रविवार, 18 जनवरी 2015

पी के-अपने पूर्वाग्रहों को हाल के बाहर ही छोड़ आएं!

1  सितम्बर 2012 को बनारस से ट्रांसफर होकर जब से सोनभद्र आया नए स्थान की कटु कुटिल चुनौतियों से जूझते हुए और नयी परिस्थितियों में खुद को ढालते हुए समय कुछ ऐसा बीता कि मनपसंद कई बातें, कई शौक बिसरा बैठे। यहाँ तक कि कोई फिल्म भी नहीं देख पाये। अब कहाँ बनारस के माल में फिल्म देखने का एम्बिएंस और कहाँ यहाँ सोनभद्र के कस्बाई मुख्यालय  रॉबर्ट्सगंज के जजर्र सिनेमाघर! जाने की हिम्मत भी नहीं जुटी। और मुझे यह भी नहीं लगा कि वहां "इज़्ज़तदार आदमी"(!)  को देखने वाली वाली फिल्मे भी लगती होंगी। इस  बीच कितनी अच्छी अच्छी फ़िल्में आईं और चली गयीं।  मन मसोसता रहा और फिल्मों के  दीवाने अपने एक प्रिय सर को कनविंस करने का असफल प्रयास भी कि सर मैं इन कारणों से फिल्म नहीं देख पा रहा।  
मगर जब पी के की चर्चा और उस पर मचे हो हल्ले की खबर सुनायी पड़ने लगी तो संकल्प किया कि इसे देखनी है और वह भी बनारस चल के।  इसमें एक अंतरिक्ष वासी के धरती पर आने और यहाँ के हालात से जूझने के कथानक ने भी आकर्षित किया। मैं इस फिल्म को इस नज़रिये से भी देखना चाहता था कि क्या   यह साइंस फिक्शन के फ्रेम में आ सकती है?बहरहाल कल वह सुदिन आ गया और हम मियाँ बीबी फिल्म बनारस के आई पी माल में देख ही आये. 
ठीक ठाक फिल्म है। थीम धार्मिक पाखंड है।  मगर कई और भी संकेत हैं।  कहानी को बंम्बईया चाशनी में लपेटा गया है -प्रेम सीन है ,धमाका है ,विछोह है ,फैमिली ड्रामा है।  यह सब कोई नया नहीं है।  और धर्म के पाखण्ड पर कटाक्ष करने के मामले में भी यह फिल्म कोई नयी नहीं है।  बस नया है तो एक एलियन का नज़रिया।  सुदूर अंतरिक्ष से धरती पर शोध करने आया शोधार्थी असहज स्थितियों में एक सर्वथा अजनबी संस्कृति से साक्षात्कार करता है। मैं जैसे सोनभद्र आकर अपने शौक भूल गया वैसे ही बिचारे के साथ आते ही  एक ऐसी त्रासदी हुयी कि उसे अपना मकसद ही भूलना पड़ा।  उसका वह यंत्र  उससे छीन लिया गया जिससे उसे यान को वापस बुलाना था।  अब घबराहट और घर जाने की फ़िक्र में कोई शोध ठीक से भला कैसे हो पाता।  अगर एक एलियन की निगाहों से आप इस फिल्म को देखे तो आनंद आएगा -अपने पूर्वाग्रहों को हाल के बाहर के स्ट्रांग रूम  में जमा कर दें! 
ईश्वर सार्वभौम नहीं है।  केवल धरती पर है। धर्म केवल धरती पर है। संस्कृति  धरती पर है।कम से कम ये सब एलियन की धरती पर तो जैसे यहाँ हैं वैसा नहीं है।  और फिर धर्म को लेकर फैले पाखंड का जो अतार्किक  स्वरुप एक एलियन की नज़र देखती है उससे वह स्तब्ध और भ्रमित हो रहता है. मजे की बात तो यह है कि धर्म के जिस पाखंड पर फिल्म चोट करती है बिल्कुल उसी की पुनरावृत्ति इस फिल्म को लेकर मूर्खजन करते हैं और हास्य का पात्र बनते हैं। और तो और स्वामी रामदेव जी भी इस फिल्म को लेकर आक्रामक हो गए थे संभवतः बिना देखे ही।  फिल्म ने विश्व के सभी प्रमुख धर्मों के पाखंड पर चोट की है और उनके अतार्किक अंतर्विरोधों को दिखाया है।  एक एलियन के साथ धरतीवासियों का इनट्रैक्शन रोचक है -उसे पियक्कड़ समझ लिया जाता है -नाम पी के पड जाता है। 
आपमे जायदातर लोगों  फिल्म अब तक देख ली होगी सो कहानी बताने की जरुरत नहीं।  धर्म की प्रासंगिकता को लेकर चुटीले और सार्थक संवाद हैं।  धर्म और पाखंड के अंतर को बताने का प्रयास है -मगर थीम कोई नयी नहीं।  ओह माई गाड़ इसी अधिक प्रभावशाली तरीके से विषय को रखती है।  इसमें कई फूहड़ कॉमेडी है जो कुछ ख़ास तरह के दर्शकों को ज्यादा भाएगी।  जैसे बच्चों और महिलाओं को और कुछ दृश्य उन्हें असहज भी करेगें। हाल की खिलखिलाहट और स्तब्धता से भी  मैंने यही समझा।  

