मंगलवार, 30 मार्च 2010

आखिर चल ही पड़े तिरुवनंतपुरम की ओर ....(केरल यात्रा संस्मरण -2)

यह सच है कि मित्रता की असली पहचान कठिन समय में ही होती है -दिल्ली  से किंगफिशर की १० बजे की तिरुवनंतपुरम की फ्लाईट छूट  जाने से मेरा पूरा यात्रा प्लान ही खटाई में पड़ चुका था .दिल्ली से ३००० किलोमीटर की दूरी अब कैसे पार होगी यह  सोच सोच कर रूह जो कांपनी शुरू हुई तो कांपती ही जा रही थी  .पता नहीं गर्मी की वजह से या अपने अहसासों के चलते हम पसीने पसीने हुए जा रहे थे-मेरा विभागीय दल तीन दिन पहले यानि २० मार्च को ही बनारस से कूंच कर चुका था और तिरुवनंतपुरम अपने पूर्व नियत समय पर शाम को ६ बजे पहुँचने वाला था -उनकी ट्रेन जैसे मुझे चिढाती हुई समय से ही चल रही थी -प्लान के मुताबिक़ मुझे किंगफिशर की फ्लाईट से वहां ३ बजे तक पहुंच कर उस दल को रिसीव करना था -अब एक ही  चारा था कि देखा जाय कि कोई और प्लेन मिल जाय तो बात बन जाय -पर मेरे पास तत्काल इतने पैसे नहीं थे-तनिक  टेक्नोलोजी फोबिक होने के नाते  बेटे के बार बार कहने पर भी मैं अपना ऐ टी एम कार्ड साथ नहीं  रखता -और ऊपर वाले की आज तक मुझ पर यह कृपा रही है कि   किसी से पैसे मांगने की कभी नौबत  नहीं आई और आये  तो मैं मांगूं भी नहीं  .यह मेरे लिए आत्महत्या कर  लेने के समान है .यह अलग कथा है ,विषयांतर हो जायेगा ! यहाँ भी   बड़ी विपरीत स्थिति हो गयी थी कि आखिर किया क्या जाय और जो करना था जल्दी करना था -समय मानो पंख लगाकर उड़ चला था ...मेरे रेल यात्री दल के मुखिया  बार बार पूंछते जा रहे थे  कि सर आप कहाँ हैं और कब तक पहुँच रहे हैं और जब उन्होंने यह सुना कि मेरा  प्लेन छूट गया है तो पूरे दल में  चिल्ल पों मच  गयी  -अनजान जगह अनजान लोग अनजान बोली भाषा  -वे डर से गए थे. अचानक याद आया अपने एक मित्र का जो एयर इंडिया में थे-के पी सिंह .मैंने २००२ में जो मोबाइल नंबर  लिया वही  अभी भी मेरे साथ है मैंने कभी उसे बदला नहीं !कारण ? टेक्नोफोबिया ही !! मेरे मोबाइल में एक हजार से अधिक ही नंबर सेव है -के पी सिंह का नंबर मिल गया -एक बार में ही फोन लग गया -उन्होंने तुरंत रेस्पांड किया .
"भाई सिंह साहब ,दिस   इज  ऍन  एस ओ एस ..ऍन इमरजेंसी प्लीज ..."
" बताईये न क्या बात है ?"
और मैंने एक सांस में ही सारा वाकया बयान कर दिया .....
"आप ज़रा भी   परेशान न हों मैं आधे घंटे में आपको रिंग बैक करता हूँ ..."
उन्होंने ढांढस  दिया  तो कुछ जांन  में जांन  आई ...पर मन  में तो अभी भी तरह तरह की शंकाएं उमड़ घुमड़ रही थीं -जेब भी तो तंग थी ....ठीक आधे घंटे बाद उनकी काल आ गयी ...
"बॉस आपकी सीट इन्डियन एरलाईन्स की फ्लाईट आई सी ४६५ में बुक हो गयी है ,यह दिल्ली से शाम साढ़े पॉँच बजे हैं और तिरुवनंतपुरम रात दस बजे पहुंचेगी ..आप एअरपोर्ट पर पहुंच कर अपना पी एन आर नंबर हमारे काउंटर पर बताईयेगा और आई डी प्रूफ दिखाकर अपना टिकट ले लीजियेगा -पी एन आर मैं अभी एस एम एस कर रहा हूँ ...."
"पैसे सिंह साहब .?.." 
"  लौट कर दे दीजियेगा बॉस ..अभी  आप टेंशन फ्री हो जाईये ..."
"मगर मुझे देना कितना होगा -मेरे संशयों ने मुझसे चिरकुटई करा ही  दी"
" बास, लोवेस्ट फेयर इकोनोमी क्लास में आठ हजार चार सौ रूपये ...यह दिल्ली से त्रिवेंद्रम का  का न्यूनतम फेयर है "
" ठीक है सिंह साहब थैंक्स अ लाट ....यूं हैव सेव्ड माय टूर प्लान  ....." और मैंने एक गहरा सांस  लिया ..अचानक ही सब कुछ हल्का महसूस होने लग गया .हल्का और बेपरवाह सा! बस अब एयरपोर्ट पहुंचना रह गया था -समय बहुत था मगर वो क्या है कि दूध का जला छांछ को भी फूक फूँक कर पीता है इसलिए टैक्सी पकड़ी और इंदिरा गान्धी इंटरनेश्नल एअरपोर्ट के डोमेस्टिक फ्लाईट टर्मिनल १ ऐ पर बहहुत जल्दी ही पहुँच गया  -टिकट आसानी से मिल गया -वेटिंग लाउंज में पहुँच कर राहत की सांस ली .अब कुछ दिल्ली के ब्लागरों को अपनी व्यथा अपने ३जी  मोबाइल के जीमेल अकाउंट और फेसबुक से मेल भी की -मगर महानगर में किसे किसकी सुध है -कोई हेलो हाय भी नहीं हुआ -प्लेन के प्रतीक्षा की घड़ियाँ मानो पहाड़ सी बीत रही थीं -ऐसे में कितना ही अच्छा होता  गप शप के लिए कोई फालतू ब्लॉगर ही  मिल जाता -अब दिल्ली जैसे महानगर में कोई फालतू ब्लागर ? वे तो छोटे छोटे नगरों जैसे  इलाहाबाद और बनारस में ही  मिलते हैं -आये दिन हांका लगता ही रहता है ,अरे भाई मिश्रा जी हम बनारस पहुँच रहे हैं आपसे मिलना है -और हम छोटे शहरों के ब्लॉगर कितना फालतू हैं न -हर वक्त सुलभ हैं! आप भी  जब चाहें ट्राई कर सकते हैं . मगर सच यह भी है कि दिल्ली का विस्तार और महानगरीय समस्याएँ लोगों को बहुत सहज होने से हठात रोक देती हैं ..कोई उलझन ही रही होगी जो वो भूल गया मेरे हिस्से में कोई शाम सुहानी लिखना ...अब इतना बुडबक भी  नहीं हैं हम ......

