शुक्रवार, 21 जून 2013

काश कोई कृष्ण आज भी होता!

गोवर्धन पर्वत का मिथक याद है आपको? कृष्ण ने कैसे गोकुल वासियों की अति वृष्टि (क्लाउड बर्स्ट ?) से रक्षा की थी ! कृष्ण अन्वेषी थे, बचपन में खिलाड़ी कृष्ण ने खेल खेल में ऐसी कोई सुरक्षित कन्दरा खोज ली होगी जहां आपात स्थिति में कम से कम लोगों की जान बच सके! और वे सफल हुए -जन स्मृतियाँ इसी घटना को मिथक के रूप में हजारों साल से सजोये हुए हैं! मगर यह कितना शर्मनाक है कि अति वृष्टि के अंदेशे के बावजूद भी हम अपार जनहानि को रोक पाने की कोई आपात व्यवस्था नहीं कर पाए -और विज्ञान और प्रौद्योगिकी की इतनी प्रगति के बाद भी इतनी बड़ी जनहानि हमारे लिए शर्म की बात है! माना कुदरत के आगे हम विवश हो जाते है मगर जो कुछ उत्तराँचल में घटा है उससे तनिक भी आपको लगता है कि निरीह दर्शनार्थियों के जान माल के रक्षा की कभी कोई भी कवायद हुई होगी? आपदा प्रबंध की कोई तैयारी तक नहीं थी! सब असहाय निरुपाय काल के गाल में समा गए . हादसे का न तो पूर्वानुमान था और अगर था भी तो एक लापरवाह बेहयाई के चलते जिम्मेदार लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और अनहोनी घटित हो गई !आज उत्तराखंड सरकार निश्चित रूप से कटघरे में खडी है और अपनी इस गैर जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो पायेगी .काश हम अपने मिथकों से ही कोई सार्थक सीख ले पाते!
हे कृष्ण बहुत आई तुम्हारी याद !

सबसे शर्मनाक यह भी है कि इतनी बड़ी जनहानि हो गयी और जवाबदेह लोग घटना पर दो दिन तक तोपन ही डालते रहे .प्रत्यक्ष दर्शी जहाँ हजारो की मौत का मंजर बयां कर रहे थे वहीं सरकारी आंकड़ा सौ सवा सौ तक सिमटा रहा है .आखिर क्यों ? यही डर था न कि सरकार की भद पिट जायेगी ? विपक्षी पार्टियां सरकार को कटघरे में ला खड़ी करेगीं ?वह तो हो ही रहा है और आगे भी अभी कम लानत मलामत नहीं होगी . सारे देश से श्रद्धालु -पर्यटक वहां गए थे . और सरकार की इतनी बड़ी विफलता का सवाल अभी पूरे देश में गूंजेगा! अभी तो लोग सदमे में है अपने स्वजनों की सलामती की दुआ कर रहे हैं . उनकी बेसब्री से इंतज़ार हो रहा है . इससे उबरते ही लोग इस हादसे की जिम्मेदारी नियत करने में लगेगें . राजनेता अब इतना घाघ हो चुके हैं कि वे जानकर कि भारतीय जन -स्मृतियाँ बहुत अल्पकालिक हैं मन ही मन आश्वस्त है -लोग दो चार दिन चिल्ल पों मचाएगें और फिर चुप हो जायेगें , मगर यह मामला धर्म कर्म से जुड़ा है जो भारतीय जीवन का प्राण -तत्व है -निश्चित ही इस बड़ी लापरवाही /चूक का खामियाजा उत्तराँचल सरकार को भोगना होगा !
इस विपुल विध्वंस के कई पहलू हैं जिसमें प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से उपजते पर्यावरण असंतुलन के साथ ही व्यावसायिकता की आंधी में सारी नैतिकता और मानकों को ताक पर रख निर्माण कार्यों को अंजाम देना भी है . मेरे एक फेसबुक मित्र ने तो घटना के पीछे एक "Weather Warfare" के एक सर्वथा नए कूट युद्ध की आहट को
भांपा है और उनका दावा  है कि क्लाऊड सीडिंग से ऐसे हादसे दुश्मन देशों द्वारा प्रयोग के तौर पर आजमाए जा रहे हैं . पता नहीं उनकी बात कितनी सच है मगर ऐसी संभावनाएं निर्मूल नहीं हैं . हमें ऐसी हरकतों से आगाह होना होगा और समय रहते इनकी काट भी वजूद में लानी होगी!
एक और बात जिस पर हमें गंभीरता से ध्यान रखना  होगा वह है हमें ईश्वर को अपने अन्तर्मन में तलाशना होगा . भक्तजनों के लिए तो ईश्वर कण कण में विद्यमान हैं . हम घर बैठे क्यों नहीं ईश्वर का ध्यान करते? ऐसा प्रायः हो रहा है कि धार्मिक स्थलों पर दुर्घटनाएं हो रही हैं .अभी पिछले कुम्भ में भगदड़ से लोगों की मौतें हुयी थी .अब हमारी जनसंख्या इतनी बढ़ गईं कि धर्म स्थलों पर आ जुटने वाली भीड़ को संभाल  पाना बहुत चुनौती भरा है .इन हादसों से मिलने वाले सबक में एक यह भी है कि हम घर में अपना मंदिर मस्जिद गुरद्वारा बनाएं . ज़रा भी बुद्धिमानी नहीं है खुद को मौत के मुंह में इस तरह झोंक  देना . आज कोई कृष्ण नहीं है बचाने वाला! 

