रविवार, 25 दिसंबर 2011

जलेबीबाई, किसी मिठाई का नाम लो!

बहुत दिनों से यह पोस्ट लिखने को सोच रहा था .आज लगा कि मिठाईयों की चर्चा कर पिछली पोस्ट की कड़वाहट थोड़ी मिटाई जाय .. मिठाई के प्रति प्रेम सर्वव्यापी है ..यहाँ तक कि ईश्वर के भोग में मिठाई ही प्रमुख है ..लोकमंगल के अधिष्ठाता अपने गणेश तो मोदक/लड्डू प्रेमी हैं ही और इसलिए बिचारे डायिबिटीज के निवारण के लिए कपित्थ जम्बू जैसे सुन्दर (चारू) फलों का भी नियमित सेवन करते हैं ..सुना है इनमें डायबिटीज निवारक गुण होते हैं ...कपित्थ यानीं कैंत और जम्बू यानी जामुन! पता नहीं कितनो ने  कैंत  देखी है ,मगर इस पर हम कभी फिर चर्चा कर लेगें ..आज तो सुबह सुबह कुछ मीठा वीठा हो जाय ....तो आप आज अपनी पसंद की कोई मिठाई बताएगें ...

मुझे याद पड़ता है कुछ दिनों पहले जर्मनी वाले राज भाटिया जी ने फेसबुक पर भारत की राष्ट्रीय मिठाई के नामांकन की बात छेड़ी थी मगर उन दिनों जलेबीबाई की धूम मची हुयी थी इसलिए बात बस जलेबी के लटको झटकों से आगे नहीं बढ़ पाई....मैंने उस परिचर्चा में भाग लेते हुए अपनी पसंद लड्डू ही बताई थी ....मेरी निगाह में तो यही भारत की राष्ट्रीय मिठाई बनने  लायक है ,कन्याकुमारी से कश्मीर तक लड्डू का ही जलवा है ....मगर यहाँ आपको राष्ट्रीय नहीं अपनी पसंद की मिठाई बतानी है ताकि हिन्दी ब्लागजगत की पसंदीदा मिठाई की पहचान हो सके.... वैसे अपनी  जलेबीबाई को मैंने मेल भेजकर उनकी भी पसंद पूछी है ..उनका जवाब आता ही होगा ..डर यही है कि नाम के साथ अगर फरमाईश भी हो गयी तो? :) 
किसिम किसिम की मिठाईयां मगर ब्लागजगत की पसंद कौन? 

वैसे मुझे मिठाई से ज्यादा चाट पसंद है और इस मामले में मेरी रसना बड़ी देशज है ..भारत के अलावा चाट के चाहने वाले दीगर देशों ,दुनिया जहान में बहुत कम हैं ...यहाँ तो चाट पर चर्चा शुरू हो जाय तो क्या कहने एक से एक बढ़कर आईटम हैं ..यम.. यम.. सी.. सी ..और यह मेरी कमजोरी भी है.. तो इस पर भी चर्चा आज स्थगित कर ही देते हैं ,वैसे सुना है बहुत सी कोमलान्गियों को भी चाट प्रिय है और जाहिर है वे मुझे भी प्रिय हैं बिना कहे ही ...मगर मुझे आश्चर्य इस बात का है कि कतिपय देवियों को भी मिठाई पसंद है और मिठाई से उन्हें रिझाने का एक गौरवशाली इतिहास रहा है .. :) 


हमने बड़े बूढों के मुंह यह सुना है कि जब नागरी बसाहटें उतनी वजूद में नहीं थीं और मानव सभ्यता गाँव गिरावों में आँखें मुलमुला रही थी तब कुछ ख़ास गोत्रों के श्रेष्ठ जन अगल बगल की ईख या अरहर की घनी फसलों में एक ख़ास किस्म की तत्कालीन जलेबी जिसे आज भी "चोटहिया जलेबी"  के नाम से भारत के इस पूर्वांचल में जाना जाता है सरे शाम छोड़ आते थे..और घोर आश्चर्य यह कि सरे सुबह वह वहां से अछ्छन्न (अदृश्य) हो जाती थी ..यह किसी मानवेतर प्राणी का काम नहीं होता था ..बल्कि आधी दुनिया का कोई खूबसूरत नुमायिन्दा इस काम को अंजाम दे देता था और यह सिलसिला चल पड़ता था और फिर मडवे तले  तर्ज पर एक गुनगुनी सी प्रेम कहानी जन्म ले लेती थी जिस पर आगे चल के विदेशिया आदि फ़िल्में तक बनी ....ज्ञानी जन प्रसंग और सन्दर्भ समझ गएँ होगें और नहीं तो फिर ब्लागजगत के रसिक जनों (नाम जानबूझ कर नहीं ले रहे हैं ..,नाराज हो गए तो ? ) से पूछ पछोर सकते हैं ...

