रविवार, 13 नवंबर 2011

आप किस बच्चे को ज्यादा प्यार करते हैं?

टाईम पत्रिका के ताजे अंक (नवम्बर १४,२०११) की आमुख कथा बच्चों के प्रति माँ-बाप के भेदभाव पर केन्द्रित है ....क्या हम अपने बच्चों में किसी को कम किसी को ज्यादा चाहते हैं? क्या इसका कोई जैवीय /जीनिक आधार भी है या फिर सामाजिकता और परिवेश ऐसे निर्णयों पर हावी हैं ? टाईम का आलेख निर्णायक  नहीं है ....बल्कि संभ्रमित अधिक करता है ....वह पशु पक्षियों पर किये अध्ययनों का सहारा लेता है -जहां श्रेष्ठ की उत्तरजीविता ज्यादा मायने रखती है और इसलिए वहां वही ज्यादा प्यार दुलार पाता है जो बलिष्ठ ,हृष्ट पुष्ट होता है और संतति संवहन में सर्वथा समर्थ लगता है -आखिर वही तो वंश परम्परा का संवाहक है! इसलिए ही पेंगुइनें छोटे और कमज़ोर अंडे को खुद पैर से ढकेल बाहर करती है और ईगल(गरुंड) पक्षी की एक प्रजाति की माँ अपने ही एक बलशाली बच्चे को अपने से कमज़ोर का चीथड़ा उड़ाते देखकर भी चुपचाप रहती है .....तो क्या मनुष्य में भी कोई ऐसी ही प्रवृत्ति अंतर्निहित  है?  क्या वह भी अपने होनहार बच्चे को ही ज्यादा मानता है? उस पूत को जिसके पाँव पालने में ही दिख जाते हैं? 



लेखक जेफरी क्लुगर ने एक अध्ययन के हवाले से कहा है कि ७० फीसदी पिताओं और ६५ फीसदी माताओं में बच्चों के प्रति ऐसे भेदभाव के प्रमाण मिले हैं हालाँकि वे ऐसी किसी बात को प्रत्यक्षतः प्रगट नहीं करते ....पिता के मामले में प्रायः उसकी सबसे छोटी बिटिया और माँ के मामले में उसका सबसे बड़ा लड़का ..यानी 'पैलौठी" -पहला बच्चा -लड़का!..पैलौठी के बच्चे को पसंद करने का एक और कारण अध्ययन में  बताया गया है जिसे   जिसे "रूल आफ संक कास्ट"(rule of sunk cost) कहा गया है और जो कारपोरेट जगत का माना जाना नियम है -जिस प्राडक्ट पर जितना अधिक धन -संसाधन लगता है उसे व्यवसाय जगत ज्यादा फलना फूलना देखना चाहता है ....सबसे बड़ा बच्चा ऐसा ही एक कैपिटल है माँ बाप के  लिए ....मगर क्या मानव सम्बन्ध ठोस व्यावसायिकता से प्रेरित हैं? 

अपने एक लंगोटिया मित्र  से बिना उनकी अनुमति के क्षमा याचना  सहित  उनके   बचपन की  एक बात यहाँ उद्धृत करना चाहता हूँ. उनकी माँ  ने उनसे एक बार कहा था  -" पैलौठी के बच्चे को तो जन्म लेते ही मर जाना चाहिए, जीवन भर उसे जिम्मेदारियों का बोझ और तरह तरह के कष्ट झेलने पड़ते हैं " कहना न होगा कितना खराब लगा था तब उन्हें यह सुनकर मगर माँ का  प्रसाद मानकर मेरे मित्र ने  यह ग्रहण किया था  ....लेकिन  क्या यह वाकई सच है? पता नहीं ये  इमोशनल बातें यहाँ उठाना भी चाहिए या नहीं मगर मेरे मन में बैठा विज्ञानी इन सबसे पूरी तरह तटस्थ है और वह तथ्यान्वेषण को ज्यादा तवज्जो देता है? ऐसे  उदाहरण भी मिलते हैं जिनमें सबसे कमजोर बच्चे के प्रति माँ बाप का स्नेह (माँ का विशेष ) ज्यादा होता है और इसका आधार भावात्मक है ...इस व्यवहार का  एक नजीर पक्षी जगत में एक  पनडुब्बी (कूट ) में भी देखने को मिलता है जो बच्चों में सबसे बाद के निरीह बच्चे का ज्यादा ध्यान रखती है और उसे खाने खिलाने में ज्यादा व्यस्त रहती है ....कूट्स के सभी बच्चे एक सा ही दीखते हैं मगर सर की सबसे चटख गुलाबी कलंगी सबसे छोटे वाले को  अलग करती है ....मतलब मनुष्य में भी इन मामलों में कोई एक निश्चित व्यवहार प्रतिरूप विकास यात्रा में नहीं उभरा है बल्कि यहाँ कई प्राणियों के मिश्रित  व्यवहार ही अवतरित होते दीखते हैं ...

