Monday, 15 March 2010

गाली गलौज की भाषा और ब्लागजगत

अभी उसी दिन मुझे बताया गया कि मैं बहस मुबाहिसों के दौरान अधिकतर अपशब्दों /अब्यूजिव मतलब गाली गलौज की भाषा का प्रयोग करता हूँ और वह भी खास तौर पर नारियों के लिए .यह मेरे लिए असहज हो उठने की स्थिति थी मगर उससे कहीं बढ़कर आत्मान्वेषण का एक सुनहरा मौका भी सहज ही उपलब्ध हो गया था -कबीर वाणी ऐसे ही मौकों के लिए है -कबिरा निंदक राखिये आँगन कुटी छवाय ......मैंने कुछ तो आत्मान्वेषण किया और कुछ सिंहावलोकन (सिंह आदत के अनुसार पीछे मुड़ मुड़ कर देखता है इसलिए शब्द बना सिंहावलोकन )  . नैसर्गिक न्याय का तकाजा है कि किसी को भी अपना पक्ष रखने का मौका जरूर  दिया जाना चाहिए .इसी भावना से मैंने आरोपकर्ताओं से उन स्पेसफिक दृष्टान्तों की मांग की जिसमे उन्हें ऐसी प्रतीति हुई कि मैंने कथित अपशब्द और गाली गलौज की भाषा का इस्तेमाल किया है तो उसका उत्तर अभी तक नहीं दिया गया! मुझे सामाजिक जीवन में होशोहवाश के साथ चालीस वर्ष और एक सरकारी मुलाजिम के तौर पर छब्बीस वर्ष के खट्टे मीठे अनुभव होने को आये .मैंने देखा है कि आम भारतीयों की एक आदत बिना दृष्टांत के आरोप लगाने की भी होती है -ऐसे कई मामलों में जांच पड़ताल के बाद कुछ नहीं मिलता और समय संसाधन की जो बर्बादी होती है सो अलग -आरोप प्रत्यारोप भी हमारे राष्ट्रीय चरित्र में बहुत गहरे घुसा हुआ है और इसके मनोविश्लेषण पर रोचक  तथ्य प्रकाश  में आ सकते हैं -मसलन इस संकल्पना पर मनोविश्लेष्णात्मक अध्ययन आगे बढाया जा सकता है कि कहीं परिस्थितियों से उपजे गहरे नैराश्य और   जीवन से हार मान   चुके  लोगों के लिए अपने "वेजिटैटिंग" वजूद का अहसास कराते रहने में  आरोप  एक तिनके का सहारा तो नहीं है ? यानि  वे अपनी अस्मिता की मौजूदगी को  बस दर्शाते  रहना चाहते हों ? बहरहाल यह भी एक कयास है और इसके आधार पर कुछ निर्णयात्मक तौर पर नहीं कहा जा सकता !

लोकतंत्र में असहमति को बड़ा सम्मानित दर्जा मिला है मगर असहमति ठोस तथ्यों और बुनियादों पर आधारित होना चाहिए न कि केवल मन की भड़ास या अन्य किन्ही दीगर कारणों से हुई खुन्नस को  दूर करने का एक जरिया .कई गलत आरोपों या जनहित याचिकाओं पर अदालतों ने अपना समय जाया करने के लिए वादी  को कड़ी फटकार लगाई है -कुछ लोग जन्मजात निंदक/सायनिक  होते हैं -उन्हें दुनिया के सकारात्मक मामलों में भी कोई न कोई नुक्स नजर आ ही जाता है मगर शायद यह भी प्रकृति की व्यूह रचना है और जरूर इसका कोई सकारात्मक पहलू होगा -कबीर जैसे  संत ने इसलिए निंदक की भूमिका को स्वीकार किया!