आज तो हम उस ज़माने की चोटहिया जलेबी ,गुड गट्टा ,खील बताशों के मीठे संसार से बहुत आगे आ गए हैं ..अब तो डिजाईनर मिठाईयों का क्रेज है और उनके अजीबो गरीब नाम हैं .मगर आपसे इन के तनिक पहले की पारम्परिक मिठाई का नाम पूछ रहे हैं ..जैसे रसगुल्ला ...पहली बार जब मैं  कलकत्ता (आज का कोलकाता ) गया तो देखा वहां  एक साथ कई कई रसगुल्लों को गड़प करने का रिवाज है ..हम बहुत अचम्भित हुए मगर एक साथ मैंने भी कई रसगुल्लों को उदरस्थ कर एक नया अनुभव हासिल किया ..तो समझिये मेरी भी पसंद यही है ...आपको अपने नाम बताने हैं .....आप बेशक कोई प्रतिक्रया  भी इस पोस्ट पर कर सकते हैं मगर अपनी पसंद की मिठाई का नाम जरुर लिख दें... ताकि यह रायशुमारी पूरी हो जाय और एक ब्लॉग जगत की मिष्ठान्न निर्देशिका तो बन ही जाय ..सर्व पसंद मिठाई का निर्धारण भी हो जाय ... तो तैयार हैं न आप ? तो बस शुरू हो जाईये !  

44 टिप्‍पणियां:

  1. चाट, विशेषकर गोलगप्पों से विशेष स्नेह है।

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  2. जिसने छत्‍तीसगढ़ की पिडि़या का स्‍वाद नहीं जाना, खैर...
    हम तो जल्‍दी आ गए, कुछ देर बाद आयेंगे, बार-बार आएंगे.
    पोस्‍ट में तो मिठास है ही टिप्‍पणियों का भी जायका लेने...

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  3. आपने सुबह -सुबह जलेबी की याद दिला दी.अपनी तो पसंद की मिठाई जलेबी (पतली और कड़क) ही है !दिल्ली में शाम को जलेबी अपना जलवा दिखाती है जबकि हमारे मुलुक में सुबह-सुबह नाश्ते के साथ !

    .....आपकी रसना और रचना दोनों चटोरी हो रही हैं,खूब स्वाद और चटखारे लिए जा रहे हैं !
    कैंत को हमारे यहाँ कैथा (अगर मैं सही समझ रहा हूँ ) कहते हैं.

    ब्लॉग-जगत की असली मिठाई तो अली सा हैं.मेरे कहने का मतलब आपसी संवाद,मेल मिलाप !

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  4. दिल्ली की द्वारका कालोनी में ज्यादातर ऊंची नाक वाले लाला और तरह तरह के बाउ लोग रहते हैं लेकिन वो भी यहां की एक प्रसिद्ध मिठाई की दुकान के बाहर ताज़ा जलेबी के लिए लाइन लगाए मिलते हैं...

    जलेबी दा जवाब नईं.

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  5. मिश्र जी , पसंद तो ऐसे पूछ रहे हैं जैसे बताते ही पैक करा के भेज देंगे ! :)
    वैसे जलेबी ( बाई ) में भी क्या है बुराई !

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  6. हमे परवल की मिठाई ज्यादा पसंद है साथ में मलाई रोल हो जाये तो क्या बात .....
    बनारस का लाल पेड़ा भी कम नहीं .....

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  7. जबसे बरेली छूटी, जबेली भी छूट ही गयी।

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  8. चाट वगैरा अपनी जगह हैं लेकिन मिठायी का स्वाद अलग ही है। एक का नाम कैसे गिनायें, सब एक से बढ़कर एक हैं।

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  9. पसंदीदा मिठाई नंबर १ : सोहन-पपड़ी...
    पसंदीदा मिठाई नंबर २ : खोये की बर्फी..
    पसंदीदा मिठाई नंबर ३ : बूंदी के लड्डू...

    बहुत बड़े मिठखउए हैं हम!!!!

