शनिवार, 6 मार्च 2010

इस बार बच गया है अभिमन्यु मगर......

मुझे आज लिखना था साईब्लाग पर ,नर नारी समानता पर अगली पोस्ट मगर मन  इतना व्यथित है कि आज कोई भी सार्थक लेखन नहीं हो सकेगा -तो यह निरर्थक ही सही! मगर खुशी भी  इस बात की है कि इस बार बच गया अभिमन्यु ,वह मरा नहीं है -किस तरह से एक अभिमन्यु   पर कल कितनी ही दुखी -दमित कामनाएं,ब्रिहन्न्लायें और शिखन्डी तथा एक शकुनी मामा/जयद्रथ   टूट पड़े और  जितना कुछ संभव था नोच खसोट कर उसे क्षत विक्षत किया गया .भारतीय संस्कृति का भाष्य दर भाष्य होता रहा! क्या गलत कह दिया मिथिलेश ने कि महिलायें सार्वजनिक स्थलों पर सलीके से कपडे पहना करें -और यह भारतीय महिलाओं के लिए ही क्यों पूरी दुनिया की महिलाओं को लेकर क्यूं  नहीं  एक  उचित हिदायत  है ? कपडे तो सुरुचिपूर्ण होने ही चाहिए! क्यों होने चाहिए कान खोल कर सुन लीजिये, मैं बताता हूँ - कुछ पश्चिमी देशों में अनावृत्त वक्ष की वेटर ग्राहकों को सर्व करती हैं -मगर बाकायदा इसके लिए उन्हें प्रशिक्षित होना पड़ता है कि कि वे अपने   वक्ष अग्रकों को पुरुष ग्राहकों से कैसे बचाती रहें -क्योकि प्रायः पुरुष ग्राहक अचानक और सहज ही उन्हें छूने   के लिए अपने हाथ  बढा देते हैं -इसलिए कि उनके वक्ष अग्रक तीव्र नैसर्गिक उद्दीपन का प्रभाव डालते हैं -व्यवहार विज्ञानियों के शब्दों में उनके वक्ष अग्रक तीव्र "sign stimulus "  हैं जो "stimulas bound response   " के लिए पर्याप्त उद्दीपन देते हैं .

यह  तथ्य है कि नारी के खुले दैहिक क्षेत्र ऐसे तीव्र उद्दीपन उत्पन्न करते हैं -नगरीय मनुष्य इनके साथ रहता हुआ इनके प्रति काफी सीमा  तक असंवेदित होता  जाता है मगर वह भी अनदेखे उघारों पर उद्वेलित हो सकता है .किशोर और युवा तो सहज ही इनके प्रति रिएक्ट करते हैं -तो इसमें कहीं कोई अनुचित बात नहीं है कि पहनावे में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए -अब नारीवादी इन बातों पर हो हल्ला मचाएं तो मचाते रहें -जो वैज्ञानिक तथ्य है वह झुठलाया नहीं जा सकता! जब ड्रेस कोड की बाते होती हैं तो इनके पीछे यही भाव होता है -किसी भी लोक तांत्रिक व्यवस्था में पहनावे पर कोई रोक नहीं है -जो भी पहनना हो पहने -हाँ अपनी रिस्क पर -वेलफेयर स्टेट आपको बचाने हर जगह मौजूद नहीं है!

मुझे पर- मुखापेक्षिता नहीं आती -अपने बड़े सीनियरों से भी लड जाता हूँ -दुरभिसंधियां नहीं बनाता ,बेनामी टिप्पणियां नहीं  करता और इसकी कीमते भी चुकाता रहता हूँ ,बड़ी कीमतें भी -पर जैसा हूँ हूँ मुझे खुद से कभी कोई गिला शिकवा नहीं रहा -मुझे फख्र है कि अपने ऊपर कि मैं किसी भीष्म को मारने में शिखंडी नहीं बनता और न ही अकेले अभिमन्यु के वध के लिए किसी जयद्रथ की भूमिका में रहता हूँ -अब जिन्हें इन बातों पर जितनी लफ्फाजियां सूझे वे मुखर हो उठें जिसे रिझाना चाहें रिझाएँ और शिष्टता का ढोंग करना चाहें करें -मुझे मालूम है कि हमाम में कौन कौन नंगे हैं!