39 टिप्‍पणियां:

  1. एक बढ़िया सामयिक लेख के लिए आभार आपका !
    हमारे देश में आपदा प्रवंधन के बारे में कोई तैयारी नहीं है यह हम सब जानते हैं ! प्राकृतिक आपदाओं पर हमारी दुर्दशा हो जाती अगर कहीं युद्ध कालीन अवस्था में , जैवीय,कैमिकल अथवा एटोमिक युद्ध की स्थिति में केशव भी, हम निकम्मों के लिए इतनी दूर से आयेंगे, संदेह हैं !
    मंगल कामनाएं ही दे सकता हूँ !

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  2. सुन्दर आलेख के लिए अभार. मैं भी सोचा करता हूँ कि हालातों को जानते हुए हम मरने क्यों ऐसी जगहों पर जाते है.

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  3. इस अंधश्रद्धा पर आपने बहुत अच्छी बात लिखी है। हर व्यक्ति को अपने भीतर कृष्ण जगाना होगा तभी कलियुग में संसार की रक्षा हो पाएगी।

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  4. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन इस दुर्दशा के जिम्मेदार हम खुद है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  5. मेरे एक फेसबुक मित्र ने तो घटना के पीछे एक "Weather Warfare" के एक सर्वथा नए कूट युद्ध की आहट को
    भांपा है और उनका दावा है कि क्लाऊड सीडिंग से ऐसे हादसे दुश्मन देशों द्वारा प्रयोग के तौर पर आजमाए जा रहे हैं . पता नहीं उनकी बात कितनी सच है मगर ऐसी संभावनाएं निर्मूल नहीं हैं .


    यह सर्वथा नयी जानकारी है .... दुखद घटना पर सार्थक लेख

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  6. this was due to 2 converging low presure systems . one from the bay of bengal and another from arabian sea. cloud seeding? doesn't seem likely.. moreover similar rains are predicted or forecasted again from 24th onwards. just 2 days in hand... being wasted bickering..

    @no krishna to save?
    well people go to "teerth" for tourism. people discuss krishna rama and shiva for entertainment. people have a business making money out of the tourism industry. government makes money by makinf more hotels despite eco warnings. media persons waste precious time and resources boarding helicopters meant for rescuing people. prime minister holds up air traffic for hours for his so called inspection....

    which religious texts ask us to do all this??

