई तरह के मनोभाव उभरे हैँ -
    अजित जी का प्रयास "बकलमखुद " भी ब्लोगर परिचय का अकेला स्तँभ है
    आप को शुभकामनाएँ --
    - लावण्या

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  19. मुझे इस बारे कुछ नही पता?? क्यकि मे चिठ्ठा चरचा मै बहुत कम जाता हुं , बस समय ही नही मिलता, ओर दुसरी बात मुझे शव्दो से खेलना भी नही आता, शुरु से अकेला रहा हुं( अकेले का मतलब भारतीया समाज से) सो ज्यादा बात नही बना सका जेसे आप सब शव्दो को सजा कर बोलते है लिखते है, शायद इतनी अकल नही मेरे मै, लेकिन फ़िर भी मै यही कहुगां कि आप जब भी किसी को टिपण्णई दे खुल कर ओर दिल से जो बात निकले लिखे क्योकि सच बात का कोई बुरा नही मानेगा, जो सच से प्यार करता होगा.
    धन्यवाद

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  20. अच्छा काम शुरु किया है.. शुभकामनाऐं..

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  21. बहुत देर से आया हूं, माफ़ करेंगे.
    व्यक्तित्व की चर्चा तो की ही जानी चाहिये, पर ब्लोगर के छोटे से प्रोफ़ाइल से सन्दर्भ लेकर या कुछ अन्य/अन्यत्र प्रयास कर- इसका उल्लेख भी जरूरी है.
    घोस्ट बस्टर की एक बात से पूर्णतया सहमत हूं-
    "ब्लॉग जगत में कम लोग हैं जो पूरी शालीनता का निर्वहन करते हुए भी खुलकर सच कह पाते हैं. आप उनमें अग्रिम पंक्ति में हैं."

    मेरा तो काम बस इतना होगा कि मैं आपकी चर्चा का गुन्जार सुनूं और मुग्ध होता रहूं.
    बाकी बाद में.

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  22. चर्चा सार्थक लगी,शुभकामनाऐं..

    Regards

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  23. जमे रहिये हमारी शुभकामनाये है बस निष्पक्षता ओर कुछ ऐसे पहलू सामने रखे जिससे चर्चा दिलचस्प बनी रहे ...

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  24. चर्चा व्यक्तिगत ना होकर केवल लेखन तक ही रहे तो बढ़िया रहेगा.. बाकी आपने कुछ योजना तो बना ही रखी होगी.. पहल स्वागत योग्य है.. हमारी शुभकामनाए आपके साथ है..

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  25. bahut acchi hai aapki ye pahal..waise main jayada kuch nahi keh sakta..wo choti muhn aur badi baat waali hisaab kitaab ho jaayegi...

    lakin apni ye charcha aap jaari rakhe...

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  26. मिश्र जी,
    मेरे बारे में इतने अच्छे विचार रखने के लिये शुक्रिया।

    मैं अपने विचारों के लिये जाना चाहता हूं न कि अपने परिचय के कारण। यह इसलिये कि परिचय अक्सर अन्य लोगों की सोच में अनावश्यक बाधा डालते हैं।

    कुछ समय पहले द टेलीग्राफ ने एक लेख हिन्दी चिट्ठाकारिता पर लिखा था। उसकी सम्वादाता मेरी पत्नी से इस बारे में बात करना चाहती थी पर हमने उसे मना कर दिया और दूसरे चिट्ठाकारों के चिट्ठे के बारे में पता दिया कि वह उनसे बात कर ले।

    टेलीग्राफ के लेख में काफी कुछ हमारे बारे में लिखा गया और इसे सम्वाददाता को यह बात बहुत अजीब लगी कि हमने उससे बात करने से कयों मना कर दिया। उसके बाद मेरी पत्नी ने एक चिट्ठी 'भारतीय भाषाओं के चिट्ठे जगत की सैर' नाम से लिखी जिसमें कुछ हमने अपने बारे में लिखा है और गुमनाम रहने के कारण बताये हैं।

    कई चिट्ठाकार बन्धु हमारे परिचय को समझते हैं। अन्तरजाल पर कोई व्यक्ति गुमनाम रह ही नहीं सकता पर हम गुमनाम ही रहना चाहते हैं। उनसे भी हमारी यही गुजारिश है कि हमें ऐसे ही रहने दें।

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  27. उन्मुक्त जी बहुत ही प्यारे इंसान हैं और अंतर्जाल पर हिन्दी और मुक्तस्रोत साफ्टवेयर के प्रसार के लिये ये समर्पित हैं.

    मैं भी इनकी सोच कि "परिचय अक्सर अन्य लोगों की सोच में अनावश्यक बाधा डालते हैं" से सहमत हूं.

    अरविन्द जी, आपने एक अच्छा काम शुरू किया है और अब यह आगे बढ़ाते रहना ही पड़ेगा.

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  28. जी हॉं, मैं ही क्‍या अब तो सभी लोग दिल थाम कर इंतजार करेंगे‍ कि देखूं मेरा नम्‍बर कब आता है। वैसे आपका यह प्रयास काबिले तारीफ है। यह चर्चा अन्‍य प्रकार की चर्चाओं से सर्वथा भिन्‍न है, जो यत्र तत्र होती रहती है। इस श्रंख्‍ला के लिए हार्दिक बधाई।

    रचना जी के सुझाव अच्‍छे हैं। मैं तो यही कहूंगा कि वे अपनी ओर से कोशिश करें, मेरी ओर से जो बन पडेगा, करने की पूरी कोशिश करूंगा।

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  29. मैं यही चाहूँगी कि चिट्ठेकार से अधिक महत्व उसके चिट्ठे को दिया जाए। आपके प्रयास के लिए शुभकामनाएँ और वह किस रूप में सामने आएगा की प्रतीक्षा।
    घुघूती बासूती

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  30. आपकी सारी "चर्चाये" सिर्फ आज नजर में आईं. बहुत ही स्तुत्य प्रयास है.

    इस आलेख में मेरा और उन्मुक्त जी का विश्लेषण एकदम वस्तुनिष्ठ है. वाकई में हम एक दूसरे से "जुडे" उत्तर और दक्षिण ध्रुव हैं.

    "जुडे" इस मायने में है कि हम दोनों में अधिकांश विषयों पर सहमति है.

    चर्चा जारी रखें !!

    सस्नेह -- शास्त्री

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  31. आज चिट्ठाकार चर्चा की सारी पोस्ट्स देख लीं. ऐसा लग रहा है काफी जल्दी आ गया मेरा नाम इन महारथियों की सूचि में. पुनः धन्यवाद.

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  32. ye prayas band kyn ho gaya ye jan na chahunga itne dino bad....agar aap bata sakein sir

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