बहरहाल ले देकर किसी तरह अकेलेपन का साढ़े पांच बजा और ठीक समय पर हम उड़ चले तिरुवनंतपुरम की ओर ....भारत की लम्बी डोमेस्टिक उड़ानों में से एक उडान ......दिल्ली एयरपोर्ट का  सिक्योर्टी होल्ड लाउंज और उसमें लगे दो बड़े अक्वेरियम बहुत आकर्षित कर रहे थे-एक दक्षिण भारतीय व्यंजनों का काउंटर   है -वहां कुछ क्षुधापूर्ति भी हुई-मीनू की दरें तो आसमान छूती हैं मगर खाने के आईटम पूरे यम यम हैं .दिल्ल्ली से कोचीन होकर इस विमान  को दस बजे तिरुवनंतपुरम  पहुंचना था ...एक लम्बी यात्रा थी यह .....

जारी ....

24 टिप्पणियाँ:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

चलिए यात्रा चल पड़ी। पिछली कड़ी में तो हमें भी समझ नहीं आ रहा था कि कैसे आप तिरवनंतपुरम पहुँचे होंगे।

बी एस पाबला ने कहा…

सारा ध्यान उधर ही चला गया
कि
फालतू ब्लागर तो छोटे छोटे नगरों में ही मिलते हैं -आये दिन हांका लगता ही रहता है, अरे भाई हम पहुँच रहे हैं आपसे मिलना है
हम छोटे शहरों के ब्लॉगर कितना फालतू हैं हर वक्त सुलभ हैं! आप भी जब चाहें ट्राई कर सकते हैं


सही है, सच कब तक छुपा रहेगा :-)

Vivek Rastogi ने कहा…

यह चिरकुटाई नहीं है यह तो हम अपने कर्ज का बोझा जल्दी से जल्दी उतारने के लिये प्लान करते हैं, और अंदाजा भी लगा लेते हैं कि कितना बोझ है, पर यह सब कभी न कभी सभी के साथ होता ही है।

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

दोस्त की परीक्षा क्यों ली जाती है !

अजित वडनेरकर ने कहा…

आखिर चल पड़ी यात्रा। फ्लाईट का इंतजाम होने का प्रसंग जानना दिलचस्प रहा।
उधारी तो बला है...

sangeeta swarup ने कहा…

विपत्ति में ही मित्रता की पहचान होती है....संस्मरण रोचक है.

ललित शर्मा ने कहा…

वैसे ट्रेन द्वारा दिल्ली से तिरवनंतपुरम जाने की सोच कर ही बुखार चढने लगता है। वह भी गर्मी के दिनों में।
बरसात के मौसम में ट्रेन द्वारा सेलम से तिरवनंतपुरम का सफ़र आनंददायी हो जाता है

बहुत बढिया स्मरण,
अब आगे की कथा का इंतजार है।

zeal ने कहा…

Mr. Ved Vyasa, kindly hire one 'Ganesha' to write/type for you, but please complete the 'sansmaran' in just one go....commercial breaks are annoying .

Smiles.