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    1. Yes Shilpa ji the market forces are responsible to a great extent!

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  7. doodh hota to kheer pakate
    chaval, shakkar maang late...


    we have nothing in our hands.. no krishna, no other God..
    It's human efforts that are going to make any difference and that's what we lack !!

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  8. यह एक भीषण त्रासदी थी, इससे कोई इंकार नहीं लेकिन प्राकृतिक आपदाओं पर शत प्रतिशत नियंत्रण पाया भी नहीं जा सकता। इनके असर को न्यूनतम करने के लिये प्रयासरत रहना चाहिये। इनके डर से घर में ही बैठे रहना अजीब सा लगता है।
    तीर्थयात्रायें और पर्यटन सिर्फ़ पर्यटक के लिये ही नहीं, स्थानीय निवासियों के लिये भी महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिये केन्द्र व कुछ राज्य सरकारें अपने कर्मचारियों को जम्मु-कश्मीर के लिये टूर पैकेज उपलब्ध करवा रही हैं(हालाँकि यह उदाहरण बहुत सटीक नहीं है, मैं तो इसे भी तुष्टिकरण का जरिया ही मानता हूँ )। अपनी गांठ से पैसा खर्च करके तीर्थाटन पर जाने वाले श्रद्धालुओं को इस या उस बहाने से हतोत्साहित करने की बजाय प्रकृति के प्रति सेंसिटाईज़ करना मेरी राय में ज्यादा उचित रहता।

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    1. संजय जी ,
      पहले जनसँख्या कम थी भीड़ का दबाव नहीं था -अब धर्म स्थलों पर भारी भीड़ इकट्ठा होना खतरे की संभावनाओं ,जान माल की क्षति को कई गुना बढ़ा देता है . कभी हरिभक्त रैदास ने कहा था कि जब मन चंगा कठौती में गंगा ! आज ऐसी ही विचारधारा को अपनाए जाने की जरुरत है ! अन्यथा भुच्चड़ों की भीड़ ऐसे ही के गाल में समाती रहेगी !

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    2. सवाल पैसे खर्च कर जाने वाले श्रद्धालुओं का नहीं , पर्यटन और तीर्थयात्रा के नाम पर प्रकृति की अनदेखी कर किये जाने वाले निर्माणों का है !
      कहीं तो रुकना पड़ेगा . पहाड़ पिघल रहे हैं। पहाड़ों पर भारी भीड़ के इंतजामों के लिए किये गए कार्य प्राकृतिक असंतुलन का कारण बन रहे हैं . यह संख्या नियंत्रित की ही जानी चाहिए ताकि श्रद्धा बनी रहे .

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    3. भुच्चड़ों की भीड़ ...

      let us keep it pending for some other time, Mr. Mishra.

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    4. संजय अनेजा: As you wish!
      But for people who not only endanger lives of their own and their family members but also pose a great administrative problem and that too on a false belief of getting salvation by just going on such journeys I don't have a better word to use!
      Enough is enough! Such assemblages must be tactfully minimized if not stopped completely! We can not play with valuable human lives like that and watch helplessly!

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    5. अरविन्द जी,
      जैसाकि आपने बता ही दिया कि कुछ लोगों के लिये इससे बेहतर शब्द आपके पास नहीं। मेरा आभार स्वीकार करें,कुछ लोगों पर आपका सर्वोत्तम न्यौछावर करने में निमित्त मैं बन पाया। तो फ़िलहाल ये चैप्टर क्लोज़्ड।