इस बार बच गया है अभिमन्यु मगर जयद्रथ बचेगा या नहीं -देखा जाना शेष है .....

35 टिप्‍पणियां:

  1. इस बार बच गया है अभिमन्यु मगर जयद्रथ बचेगा या नहीं -देखा जाना शेष है .....

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  2. अक्सर सोचता हूं कि अभिमन्यु ही क्यों हमेशा चक्रव्युह मे फ़ंसता है? ये जयद्रथ कभी क्युं नही फ़ंसता?

    रामराम.

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  3. संशोधन - बृहन्नला
    @ मिथिलेश ने कि महिलायें सार्वजनिक स्थलों पर सलीके से कपडे पहना करें।
    इतने पर ही हंगामा है तो बेहूदा है। यौनांगों के गोपन की पूर्ति करते हुए वस्त्र सौन्दर्य और अवसरोचित गरिमा के लिए आवश्यक हैं। परिवेश और अवसर के अनुकूल होने ही चाहिए - पुरुष नारी दोनों के लिए।
    कुछ प्राकृतिक विशेषताएँ, कुछ पुरुष प्रधान समाज का होना और संतान वहन और जननी होने के कारण नारी के जिम्मे कुछ अधिक ही आता है।
    अतिवादी इससे घुटन महसूस करते रहे हैं। आश्चर्य नहीं कि प्रतिक्रिया में संतान धारण न करने और गर्भाशय निकलवा देने तक की बातें हुई हैं।
    वैसे पहनावे के बारे में अब समाज अधिक सहिष्णु हो चला है,शालीनता की सीमा में सब स्वीकार्य है। शालीनता की सीमा अलग अलग समाजों में अलग अलग हो सकती है, बन्द विशिष्ट पार्टिय़ों में अलग हो सकती है लेकिन सार्वजनिक स्थलों पर तो उनके कायदे मानने ही पड़ेंगे। अतिवादी तो हमेशा बुरे होते हैं। इस मामले में भी रंग दिखा दिए - कौन सी नई बात है ?
    आप अपनी लेखमाला जारी रखिए। ब्लॉग जगत स्वभावत: त्वरित है। प्लेटफॉर्म ही ऐसा है कि हो हल्ला मचता रहता है।

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  4. Yes i do not see any reason for all this 'hangamakhezi' . Mithilesh was right and you are right too .Undue exposure of boobs in public is definitely disturbing and devastating for the kind of society we live in until and unless we all start living like primitive apes or hi-fi citizens of some golden-era empire !

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  5. इस बात पर किसी को आपत्ति नहीं है कि औरतें शालीन कपड़े पहनें. लेकिन औरतों को ही नहीं सभ्य समाज में प्रत्येक व्यक्ति को शालीन कपड़े पहनने चाहिये. हमें आपत्ति इस बात पर थी कि ऐसी कितनी औरतें हैं कि आपलोग इतने भयभीत हैं ?
    हमारा कहना यह था कि न मुट्ठी भर औरतों के कम कपड़े पहनने पर भारतीय संस्कृति ढह जायेगी और न ही सलमान खान और जॉन अब्राहम जैसे अभिनेताओं के शर्ट उतार देने पर या कच्छा दिखाने पर. भारतीय संस्कृति इतनी भंगुर नहीं है. मुद्दा यह है कि जिस नौजवान से हम अपेक्षा करते हैं कि वह देश की समस्याओं पर ध्यान दे, वह अगर बार-बार औरतों के पहनावे को लेकर चिंतित हो रहा है, तो उसे राह दिखाने की ज़रूरत है, न कि आँख मूँदकर उसका बचाव करने की.
    दूसरी बात, जिन्हें आप "दुखी -दमित कामनाएं,ब्रिहन्न्लायें और शिखन्डी" कह रहे हैं, उनमें हम जैसी मिथिलेश की दीदियाँ भी हैं. आपको क्या लगता है ? अदा जी, रश्मि जी, वाणी जी या मैं मिथिलेश की दुश्मन हैं ?
    तीसरी बात, यह भी एक विडम्बना है कि भारतीय संस्कृति को बचाने के लिये आप विदेशों का उदाहरण दे रहे हैं. भारत में कितने ऐसे बार या रेस्टोरेंट हैं, जिनमें अनावृत वक्ष से वेट्रेस ग्राहकों को लुभाती हैं?
    ...आपलोगों को इस बात की चिंता है कि कहीं हम औरतें भी उसी राह पर न चली जायें. जब हमारे बार-बार समझाने पर भी हमारे भाई यह बात न समझकर औरतों को कोसे जा रहे हैं, तो गुस्सा नहीं आयेगा ? क्या आपलोग जब "हमारा समाज औरतों की स्वतंत्र प्रवृत्तियों के कारण रसातल में जा रहा है" बार-बार ऐसा कहते हैं, तो क्या यह सारी औरतों का अपमान नहीं है ? क्या हमें इससे दुःख नहीं होता ? और आप अगर मुट्ठी भर औरतों को लेकर पूरे नारी समाज पर लांछन लगायेंगे तो हमें आगे आना ही पड़ेगा.