भाषा का जहाँ तक सवाल है वह औपचारिक और अनौपचारिक संवादों के कितने ही वितानों ,विविध रूपों के  बीच अठखेलियाँ खेलती रहती  है .हम किसी गहरे दोस्त ,लगोटिया यार को दखते ही "अबे साले इतने दिनों तक कहाँ रहे " का उद्घोष कर सकते हैं और भी स्थानीय जुमलों /फिकरों (स्लैंग्स ) का इस्तेमाल कर सकते हैं -मगर औपचारिक अवसरों पर हम इन भावाभिव्यक्तियों  के प्रयोग से बचते हैं -अभी ब्लागजगत अपनी भाषा शैली को नियत करने में जुता/जुटा  हुआ है -आये दिन इसलिए ही तकरारें हो रही हैं नए नए शब्द भी गढ़े जा रहे हैं ,प्रचलन में आ रहे हैं और उतनी ही तेजी से प्रचलन से बाहर भी हो रहे हैं .मैं मानता हूँ कि बचपन में गाँव के लालन पालन के कारण मेरी भाषा में कुछ भदेसपन हो सकता है -कुछ गवयीपन हो सकता है कुछ ग्रामीण स्लैंग हो सकते हैं मगर मैं किसी के लिए गाली गलौज की  भाषा का प्रयोग करता हूँ यह जानकर मुझे हैरत हुई है .कई बार शब्दों के प्रयोग परिप्रेक्ष्य से अपरिचित होने पर भी गलतफहमियां हो सकती हैं .मैं अगर यह कहकर अपना स्व-औचित्य भी सिद्ध कर रहा हूँ तो केवल इसलिए कि मुझे अभी तक यह पुख्ता प्रमाण नहीं दिए गए हैं कि मैंने कब कहाँ और किसके लिए अब्यूजिव भाषा का इस्तेमाल किया है .

वैसे भी भाव सर्वोपरि है -भाषा तो बस भावों की चेरी है -यह कुछ रानी और चेरी की जुगलबंदी का मामला है. अब भाषा कहीं भाव की बराबरी कर पायेगी ? कहाँ राजा भोज और कहाँ गंगू तेली ? हम भावों पर ध्यान दें तो कई बार शब्दों के अनायास घावों से बच सकते हैं .आज इस पोस्ट के माध्यम से मन  की एक फाँस निकालने की कोशिश  की है -कभी कभी कुछ बातें प्रत्यक्षतः सुभाषित होकर भी मन को डंक की तरह बेध जाती हैं और फिर बिना  कुछ कहे चैन नहीं पड़ता ...आज की रात कुछ चैन से सो पाउँगा ....आप सभी को भी शुभरात्रि !
१५.३.१० ,९ बजे रात्रि

46 comments:

विनोद कुमार पांडेय said...

विभिन्न प्रकार के लोग हैं और विभिन्न प्रकार की बातें..कभी कभी ऐसी बात हो जाती है जिससे दिल दुख जाता है..शारदीय नवरात्रि की हार्दिक शुभकामना..अरविंद जी

डॉ. मनोज मिश्र said...

लोकतंत्र में असहमति को बड़ा सम्मानित दर्जा मिला है मगर असहमति ठोस तथ्यों और बुनियादों पर आधारित होना चाहिए न कि केवल मन की भड़ास या अन्य किन्ही दीगर कारणों से हुई खुन्नस को दूर करने का एक जरिया .कई गलत आरोपों या जनहित याचिकाओं पर अदालतों ने अपना समय जाया करने के लिए वादी को कड़ी फटकार लगाई है -कुछ लोग जन्मजात निंदक/सायनिक होते हैं -उन्हें दुनिया के सकारात्मक मामलों में भी कोई न कोई नुक्स नजर आ ही जाता है मगर शायद यह भी प्रकृति की व्यूह रचना है और जरूर इसका कोई सकारात्मक पहलू होगा -कबीर जैसे संत ने इसलिए निंदक की भूमिका को स्वीकार किया!..
इस बात से सहमत हूँ ,लेकिन कुछ चंद लोंगो को स्पष्टीकरण की जरूरत क्या है ,लेखन तो स्वान्तः सुखाय है न.
नवरात्रि और नये संवत की शुभकामना.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

डाक्टर साहब, क्यों दुखी होते हैं। आप ने कभी किसी का असम्मान नहीं किया। बुरी तो कोई भी बात लग सकती है। उस का क्या? आप अपना काम किए जाइए।

गिरिजेश राव said...

@ कहीं परिस्थितियों से उपजे गहरे नैराश्य और जीवन से हार मान चुके लोगों के लिए अपने "वेजिटैटिंग" वजूद का अहसास कराते रहने में आरोप एक तिनके का सहारा तो नहीं है ? यानि वे अपनी अस्मिता की मौजूदगी को बस दर्शाते रहना चाहते हों ?
सोचने लायक बात है
गाली साली दिल पर लेने की चीज नहीं होतीं - चाहे अपनी हों या दूसरे की - एक से अपना अमन चैन जाता है तो दूसरी से परिवार का।
ठर्र मार सोइए।

बी एस पाबला said...