अब यह फिल्म विज्ञान  कथा की श्रेणी में रखी जा सकती है या नहीं ? विचार विमर्श फेसबुक पर चल रहा है।  हाँ थोड़े से दृश्य और कोण  फिल्म में जरा हट के और डाल दिए गए होते तो यह शर्तिया मुख्यधारा की साइंस फिक्शन कही जा सकती थी -अभी तो थोड़ा हिचकिचाहट सी है। काश निदेशक ने मुझसे संपर्क किया होता? :-) मुझे अपनी लिखी पहली विज्ञान कथा गुरुदक्षिणा की याद ज़ीशान ने दिलाई और कहा कि फिल्म तो शुरू में आपकी कहानी सी लगती है।ना ना मैं निदेशक या फिल्म राईटर पर कोई आक्षेप नहीं लगा रहा हूँ :-) 

9 टिप्‍पणियां:

  1. ekdam shortcut review likhe hain aap .... hamen to bahut average moorkhtapoorn film lagi.

    itne idiotic aadmi ko kaunsi advanced society space exploration mission par bhejegi? oopar se no regular signalling system to keepo him under surveillance :( the buffoonery of it all!!

    nothing antihindu about it.....

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  2. हम तो सिनेमा नइ देखन , काय मूल्याञ्कन करबो ?

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  3. औसत दर्जे की फिल्म है ... ऐसे सन्देश पहले भी अनेक फाइलों में हैं ...
    जान कर कंट्रोवर्सी खड़ी की गयी है फिल्म के लिए ... और सफल भी रही ...

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  4. अभी तो फिल्म देखी नहीं । बाकि विवादों ने तो फिल्म फायदा ही पहुँचाया है ।

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  5. फिल्म तो नहीं देखी लेकिन चर्चा इतनी हो गयी की देखने की जरुरत ही नहीं .... ..कुछ दिन का झमेला है दूसरी फिल्म आयेगे तो भूल जायेगें....फिर उस पर होगी बहस ...यूँ ही चलता रहेगा ..चलता रहेगा सिलसिला ..

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  6. साइंस फिक्शन तो नहीं , लेकिन सामाजिक धार्मिक बुराइयों पर करारी चोट करती है यह फिल्म !
    हम अक्सर पूर्वाग्रह से ही ग्रसित होते हैं ! इसलिये लोग इस फिल्म पर विरोध प्रकट कर रहे हैं ! वरना गणेश की मूर्तियों पर टनों दूध बहाने को एक मूर्खतापूर्ण कार्य ही कहा जायेगा !

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  7. साइंस फ़िक्शन तो किसी एंगल से नहीं है. रहा सवाल धार्मिक विवाद का तो मामला प्रायोजित ही लगता है - क्योंकि एपिक जैसे चैनलों पर 'यम किसी से कम नहीं' जैसे सीरियल धमाके से चल रहे हैं, जिन पर विवाद करने वाले आँखें मूंदे हुए हैं! :)

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  8. न तो साइंस फिक्सन है और न ही कुछ विशेष। जान बूझ कर फिल्म चलाने के लिए धार्मिक मुद्दे को उठाया गया है क्योंकि निर्माता निर्देशक जानते थे कि इस कारण विवाद होंगे तो पब्लिसिटी भी मिलेगी और फिल्म पैसा कमा जाएगी कुछ बड़े सितारे , कुछ निर्माता व निर्देशक की पुरानी साख का फायदा मिल जायेगा वरना तो ओह माय गॉड इससे कहीं बेहतर फिल्म थी ,जनता भी इन लोगों की चाल में फंस जाती है

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