मंगलवार, 27 सितंबर 2011

बनारस से बोध गया और गया तक की एक ज्ञान यात्रा -1

कभी महात्मा बुद्ध ने बोधगया से ज्ञान /बुद्धत्व प्राप्तकर  बनारस (सारनाथ ) तक उसी ज्ञान को जन सामान्य से साझा करने के लिए ज्ञान - यात्रा की थी और एक इतिहास को जन्म दिया था ....उन्ही के पदचिह्नों पर हालांकि उलटे  तरफ की यात्रा को लेकर मन में एक रोमांच था ....यही नहीं एक विख्यात शैव स्थली से घोर वैष्णवी स्थान  -गया की यात्रा कई जिज्ञासाओं को भी कुरेद रही थी ....यात्रा की तारीख पहले से निश्चित की जा चुकी थी ..मेरी एक भोपाल वासी मित्र भी साथ थीं जिन्हें अपने पितरों का श्राद्ध -तर्पण गया में करना था ...हमें २५(सितम्बर ,२०११)  की सुबह यहाँ से निकलना था -यात्रा की तैयारियां पूरी हो चुकी थी बस भोपाली मित्र की प्रतीक्षा थी जिन्हें ट्रेन से २५ की सुबह ४.३० बजे तक पहुँच जाना था और वहीं स्टेशन  से उन्हें रिसीव कर सीधे प्रस्थान करना था ....मगर २४ तारीख से ही जो घनघोर वर्षा शुरू हुयी  कि लगा कि बादल फट गया है ...इतना पानी कि खंड प्रलय सा दृश्य उत्पन्न हो गया ..शहर जैसे डूबने लगा हो ...ट्रेन की पटरियां जलमग्न हो गयीं ...रेल यातायात ठप हो गया ..गनीमत यही रही कि मित्र की ट्रेन बनारस की सीमा में तो आ गयी थी मगर  दस किलोमीटर दूर अंगद का पाँव बन ठहर गयी थी ..उस तूफानी वर्षा और जल प्लावन से जूझते हुए किसी तरह एक  'रिस्क्यू आपरेशन ' के जरिये उन्हें ट्रेन से मुक्त कराया गया ...


वर्षा का रौद्र रूप अभी भी बना हुआ था ...मगर हमें सूर्यास्त के पूर्व गया इसलिए पहुंचना था कि 'विधि विधान' के तहत सूर्यास्त के पहले ही पिंड दान पूरा हो जाना था ...इसलिए कोई और विकल्प नहीं था इसके सिवा कि वर्षा की परवाह किये बिना प्रस्थान कर दिया जाय -हालांकि यह निर्णय लेने में भी ग्यारह बज गए. गया की दूरी बनारस से सड़क मार्ग से २७० किमी बतायी गयी थी और इसे पूरा करने में ५-६ घंटे का अनुमानित समय बताया गया ..बरसात के चलते और भी विलम्ब होने की आशंका ड्राईवर ने जताई ...बहरहाल हम चल पड़े ..बनारस में ही जी टी रोड पर जगहं जगहं इतना पानी भरा था कि  इनोवा उस पर जैसे तैर सी रही  हो और इस 'तैराकी' के लुत्फ़ में हम बनारस की सीमा को पार करने में ही डेढ़ घंटे से अधिक समय गुजार दिए ...मित्र के चेहरे पर परेशानियां उभरने लगीं थीं  ....बहरहाल हम बिहार की सीमा में प्रवेश कर चुके थे जिसका प्रमाण भी साक्षात दिखने लगा था ....बिहार की एक वाटर मार्क-पहचान आप यहाँ चेपी फोटो में पा  सकते हैं ....
बिहार -एक पहचान (फोटो सौजन्य:कार्तिकेय जैन )  