    और चाट-पकौड़ी के बात हो तो समोसे को जोड़ना बहुत ज़रूरी हैं...समोसा खाते हुए भी बहुत सी प्रेम कहानियां बनी हैं... :)

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  10. आज तो आप मनपसंद मिठाई का नाम पूछ जले पर नमक छिड़क रहे हैं ... :)

    सारी मिठाइयाँ पसंद हैं ..सबसे पहला नंबर जलेबी ... पर अब रोक लग गयी है ...तो बस नाम सुन कर ही आनंद ले रहे हैं .

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  11. स्थान विशेष की मिठाई का स्वाद लाज़वाब होता है। जैसे यहां बनारस के लंका क्षेत्र में दादी की जलेबी सभी की पहली पसंद है। आपके जौनपुर के बेनी साव की इमरती इन जलेबियों का बाप है।

    कलकत्ता का रसोगुल्ला..वाह क्या कहने। बनारस में पहले एक मात्र मिठाई की सर्वश्रेष्ठ दुकान मानी जाती थी..राम भंडार। इस दुकान की मिठाइयाँ विदेशों में भेजी जाती थी। अब तो बहुत सी दुकाने हो गईं जो बेहतरीन मिठाइयों का उत्पादन करती हैं। बनारस में मिठाइयों की दुकाने और मिठाई के शौकिन भी अधिक हैं।

    मौसम के अनुसार भी मिठाई का महत्व होता है। जैसे घने कोहरे और कड़ाकी ठंड में बनारस में पाया जाने वाला मलइयो कहीं अन्यत्र नहीं मिलता। यह एक विशेष प्रकार की मिठाई होती है जो रातभर गिरती ओस की बूंदों से मिलकर अपना मिठास बनाती है। मुझे तो मिट्टी के पात्र में मिलने वाला यह मलइयो ही सबसे प्रिय है। इसे बनाने वाले भी बहुत कम यादव बंधु शेष रह गये हैं। इसे बनाने में इतना खटकरम है कि यह सबके बस की बात नहीं। एक पुरवा लीजिए और सटक से सुड़क जाइये..घलुए में केसरिया मीठा दूध..वाह !

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  12. पुरनपोडी (पुरन पूरी) महाराष्ट्र का एक लोकप्रिय मीठा व्यंजन!

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  13. उफ्फ ... सुबह सुबह मीठे की याद ... पानी आ रहा है मुंह में ... और किसी एक का नाम लेना बहुत कठिन है ... फिर भी लेना है तो जलेबी रबड़ी के साथ .. रसगुल्ला ... बस अब आगे नहीं ...

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  14. इमरती - आज कल इमरती पर जोर है यहाँ। गरमागरम।

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  15. उंहू......खरचा करवा दिया न अरविंद जी,


    अब जाउंगा शाम तक बाजार की ओर, बिना जलेबी खाये मन नहीं मानेगा, लाकर ही रहूंगा :)

    दरअसल पोस्ट पढ़ते पढ़ते मन हो आया कि जलेबी खाई जाय। वैसे मेरी पसंदीदा मिठाई मिल्क केक है।

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  16. aaj sabare se hi kuch na kuch meetha khane ko mil raha hai ...


    jai baba banaras.....

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  17. बहुतेरी मिठाइयां पसंद हैं ! बहुत सोचा पर जलेबी और दूध की जुगलबंदी का कोई जबाब नहीं !

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  18. जलेबी और लड्डू तो हर घर की , हर तबके की , हर उम्र की मिठाई है . पूजा के लिए लड्डू और हर संस्कार के लिए जलेबी ही मुख्य मिठाई माना जाता है . आज की डिजाइनर मिठाइयों पर हमारी पारम्परिक मिठाइयाँ हमेशा भारी ही रहेगी .

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  19. मोतीचूर लड्डू
    खीर कदम
    पाकीज़ा
    मालपुआ
    मथुरा पेड़े
    केसर रसमलाई
    इमरती
    खोवे की जलेबी
    काला जाम
    (गीला) कलाकंद
    रबड़ी+जलेबी
    खजूर संदेश
    मिष्टी दही

    गुड वाली मक्का रोटी की चूरी
    गुड पगी खीर

    आज तक हमें प्रिय है

    (आनन फानन में यही नाम लार टपकाते याद आए, बाक़ी बाद में)

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  20. .
    .
    .
    देसी घी में तली गर्मागर्म जलेबी, गाय के दूध से बने दही के साथ... वह भी नैनीताल में... जाड़े की सुबह-सुबह, बाजार तक उतर आये बादल के आगोश में ...

    आह, अलौकिक !



    ...

