रविवार, 4 मार्च 2012

बांधे रखती है फिल्म पान सिंह तोमर!

जी हाँ फिल्म के प्रमुख किरदार का नाम ही फिल्म का नाम भी है . दरअसल एक  असली किरदार के 'रियल लाईफ' का ही रील वर्जन है यह फिल्म . पान सिंह तोमर कभी सेना में दौड़ प्रतिस्पर्धाओं के नेशनल चैम्पियन हुआ करते थे ...मगर जमीन जायदाद और पट्टीदारी के चक्कर में ऐसा उलझे कि उन्हें चम्बल के बीहड़ों में शरण लेनी पडी और अंत में मुठभेड़ में उनकी जान  चली गयी ....नहीं..नहीं...यह फिल्म चम्बल के डाकुओं का महिमा मंडन या गौरव गान नहीं करती जबकि उन विवशताओं को जरुर उजागर करती है जिस खातिर एक सीधा सरल सच्चा व्यक्ति भी बीहड़ के रास्ते चल पड़ता है ...

फिल्म पर पिपली लाईव का प्रभाव स्पष्ट है -कई कलाकार भी उसी फिल्म के हैं -ग्राम्य परिवेश का चित्रण करने में फिल्म पिपली लाईव का अनुसरण करती दिखती है ...फिल्म की पटकथा कसी हुई है ...एक सेकेण्ड को भी फिल्म बोरिंग नहीं हुई है जबकि पूरे सवा दो घंटे की फिल्म है ....संवाद प्रभावित करते हैं और सबसे अधिक प्रभावित मुख्य पात्र इरफ़ान खान करते  हैं जिन्होंने इस फिल्म में अपने अभिनय के झंडे गाड़ दिए हैं ...एक जगह पान सिंह तोमर से  सेना के अधिकारी पूछते हैं कि क्या उसका सम्बन्ध डाकुओं के परिवार से है तो वह कहता है  साब! डाकू नहीं बागी कहिये ..डाकू तो भारत के पार्लियामेंट   में पाए  जाते  हैं {लगता है अरविन्द केजरीवाल इसी डायलाग से प्रभावित हुए हैं जिसका इस्तेमाल वे धड़ल्ले से हाल की अपनी तकरीरों में कर रहे हैं .. - :) } ..

पीपली लाईव के बाद इस फिल्म ने एक बार फिर भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था -ला एंड आर्डर के नकारे- निकम्मेपन ,असंवेदनशीलता और नाकाबिलियित को फोकस किया है ..किस तरह पुलिस निकम्म्मी और पक्षपाती है ,यहाँ तक कि एक बेहद संगीन और नाजुक मौके पर खुद जिले का कलेक्टर समस्या का निराकरण न कर कहता है कि दोनों पक्षों में चंबल के खून की गरमी है आपस में खुद निपट लो और घटनास्थल से चल पड़ता है ....पानसिंह तोमर की विवशता उसे चम्बल का राह दिखाती है .. जहाँ एक नेशनल खिलाड़ी के रूप में उसे कोई पूछता नहीं ,इलाके का थानेदार तक उसका मेडल फेक देता है, बागी बन जाने  पर उसकी फोटो अखबार के पहले पन्ने पर छपती है ....लोग उसके नाम से थर्राते हैं ...इसी विडंबना को लेकर वह व्यथित है .

खैर जो भी हो पान सिंह तोमर ने कानून को अपने हाथ में लिया तो फिल्म के अंतिम दृश्य में हुयी मुठभेड़ में उसका एनकाउंटर भी हो जाता है ...मगर फिल्म इस मामले का कोई हल नहीं दिखा पाती कि आखिर समस्या का समुचित समाधान /विकल्प क्या है ? क्या  पान सिंह तोमर का रास्ता ही अंतिम विकल्प है और नहीं तो फिर विकल्प क्या है? शायद आज की मौजूदा भ्रष्ट और नाकारा व्यवस्था में सचमुच कोई विकल्प नहीं दीखता? और फिल्म इसी मोड़ पर समाप्त होती है -आखिर कोई हल हो तो वह सुझाये! 