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  6. आपके आलेख और टिप्पणियों में एक शर्त देखत हूँ, "हमारा जिसमें तरह के समाज में रहते हैं, उसमें.....". इस जिस तरह में ही तो पूरी समस्या है. यदि यहाँ समाज जिसमें तरह का नहीं रहेगा तो शायद आजादी दर्शाने के माध्यमों (कपड़े)का दुराग्रह नहीं रहेगा. उदाहरण के लिये जिन पश्चिमी देशों का संदर्भ आपने लिया वहाँ समाज के जिस तरह का न रहने पर भी आज महिलायें नग्न या अर्ध नग्न नहीं घूमती. मैंने अपनी यात्रओं में उन्हें उतना ही सुरुचिपूर्ण कपड़ों में पाया जितने उन समाजों में जो अभी भी जिसमें तरह के हैं.
    फिर समस्या ये भी है कि ये सलीका और सुरुचिपूर्ण है क्या? ये सब हमारा अपनी रुचि और सुविधा से तय करते रहते हैं. आदर.

    पुनश्च: धृतराष्ट्र को मारने में शिखंडी नहीं भीष्म को मारने में शिखंडी का योगदान था. वैसे ये कथा भी पुरुष के अहंकार की कथा है, भीष्म ने पूर्व जन्म में भी स्त्री रहे चरित्र से लड़ना स्वीकार नहीं किया क्यों ये उनके पुरुष्त्व के विरुद्ध था.

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  7. ब्लाग की दुनिया भी अजब है ,कब किसी को क्या कह दिया जायेगा भरोसा नहीं .
    मेरे एक बात समझ में नहीं आती कि किसी के लेखन पर इतना हो हल्ला क्यूँ.
    ब्लॉग अपना ,विचार मेरे, आप सहमत तो वाह -असहमत तो वाह .
    इतनी परवाह की जरूरत क्यों,बहुत काम और भी हैं इस दुनियां में.
    केवल ब्लाग पर एक टिप्पणी भर कर देने से समाज को और उसकी मानसिकता को नहीं बदला जा सकता .
    जमीनी हकीकत क्या है इस पर किसी ने सोचना और कार्य करना मुनासिब नहीं समझा.
    करोड़ों की आबादी लिए इस महान देश में जितनी समस्याएँ है ,ब्लाग जगत में लेखक तो छोडिये पाठक भी उतनें नहीं है.
    जिन लोंगों को समाज में नारी - विसंगतियों की इतनी चिंता है उन्हें सीधे समाज के बीच उतरना होगाऔर उनके लिए कुछ करना होगा.
    बंद कमरे में ,वातानुकूलित कमरों में बैठ कर,केवल ब्लॉग पर टीका-टिप्पणी कर के तो भला नही होने वाला.
    किसी के कह देने भर से यह साबित नहीं हो सकता कि वह नर-या-नारी विरोधी है .
    यदि आप किसी पोस्ट पर लेखक के विचार से सहमत नहीं है तो कोई जरूरत नहीं है कि उस पर कोई भी टिप्पणी की जाय.
    परिवार में -समाज में- हर किसी की अपनी-अपनी सोच होती है कोई जरूरी नहीं हर कोई हर एक बात से सहमत-असहमत हो.
    किसी की पोस्ट उसकी निजी राय होती है उस पर वितंडावाद फैलाना मेरी नजर में उचित नहीं है.
    हर एक मुद्दे को नर -नारी विवाद का रूप देने वाले जो लोग है वे जाने-अनजाने ब्लाग-जगत की स्वस्थ विचारधारा को प्रदूषित करनें का प्रयास कर रहे हैं.इसमें हर पढ़े -लिखे-शख्स का नुक्सान होगा जो रचनाधर्मिता से जुड़ा है चाहे वह नर हो या नारी.