Arvind Mishra ने कहा…

Kindly bear with me Zeal ,its a long story I cant cut it short and Mahabharat was also not written in just one volume but yes i could give it a try if only you accept to be my Ganesha of this venture !
If you remember the myth Ganesha accepted the condition put forth by Vyas.
Waiting for your reply.

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

रोचक लगे आपके यह यात्रा संस्मरण .

Babli ने कहा…

बहुत ही बढ़िया और रोचक संस्मरण रहा! मैं जब दिल्ली में थी तो वहां से ट्रेन द्वारा कोचीन गयी थी जो मेरा सबसे लम्बा सफ़र था और गर्मी थी काफी उस समय! आजकल तो मुश्किल से ट्रेन द्वारा यात्रा करती हूँ!

zeal ने कहा…

btw...the condition put forth was by Ganesha and not by Maharshi Vyasa.

Arvind Mishra ने कहा…

Right Zeal,thanks!
But it was reciprocated in the same zeal and the second condition came from Vyas!
But my proposal still stands -are you ready to be my Ganesha? Yes I shall dictate to you ceaselessly and without any pause but YOU wont have to write anything without fully understanding it!
Cheers!

Udan Tashtari ने कहा…

bबढ़िया है मित्र मिल गये तो यात्रा जारी रही..ईश्वर ऐसे मित्र सबके बनाये रखे!! जय हो..आगे जारी रहें.

Shastri JC Philip ने कहा…

लगता है कि यात्रा संस्मरण पर आपकी उतनी ही पकड जितनी वैज्ञानिक लेखन विधा पर है।

सस्नेह -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

राज भाटिय़ा ने कहा…

मजे दार जी लेकिन आप की फ़लाईट छुटी केसे? चलिये अब पहुच तो गये होंगे आगे का हाल विस्तार से लिखे, वेसे मुझे ओर मेरे बच्चो को बहुत शोंक है एक बार भारत की लम्बी दुरी की ट्रेन मै बेठने का, लेकिन् जब रोज देखते है की चलती ट्रेन मै लूट लिया तो दिल के अरमा दिल मै ही दफ़न करने पडते है

mukti ने कहा…

कोस लीजिये सबलोग (आपके साथ पाबला जी भी शामिल हैं) मिलकर महानगर वालों (दिल्ली वालों) को. दर्द तो हमारा कोई जानता नहीं. एक दिन पानी न आये तो हाय-हाय मच जाती है और ’छोटे महानगरो” (बनारस और इलाहाबाद छोटे शहर नहीं हैं) की तरह यहाँ हैंडपंप नहीं होते, जो गये और एक बाल्टी भर लाये और तिमंजिले पर लेकर सर-सर चढ़ गये.
ख़ैर, संस्मरण तो आपका बड़ा एक्सीडेंटमय होता है. इतना टेक्नोफ़ोबिक भी नहीं होना चाहिये कि ए.टी.एम. कार्ड जैसी महत्त्वपूर्ण चीज़ न ले जायें अपने साथ. कहते हैं कि विदेश में धन ही मित्र होता है. वो तो कहिये कि सिंह साहब मिल गये, नहीं तो आप क्या करते????

अभिषेक ओझा ने कहा…

ऐसे जुगाडू मित्र भगवान् सबको दें :)

zeal ने कहा…

Yes, would love to be your Ganesha...lol

@ Mukti

may God bless us with "Singh" kinda finacial friends.

A friend in need , is a friend indeed.

Raviratlami ने कहा…

कमाल है, आपके जैसा टेक्नोक्रेट भी टेक्नोफ़ोबिक हो सकता है! एटीएम वगैरह तो अब आवश्यकता है. जेब में नकदी रखने की जरूरत ही नहीं.

बहरहाल, हमारी केरल यात्रा भी 5 अप्रैल को शुरू हो रही है. तिरूवनंतपुरम और आसपास देखने/रहने इत्यादि के कुछ टिप देंगे तो हमारा भी भला होगा. आपका ईपता ढूंढ रहा था नहीं मिला इधर कहीं तो यहीं निवेदन कर दिया :) पर कृपया जवाब मेरे raviratlami एट gmail.com पर भेजें तो अच्छा रहेगा.

Arvind Mishra ने कहा…

There seems to some trouble in publishing on of the cutest remarks of Zeal -its here-

Yes, would love to be your Ganesha...lol

@ Mukti

may God bless us with "Singh" kinda finacial friends.

A friend in need , is a friend indeed.

@..and am your Vyasa but how the game would materialize? Any insight?

P.N. Subramanian ने कहा…

. शुभ यात्रा .

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

एक फोन काल नें यात्रा सुखमय कर दी वर्ना यात्रा अझेल होती.

हिमांशु । Himanshu ने कहा…

आपको जो मिलेंगे और मित्र की श्रेणी में आकर ठहर जायेंगे, वह सच्चे/पक्के ही न होंगे-सदैव परीक्षा में खरे उतरने वाले !
साफगोई आपकी और सद्भाव - इन सदगुणों के रहते अच्छे मित्र ही मिलेंगे आपको !
खूबसूरत लिखाई !

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