फिल्म बहुत अच्छी है .पटकथा  चुस्त दुरुस्त .अभिनय बेमिसाल! देख सकते हैं! साढ़े तीन स्टार! दीगर विवरण यहाँ देख सकते हैं !

23 टिप्‍पणियां:

  1. फ़िल्में वहीं असल रूप में सफ़ल होती हैं जो दर्शकों तक अपना संदेश पहुँचा दें, पान सिंह तोमर देखने के लिये हम भी लालायित हैं, जल्दी ही देखते हैं।

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  2. एक बेहतरीन पोस्ट और फिल्म समीक्षा |सर होली की शुभकामनाएँ |

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  3. फिल्म समीक्षा है कठिन, विषयवस्तु जब सत्य ।
    दिल-दिमाग रोमांच में, जाय भटक न तथ्य ।

    जाय भटक न तथ्य, खिलाड़ी कितना आला ।
    किन्तु नपुंसक राज, पान को चम्बल पाला ।

    ज्यादातर उन्माद, करे है कठिन परीक्षा ।
    जब चम्बल की बात, कठिन तब फिल्म समीक्षा ।


    दिनेश की टिप्पणी-आपकी पोस्ट का लिंक

    dineshkidillagi.blogspot.com

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  4. ज्यादातर उन्माद, लिया है कड़ी परीक्षा ।
    जब चम्बल की बात, कठिन तब फिल्म समीक्षा ।।

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  5. देख आये और सीधे विषय से जुड़ने के कारण प्रभावित हूँ।

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  6. असमंजस के साथ देखने का प्रोग्राम बना रहा था, अब तो देखूंगा ही ..

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  7. अच्छी फिल्म है। कल ही देखी। शायद पिपली लाइव से पहले बनी फिल्म है। बनने के ढाई साल बाद अब रिलीज हुई है।

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  8. तिग्मांशु धूलिया की फिल्मों का अपना एक प्रभाव होता है...... आपके विचार पढ़कर अब ये भी फिल्म भी देखते हैं.....

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  9. आपसे अपडेट पाने के बाद फिलिम देखना कौनो जरूरी नहीं लगता!

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  10. २००९ में पहली बार इस फिल्म के बारे में पता चला था, तब से वेट कर रहे थे, देखिये कब देखने का मौका मिलता है !!!!

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  11. ..विकल्प न दे पाना अन्ना और केजरीवाल जी की भी असफलता कही जा रही है !

    बहरहाल होली में पान चबाने का अपना रिवाज़ है !

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  12. आपको लगता है कि यह शासन प्रशासन आपका है. नहीं, यह निजाम वही है, आजादी से पहले वाला, बस लोग दूसरे आ गए हैं.

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  13. समस्या है हम सभी जानते हैं पर इस पर बात करने का या लोगों को झिंझोड़ने का साहस कर रही हैं फ़िल्में , ये भी कम नहीं . समाधान देने की कोशिश करने वाले और सही !!
    देखने लायक मूवी लग रही है , पूजा ने भी सिफारिश कर दी है !

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  14. हल सुझाना कतई जरूरी नहीं, समस्‍या को ठीक-ठीक समझ लेते ही हल की राहें खुलने लगती हैं.

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  15. काफी दिनों बाद साढ़े तीन स्टार वाली फिल्म देखने को मिली है . सुन्दर समीक्षा ..

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  16. अच्छी समीक्षा है . देखने की उत्सुकता बन रही है .

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  17. अंदाजा तो था कि फिल्म अच्छी होगी.अब देख ही लेते हैं.

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  18. समीक्षा से ना -इत्तेफाक रखना मुमकिन ही नहीं है .सहमत इस कसावदार समीक्षा से .अभी तक समीक्षा ही पढ़ी है अब फिल्म देखनी ही पढेगी .

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  19. काफी समय बाद लगता है एक सार्थक फिल्म आई है. देखता हूँ.

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  20. अच्छी समीक्षा है बेहतरीन पोस्ट

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