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  8. मेरे ख्याल से अभिमन्यु को अपना काम करते रहना चाहिये ! उनसे थोड़ा सा अध्धयन और किंचित भाषा सुधार अपेक्षित है ! बाक़ी वे युवा हैं उर्जावान हैं , उनके विचारों का स्वागत है !

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  9. पंकज जी आभारी हूँ त्रुटि सुधार के लिए मुझे भी लिखते वक्त कुछ खटका सा था मगर अब दृश्य साकार हो उठा है -अश्वत्थामा नरो वा कुंजरो के उद्घोष के बाद धृष्टद्युम्न ने द्रोणचार्य को और शिखन्डी के कारण भीष्म को शर शैया तक पहुचना पड़ा था -
    मिथक हमारी चेतनाओं को झकझोरते रहते हैं और शायद इसलिए चिरन्तन भी हैं .
    आपकी मूल बात से भी सहमति है!

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  10. --मुझे जो कहना था-चिट्ठा चर्चा मंच पर कह दिया,
    मेरे पास समय का आभाव है---

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  11. आप ने आज सारथी पर जो टिप्प्णी की उस आलेख का पूरा रूप सिर्फ आपकी टिप्पणी के बाद आया है। जरा

    http://sarathi.info/archives/2624

    देख लें

    सस्नेह -- शास्त्री

    हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
    हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
    मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
    लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??

    http://www.Sarathi.info

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  12. @मुक्ति ,
    नहीं नहीं अब यह हमेशा के लिए स्पष्ट हो जाने ही दीजिये की असली नारी वादी कौन कौन हैं और पुरुष वादी कौन!
    कुछ लोगों के मन में जो कलुष भरा है वह बाहर आ जाय तो अच्छा ही रहेगा न-यह नारीत्व और पुरुषार्थ का लिटमस टेस्ट चल रहा है
    फतवे जारी कर ही दिए जायं उभय पक्षों से -रोज रोज का क्या झींकना और नारद मोहों का रखना ही क्या ?
    और हाँ नैसर्गिक आवेग इस धरा पर सब पुरुष पर एक जैसे ही तारी होते हैं -और विश्वास कीजिये हम भी किसी के दुश्मन नहीं हैं कम से कम नारियों के तो कतई नहीं हाँ एकाध अब जरूर अपवाद बन गयी हैं!इसलिए की उनसे सामूहिक सौहार्द के बिगड़ने का अंदेशा है !
    धरा १४४ लगानी ही पड़ेगी नहीं तो जन धन की हानि आसन्न लगती है !
    @तनु श्री ,
    हाँ एक यही रास्ता अब शेष लगता है -
    ----चलिए बातें बहुत हुई अब ठोस निर्णय लिया जाय,बगैर कठोर निर्णय के कोई सुधार नही होगा ---
    १-महिला दिवस की पूर्व संध्या पर हम सभी महिला मंच के लोग रचना दीदी के नेतृत्व में यह सपथ लें कि ब्लॉग-जगत में किसी भी पुरुष ब्लागर की पोस्ट पर टिप्पड़ी नही करेंगे???????????-
    २-जो पुरुष ब्लागेर बंधू हैं उनसे भी मेरी अपील की किसी महिला के पोस्ट पर आज-अभी से कोई टिप्पड़ी पोस्ट नही करेंगे????????महिला पोस्ट पर महिलाओं कीटिप्पड़ी -पुरुष पोस्ट पर केवल पुरुषों की---
    ---बात खत्म-नया निर्णय शुरू,मुझे उम्मीद है यही सबका निर्णय होगा---
    -----और यही होना भी था न-------
    मगर प्रगतिशील क्या इसे भी मानेगें ?