गुरदास मान का गाया एक बेहतरीन गीत है, जिसके बोल कुछ इस तरह है कि
बाकी सब बातें छोड़ें, दिल साफ होना चाहिए

शुभरात्रि

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

चलिए अच्छा हुआ कि मन की ये फाँस भी पुराने साल में निकल गई...अब नूतनवर्ष हर्षोल्लास से मनाया जाए!!
शुभकामनाऎँ!!!

शरद कोकास said...

इतना भावुक होकर मत सोचिये अरविन्द जी । आपकी भावनाओं से आपने अवगत कराया इसके लिये धन्यवाद । नव वर्ष की शुभकामनायें ।

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

हाथी चले बाजार , कुत्ता भूंके हजार...

लड्डू बोलता है...इंजीनियर के दिल से....
laddoospeaks.blogspot.com

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

अपनी बात उदाहरण से स्पष्ट करते तो बेहतर होता। कौन से आरोप थे और उनके समर्थन में कौन सी पोस्ट/टिप्पणी का उदाहरण दिया गया। यह मामला कुछ स्पष्ट नहीं हुआ। आप ने अपनी सफ़ाई पेश करते हुए जो कारण गिनाए हैं उनका भी सोदाहरण उल्लेख करें तो हम जैसे अज्ञानी भी कुछ सीख सकें :)

यदि ठोस उदाहरण नहीं आते तो आपकी चिन्ता व्यर्थ कही जाएगी। वैसे आप बिन्दास लिखते रहिए।

मैंने कुछ तो आत्मान्वेषण किया और कुछ सिंहावलोकन (सिंह आदत के अनुसार पीछे मुड़ मुड़ कर देखता है इसलिए शब्द बना सिंहावलोकन )”

यानि बात-बात में आपने अपने मुँह से अपने आपको सिंह कह ही दिया। इसपर यदि किसी अन्य सिंह या सिंहनी एतराज हो तो मुझे दोष मत दीजिएगा।:)

manu said...

:)

manu said...

-कभी कभी कुछ बातें प्रत्यक्षतः सुभाषित होकर भी मन को डंक की तरह बेध जाती हैं और फिर बिना कुछ कहे चैन नहीं पड़ता ...आज की रात कुछ चैन से सो पाउँगा ....आप सभी को भी शुभरात्रि !
१५.३.१० ,९ बजे रात्रि
posted by Arvind Mishra at 21:04 on 15-Mar-2010





aaaj kyaa vishesh baat hai.....??

प्रवीण शाह said...

.
.
.
आदरणीय अरविन्द मिश्र जी,

बाकी सारी गल्लां छड्डो, दिल साफ होना चाही दा!

मैं जानता हूँ कि आपका दिल साफ है, सोईये चैन से , बच्चे की मानिंद !
शुभरात्रि !

राज भाटिय़ा said...

आप को नव रात्रो की बहुत बहुत बधाई.....

Udan Tashtari said...

नव संवत्सर 2067 व नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाएं


-आरोप प्रत्यारोप, सबूत आदि सब बाहरी और बेवजह बातें हैं, यह सब बनाई बिगाड़ी जा सकती हैं और इनकी ज्यादा लम्बी उमर नहीं होती. जरुरी है शांतिपूर्वक ईमानदार आत्म- विश्लेषण.

अगर इसके बाद भी महसूस हो कि आप सही हैं तो सही वरना जो सुधार आवश्यक समझ आये, उसका क्रियांवयन किया जाये.

यह मेरी समझ है इस तरह की बातों पर, तो कह दिया.

Suman said...

nice

प्रवीण शाह said...

.
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.
अरे भाई हमारी 'मानस पुत्री' टिप्पणी कहाँ चली गई जो हमने रात सोते समय की थी?

manu said...

पर मिश्रा जी जाने कैसे दें...
मसाला जो मिला हुआ है..पोस्ट डालने वास्ते...

निर्मला कपिला said...

आप दुखी और इतने भावुक क्यों हो रहे हैं? तब हम जैसे लोगों का क्या होगा? सब तरह के लोगों मे तो सुनो सब की और करो अपनी वाली बात पर ही चलना चाहिये। आपको नव संवसतर की शुभकामनायें

Dr. Smt. ajit gupta said...

