रविवार, 12 अगस्त 2012

चोरी भी सीनाजोरी भी ....फरीद ज़कारिया नहीं हैं भारतीय!


विश्वप्रसिद्ध टाईम पत्रिका ने अपने एक प्रमुख स्तंभकार और कई आमुख कथाओं (कवर स्टोरी ) के प्रस्तुतकर्ता  फरीद रफीक ज़कारिया को निकाल बाहर किया और सी एन एन ने भी जहाँ वे अपना एक नियमित कार्यक्रम प्रस्तुत करते रहे हैं इनसे किनारा कर लिया -कारण? साहित्यिक चोरी ....इनके ऊपर आरोप है कि इन्होने अपने आलेखों में कुछ पैराग्राफ और लाईनें दूसरे स्रोतों से जस का तस उड़ा लिया ...फरीद रफीक ज़कारिया भारतीय मूल के एक नामी गिरामी पत्रकार हैं जो काफी लम्बे अरसे से अमरीका में रह रहे हैं . न्यूजवीक पत्रिका में भी वे एक प्रसिद्ध स्तंभकार रह चुके हैं . वे अंतर्राष्ट्रीय विषयों,व्यापार और अमेरिका की विदेश नीति के अच्छे जानकार हैं .... 
आश्चर्य होता है ऐसे जाने माने और  तमाम विषयों तथा  भाषा पर अधिकार रखने वाले शख्स ने भी साहित्यिक चोरी का दामन थाम लिया ...साहित्यिक चोरी बौद्धिक समुदाय में कलंक सरीखी है -लिहाजा टाईम और सी एन एन ने बिना समय गवायें उन्हें तत्काल बाहर का रास्ता दिखा दिया ..भले ही ज़कारिया ने माफी मांग ली ....किसी ने फिकरा  कसा कि अगर उनपर भारतीय संस्कारों का तनिक भी असर होता तो वे माफी नहीं मांगते -यहाँ तो पूरी की पूरी किताब ही उड़ा ली जाती है और लोग चुप्पी साधे रहते हैं  .....एक उस विनम्र प्रोफ़ेसर की कहानी मुझे याद है जिन्होंने अपने एक सहयोगी से जिसने उनकी एक पूर्व प्रकाशित पूरी किताब ही चुरा कर अपने नाम से कालांतर में छाप दी थी से यह अनुरोध किया था कि ' चलिए जो कुछ आपने किया, किया मगर  कम से कम आभार वाला पृष्ठ तो खुद लिख लिया होता :-) .....एक सज्जन खुद मेरे साथ भी ऐसा ही वाकया अंजाम दे चुके हैं जो एक प्रसिद्ध विज्ञान संचार संस्थान नयी दिल्ली में ठीक ठाक पद पर कार्यरत हैं और उनके इस कार्य में एक ब्लागर देवि जिन्हें खुद प्रकृति भी दण्डित कर चुकी हैं (क्षमा करें ,फिर भी लोग सच्चाई का मार्ग नहीं अपनाते-इसलिए लिख रहा हूँ!) बराबर की साझीदार रहीं ....आज तक उन वैज्ञानिक संचारक महोदय या मोहतरमा का माफीनामा नहीं आया ..लोग बाग़ मुझसे पूछते हैं कि मैं कोर्ट क्यों नहीं जाता ....अब मैं कोर्ट जाऊं तो क्या उनके साथ वैसा ही सलूक उनकी नियोक्ता संस्थायें करेगीं जैसा फरीद ज़कारिया के साथ टाईम और सी एन एन ने किया? यह भारत है बाबू ? यहाँ ऐसे ही घाघ बैठे हैं और दूसरो के खून पसीने पर ऐश कर रहे हैं . 
भारत में साहित्यिक चोरी के दृष्टांत आये दिन सुनायी देते हैं . भारत में प्रधान मंत्री के सलाहकार सी .एन .राव पर भी कथित रूप से यह कलंक लग चुका है जिन्होंने अपने एक शोध पत्र के अंश को पहले के छपे दूसरे शोधकर्ताओं के पेपर से शब्दशः टीप लिया था ....सी एस आई  आर के पूर्व डाइरेक्टर माशेलकर साहब भी इस आरोप से बच नहीं पाए ...और भी कई जाने माने भारतीय हैं जिन्होंने अपने देश को ऐसे कृत्यों से शर्मसार किया है मगर आज यहाँ उनका नाम गिनाने का मकसद नहीं है -आपके साथ यह चर्चा करना चाहता हूँ कि आखिर क्यों पढने लिखने वाले लोग भी ऐसे घटिया स्तर पर उतर आते हैं? क्यों करते हैं वे ऐसा ??  कहीं खुद भाषा और विचार,कल्पनाशीलता की कमी इन्हें  दूसरों का बना बनाया मैटर उठा लेने को न उकसाता हो? यह अंतर्जाल भी तो अब इन साहित्यिक चोरों का ऐशगाह है  जहाँ  कट -पेस्ट की सुविधा सहज ही उपलब्ध है ..जहाँ भी  अपने काम की सामग्री देखी खट से कापी किया और इंगित स्थल पर पेस्ट कर दिया ..पहले तो हर्फ़ दर हर्फ़ टीपना पड़ता था ......या फिर कैंची और गोंद का सहारा लेना पड़ता था  फिर टाईप कराने या मुद्रित कराने का लफड़ा था मगर अब तो बहुत कुछ लिखना पढना अंतर्जाल पर आता जा रहा है और टीपकों की नयी पीढी  की चांदी ही  चांदी है ..... 

