शनिवार, 27 फरवरी 2010

वाह रे दिल्ली -आखिर बन ही गए न बुडबक! (यात्रा संस्मरण समापन किश्त)

 २४ फरवरी ,२०१० अपराहन 
कार चालक ने जाते जाते बता दिया था कि सर ये सामने कई बैंकों के ऐ टी एम की कतार है अगर किसी का वेट करना है तो यहाँ बुलाना आसान रहता है .गरीब रथ तो  ५.५० पर थी और अभी भी ३ बज रहा था .पराठा पच चुका था और जोरों की भूख लग आई थी -राजेश जी ने शिष्टता वश खाने का आग्रह किया  था और मैंने उतनी ही अतिरिक्त शिष्टता से उसे अस्वीकार कर दिया था -किंचित मिथ्याचार भी कि खाना हम खाकर ही निकले थे-वैसे मनीष के यहाँ का पराठा और सेवईं एक तरह से ब्रंच (ब्रेकफास्ट +लंच )  ही तो था . मगर भूख तब और लग आई जब नई दिल्ली स्टेशन के ठीक सामने और ऐ टी अम की कतार में ही एक रेस्टोरेंट के मीनू पर नजर गयी .यहाँ खाने वालों की कतार लगी थी -मीनू में पनीर के कई प्रेपरेशन अपनी ओर खींच रहे थे-मन  हो आया कि  बटर पनीर खाया जाय और साथ में बटर नान -यम यम! रहा नहीं गया -काउंटर पर गया टोकेंन  लेने -वहां बैठे गोल मटोल मगर चेहरे से क्रूर आदमी ने पूंछा  कि खाना खा लिया ?-मैंने जवाब दिया अभी कहाँ! -"खाने के बाद पेमेंट करियेगा" उसने प्रोफेसनल टोन में जवाब दिया -जी साब जी कहते हुए मैं रेस्टोरेंट में अपनी मन  माफिक टेबल खाली होने का इंतज़ार करने लग गया -लम्बा इंतज़ार था उफ़ ! बहरहाल टेबल खाली होते ही द्रुत गति से मैंने वहां कब्ज़ा जमाया -वेटर को आते ही आर्डर  दे दिया - अभी भी याद है उसने जोर देकर पूंछा था कि बटर पनीर हाफ ही लाना  है न, मैंने भी बल देकर कहा हाँ हाँ हाफ! (अब एक प्राणी फुल कैसे खाता ? ) मेरी छठी हिस कुछ कुछ सक्रिय होती दिखी मगर मैंने नई जगह पर ऐसी ही अनुभूति होती होगी  यह मानकर उस अनुभूति को उपेक्षित कर दिया .पनीर आया तो देखा ,यह तो फुल था -फिर सोचा हो सकता है दिल्ली की इकाई ही यही हो -मतलब हाफ में यहाँ फुल मिलता हो -देश की राजधानी है यह -ऐसी समृद्धता यहाँ हो भी सकती है .मगर जब सामने सुस्वादु व्यंजन हो तो ये विचार कितने दीर्घकालिक होते -बटर पनीर की भीनी मसालेदार  महक  और छवि के आगे तुरत ही छूमंतर हुए ये विचार -खाना वाकई लजीज था -मैंने दो बटर नान ,चावल हाफ माँगा तो वह भी मानो किसी अलग नियम से फुल मिला -यह ज्यादा हो गया था मगर सुस्वादिता पेट पर भारी पड़ती ही है -अब भुगतान की बारी थी ...काउंटर पर पहुँचने के पहले मैं मन  में एक रफ कलकुलेशन कर  चुका था जिसके मुताबिक़ ज्यादा से ज्यादा ७० -७५ रूपये का बिल होना था -काउंटर विलेन बोला -१३५ रूपये -मैं चौका -कहा, पनीर तो हाफ था -"पैसा भी हाफ का ही चार्ज किया गया है " विलेन बोला .बगल के एक शायद (शुभेच्छु) यात्री ने मामले को भाप कर मुझे सांत्वना दी -भाई साहब यहाँ फुल ही हाफ है -कोई फुल श्रेणी नहीं है यहाँ -आप फिर से मीनू पढ़िए! हद है अब मीनू पर लिखी वही  सूची पोस्टर के बड़े अक्षरों  सी साफ़ दिख रही थी -जहाँ फुल का नामोनिशान नहीं था -बस दो कटेगरी थी -हाफ और क्वार्टर! क्वार्टर सब्जी ?-न कभी सुना न कभी  देखा ,न अपने बनारस में और न अपने नखलऊ में -दिल्ल्ली के ठगों ने लूट लिया था आखिर ...बहरहाल इज्ज़त के साथ पेमेंट किया और एक बार नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की ओर निहार कर कहीं बैठने की जुगाड़ में लग गया -