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  13. मिश्रजी ई अनूपजी शुक्ल के यहां हम चार ठो कमेंट किया पर ऊ छापते ही नाही है. क्या उन्होने ठेकेदारी ले रखी है क्या? लडवाबे की?

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  14. तो अब क्या तनु जी की बात ब्लाग - जगत का फैसला है ?

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  15. @ तनु जी यह बहुत ही दुर्भाग्य पूर्ण निर्णय लिया है आप लोंगों नें,
    पुनः विचार अपेक्षित है.

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  16. अरविन्द मिश्रा जी सादर चरण स्पर्श

    व्यस्तता होने के कारण आपका लेख देर में देख पाया , मेरा कल Exam है , जिसके नाते अभी जारी ऊठापटक में मैं भाग नहीं ले पा रहा , जिसका मुझे बहुत खेद है । आपका और शास्त्री जी का तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ , आपने जिस तरह से मेरे पक्ष को सामने रखा मुझे उससे सांत्वना मिली और खुशी हुई और लगा कि अब भी हिन्दी ब्लोगिंग में कुछ लोग हैं जो सच का साथ देते है । यहाँ तो ज्यादतर लोग मात्र टिप्पणी से मतलब रखते हैं जिससे वे किसी का ना तो विरोध ही कर पाते है और ना ही साथ ही दे पाते है , उनका खूद का कोई वजूद नहीं होता, आपका आभार प्रकट करता हूँ ।
    मेरा चिट्ठा चर्चा से कोई व्यक्तिगत विद्रोह नहीं है, मेरा कहना मात्र इतना ही है कि इससे पहले मुझे इस तरह से चिट्ठा चर्चा मे शामिल क्यों नहीं किया गया, चिट्ठा चर्चा को याद रखना चाहिए कि उनका ब्लोग हमशे है ना कि हम उनसे । चिट्ठा चर्चा को अपने नाम के अनुरुप चर्चा करनी चाहिए ना कि व्यक्तिगत रुप से भड़ास निकालने के लिए किसी की पोस्ट को लगाना चाहिए , अगर वे इस तरह की हरकत करते है तो उन्हे लेखक से अवश्य ही पुछना चाहिए, अगर इसी तरह से भड़ास निकलाने के लिए सभी खूद का ब्लोग बना लें तो शायद अपने ब्लोग पर लिखने के मायने ही खत्म हो जाऐंगे । सुजाता जी कौन है मुझे नहीं पता , आजतक उनका एक भी कमेण्ट मेरे ब्लोग पर नहीं है, तो इससे ये बात स्पष्ट होती है कि वे मुझे नहीं पढती ना ही मुझे जानती ही होंगी , तो मेरे लेख को बिना मेरे इजाजत चिट्ठा चर्चा में क्यों लगाया गया, सुजाता जी ने जो कुछ भी किया इसे मात्र कायरता और जलील हरकत कही जायेगी ।

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  17. @ मिथलेश बचुआ

    तुम जाकर अपना परिक्षा देखो...खबरदार आज इधर झांका तो दू गो लप्पड पडेगा अम्माजी का. हम देखती हैं आज इधर का काम. तू परिक्षा दे. कल आना.

    और एक ठो रचना और एक ठो अनूप शुक्ल को ब्लाग से बाहर कर दो सब गंदगी मिट जायेगा.

    हम पूछती हैं कि आखिर इसमे दिक्कत कहां हैं?

    तुम लोग नही तो अब अम्माजी करके छोडेगी ये काम.

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  18. बहुत सटीक आलेख .... मेरी समझ से मिथिलेश ने अपनी बात सबके सामने रख कर कोई गलत कार्य नहीं किया है फिर ब्लॉग अपनी बात कहने के लिए तो हैं ...

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  19. @ मैंने चिट्ठाचर्चा पर एक टिप्पणी की मगर वहां अब माडरेशन है शायद छपेगी भी नहीं
    मगर कुछ अंश याद है -
    तनु श्री की टिप्पणी का निहितार्थ समझता हूँ -मैंने तो घोषित नारी वादियों और पुरुष नारीवादियों के ब्लॉग पर टिप्पणी तत्काल प्रभाव से बंद कर दिया है -मगर जानता हूँ प्रियजनों के ब्लॉग पर न जा पाना कितना दुष्कर निर्णय है -

    हाँ शोले का ही तो एक और डायलाग है न -गब्बर सिंह बोलता है -बड़ा याराना है न उससे नाच नाच एसई कुछ अब याददाश्त भी साथ छोड़ रही ससुरी ... अपने यार को बचाना है तो अब बेचारी बसन्ती करे भी क्या नाच पडी .