कई बार लोग जब ज्यादा प्रालिफिक होने के चक्कर में रहते  हैं या उनका प्रमोशन /नियुक्ति आदि प्रकाशित सामग्री के मूल्यांकन पर आधारित होता है तब भी लोग ज्यादा से ज्यादा शोधपत्र ,आलेख ,किताब प्रकाशित करने के के जुगाड़ में लग जाते हैं और आसान सा रास्ता -साहित्यिक चोरी अपनाते हैं . मगर यह उन लोगों के लिए जिनकी सामग्री चुराई जाती है बहुत आहत करने वाला होता है- 'खून पसीने की कमाई' चोर लोग सहज ही ले उड़ते हैं और खुद मलाई खाते हैं ....बुद्धि विवेक किसी का और मजा कोई और लूटे ...और ये साहित्यिक चोर इतने निर्लज्ज हो रहते हैं कि मूल लेखक का संदर्भ देने की कौन कहे उनका पत्ता ही साफ़ करने के जुगाड़ में लग जाते हैं -कहीं पोल न खुल जाए ...कभी अपनी चुराई कृति में मूल लेखक का कोई संदर्भ सूत्र नहीं देते ....ताकि पाठक चोरी के स्रोत तक कहीं न पहुंच जाए .... 

मेरी दरख्वास्त है सभी मित्रों से कि साहित्यिक चोरी की कठोर शब्दों में निंदा करें ..ऐसे लोगों का खुलकर बहिष्कार करें न कि कुछ छोटे मोटे लाभों के चक्कर में उनकी मिजाजपुर्सी करते रहें .....मैं चूंकि ऐसी घटना का खुद भुक्त भोगी रह चुका हूँ और आप ब्लागरों में भी इस कृत्य के कई लोग शिकार हो चुके हैं इसलिए ऐसे चोरों के खिलाफ हमें बिगुल बजाते रहना होगा ताकि उन्हें कुछ तो शर्म हया आये और वे सफलता का शार्ट कट अपनाने के बजाय कुछ  परिश्रम करें.  देश के उच्च पदों पर आसीन होकर उसे निरंतर खोखला न बनायें ....मैं जानता हूँ इस मुहिम को आप गति देगें ....फरीद ज़कारिया की तरह यहाँ नैतिकता और विवेक की  आग्रही ये चोर जमात नहीं है -ये तो कभी माफी नहीं मानने वाले ....सामूहिक बहिष्कार ही इनका एकमात्र इलाज है ......और ऐसी कोई संस्थागत प्रक्रिया भी वजूद में आनी चाहिए जो  इस तरह के बढ़ते अकादमीय कदाचारों पर अंकुश लगा सके!

