गुरुवार, 18 मार्च 2010

पिछले दिनों देखी दो फिल्में -दोनों हल्की फुल्की मगर मजेदार

मैंने बीते हप्ते में दो फिल्मे देख डाली .दोनों ही हल्की फुल्की कामेडी .मगर मजेदार .पैसा वसूल .एक तो अतिथि कब जाओगे और दूसरी न घर के न घाट के .औपचारिक समीक्षाएं आप दिए लिंक पर पढ़ सकते हैं ,यहाँ इन दोनों फिल्मों की उन खास बातों की चर्चा जिनके चलते यह पोस्ट लिखनी पड़ रही है और आपका व्यस्त समय जाया करना पड़ रह है .मैं इन दोनों फिल्मों को देखने की सिफारिश करता हूँ -हर  उम्र  के लोगों को -जो खुद चल के जाएँ तो जाएँ ही और सहारा लेकर जाने वाले भी हाल में दाखिल  हो लें .फिर तो हा हा ही ही का ऐसा आलम होगा कि पता ही नहीं चलेगा कि फ़िल्म कब खत्म हो गयी .आज की इस आपा धापी की  दुनिया में मुक्त हास्य दुर्लभ है -दोनों फिल्में ऐसा गुदगुदाती हैं कि दबी हंसी भी फूट पड़ती है .

पहली फ़िल्म गाँव से शहर पहुंचे सही मायनों में एक गवईं अतिथि (बिना तिथि घोषित किये जो टपक पड़ता हो) के सहज व्यवहार और शहरी जीवन के मिथ्याचार /बनावटीपन (sophistication ) के अंतर्द्वन्द्व से सहज ही उपजे हास्य को फोकस करती है .वह शहर के आत्मकेंद्रित जीवन पर भी चोट करती है जहाँ पड़ोसी पड़ोसी तक को नहीं जानता .जबकि गाँव से आया एक व्यक्ति सहज ही नए जगह में सामाजिकता को पुनर्जीवित कर देता है और अहसास दिला देता है कि मनुष्य की सामाजिकता की प्रवृत्ति मुखौटों के बीच भले ही छिप गयी है मगर है वह मूलतः एक सामाजिक प्राणी ही -अतिथि के जाने की   दुहाई करता शहरी परिवार जब उसकी सामाजिकता के चलते जीवन का एक नया पहलू ,एक नया  अंदाज देखता है तो उनकी आंखे खुल जाती है .फ़िल्म यह पावरफुल सन्देश देती है कि जहां भी रहें थोड़ी सामाजिकता जरूरी है -यह आपको दुनियावी फायदे भी  दिलायेगी साथ  ही जीवन को एक नया अर्थ भी दे देगी .कुछ निहायत ही खुदगर्ज लोगोंको  यह फ़िल्म उनका घिनौना अक्स भी दिखलाएगी.बस परेल रावल जिन्होंने गवईं अतिथि की भूमिका की है द्वारा  बार बार प्रदूषित वायु प्रक्षेपण के दृश्यों को छोड़ दें तो फ़िल्म साफ़ सुथरी है -पूरे परिवार के साथ देखने लायक .

दूसरी फिल्म भी गवईं जीवन की सहजता और भोलेपन और शहर की चंट जिन्दगी को आमने सामने ला खडी करती है -एक ओर मूर्खता की हद तक भोलापन है तो दूसरी ओर मक्कारी  की हद तक होशियारी .इनी विरोधाभासों से सहज हास्य उपजाती फ़िल्म बहुत अच्छी बन पडी है .गाँव के कई सीन तो हँसते हँसते पेट में बल ला देते हैं -पर शायद उन्ही को जो गाँव की जिन्दगी को थोडा ही सही करीब से देखे हों -एक सीधे सादे गाँव के आदमी को महानगर के जीवन में कितनी जलालत  झेलनी पड़ती हैं और शहर के लोग पल पल में  शोषण करने को तैयार रहते  हैं मगर  कुछ सहृदय लोग कैसे मदद के लिए आगे आ जाते हैं फ़िल्म प्रभावपूर्ण ढंग से सामने लाती है . धुर भुच्चड गाँव और आधुनिक महानगर मुम्बई किन बिन्दुओं पर आकर मिल जाते हैं यह भी मार्मिकता से उकेरती है न घर के न घाट के फ़िल्म .समय मिल जाय तो देख ही लें !

26 टिप्‍पणियां:

  1. अतिथि ....देखने का मौका मुझे भी मिला, मजेदार फिल्म है मगर अंत अच्छा नहीं लगा ...

