शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2010

वसंत का शंखनाद!

हिन्दी ब्लागजगत  में वसंत पंचमी से बालक बसंत की  फिफिहरी जो बजनी शुरू हुई अब वह  शंखनाद बन गयी है .इस बार की उसकी चतुरंगिनी सेना की अगुवाई  कर रहे सेनापतियों की एक सूची यहाँ देखी जा सकती है .संक्रामकता की पूरी आशंका है .तरह तरह के गुप्त सुषुप्त संकेत और मनुहार शुरू हो गए हैं .मन  महुआ और तन फागुन होने लग गया है .यह प्रेमाकुलता का मुखर पर्व है .मनुष्य का तो कोई निश्चित ऋतुकाल नहीं होता अर्थात उसका हर पल ऋतुकाल ही  है मगर वसंत के दिनों की यह मादकता सोचने पर विवश करती है .आज नहीं हजारो वर्षों  से मदनोत्सव मनाया  जाता रहा है -ऋषि मुनियों तक ने इसके महात्म्य को स्वीकारा और वसंत ने उनके दंभ को पराभूत किया .जब आदि देव शंकर और मर्यादा पुरुषोत्ताम श्रीराम ही वसंत के पुष्प वाणों से आहत हो उठे हों  तो दूसरे तपस्वियों, पामर देहियों का तो  कहना ही क्या ?

उसी कामदेव ने लगता है अपनी चतुरंगिनी सेना के साथ ब्लागजगत पर धावा बोल दिया है .तब आपन प्रभाउ विस्तारा ,निज बस कीन्ह सकल संसारा ....सदाचार जप जोग बिरागा ,सभय बिबेक कटकु सब भागा और सबके हृदय मदन अभिलाषा लता निहार नवहिं तरु शाखा जैसी स्थिति बस होने ही वाली है. मगर न जाने क्यूं मुझे प्रेमातुरता का यह मुखर रूप सदैव  आतंकित करता रहा है . प्रेम क्या शंखनाद का मुहताज है ? बशीर बद्र की इन पक्तियों को देखिये -
मुझे इश्तिहार सी लगती  हैं ये मुहब्बतों की कहानियां 
जो कहा नहीं वो  सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो 
प्रेम  तो बस अनुभूति का विषय है .और सार्वजनिक करने का मामला नहीं है ,भले ही वह जगजाहिर हो जाय यह बात दीगर है .एक और शायर पूरी सन्जीदगी  से कहता है कि उसके पास बहुत कुछ तो सारी दुनिया को सुनाने के लिए हैं मगर चंद अशआर तो बस दिल में बसी उस और सिर्फ उस माशूका के लिए ही हैं .

मित्रों, मेरी गुजारिश है प्रेम का आतंक यहाँ मत शुरू करें -यह एक बहुत ही सुकोमल नाजुक अनुभूति है .होली की उद्धतता कभी कभी शालीनता की सारी हदे पार कर जाता है और बात बनने के बजाय बिगड़   जाती है .मुझे डर  है  कि कहीं मैं भी संक्रामकता के चपेट में आकर हुडदंगीं  न बन जाऊं और अपना भी कुछ नुक्सान कर डालूँ -पहले के ही भारी नुक्सान की अभी भरपाई नहीं हो पाई है .तो यह मेरा डर ही आज यह अपील  करवा रहा है  मुझसे .....

बाकी तो आप सब खुद जिम्मेदार और होशियार हैं .....थोडा लिखा अधिक समझना .हा हा (इतना लिखने के बाद भी ) .

31 टिप्‍पणियां:

  1. मुझे डर है कि कहीं मैं भी संक्रामकता के चपेट में आकर हुडदंगीं न बन जाऊं

    -आपसे बहुत उम्मीदें थीं सब मटिया मेट हो गई मात्र इस व्यक्तव्य से.