भारत की तो बात ही मत पूछिए यहाँ तो देश काल परिस्थितियों में लड़का लडकी को लेकर जबरदस्त बायस देखा जाता रहा  है ...घुघूती बासूती जी ने अनचाही बच्चियों के जन्म पर उनसे किये जाने वाले भेदभाव पर एक रिपोर्ट  दी है!  यहाँ बड़े पैमाने पर तो लड़कों को लड़कियों के बजाय ज्यादा तवज्जो दिया जाता रहा है ...मगर यह सहज जैवीय व्यवहार नहीं है क्योकि परिवेश और सोच के बदलाव से  ऐसी बातें कम होती जा रही हैं ....किन्तु  यहाँ अच्छे पढ़े लिखे परिवारों में  क्या बिना जेंडर भेद के भी बच्चों के बीच  ऐसा कोई पक्षपात किया जाता है? मैंने एक वाकया अपने एक अन्य मित्र से और भी सुना है जब कमासुत बच्चे (कमाने वाल बच्चा ) को ज्यादा तवज्जो दिया जाता है ...उसके खान पान में ज्यादा ध्यान दिया जाता है ..प्रेम के प्रतीक के रूप में उसे परसी गयी दाल में देशी घी की मात्रा ज्यादा डाली जाती है जबकि बगल का बेरोजगार बच्चा इस देशी -घी प्रेम से वंचित रह जाता है .....और  प्रायः पिता की ओर से  ताने भी सुनता  है -न काम का न काज का ढाई सेर आनाज का ....हमारे मिथकीय पात्रों में एक राजा पुरु हुए हैं जिन्होंने अपने पिता के कहने भर से उन्हें अपनी जवानी सौंप दी थी जबकि उनके  दूसरे बेटो ने उन्हें ठेंगा दिखा दिया था ..यहाँ भी एक ख़ास लाडले  पुत्र और  पिता के सम्बन्ध का एक पहलू उभरता है ....

जो भी हो अपना तो यह मानना है कि मानव व्यवहार बहुत जटिल है और ऐसे अध्ययन अंतिम नहीं कहे जा सकते ..हाँ वे इन विषयों की ओर अकादमिक/ अन्वेषण की  रूचि जरुर जगाते हैं ..और अन्वेषण तो मनुष्य की मूलभूत चाह ही है ! 

38 टिप्‍पणियां:

  1. मानव व्यवहार बहुत जटिल है, बहुधा पहले से बता पाना कठिन है।

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  2. होता है, पंडित जी, कुछ परिवारों में ऐसा भी होता है... हाँ आपने पूछा है कि "आप किस बच्चे को ज़्यादा प्यार करते हैं" तो इस पर ईमानदारी से विषयान्तर करते हुए इतना बता रहा हूँ कि हम दोनों बाज़ार में किसी भी अच्छी ड्रेस को देखकर उसे खरीद लेते थे/हैं और जब कोई पूछता कि किसके लिए है तो कहते कि देखते हैं अब तो इस ड्रेस के लिए बच्चा ढूँढता हूँ... बच्चा परिवार में मिले या पड़ोस में हम उसे बहुत ज़्यादा प्यार करते थे/हैं!!
    विषय से अलग कमेन्ट करने के लिए क्षमा!!