केवल एक जोड़ा जुडी कुर्सियां दिखीं जिस पर एक सुरक्षा कर्मीं ये के -५६ लिए मुस्तैद था -दूसरी खाली थी ....सुबह एक सुरक्षा कर्मी से मुठभेड़ हो चुकी थी और उनसे डील करने का कुछ पेशेवराना कान्फिडेंस हो आया था और उसी लहजे में मैंने उससे बगल बैठने का अनुग्रह किया -आश्चर्यों का आश्चर्य वह मान  गया - भोजनोपरांत अपराह्न झपकी सी आ  रही थी मगर चेष्टा कर मैंने प्रियेषा को फोन कर बता दिया था कि तुम स्टेशन के ठीक सामने ऐ टी एम के कतार के सामने आई सी ई सी आई के सामने आ  जाओ -उसने कहा कि मैं १० मिनट में पहुँच जाउंगी .और मैं झपकियाँ लेने में मशगूल हो गया -अभी दस मिनट भी नहीं हुए थे  कि कानो को अप्रिय सी लगती मोबाईल की घंटी बजी -प्रियेषा का फोन था -
"पापा कहाँ हैं आप ? " 
"आई सी आई सी आई ऐ टी एम के ठीक सामने" 
"क्या ? यहाँ तो कोई आई सी आई सी आई ऐ टी एम नहीं है "
लगभग चीखते हुए उसने जवाब दिया 
एक तो भोजनोपरांत  सुन्दर सी झपकी में विघ्न और दूसरे कैसे नहीं दिख रहा है इतना स्पष्ट सा लैंडमार्क प्रियेषा को ...
मैं भी दुगुने आवाज में चीखते हुए एक एक शब्द को चबाते हुए से बोला -
"स्टेशन पर जहाँ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन लिखा हुआ है उसके ठीक सामने देखो.... "और मैंने अनिर्दिष्ट 
दिशा में हवा में हाथ भी लहराया ...
" हद है पापा, गरीब रथ कहाँ नई दिल्ली से जाती है ,पुरानी दिल्ली से जाती है "  वह सातवे सुर में बोल रही  थी ..
मानो मुझमें स्प्रिंग सा लग गया हो उछल कर खड़ा हो गया ,मोबाईल हाथ से छूटते छूटते बचा -सुरक्षा कर्मीं भी अचानक हुई इस हलचल से सकपका गया और मुझे  अविश्वास से देखने लगा ...
'' वहीं रुकिए मैं पहुँच रही हूँ " मानों बेटी को भान हो गया था कि यह संस्मरण  लम्बा खिंच जायेगा और उसे विराम देने (मेरी और फजीहत  न हो और इज्ज़त कुछ तो बंची रहे, )उसने मुझे खुद लेने का फैसला  लिया -(आखिर बेटी है न ! पापा की इज्ज़त प्यारी है उसे )
सुरक्षा कर्मी ने मेरी दयनीय दशा देखकर मुझे मेट्रो का द्वार खुद थोडा आगे बढ कर दिखाया ....और सच ही थोड़ी ही देर में प्रियेषा वहां आ पहुंची थी -कोसना  जारी था उसका जो अब भी जारी है -मैंने टिकट पर स्टेशन का नाम ठीक से क्यूं नहीं  पढ़ा?
और मेरी टेक कि तुम लोगों ने इतनी बार बात की तो बताया क्यूं नहीं  बहरहाल यह अंतहीन आरोप प्रत्यारोप है जो कम से कम अगली दिल्ली यात्रा तक तो चलता ही रहेगा ! 
आगे की मेट्रो की यात्रा बहुत शानदार और गरीब रथ की भी घटना  विहीन बीती -आखिर ड्राप सीन तो पहले ही जो आ  चुका था! मैं अब बनारस में था -अपनी मांद में .....