    उत्तर देंहटाएं
  2. श्रीमान जी, होली आनन्द का त्यौहार है, सुवासित रंगीन जल से भीगना किस के मन को नहीं भिगोता. बस जबरदस्ती, कींचड़, गन्दा पानी और अश्लील हरकतों के चलते इसका मजा खराब हो गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपने प्रेम को आतंक की संज्ञा दी है , आतंकवादी आते ही होंगे :)

    उत्तर देंहटाएं
  4. सच कह रहे हैं आप....प्रेम तो बस अनुभूति का विषय है ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. हम तो हर होली पर होशियार रहते हैं धन्यवाद याद दिलवाने के लिये । प्यार की परिभाषा बहुत अच्छी लगी

    उत्तर देंहटाएं
  6. पहले के ही भारी नुक्सान की अभी भरपाई नहीं हो पाई है

    इतना प्रेम भी ठीक नहीं :-)

    बी एस पाबला

    उत्तर देंहटाएं
  7. अरविंद भैया-लगता है फ़ागुन आ गया है, उधर अवधिया जी भी सेनापति के साथ मदन महोत्सव की तैयारी में हैं, इधर आप और कविता-कवि भी। अब हमको भी होली हुंड़दंग मे शामिल होना पड़ेगा।:)

    नही तो फ़ागुन का क्या आनंद जब लग तन-मन ना भीगे।
    अच्छी पोस्ट आभार

    उत्तर देंहटाएं
  8. 'prem' bada hi rochak vishay hai..is par likha jata raha hai aur rahega..
    aur aapke lekh se hum aur ru-b-ru ho chale hai...liked it!

    उत्तर देंहटाएं
  9. माननीय मिश्रा जी ...

    वसंत के सेनापतियों की जो सूची जारी की गयी है ....उसमे एक सुधार करने की जरुरत है ...मुझे होली का त्यौहार बिलकुल पसंद नहीं है ....:):)

    वैसे वसंत और बहुत से ब्लोग्स पर छाया हुआ है ....आप इजाजत दे {बिना क्रोधित हुए :):)} तो कुछ लिंक भेज दें ....!!

    उत्तर देंहटाएं
  10. प्रेम अनुभूति का विषय है ....प्रचार का नहीं ...इससे मैं पूरी तरह सहमत हूँ .....!!

    उत्तर देंहटाएं
  11. आपने अपील करके सब प्लानवा ही खटाई मे पडवा दिया. अब करें तो मुश्किल ना करें तब भी मुश्किल.:)

    रामारम.

    उत्तर देंहटाएं
  12. सार्थक लेख...और प्यार अनुभूति का नाम है ..एकदम सहमत

    उत्तर देंहटाएं
  13. वसंत में ये हाल हैं सबके...फिर बारिशों में क्या होंगे...

    उत्तर देंहटाएं
  14. अरविंद जी! ऐके ही तो महीना आवै है बरस में फागुन का। जो फगुनियाएँ तो क्या गलत है। वैसे अभी आदिवासी मजदूरों की झोंपड़ियों से चंग बजने की आवाजें नही आने लगी हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  15. काश ये नाज़ुक नाज़ुक सी अनुभूति हमें भी हो पाती
    पर लगता है जैसे आपने इसपर एकाधिकार कर रखा है इन दिनों : )

    उत्तर देंहटाएं
  16. अरविन्द जी,
    आज कल आप उम्मीदों पर खरे नहीं उतर रहे हैं...क्या बात है ??
    और हाँ...प्रेम ?? कौन है ई ?

    उत्तर देंहटाएं
  17. कहवाँ भैया मंच बनल बा कहाँ तनल शमियाना

    कौन सजनिया ठुमका मारे कौन सजन मुस्काना

    ब्लॉगर पर मंच बनल बा इहाँ तनल शमियाना
    उड़न पुतरिया ठुमका मारे ललित सजन मुस्काना

    ..हा जोगीरा सर र र र र

    उत्तर देंहटाएं
  18. कविता तो मन में बन ही रही है पर काहे लिखूं !
    अब अपने सिद्धांत की रक्षा भी तो करनी है , जिसमें कि
    मुझे कहीं खोट नहीं दिख रही है और जिसे
    आप बूझ चुके हैं .. सिद्ध अंत नहीं होने दूंगा अपनी
    लाख टके की बात का ... '' हम ही न होंगे तो दुआ
    कौन करेगा / हक हुस्ने-मोहब्बत का 'अदा' कौन करेगा ! '' आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  19. पैरोडी में बना कर रहा हूँ -- किसी शायर के पूर्व-टिप्पन्योक्त शेर की नक़ल पर ---
    .
    '' या रब !मेरे 'बाऊ' को सदा रखना सलामत ,
    वरना फगुनाने की दुआ कौन करेगा ! ''

    उत्तर देंहटाएं
  20. चच्चा देखो चुटकी लेवें आचारज ललचाना
    लिख के भइया मुस्की काटें अदा रहीं दुखियाना ।

    हा हा जोगीरा स र र र ..

