Thursday, 9 October 2008

यादें -पुण्यस्मृति दिवस की !


५ अक्टूबर को पिता जी का पुण्य दिवस था .यह विगत ९ वर्षों से एक आयोजन के रूप में मेरे पैतृक निवास -चूडामणिपुर ,बख्शा ,जौनपुर में मनाया जाता रहा है .ऐसा नहीं है कि उन उनके दोनों पुत्र -एक मैं और मेरे अनुज डॉ .मनोज मिश्र बहुत लायक पुत्र हैं और एक अनुकरणीय कार्य कर रहे हैं .बल्कि यह एक जन कार्यक्रम है ,बहुत अच्छी शिक्षा और मेधा के बावजूद पिता जी गावं में ही रह गए -और आज उनकी लोक गम्यता ही प्रतिस्मृति के रूप में उन्हें वापस हो रही है -लोगों की उनके प्रति यह स्वप्रेरित श्रद्धांजलि है जो हर वर्ष उनकी स्मृति को तरोताजा करती है .अंगरेजी की एक कहावत है कि जीवन में जैसा निवेश आप करते हैं वही आपको उत्तरार्ध में वापस होता है . पिता जी की रचनाएं सरस्वती में छपी , वे कल्याणमन लोढा और आचार्य विष्णु कान्त शास्त्री जी के स्टुडेंट रहे .रामचरित मानस में उनका अगाध प्रेम था -भारतीय वांग्मय पर तो उनका अध्ययन विस्मित करने वाला था -इस ब्लॉग पर समय समय पर उनकी रचनाएं भी आपको पढने को मिलेंगी .साहित्यानुराग मेरी नजर में उनका ऊज्वल, सबल पक्ष था और राजनीति में रूचि दुर्बल पक्ष .शायद राजनीति ने उनकी असीम संभावनाओं पर ग्रहण भी लगाया . सभी तो आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी नहीं हो सकते जिन्होंने कविता और राजनीति को साथ साथ साध लिया .

उन्हें नौकरी और किसी की दासता स्वीकार नहीं थी -उनका आदर्श वाक्य ही था -पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं .यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं है -मुझे अफसोस होता है कि इस बात पर मुझ मूढ़ द्वारा बहस कर उनका कईबार दिल दुखाया गया .पर आज लगता है मनुष्य जैसे नश्वर और क्षणभंगुर जीव के लिए समझौते करते रहना सचमुच कोई पुरुषार्थ नहीं है -उन्होंने अपने शर्तों पर जीवन जिया और आज क्षेत्र में अपनी यशः काया में जीवित हैं ।
मैं सोचता हूँ मैंने तो एक चाकरी कर ली है पर क्या इस स्थूल शरीर के बाद भी मुझे कोई जानेगा ? वैसे ऐसी मेरी कोई इच्छा नहीं है पर कहते हैं न कि अमरता की चाह तो सभी में होती है -सभी अपनी यशः काया में बने रहना चाहते हैं .
पर मुझे कभी कभी यह सुखानुभूति अवश्य होती है कि मैं एक बहुत ही योग्य पिता का पुत्र हूँ और इसलिए ख़ुद को नालायक भी नहीं कह सकता -क्योंकि आत्मा वै जायते पुत्रः .
पुनश्च -मित्रों यह मेरी एक नितांत निजी पोस्ट है ,आप पढ़ तो लें पर टिप्पणी आवशयक नहीं .

24 comments:

Anil Pusadkar said...

अरविंद जी उसी तारिख को ही मैने भी अपने बाबूजी को खोया था।मै उस दर्द को समझता हूं।

ताऊ रामपुरिया said...

आपके निजी क्षणों में और विचारों में साथी ब्लागरों को सम्मिलित करने के लिए ह्रदय से आपका आभार ! और आदरणीय पिताश्री को सादर प्रणाम ! उनके द्वारा स्थापित मूल्यों को हम किंचित भी पा सके तो यही उनको सची श्रद्धांजलि होगी !

मैथिली गुप्त said...

आप बहुत ही योग्य पिता के पुत्र ही नहीं बल्कि बहुत ही योग्य पिता के बहुत ही योग्य पुत्र हैं.

अब प्रतीक्षा है कि आप कब उनकी रचनाओं को हमें पढ़ने का अवसर देते हैं.

भूतनाथ said...

बहुत भावुक कर गया आपका ये पिताजी को स्मरण करना ! आपकी मार्फ़त उनकी रचनाओं को पढ़ने का शौभाग्य हमें भी मिल सकेगा ! यही बड़ी खुशनसीबी होगी ! पिताजी सादर नमन !

Gyandutt Pandey said...

मन को छू गयी पोस्ट। आपके पिताजी को नमन।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आपके पिताजी की पुण्य स्मृति को मेरे भी नमन !
आलेख भावभीना श्रध्धा सुमन है -
- लावण्या

Ghost Buster said...

बहुत सुंदर भावनात्मक पोस्ट है. आदरणीय पिताजी को सादर नमन.

लवली said...

chaliye aapne is layak to samjha..aur sirf tippni ke liye tippni nahi kar rahe hum..aapke pita jee ko hamare srdha suman aur aapko bahut dhnyawad..ki aapne apni niji baten yhan banti hum sab ke sath.

Parul said...

नमन व पोस्ट के लिये धन्यवाद

राज भाटिय़ा said...