32 टिप्पणियाँ:

बेचैन आत्मा ने कहा…

यह संस्मरण तो गजबै है.
फुल ही हाफ है!
चलिए हम ध्यान देंगे..कभी जाना हुआ तो.

Suman ने कहा…

आप और आपके परिवार को होली की शुभकामनाएँ...nice

Udan Tashtari ने कहा…

बिटिया का धन्यवाद किजिये...वरना दिल्ली में ही बैठे रह जाते कम से कम उस दिन तो...:)

बढ़िया वृतांत रहा.

मुनीश ( munish ) ने कहा…

Sir Delhi is not India ,but it is sum total of urban India --a capital ruled by those whom we all have chosen collectively . I feel sorry to know to about ur inconveniences . Nxt. time pls. inform me without any hitch and i'll see to it that u have a nice stay here.

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

यात्रा संस्मरण जायकेदार रहा.

दीपक 'मशाल' ने कहा…

sach kaha aapne khane ke mamle kai jaghon par bahut lootti hai Dilli..
khair aap sahi station pahunche to.. der aayad durust aayad..

बी एस पाबला ने कहा…

मीनू पर लिखी वही सूची पोस्टर के बड़े अक्षरों सी साफ़ दिख रही थी

हा हा

इसे कहते हैं आंखें खुलना। पनीर ने बंद कर दी थीं ना!

रोचक संस्मरण
बढ़िया

डॉ टी एस दराल ने कहा…

दिल्ली के खाने में हाफ और क्वार्टर ! ये तो हमने भी पहली बार सुना अरविन्द जी ।
खैर ये दिल्ली है , यहाँ सतर्क तो रहना ही पड़ता है।
लेकिन आप भी नदीरे -पुदीरे के चक्कर में फंस गए ।

आपको और आपके परिवार को होली की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें।

निर्मला कपिला ने कहा…

संस्मरण बहुत अच्छा लगा। होली की शुभकामनायें

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

रोचक संस्मरण,आपको होली की रंग भरी शुभकामनाएँ !

Ghost Buster ने कहा…

अद्भुत कथा प्रवाह! दो बार पढ़ा.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

दिल्ली का मतलब पुरानी दिल्ली जी। नई दिल्ली को तो नई दिल्ली बोलना होता है।

राज भाटिय़ा ने कहा…

बाबू जी धीरे चलना, दिल्ली मै चलिये आप से यह भी पता चल गया, वेसे मै तो इन होटल के खानो से हमेशा ही बचता हू, इस लिये इन सब से परिचित भी नही..
होली की आप को ओर आप के परिवार को बहुत बहुत बधाई

ali ने कहा…

आज सुमन जी नें इतिहास रच दिया नाइस के साथ शुभकामनायें भी :)

प्रवीण शाह ने कहा…

.
.
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-भाई साहब यहाँ फुल ही हाफ है -कोई फुल श्रेणी नहीं है यहाँ...यहाँ फुल का नामोनिशान नहीं था -बस दो कटेगरी थी -हाफ और क्वार्टर!

हा हा हा, धोखा देने के लिये ही सही, पर जीवन की एक बड़ी सच्चाई को ही दिखा रहा है यह रेस्टोरेन्ट... क्या आपको नहीं लगता कि अब फुल इन्सान भी बड़ी मुश्किल से दिखता है...बस दो कटेगरी हैं -हाफ और क्वार्टर!

rashmi ravija ने कहा…

.अच्छा संस्मरण रहा....ट्रेन नहीं छूटी, नहीं तो..कई किस्तों में संस्मरण लिखना पड़ता....Thanx to Priyesha

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बहुत जोरदार रही ये यात्रा.

आपको होली पर्व की घणी रामराम.

रामराम

वाणी गीत ने कहा…

पिता का बेटी के प्रति प्रेम छलका जा रहा है ...काश कि ये आपका स्थाई भाव हो जाता ....और दूसरी बेटिओं और दूसरों की बेटिओं के लिए भी ....

होली की बहुत शुभकामनाएं .....!!