    उत्तर देंहटाएं
  21. Bhai fagun ki sharaatain na roki hai na ruke gi aapne sach hi kaha hai bade bade tapaviyo ka is par bas na chala.. :)
    prem to ek virtrat vishay hai jitane log utani soch...bade bade mahakavya likha gae par prem par chintan chlata hi raha...bahut acchi post lagi aapki!
    Aabhar!!
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  22. अदा रहीं दुखियाना ? अरे ऐसन नहीं फ़साना
    ठोर जो उनका टेढ़ भये हैं, पर असल में है मुस्काना

    हा हा जोगीरा स र र र ..

    उत्तर देंहटाएं
  23. offffffffffo होलिया तक इहै सब चली का !
    ई ब्लोगिंग की कौन अदा है !
    खालिस बाऊपना है !
    कुछ लोगन का महफूज रहने दो न !
    कितने स्तम्भ ढहाना है !
    हमें तो मिसिर-स्तम्भ के ढहने का डर सताने लगा है !
    .
    भभूका खाए हौ का सभै !

    उत्तर देंहटाएं
  24. अमरेन्द्र जी,
    सादर,
    हम तो इहे समझे कि ई सब निर्मल हास है...और कबीरा के आगे बढ़ावे में तनी जोगदान करी...
    बाकि अगर ..कौनो समस्या है तो हम यहीं पर...हाथ जोड़ लेब...
    गलती जो हो गयी हो तो माफ़ी...

    उत्तर देंहटाएं
  25. अदा जी !
    ई का हुआ !
    बैकफुट पै काहे आय रहीं हैं !
    हम तौ बड़े निर्लिप्त आदमी हैं .. कौनौ 'निर्मल हास' से हमैं काहे समस्या होए !
    हम तौ --- '' झोंके कितने ही आये , हिमवान अमान खड़ा है '' - से प्रेरित हैं ..अप्रभावित हैं हम !
    '' हाथ जोड़ लेब '' कहि के शर्मिंदा काहे कीन जात अहै ..
    .
    आपै का दुःख होई .. राव-वाणी के सच हुवे पै ..---
    ''लिख के भइया मुस्की काटें अदा रहीं दुखियाना । '' तब का होई !!! :) सम्हालौ जी ! :)

    उत्तर देंहटाएं
  26. देख लीजिये, आपके द्वारा इतनी चेतावनी देने के बाद भी कुछ लोग जोगीरा का साथ ही नहीं छोड़ रहे हैं.
    और भी... एक नये तपस्वी आविर्भूत हो गये हैं-श्री श्री अमरेन्द्र जी महाराज. बाकी सब लोग तो भभूत खाये हैं. ई जाने कौन सी बूटी खाये हैं कि इन पर कोई रंग ही नहीं चढ़ रहा है. निर्लिप्त...निष्काम...बेचारे.
    ... ...
    अमरेन्द्र बुरा न मानो होली है!!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  27. फाग-अनुराग पर ऐसो बरजन क्यों?...

    "फूलि रही सरसों चहुँ ओर, जो सौने के बेस बिछायत साँचै ।
    चीर सजे नर-नारिन पीत, बढ़ी रस-रीति, बरंगना नाँचैं ॥
    त्यों ’कवि ग्वाल’ रसाल के बौरन, भोंरन-झोरन ऊधम माँचै ।
    काम गुरु भयौ, फाग सुरु भयौ, खेलिऐ आजु वसंत की पाँचैं ॥"

    उत्तर देंहटाएं
  28. सितार के तार पर हल्की सी चोट और गूँज देर तक...दूर तक.
    इस पोस्ट ने भी वही काम किया लगता है..

    मुझे इश्तिहार सी लगती हैं ये मुहब्बतों की कहानियां
    जो कहा नहीं वो सुना करो जो सुना नहीं वो कहा करो

    ...जो कहा नही वही तो सुना है!

    उत्तर देंहटाएं

यदि आपको लगता है कि आपको इस पोस्ट पर कुछ कहना है तो बहुमूल्य विचारों से अवश्य अवगत कराएं-आपकी प्रतिक्रिया का सदैव स्वागत है !

मेरी ब्लॉग सूची

ब्लॉग आर्काइव