38 टिप्‍पणियां:

  1. ऐसी ही एक खबर बिहार में भी सुर्ख़ियों में है -'' अंग्रेजी से हिंदी होते ही बदले किताब के लेखक '' वो भी क्रेडिट घोटाला के तहत . जिसे अंजाम दिया है कला और संस्कृति विभाग ने . ये भी करने के लिए सीने में ज्यादा दम होना चाहिए ..

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  2. तथ्‍य और जानकारियां तो बार-बार दुहराई जाती हैं, लेकिन प्रस्‍तुति की शैली, शब्‍दशः वाक्‍यशः इतनी अपना ली जाए...

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  3. उन्हें चोरी नहीं करनी चाहिए थी ! जिनका माल उठाया था उन्हें धन्यवाद देना तो बनता था कम से कम ! उनसे पूर्वानुमति लेते तो और भी ज्यादा बेहतर होता !

    वैसे जिनसे चोरी की उनका काम तो मौलिक था कि नहीं ? :)


    अरविन्द जी , मौलिकता और कापी पेस्ट का मुद्दा बड़ा अहम है ! हम हर कापी पेस्ट के लिए पूर्वानुमति / धन्यवाद के समर्थक हैं पर हमारे हिसाब से कापी पेस्ट की गयी हर चीज मौलिक रही हो ये ज़रुरी नहीं है ! ना तो ये सिलसिला ज़कारिया ने शुरू किया होगा और ना ही उसपे खत्म होगा ! ज्ञान में प्रथम कौन ? और जो प्रथम वही मौलिक ! सो मौलिकता को संशय में छोड़कर कापी पेस्ट की निंदा की जाए !

    ज़कारिया को सम्बंधित विषयवस्तु पर अपने से पहले पहंचे व्यक्ति का धन्यवाद ज्ञापन करना ही चाहिए था ! अतः हम उनके इस कृत्य की निंदा करते हैं ! क्योंकि उनके कृत्य से ऐसा आभास होता है कि उक्त विषय वस्तु पर लिखने वाले प्रथम व्यक्ति वे ही थे ! यह भ्रम बनाये रखना सरासर गलत है ! ऐसा करके उन्होंने दूसरे व्यक्ति का क्रेडिट छीना है और जब उनका भांडा फूट गया है सो वे भर्त्सना के अधिकारी हैं !

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  4. प्राथमिक आकडे, द्वितीयकआकडे , तृतीयक आंकड़े होते हैं वैसे ही नवीन खोज अलग है और किसी तथ्य को यथावत लिख देना जो किसी दुसरे का है नैतिक नहीं .