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  20. डा० मनोज मिश्र जी से पूर्णतया सहमत.

    .....और यह भी जरूरी नही कि जो बहस में हिस्सा लेना नहीं चाहते उनके खुद का कोई वजूद नहीं होता. बहुत से लोग ऐसे हैं जो होली रंग-औ-गुलाल से ही खेलना पसंद करते हैं जब कीचड़ उछाले जाने लगे तो घरों में लौट जाते हैं.

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  21. kuch din blog par comment band kar den.
    bas likhate rahen.ब्लाग वर्ल्ड अभी छिछ्ला है, खजाना उठाइए कीच की फिकर क्यों?

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  22. आप अपनी लेखमाला जारी रखिए। ब्लॉग जगत स्वभावत: त्वरित है। प्लेटफॉर्म ही ऐसा है कि हो हल्ला मचता रहता है।

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  23. .
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    .
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    मैं सिर्फ यही कहना चाहूँगा कि नारीवाद-पुरूषवाद, पितृसत्तात्मक समाज-मातृसत्तात्मक समाज के पचड़े-झगड़े में पड़े बिना कुछ पुरूषों को अपनी वह मानसिकता बदलने की जरूरत है जिसके दम पर वह अपना जन्मजात अधिकार मानते हैं औरत की सोच पर... हर समय औरत को यह निर्देश देते फिरते हैं कि उसके लिये अच्छा क्या है.. उसे क्या करना और क्या नहीं करना चाहिये...कैसे कपड़े और कैरियर चॉईस उसके लिये बेहतर रहेगी...

    इस तथाकथित जन्मजात अधिकार का आधार यही पुरूष बनाते हैं अपनी प्राचीन और महान संस्कृति और सभ्यता को...

    बानगी देखिये...

    नारी के संस्कार, शील व लज्जा से किसी भी देश की सांस्कृतिक पवित्रता बढ़ती है , लेकिन यदि इसके विपरीत होने लगे , नारी का शील उघड़ने लगे , लज्जा वसन छूटने और लुटने लंगे तो सांस्कृतिक प्रदुषण बढ़ता है ।


    आधुनिकीकरण के दुष्प्रभावों से भारतीय नारी भी बच नहीं पाई है। 'सादा जीवन, उच्च विचार' की उदात्त संस्कृति में पली यह नारी अपने को मात्र सौन्दर्य और प्रदर्शन की वस्तु समझने लगी है।

    यह समझ लेने की बात है कि यदि नारी-चरित्र सुरक्षित नहीं रहा तो सृष्टि की सत्ता भी सुरक्षित नहीं रह पायेगी क्योंकि नारी में ही सृष्टि के बीज निहित हैं।

    वह युवावस्था में पुरूष की प्रेमिका रहती है, प्रौढ़ की मित्र और वृद्ध की सेविका रहती है।

    भारतीय नारी अपनी लज्जा के लिए विश्व प्रसिद्ध है। शर्म उसका प्रिय गहना है,

    नारियों का संपर्क ही उत्तमशील की आधारशिला है। शीलवती नारियो के संपर्क में आकार ही पुरूष चरित्रवान, धैर्यवान, एवं तेजस्वी बनता है।

    फिर भी पता नहीं क्यों आधुनिकता के चक्कर मे पड़ी नारी पश्चिमी देशों के बनाए हुए अंधे रास्ते पर चलकर ग्लैमर की दुनिया में खोना चाहती है। और यही वह कदम है जो पंरपरागत मूल्यों पर चलने वाली कल की नारी और आज की स्वच्छंद नारी में अंतर स्पष्ट करता है। भारतीय नारी भारतीय संस्कृति के परंपरागत मूल्यों को त्यागकर विदेशी नारी की नकल कर रही है।



    हटो किनारे भाई... पृथ्वी के ऊपर विचरण कर रहे हर मनुष्य के पास अपना दिमाग है और जिंदगी में क्या उसे पाना है, अपना जीवन कैसे जीना है इसकी समझ भी...Now, Will you stop this nonsense please...चलो हटो किनारे, थोड़ी ताजी हवा आने दो न यार... बहुत सडांध कर दी है इन ठहरे हुऐ निर्देशों ने ब्लॉगवुड में...