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    6. @ वाणी गीत
      क्षमा चाहता हूँ वाणीजी, आपका कमेंट अभी ही देख पाया। मैंने ’अपनी गांठ से पैसे खर्चने वाली बात’ कही तो इसके पीछे यह भावना नहीं थी कि पैसे खर्चने मात्र से किसी को प्रकृति के अंधाधुंध दोहन का अधिकार मिल गया। अभिव्यक्ति में अस्पष्टता मेरी कमी है, इसलिये शायद मंतव्य कुछ और निकल जाते हैं। मैं यह कहना चाह रहा था कि एक तरफ़ सरकार द्वारा प्रायोजित भीड़ है, दूसरी तरफ़ स्वेच्छा से जाने वाले लोग और यही दुर्घटना उधर हो जाती तो हम लोगों की प्रतिक्रियायें विपरीत होतीं। यहाँ का चलन तिलक-टोपी देखकर श्रद्धा वर्धन या उन्मूलन का है, मेरी टिप्पणी में पैसे वाली बात उस संदर्भ में थी।

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  9. अपने यहाँ आपदा प्रबंधन की हालत वाकई बहुत शर्मनाक है. सरकार हरकत में आती है मगर जान जाने के बाद.

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  10. .
    .
    .
    अरविन्द जी,

    यह पूरा चार धाम क्षेत्र, हेमकुंड साहिब का क्षेत्र व फूलों की घाटी भी... अपनी नौकरी के दौरान कई कई बार पैरों से नापा है इसे... यह इको-सेंसिटिव जोन किसी भी तरह से इतनी बड़ी तादाद में तीर्थयात्रियों व पर्यटकों का दबाव झेलने में सक्षम नहीं है... ऊपर से तीर्थयात्रा पर भी सड़क से एकदम लगा स्टार सुविधाओं वाला होटल-गेस्ट हाउस पाने की भारतीय ललक और इस चाह का व्यापारिक दोहन करने वाले गेस्ट हाउस-होटल-आश्रम वाले... वोटों की चाह में राजनेता और नीति निर्धारक हर जगह मोटरेबल सड़क भी पहुंचाने में लगे हैं... इसी सब कुछ ने त्रासदी को जन्म दिया... यह त्रासदी एक अवसर भी है जब हम नदी से काफी ऊपर पर्वतीय ढलानों में टेंट लगाने की जगहें या हल्की फुल्की स्थानीय स्तर पर उपलब्ध लकड़ी के छोटे छोटे आवास बनायें... रिवर बेड को नदी के लिये आजाद रखें... हर जगह के लिये पत्थर सीमेंट की सड़क या रास्ता बनाने की बजाय पगडंडियों से चलना सीखें, तीर्थयात्रा के इस पक्ष का भी आनंद लें... सन पचपन से पहले यात्रा कुछ इसी तरह ही होती भी थी... हमें कुछ उसी तरह का मॉडल फिर अपनाना होगा... नहीं तो साल दो साल बाद फिर हादसा होगा ही...



    ...

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    1. प्रवीण जी
      क्या हम इन धार्मिक यात्राओं के व्यावसायीकरण को हतोत्साहित नहीं कर सकते -मूढ़ लोगों की आँखें कैसे खोली जाय ? :-(

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  11. मनुष्य आगे की सोच सकता है, पिछली घटनाओं से न सीखा हमने, तो हमें क्या कहा जाये।

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  12. इस भीषण दुर्घटना में मौत के मुंह से बच आने वालो के लिए कृष्ण है ना आज भी!!

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  13. ऐसी विपदाओं से बचने के लिए पर्यावरण की सुरक्षा आवश्यक है। अपने पर्वतीय भ्रमण के अनुभव के आधार पर हमारे सुझाव हैं :

    * पर्वतों पर वाहनों के प्रवेश पर नियंत्रण।
    * दुर्गम स्थानों पर जाने वाले बाहरी लोगों पर भी नियंत्रण।
    * दुर्गम धार्मिक स्थानों पर बच्चों पर प्रतिबन्ध और बड़ों के लिए एक निश्चित आयु सीमा तय होना चाहिए।
    * अमरनाथ , कैलाश और हज़ यात्रा की तरह इन स्थलों के लिए भी मेडिकल प्रमाण पत्र अनिवार्य होना चाहिए।
    * प्रत्येक दुर्गम स्थान जहाँ हजारों लोगों का आना अपेक्षित है , वहां लाइफ़ गार्ड्स होने चाहिए जो किसी उपयुक्त स्थान पर ऑल वेदर संसाधनों से लैस हों।
    * पहाड़ों में मकान नदी से एक निश्चित दूरी पर ही होने चाहिए।
    *पर्यावरण सम्बंधित निअमोन का सख्ती से पालन होना अनिवार्य है।