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  5. हाँ भाई साहब यहाँ तो टीपुओं की एक पूरी ज़मात मौजूद है .किस्सा सुनिए मैं रोहतक १४ सेक्टर में रहता था मालिकन मकान हिंदी में डी .लिट थीं .उनके पति हर बरस वाकिंग में मेडल लाते थे एशियाई खेलों में भी कई मर्तबा .अब साहब हम ठहरे अखबारी लाल उन दिनों रेडिओ (आकाशवाणी रोहतक )से भी बराबर संपर्क रहता था उनके इनाम जीतने की रिपोर्ट हमें बनाने के लिए मेडममालिके मकान ने कहा -हमने इमला बोला -हरियाणा के श्री ......उन्होंने लिखा हरियाणा केसरी ....साहब सारी डी लिट (पी एच डी किस खेत की मूली है इसी रास्ते से आ रहीं हैं ज़कारिया फेक्टर यहाँ शाश्वत रहा है )ब्लॉग जगत इससे कैसे बचता .यहाँ तक के नाम चीन शैर भी लोग अपना लेबल लगाके पेल देतें हैं -मसलन -अशआर मेरे यूं तो ज़माने के लिए हैं ,कुछ शैर फकत उनको सुनाने के लिए हैं .....इस शैर को एक ब्लोगिये पूरी शालीनता के साथ अपने नाम से चेपे (चस्पां )किए हुए हैं .यही तो फर्क है अमरीका और हिन्दुस्तान में हम सहते हैं ,देखने की धमकी देते वक्त गुजारते हैं एक प्रधान मंत्री नित कहते रहते थे -हमें देखना है .....अपने मौन सिंह और उनके चेले बा -रहा कहते हैं आतंकवाद का डटके सामना करेंगे , जनता खड़ी हो गई है मुंबई की धमाकों के बाद हम ऐसे नहीं डरने वाले भैये संसद उड़ा के दिखाओ (बच गए थे बच्चू किसी के भाग से वरना उड़ गई थी संसद ..वही अफज़ल गुरु आज भी काचे काट रहें हैं ....कसाब तो सरकारी मेहमान है ...और आप जानते ही हैं मेहमाँ जो .हमारा होता है वह जान से प्यारा होता है ,.....विषय अंतरण सहज हुआ है मेरा हाथ नहीं है इसमें ये निष्क्रियता हमारे यहाँ साहित्यिक चोरी से आतंकवाद तक सब जगह बरपा है .बढ़िया विचार उत्तेजक पोस्ट .कृपया यहाँ भी पधारें -

    शनिवार, 11 अगस्त 2012
    कंधों , बाजू और हाथों की तकलीफों के लिए भी है का -इरो -प्रेक्टिक

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  6. आज आपकी पोस्ट देखी... बहुत अच्छी लगी... मैं प्लेजियरीज्म की घोर निंदा करता हूँ.. .

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  7. इंसानी फितरत है जी भूल जाओ माफ कर दो विज्ञान संचार में आपके खाजाने में बहुत भण्डार है लुटाते चलो हम जैसों का भला करते चलो जी

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  8. हम साहित्यिक चोरी की कठोर शब्दों में निंदा करते हैं।
    आमीन...!

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  9. मौलिक लेखन चाहे कम ही लिखा जाये कहीं अधिक संतुष्टि देता है | हमारे यहाँ भी इसे बड़ा अपराध माना चाहिए .....

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  10. मेरे ख्याल से किसी आर्टिकल के लिए किसी दूसरे के आर्टिकल से कुछ लेना और किसी के मौलिक लेखन की चोरी- दोनों में अंतर है.
    किसी शोध-पत्र या आलेख को लिखने में हम उसी विषय पर पहले लिखे गए शोध-लेखों को 'कोट' करते हैं, लेकिन उसके साथ लेखक का नाम देना अत्यावश्यक है. उसमें भी एक सीमा है. हम किसी के भी शोध-आलेख का ज्यादा से ज्यादा तिहाई हिस्सा इस्तेमाल कर सकते हैं. ये नहीं कि अपना शोध-लेख लिखने के बजाय पूरा ही किसी दूसरे का टीप लिया.
    लेकिन साहित्य की बात अलग है. वह किसी के द्वारा किसी नए विषय को उठाना या किसी पुराने विषय को नए ढंग से कहना है. उसकी चोरी किसी भी दशा में उचित नहीं कही जा सकती.
    ब्लॉग लेखन ना साहित्य है ना ही शोध-लेख. यह अभिव्यक्ति का एक नया माध्यम है. लेकिन यह भी मौलिक होता है. इसलिए ब्लॉग की चोरी भी साहित्यिक चोरी की श्रेणी में आता है और मैं ऐसी किसी भी चोरी की भर्त्सना करती हूँ.