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  3. मेरा विचार तो यह है माँ अपने सबसे निरीह और कमजोर बच्चे को सबसे ज्यादा प्यार करती है जबकि पिता यश प्रतिष्ठा फैलाने वाले बच्चे को !

    हालाँकि मां - बाप सब बच्चों को प्यार करते हैं ........अब यह दोनों बातें एक साथ कैसे संभव है ....बस ई ना पूछियेगा जी ........प्लीज !!!

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  4. सामजिक मनोविज्ञान से ही यह बात कही है ....बकिया तो आगे विद्वत जन आगे की राह सुझाएंगे ही !!!

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  5. इस विषय पर बहुत भिन्नता मिलेगी । हर मनुष्य का व्यवहार अलग होता है । बहुत कुछ परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है ।
    हालाँकि आदर्श भावनाओं की बात करें तो मात पिता दोनों को सभी बच्चों से एक जैसा प्यार होना चाहिए ।
    लेकिन अक्सर ऐसा देखा नहीं जाता ।

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  6. मानव व्यवहार बेहद जटिल है । जो ज्यादा गुणी होगा उसकी प्रशंसा ज्यादा होगी और जो ज्यादा जिम्मा लेता हो उसे पूछा जाएगा स्वाभाविक है , पर प्यार का पैमाना थोड़ा हटकर भी है । हम किसी ठोस सर्वमान्य नतीजे पर तो नहीं पहुँच सकते । वैचारिक मतभेद के चलते या आशानुरूप स्वभाव नहीं होने पर थोड़ी खटास आ सकती है और नहीं भी । कहते हैं जो भी हो जैसा भी हो अपना ही बच्चा है ! वैसे बच्चों में भी ये भावना आती है कि किसे ज्यादा और किसे कम प्यार (प्राथमिकता)मिलता है । हर कहीं प्यार तो उन्नीस-बीस ही होता होगा । आपकी कही बातें सच हैं । इस विषय पर हुए अध्ययन अंतिम नहीं कहे जा सकते ।

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  7. आपने सही कन्क्लुड किया है कि --
    “ऐसे अध्ययन अंतिम नहीं कहे जा सकते ”
    ** परिस्थिति, परिवेश और आर्थिक स्थिति के अनुसार इन धारणाओं में परिवर्तन देखा जा सकता है। बल्कि एक ही परिवार में एक बच्चा कभी ज़्यादा प्रिय होता है, किसी दूसरे समय दूसरा हो जाता है।

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  8. मेरा विचार तो यह है माँ अपने सबसे निरीह और कमजोर बच्चे को सबसे ज्यादा प्यार करती है जबकि पिता यश प्रतिष्ठा फैलाने वाले बच्चे को !
    -------
    प्रवीण जी की इन बातों पूरी तरह सहमत हूँ...... ऐसा होते देखा है ...
    कई घरों में भेदभाव इतना ज्यादा है की लगता है दोनों बच्चे एक घर हैं ही नहीं......

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  9. मानव स्वभाव यही है कि जो कुछ आपके मनोनुकूल होगा उससे बनावटी बनाए गये सम्बन्ध भी धीरे-धीरे गहरा प्रतीत होने लगता है.हम उसको सहज रूप से प्रेम की संज्ञा दे देते हैं. वही सम्बन्ध बाद में किसी कारण वश मन के विपरीत हो गया तो वहाँ प्रेम में गिरावट आ जाती है.रही बात माता-पिता के बच्चों के प्रति प्रेम का तो वो नैसर्गिक व समान होना चाहिए. लेकिन मेरे आकलन के अनुसार बच्चों को पालने के क्रम में ही माता- पिता विद्रोही स्वभाव के बच्चे को कम प्यार देने लगते हैं.उन्हें बुढापे की लाठी का भी चुनाव करना होता है. जो हमारे अवचेतन में असुरक्षा की भावना के अनुरूप कार्य करता है. बाद में वही विद्रोही बच्चा अच्छा बच्चा साबित होने के बाद भी वो प्रेम नहीं पाता है.लगता है ज्यादा कह दिया.. मानव स्वभाव व व्यवहार ऐसा विषय है कि कितना भी पढ़ा जाए पन्ना ख़त्म होता ही नहीं है.

