रविवार, 29 दिसंबर 2013

क्या करूं क्या न करूं -अजीब धर्मसंकट था वह (सेवा संस्मरण -१६)

कहते हैं न कि याददाश्त बड़ी खराब दोस्त है ऐन मौके पर साथ छोड़ देती है। झांसी की यादों के साथ भी ऐसा ही कुछ है। कोई भी एक मुकम्मल याद नहीं सब बिखरी बिखरी सी यादे हैं कोलाजनुमा और आज आपसे उन्हीं में से कुछ साझा करूँगा। मैंने अर्थशास्त्र का विधिवत अध्ययन नहीं किया मगर मुझे अपने आचरण में हमेशा यह देखकर संतोष होता आया है कि मैं खुद और परिवार पर हमेशा अर्थशास्त्र के इस सुनहले सिद्धांत के अनुसार ही व्यय करता रहा हूँ कि "संसाधन हमेशा सीमित रहते हैं और रोजमर्रा के खर्च को अनेक विकल्पों में से चुनना और सीमित करना होता है " .मैं शायद बचपन  से ही  एक संतोषी जीव रहा और अब तो जीवन के सुदीर्घ अनुभवों ने परम संतोषी बना दिया है -मुझे भौतिक चमक दमक और सुविधाओं की कभी शौक नहीं रहा। और न कभी इसका कोई गिल्ट ही। झान्सी के आफिसर होस्टल में भी वैसी ही सन्यासी ज़िंदगी,साधारण सी कुर्सियां एक मेज और हाँ तब चूंकि ऐक्वेरियम रखना एक विभागीय 'ट्रेडमार्क' सा था तो एक बड़ा सा रंगीन मछलियों का ऐक्वेरियम भी।  

श्रीमती जी को जो भी लगता रहा हो मगर मेरे स्वभाव से उन्होंने जल्दी ही अनुकूलन बना लिया था।  आफिसर होस्टल के दूसरे अधिकारियों जिसमें सेल्स टैक्स ,इंजीनियर ,प्रशासनिक अधिकारी आदि थे के लिविंग रूम वैभवपूर्ण और सुसज्जित होते थे और साथ ही उनके पास आधुनिक सुख सुविधा और मनोरंजन के साजो सामान भी  और कुछ की खुद की अपनी गाड़ियां भी। मगर मुझे यह सब देखकर किंचित भी हीन भावना नहीं होती थी. उस समय (1987 -89) तक मेरे पास न तो टी वी थी और न ही फ्रिज आदि। मगर मुझे यही लगता था कि कि ये फालतू चीजें हैं।  पत्नी ने कम से कम एक टी वी खरीद लेने का प्रस्ताव रखा।  मगर मुझे अपनी एक वचनवद्धता याद थी। जो मैं अपनी बहन के विवाह के वक्त ऐसा परिजनों का दावा था कि  मैंने दूल्हेराजा को एक रंगीन टीवी देने का वादा खिचड़ी खाने के मान मनौवल वाली रस्म के दौरान किया था।  अब बिना बहन को दिए खुद अपनी टीवी कैसे खरीद सकता था?  

उन दिनों अपट्रान के रंगीन टीवी बाज़ार में आये थे।  दाम पता किया तो 6 हजार -हिम्मत जवाब दे गयी. इतनी तो मेरी तीन महीनों की तनखाह  थी।  अब क्या किया जाय।  मेरे एक स्टाफ ने तुरंत सुझाव दिया कि मैं अपने जी पी एफ से लोन ले सकता हूँ। बात सुलझ गयी. मुझे कई आसान किश्तों की वापसी के आधार पर छह हजार रूपये मिल गए और मैंने रंगीन टीवी खरीद लिया और उसे सीधे बहन को भिजवा दिया।  अब जब तक यह लोन था दूसरी टीवी खरीदने की हिम्मत ही नहीं थी। मैंने टीवी अपने इलाहाबाद पोस्टिंग में १९९० में ली और वह भी मित्र  मुक्तेश्वर मिश्र की पहल पर।  और  फ्रिज तो 1997  में देवरिया में! 

झांसी  के आफिसर्स होस्टल में मेरे बगल के कक्ष संख्या 17 में ही उन दिनों एक नए आई ए  एस आफिसर ज्वाइंट मजिस्ट्रेट की पहली पोस्टिंग पर आये।  उनमें एक बात विलक्षण थी ,उनके आई  ए  एस के पेपर्स में एक सांख्यिकी था और दूसरा उर्दू। एक साहित्य तो दूसरा एकदम नीरस विषय।  मेरी उनके साथ खूब जमी। साहित्य की बैठकें होती मगर एक ऐंटी क्लाइमेक्स तब आया जब उनकी एक गोपनीय जांच मुझे डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट ने सौंप दी और कहा कि मैं जांच करके रिपोर्ट  उसी दिन भले ही रात हो जाय मैं उन्हें सौंप दूं -अब मुझे तो काटो तो खून नहीं , दोनों आई ए  एस एक बॉस एक नया नया बना मित्र।  क्या  करूं क्या न करूं -अजीब धर्मसंकट।