बीती ताय बिसार दे, आगे की सुध ले। नवसम्‍वतसर की हार्दिक शुभकामनाए।

अल्पना वर्मा said...

-कहने वाले का उद्देश्य आप को मानसिक कष्ट देना था,उसका उद्देश्य पूरा हो गया.
-डॉ.मनोज मिश्र जी की बात से सहमत.

रचना said...

केवल इसलिए कि मुझे अभी तक यह पुख्ता प्रमाण नहीं दिए गए हैं कि मैंने कब कहाँ और किसके लिए अब्यूजिव भाषा का इस्तेमाल किया है .

it largely depends on how you take the world , if you believe what ever was taught to you when you were in prep or nursery { perhaps in villages prep and nursery does not exist } you can implement today without refining it with experience of self and others and change in time then what ever you may say may sound "objectionable" to others . since you want an discussion here i can site examples where what you wrote was obnoxious to others but then you will permit thousand of comments from people who believe in character slandering { and when you permit that you are doing something atrociously objectionable and dr arvind you have done it for me } i can give you many examples where you cross the limit not just for me but or many others . on blogs we can trash each others writing but we dont trash each others character , we dont permit comments which slander other persons images and if after moderation you permit it you are either still in prep or nursery or you feel that is what has to be done . then why crib when others do it for you

रचना said...
This comment has been removed by the author.
Arvind Mishra said...

@रचना जी ,
कृपया मुझे स्पेसफिक दृष्टांत दे कि कब मैंने आपके विरूद्ध कौन सी गाली गलौज की भाषा इस्तेमाल की जबकि आपके द्वारा मुझे ही नहीं अनेक ब्लागरों के सम्मान के विरुद्ध आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया गया है -मुझे पढ़ा लिखा जाहिल कहा गया और यह तक भी कहा गया कि मैंने आपका यौनिक शोषण किया है -आपने शाष्त्री जी के विरुद्ध ज्ञानदत्त जी के विरुद्ध ,सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी के विरुद्ध -लम्बी सूची है -आक्षेपजनक भाषा का इस्तेमाल किया-मैं यह कह सकता हूँ की ब्लॉग जगत में पारस्परिक सौहार्द बिगाड़ने में आपके व्यक्तिगत नैराश्य और कुंठा ने एक बड़ा और भर्त्सना योग्य योगदान दिया है -
अब आप किस मुंह से दूसरे को शिक्षा दे रही हैं ?
मैं स्पेसफिक दृष्टांत और उदाहरण मांग रहा हूँ -नारी जगत मात्र सुश्री रचना सिंह ही नहीं हैं !अकेले आप एक ऐसा जेहाद चला रही है जिसने केवल घृणा और असहिष्णुता का ही वातावरण पैदा किया है -
दूसरों के चरित्र हनन की अपनी इस मानसकिता से बाज आयें -और सम्मान करना सीखें -जाहिर है अगर आप दूसरों का सम्मान करना नहीं सीख सकीं है अभी तक (जिस भी स्कूल कालेज में आपने शिक्षा पाई हो ) तो दूसरों से सम्मान की अपेक्षा न करें ! और उन उदाहरणों के भी दें जहां मैंने गाली गलौज की भाषा का इस्तेमाल किया है -अन्यथा अनर्गल प्रलाप और चरित्र हनन का यह त्रिया -चरित्र बंद karen !

रचना said...

now that where the difference is in your comment and in my comment . you lost your cool the moment you saw my comment .
you say i have आपने शाष्त्री जी के विरुद्ध ज्ञानदत्त जी के विरुद्ध ,सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी के विरुद्ध -लम्बी सूची है -आक्षेपजनक भाषा का इस्तेमाल किया-मैं यह कह सकता हूँ की ब्लॉग जगत में पारस्परिक सौहार्द बिगाड़ने में आपके व्यक्तिगत नैराश्य और कुंठा ने एक बड़ा और भर्त्सना योग्य योगदान दिया है -
do you have permission written from all of them to question me or is it PIL
depending on it i will readdress this issue

when i write against a blog post i write against the post and not against the blogger till the time the blogger starts a group slandering then i also MAKE IT A POINT TO HIT BACK . give me one example where i have written one single comment about any blogger , his family , his home address , his work profile which has been done agianst me by very reputed blogger group

i differentiate between blog and blogger but when i said पढ़ा लिखा जाहिल it was when you commented on my body structure and when you commented . i can still give the link

you have once sent me mail saying

"cant you be little submissive "when i had asked to delete comments on your sci blog which were against me

now who gives any one a right to ask others to be submisive

on vani geets blog you have said you feel that you do all this for the sake of fun { shall i give the link }??

zeal said...