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  10. जहाँ तक मैं समझता हूँ कि अन्य किसी अध्ययन का हवाला माँ-बाप द्वारा संतान के प्रति किये जाने वाले प्यार के सन्दर्भ में देना ठीक नहीं है.कई बार बहुतों को लगता है कि माँ या पिता उसे नहीं दूसरे को अधिक चाहते हैं तो यह अपवाद-स्वरुप हो सकता है.कई बार किसी बच्चे को इसलिए भी ध्यान दिया जाता है कि वह किसी तरह से कमतर है,या तुनुक मिजाज़ है.यहाँ ध्यान देना और प्यार करना दोनों अलग बातें हैं.
    अमूमन हर माँ-बाप अपने बच्चे को प्यार करते हैं,यदि किसी बालक को डांटते ज्यादा हैं तो इसका मतलब नफरत नहीं बल्कि उसके लिए चिंतित होना है.
    फिर भी ,यदि कोई संतान बड़ी होकर अपने माँ-बाप से यह सवाल कर दे कि "आपने मेरे लिए क्या किया?" ,तो मैं नहीं समझता कि इसका भी वे कोई उत्तर दे सकते हैं !ऐसा प्रश्न ही निरर्थक है !

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  11. प्रवीण त्रिवेदी जी की एक बात तो पूर्णतया सही है कि माँ सबसे कमजोर बच्चे को अधिक प्यार करती है। पिता का स्वाभाविक रूझान उस बच्चे के प्रति हो जाता है जो योग्य है..उसके काम में हाथ बंटाता है या फिर वो जो उसकी यश वृद्धि करता है।
    दया और प्रेम में भारी फर्क होता है। कमजोर बच्चे दया के पात्र बन जाते हैं...तेज बच्चों से सभी प्रेम करते हैं।
    ..इस संबंध में सच यह भी है कि कोई भी संधान अंतिम नहीं हो सकता। शिक्षा, सामाजिक स्थिति, आर्थिक हालात..आदि कई कारक हैं जो किसी भी निष्कर्ष को उलट सकते हैं।

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  12. यह सवाल ऐसा ही है कि अपनी दो आँखों में से किसे ज्यादा चाह्ते हैं !
    फिर भी अपवादस्वरूप कभी- कभी व्यवहारिकता रिश्तों पर हावी हो जाती है, माता -पिता उन बच्चों को ज्यादा प्यार/देखभाल देते हैं जिनसे उम्मीद होती है ! या फिर उन बच्चों को ,जो किसी भी कारण से अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने में सफल हो पाते हैं !
    और यह अपवाद हर मानवीय रिश्ते में देखा जा सकता है !

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  13. अन्वेषण और विश्लेषण तो होता ही रहता है
    सुन्दर और सामजिक संदर्भो से लैस आलेख

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  14. परिस्थितिवश ऐसे उदाहरणों से इनकार भी नहीं किया जा सकता.

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  15. मानव मन को समझना बहुत मुश्किल है ..सही है यह बात ..पर बच्चो में अधिक कम प्यार की बात मानव स्वभाव में ..यह समझ नहीं आती ...सोचने लायक लेख है .....

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  16. “ऐसे अध्ययन अंतिम नहीं कहे जा सकते ” ek dam barobar

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  17. उंगलियाँ बराबर नही होतीं और मन भी उन्हे बराबर नहीं देखना चाहता।

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  18. आदर्श स्थिति से परे आपसी व्यवहार भी बहुत कुछ तय करता है ......मां बाप के आदर्श रूप में अपने बच्चों को बराबर प्यार करने की स्थिति होनी चाहिए ....मगर जब जब बच्चे बड़े हो जाते हैं ....तो उनका कार्य व्यवहार भी इस कारण में शामिल हो जाता है और तदनुरूप मां बाप का प्यार भी !