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  24. @ताकि सनद रहे -
    चिट्ठाचर्चा पर नारी टीम को बक अप करते हुए अनूप शुक्ल कहते हैं -
    "मुझे चक दे इंडिया का वह सीन याद आ रहा है जिसमें महिला हॉकी टीम की लड़कियां उनको छेड़ने वाले लफ़ंगों की वो तुड़ैया करती हैं कि देखकर मजा आ जाता है। "
    अब यहाँ लफंगे हैं मिथिलेश और अरविन्द मिश्र -
    ऐसी भाषा का प्रयोग किया जायेगा और हमसे अपेक्षा की जायेगी की हम विद्वानों की स्टीरियोटाईप सौजन्यता का उदाहरण प्रस्तुत करेगें ?
    अरे ऐसे प्रोवोकेशन पर तो हॉकी खींच कर भडुओं के मुंह पर धर दी जाती है आगे की दंतुलिमाल टूटे जाय तो बला से !
    हमसे तो कोई भी नपुंसक सौजन्यता की तनिक भी अपेक्षा न करे -हम परशुराम के जींस धारण करते हैं -एक हाथ में शस्त्र एक हाथ में शास्त्र !

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  25. सवाल जवाब का यह सिलसिला
    पढ़ने से मुझे क्या मिला
    वो बताता है आम का मामला
    इधर हम लिखते हैं इमली का इमला

    सवाले दीग़र, जवाबे दीगर

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  26. @ अरविंद मिश्र

    लफ़ंगे तुम और मिथलेश नही...बल्कि अनूप है जिसने उसके गुर्गे और गुर्गियों के साथ मिलकर गैंग बना रखा है. उनको ना तो लिखने से और ना हिंदी से कुछ लेना देना है.

    जरा देखो उसने और उसके दो तीन गुर्गे गुर्गों ने साल में कितनी पोस्ट लिखी?

    तुम और तुम्हारे जैसे नियमित लिखने वालों से ये लोग इर्ष्या करते हैं..इसलिये यह सब तमाशा वो करवाता रहता है.

    पर अब चिंता मत करो...अम्माजी आगई है इन दुष्टों की अक्ल ठीकाने लगाने. अब तुम देखते जावो कि अम्मा जी कैसे इसकी और इसके दो तीन गुर्गे गुर्गियों की मुर्गे और मुर्गियां बनाती है.

    हिम्मत मत हारना मेरे शेर बच्चों...अम्माजी सबको इक्कठ्ठा कर रही है. सबसे बात कर रही है इन दुष्ट बालक बालिकाओं की अक्ल ठीकाने लगाने के लिये..

    और ये तनुश्री कौन है ? मालुम है या अम्माजी को ही बताना पडेगा.

    जय मां काली.

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  27. बेटा मैने अनूप की चिठ्ठाचर्चा यह सातवां कमेंट किया था पर वो नालायक छाप नही रहा है...

    अरे शुकुल बचुआ...मान जा .तेरे को हम समझा रही हैं...अब भी समय है..अम्माजी के कमेंत पब्लिश कर नालायक कहीं के.

    और ये तनुश्री तेरी रचना का ही प्रोफ़ाईल है...अब कमेंट पब्लिश कर वर्ना पिछले और ये सारे कमेंट हर ब्लोग पर अम्माजी पब्लिश करेगी.

    -जय मां काली.


    मिश्र बेटा अब तुम सब लोग इस कपूत अनूपवा का बहिष्कार करो..इसके ब्लाग पर मत जावो और दुसरे जाते हों उनको भी मना करो..बाकी का काम अम्माजी पर छोड दो.

    जय मां काली

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  28. अर्विंद जी इन्हे जो करना है करे ....जो पहनाना है पहने, हमे क्या, ओर मिथिलेश ने कुछ गलत नही लिखा एक एक शब्द सही ओर सच लिखा है, अर्विंद जी मस्त रहे, भाड मै जाये यह सब जो खिंचे किसी की टांग, हमारी तरफ़ से घुमे नंगे हमे क्या.....