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  11. सबसे बेहतर तरीका है ये कट पेस्ट वाला, हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा होय| पकडे गए तो गलती मान लो और ह्रदय परिवर्तन का एफिडेविट दे दो, संस्तुति करने वाले भी मिल जायेंगे| लब्बोलुबाब ये है कि आपका नाम हटाने वाले मामले में कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हुई|

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  12. साहित्यिक चोरी नैतिक भ्रष्टाचार की तरह ही गंभीर अपराध है.यह काम कई लोग इतनी धूर्तता से करते हैं कि 'वे' ही असल दिखते हैं.
    किसी के लेख से प्रेरित हुआ जा सकता है,लेकिन यदि कोई तथ्यात्मक बात है तो उसका सन्दर्भ और स्रोत बताना ज़रूरी है.
    अंतर्जाल या इसके बाहर भी ऐसे कृत्य खूब हो रहे हैं.हूबहू किसी की नक़ल करना यही बताता है कि उसकी अपनी अकल है ही नहीं.
    आपके साथ जो हुआ,उसका हमें अफ़सोस है.ईश्वर करे सबकी रचना सुरक्षित रहे !

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  13. जो सुख मौलिक लेखन में है, वो इधर-उधर में कहां....

    ............
    कितनी बदल रही है हिन्‍दी !

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  14. बहुत उम्दा पोस्ट सर |दमदार और व्यंग्यात्मक शैली में आपने जो कुछ लिखा है सराहनीय है |

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  15. @संतोष त्रिवेदी,
    दूसरों को सहेजने के बजाय आप अपनी रचना की फ़िक्र करियेगा दूसरे पहले से ही अब सावधान हैं ... :-)
    और अब तो सबकी अपनी अपनी कोई ख़ास रचना है सिवाय आपके छोड़कर -गहरी संवेदना है आपसे ....
    @जयकृष्ण तुषार जी ,गहरी पीड़ा और गंभीरता में भी व्यंग तलाश लेते हैं यह गुण आपका अब उजागर हुआ !
    @मुक्ति: ठीक कहा ,मगर वैज्ञानिक लेखों में भी शब्द दर शब्द ,प्रस्तर दर प्रस्तर टीपना और यहाँ तक कि विचारों की भी चोरी
    वर्जित है ....

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  16. शोध पत्रों के बारे में अक्सर शिकायत सुनने को आती है कि फलाने जगह से चोरी किया गया . मौलिकता में भी कई बार पढ़े हुए विचारों का अतिक्रमण हो सकता है , मगर जानबूझकर किया गया हो तो भर्त्सनीय है ही !

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  17. किसी का थीसिस - किसी को पी-एच.डी. यह बहुत पुरानी परम्परा या कहें परिपाटी बरसों से चली आ रही है.. बहुत साल पहले, इसी शीर्षक से एक संस्मरण योगराज थानी (खेल पत्रकार) ने सारिका पत्रिका में लिखा था जिसमें उन्होंने बताया था कि कैसे उनके शोध पर अगेय जी ने दूसरे को पी-एच.डी दिलवा दी थी. किसी की मिहनत का यह अंजाम हो तो सचमुच अफ़सोस होता है और या बात भर्त्सनीय है!!

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  18. http://sb.samwaad.com/2010/08/blog-post_13.html
    साईंस ब्लागर्स अशोसियेशन ने विज्ञानं लेखन में कदाचार के मुद्दे पर लेखकों को निरंतर आगाह किया है लोगों को फिर भी मगर शर्म नहीं आती ...साहित्यिक चोरी का ताजा और शर्मनाक उदाहरण है प्रकाशन विभाग ,सूचना और प्रकाशन मंत्रालय से प्रकाशित पुस्तक "विकासवाद के जनक चार्ल्स डार्विन" जिसके लेखक मनीष मोहन गोरे हैं और सम्पादन किया है आर.अनुराधा ने .ब्लॉग जगत में इस मामले की ओर पहले संकेत किया गया था और इसका नतीजा यह हुआ की चोर की दाढी में तिनका की प्रकृति के चलते लेखक और सम्पादक को पुस्तक में छपते छपते चिपकी और विषय सूची के ठीक पीछे के पृष्ठ पर जहां आमतौर पर कुछ नहीं लिखा जाता यह घोषणा करनी पडी़-

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  19. सामूहिक बहिष्कार ही इनका एकमात्र इलाज है

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  20. काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढती, फिर भी ऐसे प्रयास होते हैं, यह आश्चर्य की बात नहीं है। जहाँ कार्यवाही की जाती है वहाँ परिणाम भी आते हैं!