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  2. वाकई में ये अच्छी फिल्में हैं....."
    amitraghat.blogspot.com

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  3. "अतिथि तुम कब जाओगे" तो मैं आपके द्वारा नामधारक "अतिथि" के साथ देख चुकी हूँ. मुझे भी बहुत अच्छी लगी. "ना घर के ना घाट के" देखनी है.

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  4. अरे मिश्रा जी आप तो बहुत फ़िल्मे देखते है जी:) बहुत बहुत धन्यवाद इन फ़िल्मो की समिक्षा के लिये

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  5. बस, जल्दी ही हम भी देखते हैं.

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  6. Now a days film industry is flooding with such movies. I wonder what has gone wrong with film directors and producers. Anyways none of my biz. Million people zillion choices. I look forward for movies like, 'Abhimaan', 'Anand','Arth','Wednesday', 'Taare zamee par".....

    Yesterday i got a chance to interact with the most graceful lady ...Dr. Kiran Bedi. Got her autograph on her book - "I dare". I recommend to go through it.

    "Change is the law, growth is optional, choose wisely."

    Divya

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  7. Thanks for recommendation Zeal,shall read for sure !
    nice quote!
    बदलाव एक नियम है और वृद्धि-विकास वैकल्पिक -बुद्धिमत्ता से चयन करें -यही न ?
    और हाँ फिल्मे तो हमें भी वो आप वाली ही पसंद हैं मगर वो कहते हैं न जस्ट फार चेंज !

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  8. देखते हैं कब अवसर मिलेगा। धन्यवाद इस जानकारी के लिये।

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  9. फुर्सत मिल जाय तो जरूर देखेंगे.

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  10. दो-दो फिल्‍में देख डाली? आप तो बड़े रईस निकले, समय के मामले में। ब्‍लागिंग ने इतना समय दे दिया क्‍या? चलो अब हम भी देखने का प्रयास करेंगे टीवी पर। क्‍या है ना कि चार घण्‍टे बर्बाद करना कुछ जमता नहीं है।

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  11. ये फ़िल्म कहां दिखाई जाती हैं जी? हमे भी देखना है.

    रामराम.

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  12. आप कह रहे हैं तो देखना ही पड़ेगा डाक्साब्।वैसे भी काफ़ी दिन हो गये फ़िल्म देखे वरना एक ज़माना था कि हर नई फ़िल्म फ़र्स्ट डे फ़र्स्ट शो देखना शान की बात छुआ करता था दोस्तों और युवाओं के बीच।

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  13. आपके द्वारा दी गयी समीक्षा पढ़ लगा की देखनी ही पड़ेगीं ये फ़िल्में...जानकारी के लिए आभार

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  14. सहज हास्य जहाँ दुर्लभ होता जा रहा है वहाँ इन फिल्मो का आना अच्छी बात है ।

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  15. आप की रिकमेंडेड हर फिल्म तो देख ही डालते हैं हम ! देखेंगे इन्हें भी !
    आभार ।

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  16. आपने बहुत अच्छा सुझाव दिया और आपके कहने के मुताबिक मैंने आखरी लाइन बदल दिया और अब बिल्कुल सही लग रहा है! बहुत बहुत शुक्रिया!
    मैंने दोनों फिल्में अभी तक नहीं देखा और आपने बड़े ही सुन्दरता से विस्तारित करके लिखा है और अब तो देखना ही पड़ेगा! सुना है की बड़ा मज़ेदार फिल्म है! जैसे की आपने लिखा है एकदम हल्का फुल्का!

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  17. 'Athithi' aayi yahan 2 din mein hi utar gayee...dekhenge..ab DVD par.\
    Shukriya sameksha ke liye

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  18. Achhee sameeksha kee hai...ab dekhneki ichha jagrit hui hai..!

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  19. मैने तो अब तक पोस्टर ही देखा है. अब लगता है फ़िल्म भी देखनी पड़ेगी.

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  20. दोनों ही फिल्मों की बढ़िया समीक्षा की है आपने.............शरद जोशी के उपन्यास पर आधारित "अतिथि तुम......" में कुछ झोल हैं.....अभिनय तो तीनों कलाकारों का ठीक है मगर फिल्म तीन घंटे तक खींचने का लालच फिल्म में कसाव कम कर देता है.......

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  21. हा...हा...हा...हा...हा...पहली तो हमने देख ही रखी थी....और अब दूसरी भी देख लेंगे....अब दूसरी बात यह है कि "वायु प्रदुषण" वाली बात को छोड़कर बाकी फिल्म साफ़-सुथरी है से आपका तात्पर्य है.....??क्या आप ये शुभ कार्य नहीं करते.....या आपके परिवार में भी कोई नहीं......!!अरे छड यार.....हलके-फुल्के लिया कर ना....क्यूँ नाक पे लेता है.....?? !

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  22. आपके कहने पर हमने भी "अतिथि..." तो देख ली.

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