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  21. १. बालूसाही
    २. बाकी सब मिठाई, कोई सा भी हो..

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  22. दूध के साथ मावे की जलेबी. परन्तु इसके बाद चाट भी चाहिए.

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  23. आज बंगाली मिठाई की दूकान पर जा रहे हैं ...रसगुल्लों का वर्णन कमाल का है !
    शुभकामनायें आपको भाई जी !

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  24. कवनो बनारसी मनई ने गरमागरम लवंगलता का नाम ही नहीं लिया .

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  25. गोल-मटोल बच्चों को लड्डू कह कर पुकारा जाता है। हमारे नाटे-मोटॆ प्रिंसिपल को लड्डू कह कर ही पुकारते थे। निश्चय ही लड्डू भारत की नेशनल मिठाई मानी जाएगी:)

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  26. आपने जलेबी की याद दिलादी....
    सुंदर सार्थक सटीक आलेख....

    नई पोस्ट--"काव्यान्जलि"--"बेटी और पेड़"--में click करे.

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  27. कोलकाता रहकर भी "शोंदेश" मुझे नहीं भाया.. कभी भी.. मुझे तो कोलकाता का "लैंचा" पसंद आता है.. बोले तो हमारे तरफ उसको गुलाब जामुन कहते हैं.. लेकिन फर्क है गुलाब दो अलग अलग साइजों में पाया जता है.. गोल याने काला रसगुल्ला..मगर लंबा वाला लैंचा कहलाता है!!

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  28. चला बिहारी ब्लॉगर... ने क्या खूब याद कराया :-)

    बस्तर में कापसी-पखांजूर के बंगाली बहुल क्षेत्र में "लैंचा' का स्वाद कई बार लिया है हमने

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  29. हैदराबाद की एक कठोर सी मिठाई का नाम याद नहीं आ रहा
    उसे शुद्ध घी में बनाया जाता है
    देखने में ऎसी जैसे कि मसूर पाक को चाशनी में डाल दिया गया हो
    मित्र लोकेश जब ससुराल जाते हैं मेरे लिए एक-दो किलो ले ही आते हैं

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  30. लड्डू पेड़ा बर्फ़ी..

    रबड़ी..

    रसमलाई..

    छेना रसगुल्ले..

    इमरती........

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  31. ताज़ी बनी रतलामी सेव के साथ (बड़ीवाली)बूँदी के लड्डू - खाये युग बीत गये !

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  32. राहुल सिंह जी से सहमत पीडिया का स्वाद ही निराला होता है. वैसे हमें चाट ज्यादा पसंद है और गुपचुप की तो बात ही मत करिए. अब इस ब्लॉग से प्राप्त रिजल्ट कब घोषित होगा.

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  33. जीजा जोबनिया ज़लेबी भरी रस की ,थारे साथ चलूंगी म्हाने जचगी .....विटामिन बी से भरपूर है खमरा उठाई ज़लेबी न मिलावट का चक्कर न बासी पन गर्मागर्म खाओ ....दूध ज़लेबी का ज़वाब नहीं ....कब्ज़ भगाओ ....सोर थ्रोट में आराम पाओ .

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  34. नव-वर्ष आपको व आपके समस्त परिवार के लिये मंगलकारी हो इसी शुभकामना के साथ।

    आज आपकी पोस्ट की चर्चा की गई है अवश्य पढ़ियेगा... आज की ताज़ा रंगों से सजीनई पुरानी हलचल बूढा मरता है तो मरे हमे क्या?

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  35. बहुत सुंदर,जलेबी पसंद मगर खोये की...
    नया साल सुखद एवं मंगलमय हो,..
    आपके जीवन को प्रेम एवं विश्वास से महकाता रहे,

    मेरी नई पोस्ट --"नये साल की खुशी मनाएं"--

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  36. सर्दी के दिनों मे गरम गरम हलवा,केसरबाटी,घर की बनी बेसन चिक्की पसंद है.
    पर...आप क्यों हमारे ज़ख्मों को कुरेद रहे हैं जी.डॉक्टर मना करता है मीठा खाने को और आप.....ऐसी ऐसी पोस्ट लिखते हैं.गरम गरम जलेबियां गरम गरम दूध के साथ खाने का मजा ही कुछ और है सर्दियों मे हा हा हा

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  37. जलेबी तो जलेबी है
    जलेबी के आगे और मिठाइयां कहाँ टिक पाएंगी .. और फिर अगर बनारसी जलेबी हो तो क्या कहने

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