बहरहाल मैंने जांच पूरी की जिसके लिए मुझे दिन भर मुख्यालय से बाहर कोई सत्तर पचहत्तर किलोमीटर दूर जाना पड़ा था -वापस लौटा तो जाड़े की रात के ग्यारह बज चुके थे. सीधे डी एम रेजिडेंस पर पहुंचा।  चौकीदार ने कहा साहब सो चुके हैं।  मिल नहीं सकते।   मैंने उसे खुद डी एम साहब का आदेश सुनाया और कहा कि यदि तुमने उन्हें बताया नहीं तो वे तुमसे नाराज हो जायेगें।  उसने बड़ी हिम्मत कर टेलीफोन के बेडरूम कनेक्शन का बज़र बजाया।  डी एम  साहब नाईट सूट में बाहर आये और मैंने उन्हें जाँच का लिफाफा सौंपा -उन्होंने जिज्ञासा से कुछ पूछा तो मैंने कहा सर सब कुछ रिपोर्ट में है।  और गुड नाईट कर वापस हो लिया।  उनके अपने ऊपर के विश्वास और एक मित्र के विरुद्ध की गयी जांच की एक अजीब सी मानसिक स्थिति से उबरने का प्रयास कर रह था मैं -ओह यह कैसा धर्म संकट था आज भी वह घटना याद आती है तो दिल में एक हूक सी उठ जाती हैं। 

झांसी प्रवास ने मुझे बेटे कौस्तुभ और बेटी प्रियेषा  के जन्म की सौगात भी दी। यद्यपि कौस्तुभ का जन्म स्वरुप रानी मेडिकल कालेज में और प्रियेषा का जन्म कमला नेहरू हास्पिटल इलाहाबाद में हुआ। कौस्तुभ के पहले जन्म दिन पर सेलेस्टियल रांडीवू यानि आफिसर्स होस्टल के कक्ष संख्या 18 में एक उत्साहपूर्ण जन्मदिन का आयोजन हुआ-उन दिनों वाल्ट डिस्ने के मिकी माऊस के जन्म जयन्ती की धूम थी तो कौस्तुभ के जन्म पर भी वही थीम था, वही रंग छाया हुआ था। कौस्तुभ के  घर का नाम मिकी रखा गया।  
अभी झांसी में एक और बड़ी जिम्मेदारी निभानी थी। .... जारी!

14 टिप्‍पणियां:

  1. जांच रिपोर्ट क्या थी...? आप तो तिलम्मी सीरीयल की तरह एंड करते हैं!

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  2. घर की हर छोटी बसी चीज़ बसाने की जद्दोज़हद भी सरल नहीं ... खासकर तब जब और भी जिम्मेदारियां हिस्से ले रखी हों ...

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  3. ईमानदारी की आमदनी से अन्य जरूरतें पूरी करते हुए घर में चीजें धीरे- धीरे ही बसती हैं।
    जांच रिपोर्ट में क्या था , मामला गोल कर गए !

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  4. यही बेसिक बात कुछ गलत करने से रोक देती है और सही रास्ते पर कार्य करने को प्रेरित करती है :)

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  5. बेशक शहरों से चस्पां रहता है अतीत ,अनुभव का दायरा।परवान चढ़ रहा है संस्मरण।

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  6. दिलचस्प हैं आपकी सर्विस कहानियाँ :)

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  7. रोचक है दास्ताँ। समान पृष्ठभूमि और मध्यवर्ग से आए कई पाठक आपके वृत्तान्त से समरस हो पा रहे होंगे।

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  8. जो मनुष्य अपनी आमदनी से कम खर्च करता है उसके पास पारस-पत्थर है ।

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  9. आपकी और अपनी(पता नहीं सामान है ये नहीं पर) उम्र के अधिकाँश लोगों का जीवन चक्र शायद ऐसा हो रहा होगा जो मध्यम वर्ग से जुड़े हैं ... और आत्म्समान के साथ सिमित सामर्थ अनुसार जीना चाहते हैं ...
    रोचक संस्मरण ...

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  10. धर्म संकट से उबरना वाकई मुश्किल होता है..

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  11. बहुत सी पारिवारिक बातें भी आप सहजता से साझा कर लेते हैं पण्डित जी! बहुत अच्छा लगता है आपका यह निश्छल व्यवहार!! जाँच से मुझे याद आया कि मित्र चैतन्य को भी ऐसे ही एक जाँच के आदेश मिले थे और उन्हें रिपोर्ट देनी थी.. मगर उनके साथ जो धर्मसंकट उपस्थित हुआ उसका परिणाम फिर कभी!!
    यह संस्मरण सिरीज़ बहुत से पाठकों को अपनी कारोबारी ज़िन्दगी के कई यादों के गलियारों में ले जाएगा!!

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  12. बहुत सुन्दर संस्मरण श्रृंखला |सर नववर्ष की असीम शुभकामनाएँ |

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  13. जिन भौतिक सुविधाओं को पाने की प्रतियोगिता आपने अपने हॉस्टल में देखी होगी उसका रूप थोड़ा बदल जरूर गया है मगह वह आज के युग में भी विद्द्यमान है. हाँ, आज के युग के लिए कई पुरानी चीजें बहुत बड़ी बात नहीं हो मगर वैभव प्रदर्शन के नए मायने जुड़ गए हैं. सुन्दर श्रृंखला.

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