There is no end of accusations and explanations. So its wise to forgive and forget.


"bygones are bygones , let them not trouble you now "

We all are human beings. To err is quite natural. Only self analysis can guide us about right or wrong. If one realizes his/her mistake , then one must apologize, otherwise just move on. Personal attacks or cribbing is not a sign-symptom of literate people.

ताऊ रामपुरिया said...

आपको नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं.

रामराम.

वाणी गीत said...

@ रचना जी,

कृपया ब्लॉगजगत में वैमनस्यता के माहौल को दर्शाने के लिए मेरे ब्लॉग लिंक का प्रयोग ना करें...
अरविन्दजी मेरे ब्लॉग मित्र रहे हैं .....लम्बे समय से ब्लॉग लेखन में अरविन्दजी से परामर्श और विचार- विमर्श करती रही हूँ ....इसलिए अरविन्दजी का जो कमेन्ट मुझे बुरा लगा या लगेगा ...मैं उसका विरोध खुद कर सकती हूँ /करती हूँ ....मुझे जो शिकायत होगी मैं खुद कहूंगी ....ये मेरा व्यक्तिगत मामला है ... यदि मुझे आपकी मदद की आवश्यकता होगी तो आपसे अवश्य कहूँगी ...

बेशक आपके खिलाफ प्रयुक्त उनकी शब्दावली पर आप जो चाहे ...कहें ....

वाणी गीत said...

@ अरविन्दजी ,
आपसे भी विनम्र निवेदन है कि आप निरर्थक मुद्दों पर बहस ना करे ...कृपया हिंदी ब्लोगिंग को अखाडा और शक्ति प्रदर्शन का केंद्र ना बनाये ...वैसे तो आपको कौन कुछ कह सकता है ...आप करेंगे वही जो आपका मन करेगा ....

रचना said...

कृपया ब्लॉगजगत में वैमनस्यता के माहौल को दर्शाने के लिए मेरे ब्लॉग लिंक का प्रयोग ना करें...
if you are writing something on the blog not just me but any one can take a link and write i still have to give the link and i will do it only once mr arvind mishra says yes

रचना said...

on vani geets blog you have said you feel that you do all this for the sake of fun { shall i give the link }??

is about dr arivnds comment on your post and not about vani your post

ललित शर्मा said...

आपको नव विक्रमी संवत एव नवरात्र की हार्दिक शुभकामनाएं।

Arvind Mishra said...

Dear Ms.Rachana ,
"i differentiate between blog and blogger but when i said पढ़ा लिखा जाहिल it was when you commented on my body structure and when you commented . i can still give the link"
जहां तक याद है मैंने कहा था कि आप "...किसी बात की चिंता में काहें दुबली होती हैं -कोई भी कह दे की इस वाक्य का मतलब नारी की शरीर सरंचना से है ?
यहाँ मैं आपकी समझ को दाद देता हूँ हा हा ....
"cant you be little submissive "when i had asked to delete comments on your sci blog which were against me

now who gives any one a right to ask others to be submisive
आप तो अंगरेजी की बड़ी ज्ञाता हैं -सबमिसिव का यहाँ मंतव्य है विनम्र होने से ..और यह बात भी विनम्रता से कही गयी थी
आप इतना ही दृष्टांत जुटा पायीं ?
बहरहाल मैं अब इसे विराम देता हूँ -अगर आपको कुछ और कहना हो तो आपका नारी ब्लॉग तो है ही ना
वहीं मैं विनम्रता से जवाब भी दे दूंगा ......प्लीज लिव एंड लेट लिव

वाणी गीत said...

@ अरिव्न्दजी
पहले कमेन्ट में पेस्ट होने से रह गया ...