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  21. एक घटना याद हो आयी. जेनयू के एक लब्धपप्रतिष्ठ शोधछात्र ने पाकिस्तान-भारत संबंधों पर एक संपादित किताब छापने के लिए तमाम विद्वानों से लेख मांगे. लेख मिले भी.

    फिर जब किताब छप के आयी तो उन्होंने लोगों को बताया कि प्रूफ रीडर से बस दो गलतियां हो गयी हैं. एक तो आवरण पृष्ठ पर उनके नाम के पहले लिखा संपादक उड़ गया,
    और अनुक्रमणिका में लेखों के साथ उनके लेखकों का नाम
    क्या करें सर अब.. होता है!

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  22. फिल्मी गानों ने दिशा दिखलायी है...

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  23. मौलिकता तो जा चुकी, सन्तों के ही साथ।
    अब तो होती हैं यहाँ, घिसी-पिटी सा बात।।

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  24. सीनाजोरी कर सके, वही असल है चोर |
    माफ़ी मांगे फंसे जो, कहते उसे छिछोर ||

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  25. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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  26. किसी न किसी रूप में ऐसी चोरियां हमेशा रही हैं . थीसिस के मामले में भी अक्सर ऐसा ही होता है - काम सारा छात्र का होता है लेकिन लेख छपता है बॉस के नाम से . हालाँकि उसमे नाम छात्र का भी होता है .
    यह मनुष्य का लालच ही है , किसी भी कीमत पर सफलता पाने का .
    अब ऐसे इमानदार व्यक्ति कहाँ से आएंगे , पता नहीं .

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  27. चोरी करने वाला कभी न कभी पकड़ा ही जाता है ... जब जकारिया जैसे लोग नहीं बच पाए तो छोटे मोटे चोरों की तो बात ही क्या ...
    ये जरूरी है की ऐसी हर चोरी पे हल्ला जरूर मचना चाहिए ...

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  28. बहुत ही बेहतरीन और प्रभावपूर्ण रचना....
    मेरे ब्लॉग

    जीवन विचार
    पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  29. वाकई वो भारतीय नहीं हैं.. अब भी कुछ शर्म उनमें बाकी जो है.

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  30. @मित्रों आप एकमत होकर इस मुद्दे पर साथ हैं यह निश्चित ही बहुत ही आश्वस्तिदायक है ,,,
    समर आपने जो दृष्टांत दिया वही एक और पुस्तक के साथ भी हुआ इलाहाबाद की एक नामी गिरामी विज्ञान संचारक
    संस्था ने मूल लेखकों का नाम महज आभार में दे दिया मगर कौन लेख किसका है इसका राज नहीं खोला और पुस्तक अपने सम्पादन में छपा ली -जो मसिजीवी/कीबोर्ड जीवी हैं उन्हें इस मुद्दे को हमेशा गरम रखना होगा -अब और बर्दाश्त नहीं होगा ..
    @मेरे शुभचिंतक अनाम मित्र-
    मुझे पता नहीं आप कौन हैं मगर जो तथ्य आपने दिए बिलकुल सटीक हैं इसलिए यह टिप्पणी यही रहने दे रहा हूँ .....आभार !

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  31. रेफेरेंस देने से कुछ कम नहीं हो जाता... पर...

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  32. स्वतंत्रता दिवस महोत्सव पर बधाईयाँ और शुभ कामनाएं

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  33. chori aur seena jori hamara rashtriy charitra banta ja raha hai..
    sateek aalekh.

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  34. काम की सामग्री लेने की ललक और आभार व्यक्त करने में संकोच ऐसी प्रवृत्ति का कारण रहता होगा शायद.
    बहरहाल ऐसे लोगों का बहिष्कार और सजा भी तय होनी चाहिए...

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