    इसमें क्या दिक्कत ??

    बकिया तो हर मां बाप अपने बच्चों को बराबर प्यार करते ही हैं .....पहले कमेन्ट में मैंने माँ बाप के रूप में महिला और पुरुष मानसिकता के अनुरूप यह बात कही थी !!

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  19. ये व्यक्ति के संस्कार व उसके सोच पर निर्भर करता है की वो कौन से बच्चे को पसंद करता है ।
    मनोवैज्ञानिक पहलुओं को कुरेदता गंभीर सवाल ।
    माता पिता अपने सभी बच्चों को सामान मानते हैं । लेकिन अंत में उसे ही ज्यादा मानते हैं जो लायक होता है अथार्त जिसके मन में उनके प्रति सच्ची सेवा भावना रहती है ।
    बहुत अच्छी प्रस्तुति !

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  20. औरत ने जनम दिया मरदों को
    मरदों ने उसे बाज़ार दिया!!!!!!

    रही बात आपके दोस्त की, यह समस्य कैसे सुलझे कि उनके मरने के बाद उनका भाई बडा होता और उसे बोझ ढोना पडता... आखिर किसी न किसी को बडा बनकर बोझ ढोना पडता ही है ना :)

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  21. Mere blog" Simte Lamhen" pe, aapke anurodh se ek 'fusion' waalee rachana post kee hai. Zaroor dekhen!

    Maine to apne dono bachhon ko ek samaan pyaar kiya....haan,pyar ke izhaar pe mere pariwaar kee orse bandishen theen,ye alag baat hai.

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  22. क्या कहा जा सकता है..परिस्थितियों और परिवेश पर काफी कुछ निर्भर करता है.

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  23. आपका यह कहना दुरुस्त है कि इन पर्यवेक्षणों को अंतिम नहीं कहा जा सकता!
    मसलन पहलौटी के पुत्र पर दिया गया वक्तव्य किन्हीं विशिष्ट परिस्थितियों और सन्दर्भों में रहा होगा पर उसका आलेख में जिक्र मित्र के सरलीकृत हवाले से है ना कि उन परिस्थितियों और सन्दर्भों से जोड़कर जिनका मूल्यांकन हम भी कर पाते !

    मानवीय व्यवहार पर जैव अथवा सामाजिक प्रभाविता की सर्वोच्चता की बहस फिलहाल अंतहीन ही कही जायेगी क्योंकि प्रेम जैसी विशिष्टताओं के अनुमापन के लिए ऐसा कोई उपकरण आज तक विकसित नहीं हुआ जैसा कि बुखार को नापने के लिये :)

    प्रेम को महसूस करना और नापना तौलना दोनों अलग अलग बातें हैं ! महसूसने के सन्दर्भ काट कर प्रेम पर वक्तव्य मुझे उचित नहीं लगते और मुझे आश्चर्य है कि आपका आलेख प्रेम को नापने पे उतारू है :)

    घुघूती बासूती की पोस्ट पर कोई कमेन्ट नहीं कर पाया इसलिए उस पर यहां कोई प्रतिक्रिया देना सही नहीं होगा ,यही बात दूसरे लिंक पर भी लागू होती है !

    सवाल यह है कि ययाति पुत्रों की आज्ञाकारिता और अवज्ञा को प्रेम के सन्दर्भ, उपेक्षा के सन्दर्भ ,फ़िक्र के सन्दर्भ , वंचित और अवंचित होने के सन्दर्भों में देखा जाये कि श्वसुर पक्ष की पारिवारिक /सामाजिक / आर्थिक / सांस्कृतिक पृष्ठभूमि अथवा पत्नियों के तुलनात्मक रूप सौंदर्य के सन्दर्भ में , पत्नियों के आहार , गृहस्थी के कौशल या फिर अन्य कोई सन्दर्भ ?...मुझे नहीं लगता कि निष्कर्ष निकालने में किसी त्वरा से काम लिया जाना चाहिए !