लेकिन समय समय पर आपके रचनाजी और अन्य नारियों के खिलाफ दिए गए कमेन्ट से मैं बहुत क्षुब्ध हूँ ...और आपसे आशा रखती हूँ कि अपनी विद्वता को कायम रखते हुए आप किसी भी नारी के खिलाफ सभ्य और सुसंस्कृत भाषा का प्रयोग करेंगे ...

Arvind Mishra said...

@जी, वाणी जी .
भविष्य के लिए नोट किया -वो क्या कहते हैं न पल्लू में (अब इसका जो भी पुरुषीय काउंटर पार्ट हो !) बाँध लिया!
अब तो हंस दीजिये बड़ी गुस्से में लग रही हैं!

DR. ANWER JAMAL said...

Thanks for this nice post.

रचना said...

ShabdkoshEnglish Hindi Dictionary | अंग्रेज़ी हिन्दी शब्दकोशEnter English or Hindi word Use on-screen keyboard utility to enter text.
1. Note that matra is added after the consonant.
2. To make half letters in 'Romanized' keyboard, use 'halant' by pressing the '/' key.



.
HomeAboutContributeQuote of the DayWord of the DayForumsHelpShopContactsubmissive
Pronunciation
सब्मिसिव

Meanings[Show Transliteration]
adjective
1.अधीन
2.आज्ञाकारी
3.दब्बू
4.वशवर्ती
5.विनम्र



Synonyms
slavish, subservient

Antonyms
domineering

Definitions
adjective

1.inclined or willing to submit to orders or wishes of others or showing such inclination
Example: a submissive reply|replacing troublemakers with more submissive people
2.abjectly submissive; characteristic of a slave or servant
Example: a slavish yes-man to the party bosses|she has become submissive and subservient


submissive - 4 dictionary results
sub·mis·sive   /səbˈmɪsɪv/ Show Spelled[suhb-mis-iv] Show IPA
–adjective
1.inclined or ready to submit; unresistingly or humbly obedient: submissive servants.
2.marked by or indicating submission: a submissive reply.
Use submissive in a Sentence
See images of submissive
Search submissive on the Web

--------------------------------------------------------------------------------

Origin:
1580–90; submiss + -ive

—Related forms
sub·mis·sive·ly, adverb
sub·mis·sive·ness, noun
non·sub·mis·sive, adjective
non·sub·mis·sive·ly, adverb
non·sub·mis·sive·ness, noun
qua·si-sub·mis·sive, adjective
qua·si-sub·mis·sive·ly, adverb
un·sub·mis·sive, adjective
un·sub·mis·sive·ly, adverb
un·sub·mis·sive·ness, noun


—Synonyms
1. tractable, compliant, pliant, amenable. 2. passive, resigned, patient, docile, tame, subdued.


—Antonyms
1. rebellious, disobedient.

Arvind Mishra said...

@1.अधीन
2.आज्ञाकारी
3.दब्बू
4.वशवर्ती
5.विनम्र
(From your submission only)

Jandunia said...

अभिव्यक्ति शालीनता के साथ की जाए तो ज्यादा बेहतर

रचना said...

1.inclined or willing to submit to orders or wishes of others or showing such inclination
Example: a submissive reply|replacing troublemakers with more submissive people

for your kind attention

विवेक सिंह said...

कहाँ कीड़े मकोड़ों से उलझ गए ?

mukti said...

"मैं मानता हूँ कि बचपन में गाँव के लालन पालन के कारण मेरी भाषा में कुछ भदेसपन हो सकता है -कुछ गवयीपन हो सकता है कुछ ग्रामीण स्लैंग हो सकते हैं."
शायद समस्या यहीं है. जिस भाषा को आप सहज रूप से बोल सकते हैं, वही दूसरे को आपत्तिजनक लग सकती है, क्योंकि वह आपके जैसे परिवेश से नहीं है. इसलिये टिप्पणी करते समय इस बात का ध्यान रखें कि ग्राम्य भाषा का प्रयोग वहीं करें, जहाँ वह उसी रूप में समझी जा सके.

Springmelodies said...

Really Sad and Feel bad for you !
So many attackers!!!!OMG!
Get your self protection shield soon.
All the best.Hope You come out safe.

अभिषेक ओझा said...

हरे कृष्ण !

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

कुछ निष्कर्ष निकाल सके कि नहीं प्रभु जी? :)

प्रवीण पाण्डेय said...

सत्य ही की जय हो ।

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

प्रवीण जी से सहमत...

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