अर्विंद जी मेरी आंखे भर आई आप का लेख पढ कर,मै तो आखरी समय पास भी नही था , ओर अंतिम समय देख भी नही पाया था अपने पिता जी को, आप के पिता जी को मेरी ओर से हाथ जोड कर नमन....

शोभा said...

निजी क्षणों में और विचारों में साथी ब्लागरों को सम्मिलित करने के लिए ह्रदय से आपका आभार

रंजना [रंजू भाटिया] said...

आपने जिस तरह लिखा है वह बहुत अभिभूत करने वाला है ..नमन आपके पिता जी को .उनकी लिखी रचनाये पढने का इन्तेजार रहेगा

Udan Tashtari said...

बहुत भावुक कर देने वाली पोस्ट.

पिता जी की पुण्य आत्मा को नमन एवं श्रृद्धांजलि!!

अनूप शुक्ल said...

संवेदनशील पोस्ट। आपके पिताजी को हमारा नमन!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

मुझे अफसोस होता है कि इस बात पर मुझ मूढ़ द्वारा बहस कर उनका कईबार दिल दुखाया गया .पर आज लगता है मनुष्य जैसे नश्वर और क्षणभंगुर जीव के लिए समझौते करते रहना सचमुच कोई पुरुषार्थ नहीं है

ऐसा अक्सर होता है अरविन्द जी. कम उम्र में हम भावावेश में कई बार अपने अधिक अनुभवी परिजनों की दृष्टि को समझ नहीं पाते हैं, मगर बढ़ी उम्र हमें उन्हें पहचान पाने का ज्ञान देती है.
आपके पिताजी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि!

seema gupta said...

'your artical is full of feelings and emotions for your father, thanks for sharing your memories with us'

regards

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

जो कुछ हमारा बहुत निजी होता है, उसे भी तो हम किसी न किसी के साथ शेयर करते हैं। आपने मन से जुडी ये बातें हमारे साथ बाँटीं, यह हमारे लिए भी गर्व का विषय है।
स्व0 डॉ राजेंद्र प्रसाद मिश्र जी सादर नमन।

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

बेहद निजी बातें हम उन्हीं लोगों के साथ शेयर करते हैं, जिन्हें अपना समझते हैं। अपना ब्लागर्स को इस लायक समझा, यह देखकर प्रसन्नता हुई।
स्व0 डॉ राजेंद्र प्रसाद मिश्र जी को सादर नमन।

रंजन राजन said...

बहुत भावुक कर गया आपका ये पिताजी को स्मरण करना! आदरणीय पिताजी को सादर नमन.
निजी क्षणों में साथी ब्लागरों को सम्मिलित करने के लिए आभार...

Tarun said...

अपनी निजी बात बांटने के लिये आभार, आपने बहुत ही भावुक पोस्ट लिखी है।

BrijmohanShrivastava said...

महोदय /यह मेरी हटधर्मी है किनिर्देश के वाबजूद टिप्पणी लिख रहा हूँ और वह भी नितांत घरेलू मामले में /किंतु जब ब्लॉग पर बात आ चुकी है और ऐसे रचना धर्मी .मानस मर्मग्य हमारे भी आदरणीय थे तो लिखने को विवश हूँ /आप धन्य हैं बधाई के पात्र है जो ऐसे पिता के पुत्र हैं / पराधीन [[नौकरी आदि ]]के सम्बन्ध में आपको पुरानी बातें याद कर दुखित होने की जरूरत नहीं है न ही उचित है /परिस्थिति अनुसार पितापुत्र में मत भिन्न हो जाया करता है /किंतु आज सोचिये उनके विचारों के अनुसार ,अपनी इच्छाओं का दमन कर अपने आप को उनके निर्देशों दे अनुसार ढाल कर तथाकथित पराधीन नरहने का निश्चय कर लेते तो क्या आप उस जगह होते जहाँ आप हैं -क्या इतने सुखी और संपन्न होते -क्या उस पुराने माहोल में आपकी पत्नी और वच्चे रह पाते /क्या उनको ऐसी शिक्षा दिला पाते /ज़्यादा नही लिख रहा नहीं तो आप कहेंगे ,कि कुछ नहीं कह रिये हैं तो, सा ...बोलता ही चला जा रिया है

BrijmohanShrivastava said...

दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएं /दीवाली आपको मंगलमय हो /सुख समृद्धि की बृद्धि हो /आपके साहित्य सृजन को देश -विदेश के साहित्यकारों द्वारा सराहा जावे /आप साहित्य सृजन की तपश्चर्या कर सरस्वत्याराधन करते रहें /आपकी रचनाएं जन मानस के अन्तकरण को झंकृत करती रहे और उनके अंतर्मन में स्थान बनाती रहें /आपकी काव्य संरचना बहुजन हिताय ,बहुजन सुखाय हो ,लोक कल्याण व राष्ट्रहित में हो यही प्रार्थना में ईश्वर से करता हूँ ""पढने लायक कुछ लिख जाओ या लिखने लायक कुछ कर जाओ ""

रंजना said...

आपके ये उदगार,हमारे अन्तःस्थल को भी उतनी ही तीव्रता से छू गए.बहुत अच्छा किया जो आपने यह हमारे साथ बांटा.

dr.bhoopendra singh said...

aapke poojya pitaji ki smriti ko prtanam.accha likhte hai aap pasand ayee aapki rachnayen .badhai .
aapka dr.bhoopendra

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