Vivek Rastogi ने कहा…

बटर पनीर यम्मी यम्मी, पर पैमेन्ट यम्मी यम्मी नहीं, वाकई एक से एक नये तरीके हैं दिल्ली में बुडबक बनाने के...

ये अच्छा हुआ कि उसने यह नहीं बोला "बुरा न मानो होली है.."

होली की शुभकामनाएँ..।

Arvind Mishra ने कहा…

@वाणी जी ,बशर्ते वे बेटियाँ ही हों ,बहुएं या भौजायियाँ नहीं -आपकी यह टिप्पणी क्या कुछ ज्यादा ही सीधी और निजी नहीं हो गयी ?बहरहाल होली है .

Arvind Mishra ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
दीपक 'मशाल' ने कहा…

इस बार रंग लगाना तो.. ऐसा रंग लगाना.. के ताउम्र ना छूटे..
ना हिन्दू पहिचाना जाये ना मुसलमाँ.. ऐसा रंग लगाना..
लहू का रंग तो अन्दर ही रह जाता है.. जब तक पहचाना जाये सड़कों पे बह जाता है..
कोई बाहर का पक्का रंग लगाना..
के बस इंसां पहचाना जाये.. ना हिन्दू पहचाना जाये..
ना मुसलमाँ पहचाना जाये.. बस इंसां पहचाना जाये..
इस बार.. ऐसा रंग लगाना...
(और आज पहली बार ब्लॉग पर बुला रहा हूँ.. शायद आपकी भी टांग खींची हो मैंने होली में..)

होली की उतनी शुभ कामनाएं जितनी मैंने और आपने मिलके भी ना बांटी हों...

Meenu Khare ने कहा…

बेहतरीन संस्मरण.अद्भुत लेखन.होली की शुभकामनाएँ.

अल्पना वर्मा ने कहा…

मज़ेदार संस्मरण!
खासकर लंच वाला भाग !
हा हा हा!
**नयी दिल्ली /पुरानी दिल्ली वाली जानकारी में गड़बड़ अक्सर होती है ..आप के साथ नयी बात नहीं हुई..:D

****आपको सपरिवार रंगोत्सव की हार्दिक शुभकामनाये****

Yasir ने कहा…

Sir...naam to hai Dilli DIL walon ki..lekin kabhi saabka nai pada itne saalon me...jaise ki na main Chandni Chowk me kabhi Chandni dekhi,na Dhaula Kuan me kabhi Kuan dekha,Nai Sarak to nai hai hi nai.... wagairah wagairah....waise aap ki aap beeti se mujhe aur b seekhne ko mila...:)
and sabke baaad isi baat par santushti hoti hai ki "Accident Makes Mind prepare"

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

होली की बहुत-बहुत शुभकामनायें.

Babli ने कहा…

आपको और आपके परिवार को होली पर्व की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!

mukti ने कहा…

पूरी संस्मरण श्रृँखला पढ़ ली. बहुत ही रोचक है. विद्वान लोगों से अक्सर ऐसी भूलें हो जाया करती हैं. कोई बात नहीं. बिटिया ने डाँटा आपको...मुझे बड़ा मज़ा आया. बड़ी खिंचाई करते फिरते हैं सबकी आप. अब पता चला???

वाणी गीत ने कहा…

टिप्पणी आपको व्यक्तिगत लगी ...खेद है ...मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था ...

मगर जब भी किसी पिता को अपनी बेटी के प्रति इतना स्नेहमय देखती हूँ तो अपने पिता याद आ जाते हैं ....आखिर बहुएं या भाभियाँ भी तो किसी की बेटी ही होती हैं.....वास्तव में हर लड़की या महिला किसी ना किसी की बेटी होती ही है ....

बहरहाल होली तो है ही.....इसलिए खीझ मिटायें और मुस्कुराएँ ....
एक बार फिर से बहुत शुभकामनायें ....!!

'अदा' ने कहा…

होली की बहुत-बहुत शुभकामनायें...!!

zeashan zaidi ने कहा…

यानी दूसरी बार ट्रेन छूटते छूटते बची. (पहली बार तो छूट ही गयी थी.) शुभ समाचार है. आप आइन्स्टीन बनने की राह पर हैं.

ज्योति सिंह ने कहा…

achchha sansmaran ,is majedaar post ke saath holi ki dhero shubhkaamnaaye aapko .

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