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  29. मुझे तो यही समझ नही आ रहा है कि अभिमन्यू तक़ नौबत ही क्यों आती है?इतना महाभारत आखिर क्यों?शेष आप सभी विद्वान हैं।

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  30. बेबाक कथन,सुन्दर अभिव्यक्ति

    विकास पाण्डेय
    www.विचारो का दर्पण.blogspot.com

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  31. जननीजन्मभूमिश्च स्वर्गादपिगरीयसि।

    स्त्री तो धरती माँ के समान है। आँधी, तूफान, आग, पानी इन सबका सितम झेलती लेकिन फिर भी हम सबका पोषण वही करती है। बाढ़ आने पर मिट्टी कटकर जहाँ भी जाती है वहाँ अपनी मूल प्रकृति साथ रखती है। तब भी वह अपनी उर्वरा शक्ति नही खोती।

    हम अपने स्वार्थ के लिए कितने उद्योग धंधे करते है जिसका खामियाजा इस धरती को भुगतना पड़ता है। अपने स्वार्थ के आगे सभी भूलते जा रहे है कि इसका दुष्परिणाम क्या हो रहा है। बढ़ते प्रदूषण से उत्पन्न ‘ग्लोबल वार्मिंग’ के रूप में एक वार्निंग मिल रही है। ठीक इसी प्रकार इस नारीवादी घमासान में महाभारत जैसी गर्मा-गरमी को भी एक चेतावनी के रूप में ग्रहण करना होगा।

    पुरुष को स्त्री की सामाजिक सुरक्षा का खयाल रखना चाहिए। स्त्री को उपभोग या धंधे की वस्तु नही बनाना है।

    यदि किसी स्त्री ने किसी लोभ या मजबूरी से अपने को बाजार में खड़ा कर लिया तो समाज के ये पहरेदार उसकी कीमत लगाने के बजाय उसको सही राह पर वापस लौटने में मदद क्यों नहीं करते? बोली लगाने वालों की भीड़ ही क्यों वहाँ जुटती है? ऐसी स्त्री में अपनी बहन, बेटी या माँ का रूप डालकर देखिए। सिक्के का दूसरा पहलू नज़र आ जाएगा।

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  32. अभिमन्यु मिथक से मुलाक़ात बड़ी दुखदायी हो बैठी है ; उसकी
    विपदा देखी नहीं जाती , कह रहा था बेचारा कि मैं 'मिथकीय ग्रंथों' में
    ही खुश हूँ , व्यक्ति पर मेरा आरोप मुझे और बर्बर तरीके से मारता है !
    मानव शब्दों से राजनीतिक खेल क्यों खेलता आया है !
    .
    वैसे मैंने कुछ बुरा नहीं कहा , आप चाहें तो डिलीट कर दें ! आपका ब्लॉग , आपकी मर्जी !

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  33. मैं आपसे सहमत हूँ डॉ अरविन्द , मिथिलेश बहुत अच्छे इंसान के साथ साथ बहुत अच्छा लेखक भी है और शायद कुछ लोगों को, जो अपने को यहाँ कर्णधार मान बैठे हैं, यह पसंद नहीं कि बिना उनकी संस्तुति यह कौन छोकरा तारीफ़ बटोरने की हिम्मत कर रहा है !
    यह बेहद अफ़सोसजनक स्थिति है हिंदी ब्लाग लेखन के लिए , मजेदार बात यह है कि सुप्रतिष्ठित लोग भी अक्सर बिना पढ़े आकर अपने कमेंट्स देकर वाहवाही लूटने का प्रयत्न करते हैं या शायद कोई पुराना अहसान उतारते हैं और इस प्रयत्न में वे अक्सर न्याय अन्याय भूल जाते हैं , मेरे विचार में यह सिर्फ बुजदिली है और कुछ नहीं !
    महिला विषयों पर लेखन की हिमाकत कर बैठा मिथिलेश, शायद यह समझ ही नहीं पा रहा होगा कि उसने दूसरे परभक्षियों की सीमा का अतिक्रमण कर दिया है !

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