    यह काम सरकार द्वारा ही किये जा सकते हैं। हम नागरिकों का काम है, नियमों का पालन करना।

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    1. ठोस सुझाव -साथ ही बिना मुकम्मल भरोसेमंद व्यवस्था और आपदा प्रबंध को सुनिश्चित किये धर्म यात्राओं को व्यवसायीकरण को हतोत्साहित करना होगा !

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  14. भीड़ को नियन्त्रित किया जाना आव्शयक है।

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  15. प्रकृति से खिलवाड़ सबके लिये खतरनाक है। लेकिन महसूस हम तब करते हैं जब कोई दुर्घटना घटती है।
    दुखद!

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  16. जापानियों से सिखने की जरूरत हैं वहाँ हर कोई कृष्ण बन जाता है और यहां मंगोल

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  17. सटीक आलेक, आपदा प्रबंधन से जुडे अधिकारी का कहना था कि मौसम वैज्ञानिकों की चेतावनी तो आई थी पर हमने उस पर ध्यान नही दिया क्योंकि ऐसी चेतावनियां तो रोज ही आती रहती है, किस किस पर ध्याब दे?:(

    रामराम.

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  18. kya kahun! jo hua bura hua aur dekho koi krishn bhi nhi aaya inhe bchane.
    ishwar kre jo bche hain unhe surkshit nikal liya jaye.
    aapke lekh hila kr rkh dete hain...dil ko bhi dimaag ko bhi

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  19. सार्थक विचार ....ऐसी दुखद घटनाएँ कितना कुछ विचार करने को मजबूर करती हैं ...

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  20. सही बात है, आज जि‍न पर ज़ि‍म्‍मेदारी है वही बगलें झांकते नज़र आते हैं

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  21. jimmedari ke padon par sare ger jimmedar log, aur ye andhvishvasi janta
    kuch achcha ho to kaise ho ?

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  22. अरविन्द भाई साहब बहुत ही सुन्दर कथन यथाथ पर आधारित पौराणिक पृष्ठ भूमि सहित प्रणाम

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  23. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    हैल्थ इज वैल्थ
    पर पधारेँ।

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  24. आपकी प्रस्तावनाओं से सहमत ये यात्राएं शरीर की हैं इनसे कुछ हासिल न होगा असल यात्रा मन की है बुद्धि का पात्र पवित्र हो तो मैं ज्योति बिंदु स्वरूप परमात्मा संकल्प को स्विच बना एक सेकिंड में परमधाम पहुँच जावूँ परमपिता परमात्मा से योगयुक्त हो मिलन मनाने .यहीं बैठे बैठे बुद्धि से योग लगालूँ .ॐ शान्ति .

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  25. मैं ज्योतिर्लिन्गम हूँ .मेरा अप भ्रंश रूप शिवलिंग कहलाता है वही मेरा प्रतीक चिन्ह है .मैं परम ज्योति (प्रकाश )हूँ .ईसा ने भी यही कहा है -God is light .

    ब्रह्मा -विष्णु -महेश का भी रचता मैं ही हूँ मेरी ही रचना है यह त्रिमूर्ति .