    आपने अपनी बहस में शक्ति सामर्थ्य और असामर्थ्य के दो बिंदु सामने रखे है पर इनसे संबद्ध / उदभूत गौरव अथवा विशिष्ट परवाह की अनुभूति को क्या प्रेम की श्रेणी में गिना जा सकेगा ?

    आपकी इस बात से सहमत कि यह विषय गहन अध्ययन / अकादमिक अन्वेषण के लिए सर्वथा अनुकूल हैं ! मुझे भी किसी परफेक्ट , प्रेम और अनुभूति मापीयंत्र का इंतज़ार है ! तब तक अनुमानों / परिकल्पनाओं से काम चलाइये :)

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  24. तमाम अन्वेषण प्रेक्षणों से नतीजे लेतें हैं और नतीजे काल और अन्तरिक्ष सापेक्ष होतें हैं .निष्कर्ष में सत्य का अंश रहता है आगे और अध्ययनों की गुंजाइश सैदेव ही बनी रहती है .बात निरर्थक कभी नहीं होती है .अच्छी पोस्ट लातें हैं आप भाई साहब .

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  25. लोकतंत्र के चौथे खम्बे पर अपने अपने विचारों से अवगत कराएँ
    औचित्यहीन होती मीडिया और दिशाहीन होती पत्रकारिता

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  26. सर आपका ब्लॉग वापस आ गया है |बधाई और शुभकामनाएं |

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  27. @जयकृष्ण जी ,
    प्रात ब्रह्मबेला में आपने कितना सुखद समाचार सुनाया है बता नहीं सकता ...बहुत आभार आपका -मिठाई ड्यू हो गयी आपकी !

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  28. बची खुची मिठाई की लालच में हम भी चले आये ...सर जी !

    बधाई !!! भाव-बाधा पार हुई !!

    कम से कम इस ब्लॉग पर नजर और टोटके बचाने वाला यंत्र तो लटकाया ही जा सकता है ....नहीं ?.....:-)

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  29. @ प्रवीण त्रिवेदी जी ,
    अरविन्द जी क्या पढते है ये तो वे ही जाने पर हमें जो महसूस हुआ हम वही पढेंगे :)

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  30. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  31. अरविन्द जी ..पूरी तरह सहमत हूँ आपकी इस बात से कि इस तरह के अध्ययन अंतिम नहीं होते...मुझे टाइम मैग्जीन के इस लेख में माता पिता के विचारों से ज्यादा एक बच्चे का दर्द ज्यादा दिख रहा है जिसे हमेशा लगता है कि उससे ज्यादा उसके भाई बहनों को उसके माता पिता प्यार करते हैं...

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  32. एक महत्वपूर्ण विषय पर उल्लेखनीय विश्लेषण। मनुष्य अन्य प्राणियों से इसी अर्थ में भिन्न है कि वह अधिक सोच-विचार की क्षमता रखता है किंतु आर्थिक समीकरणों ने उसकी संजीदगी पर प्रश्न-चिह्न खड़े किए हैं। यह एक सच्चाई है कि कमासुत(बड़ा हो या छोटा) अपने माता-पिता का अधिक स्नेह पाता है,यद्यपि खान-पान संबंधी उस प्रकार के भेदभाव की मुझे जानकारी नहीं है जिसका ज़िक्र पोस्ट में किया गया है। स्वास्थ्यगत कारणों से संबल न बन पा रहा संतान भी एक समय विशेष के बाद बोझ/उपेक्षित ही हो जाता है।

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  33. हियाँ भी कल दिए थे एक्को कमेंटवा.कहाँ फरार हो गया है हमार बचुआ? दागदार साहेब ! काहे डराते हैं आप 'इस' 'मासूम' बच्ची और इसके कमेंटवा को? समय पर नही आ सके तो नुक्सान तो हम खुद का किये हैं सर जी! आपको का फरक पड़ा? अपने ब्लोग्वा से कह दीजिए इत्ता अनियाय हमारे सबदों के साथ न करे.जरा देखिये तो कहीं स्पेम्वा में लुकाय बैठा होगा मरा जा के. तनिक सही ठोर पर बिठाय देव गुरूजी!

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