    गुरुनानक देव ने भी यही कहा -एक हू ओंकार निराकार .काबा में भी मैं ही हूँ मेरा ही वृहद् स्वरूप वह संग -ए -असवद (पवित्र पत्थर )है वृहद् आकार का वह शिव लिंग ही है .मुसलमान इस पवित्र पत्थर के बोसे लेते हैं .रामेश्वरम में राम चन्द्र (चन्द्र वंशी राजा राम )मुझे ही पूजते हैं .गोपेश्वर (मथुरा स्थित मंदिर )में कृष्ण मुझे ही पूजते हैं .सर्वत्र मेरा ही गायन है .

    मैं आनंद का, प्रेम का, शान्ति का ,सागर हूँ .कर्तव्य बोध से मैं भी बंधा हूँ .अभी यह कायनात विकारों में आ चुकी है सर्वत्र विकारों का ही राज्य है .पांच विकार नर के पांच नारी के बना रहे हैं दशानन .सर्वत्र इसी माया रावण का राज्य है .मनमोहन तो निमित्त मात्र हैं .

    मेरा साधारण मनुष्य तन मैं अवतरण हो चुका है जिन लोगों ने मुझे पहचान लिया है वह मेरे साथ इस मैली हो चुकी सृष्टि के सफाई अभियान में लग चुकें हैं .योग बल से पवित्रता के संकल्प से अपना स्वभाव संस्कार बदल रहें हैं .शुभ वाइब्रेशन प्रकृति के पांच तत्वों को भी दे रहें हैं .इधर विकार भी चरम पर हैं .मैं किसी को दुःख नहीं देता हूँ .सब अपना कर्मबंध भोग रहे हैं .हिसाब किताब तो चुक्तु होना ही है .या तो सज़ा खाके या फिर पवित्र होकर .चक्र फिर से शुरू होना है सम्पूर्ण पवित्रता का .अभी तो सब अपवित्र बन पड़े हैं इसीलिए यह विनाश के बादल मंडरा रहे हैं यहाँ वहां .उत्तराखंड तो रिहर्सल है .टेलर है फिल्म तो अभी आनी है .विनाश और नव -निर्माण की यही कहानी है .

    एक बात और मनुष्य मात्र मेरा अंश नहीं है मेरा वंश है मेरी ही genealogy है मैं कण कण मैं नहीं हूँ .सूरज चाँद सितारों से परे, परे से भी परे ,ज्ञात सृष्टि की सीमा ,क्वासर्स से भी परे मैं ब्रह्म लोक ,परमधाम ,मुक्ति धाम ,का वासी हूँ वही सब आत्माओं का भी मूल वतन है .नेचुरल हेबिटाट है कुदरती आवास है .वहीँ से मैं आता हूँ -यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ......यहाँ भारत में ही मेरा अवतरण होता है यहीं सुखधाम स्वर्ग होता है यहीं फिर रौरव नरक होता है काल का पहिया ऐसे ही घूमता रहता है जिसका जैसा पुरुषार्थ उसका वैसा प्रारब्ध कर्म भोग कर्म फल .मैं तो अ-करता हूँ अभोक्ता ,अजन्मा हूँ .


    तुम खुद को शिवोहम कहते हो फिर मुझे ढूंढते भी हो .आत्मा सो परमात्मा कहने वाले महात्मा को बतलाओ -भाई तू तो महान आत्मा है फिर एक साथ परमात्मा कैसे हो सकता है फिर काहे गाते हो -आत्मा और परमात्मा अलग रहे बहु काल .तो भाई आत्मा अलग है परमात्मा अलग है .वह तो है ही सर्व आत्माओं का बाप .फिर आत्मा (पुत्र )अपना ही बाप (परमात्मा )कैसे हो सकता है . अलग है .आत्मा ब्रह्म तत्व में लीं नहीं हो सकती है .ब्रह्म तत्व तो छटा महत तत्व है रिहाइश की जगह है आवास है तुम सब आत्माओं का .

    ॐ शान्ति .

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  26. शानदार पोस्ट और शानदार प्रतिक्रियाओं में डूब सा गया।

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  27. उत्तर
    1. कृपया मेरी नई पोस्ट 'मिथक का मतलब' देखिये

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