हम जितने ही पवन वेग से आगे बढ़ना चाह रहे थे तूफानी चक्रवाती हवाएं और अंतहीन हो चली बौछारें रास्ता रोकें खडीं थी.....कुछ तो मानवीय अवरोध भी थे ....पुलिसिया वर्दी में लुटेरे गाड़ियों को रोककर जबरदस्ती वसूली कर रहे थे ..घोर काले घने बादल थे ..मूसलाधार वर्षा और धुंधलके में गाड़ियों से वसूली -एक दहशतनाक माहौल -हमारी गाडी की ओर भी सशस्त्र  लुटेरे लपके बावजूद कि ऊपर नीली बत्ती थी और सारथी के बगल में गनर ऐ के ५६ लेकर बैठा था ...हम तो सहसा स्तब्ध रह गए मगर जैसे ही  उनमें से एक बन्दा और करीब आया गनर ने इशारे से न जाने कौन सा भाव -संवाद  किया कि उसके बढ़ते कदम सहसा रुके ही नहीं पीछे की ओर १८० डिग्री मुड लिए ....हम आगे बढे तो  कर्मनाशा दिखीं  -पूरी तरह से उफनाई हुयी ...पवित्र गंगा से बस ४० -४५ किमी की दूरी पर कर्मनाशा जैसी कथित अपवित्र नदीं का होना भला किस संकेत की ओर  इशारा कर रहा था बहुत बुद्धि लड़ाने के बाद भी समझ नहीं सका -कहते हैं आज भी इस नदी में कोई स्नान नहीं करता ..विश्वामित्र के तपोबल से सशरीर स्वर्ग जा पहुंचे और फिर वहां से अधोपतित त्रिशंकु के लार से बनी कर्मनाशा के मिथकीय आख्यान से भला कौन अपरिचित होगा? इस वर्जित  नदी की वैज्ञानिकता पर कोई प्रकाश डाले तो ऋणी होऊंगा ....वर्षा थोड़ी थमी तो हमारी गति और भी तेज हुई और अपराह्न दो बजे तक हम सोन नदी तक जा पहुंचे थे ...सोन  की विकरालता देख हम स्तब्ध  थे....बाद में पता लगा था कि मध्यप्रदेश के बाण सागर से बहुत ज्यादा पानी छोड़ दिए जाने से सोन अपने उग्र रूप में थी -कहते हैं इसी रौद्र रूप के धारण  करने से यह नदी नहीं नद कहा जाता है -सोन नद ..और इस पर बने ब्रिज की लम्बाई यात्रा के समय ही तत्क्षण जी पी आर एस से जांची गयी -पूरे ३.२ किमी .. ..यह अवश्य ही लम्बे पुल का कोई रिकार्ड होगा ..हमने सोन  नदी की विनाश लीला देखी ..गाँव के गाँव डूबे दीख रहे थे... मन खिन्न हो गया .....


अब लगने लगा था कि सूर्यास्त तक शायद ही गंतव्य  तक हम पहुँच सके -समय से होड़ शुरू हो गयी थी ...हमें यह नहीं पता था कि सड़क मार्ग से पहले गया आएगा या बोध गया ...एक आस थी कि गया पहले होने पर कुछ राहत मिल सकती है ..मगर पण्डे (जी ) से बात होने पर यह आशा भी जाती रही ..पहले बोध गया  था ...सूर्यास्त का समय ५.५० था ...गति और बढ़ी....४ बजे तक हम बोध गया पहुँच लिए ..लुम्बिनी होटल में डेरा था ..व्यग्र  पण्डे जी वहीं मिल गए और हम बिना समय गवाएं गया को चल पड़े ....लगभग १५ किमी की यात्रा १२ मिनट में पूरी हुई और हमारी मित्र पहले से अनुष्ठान की सर -सामग्री लिए आसनारूढ़ पंडित जी के पास ४.३५ तक पहुँच ही गयीं ..तीव्र गति से मंत्रोच्चार के बीच श्राद्ध कर्म और पिंड पारण क्रिया आरम्भ हुई .....उसे सूर्यास्त तक पूरा कर लेना था ....
जारी ....

34 टिप्‍पणियां:

  1. रोमांच से भर देने वाला वर्णन! कयामत का दिन था वह और उस दिन घर में दुबकने के स्थान पर आप यात्रा कर रहे थे...!!

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  2. बनारस से गया तक की यात्रा का सचित्र वर्णन पढना वह भी प्रतिकूल परिस्थितयों में, बड़ा ही रोमांचक रहा.. कर्मनाशा बिहार और उत्तर प्रदेश की सीमा रेखा है..अब पता नहीं किधर से किधर जाने वाले (बरास्ता कर्मनाशा) का कर्म नाश हो जाता है.. शायद पहले आप, या बिल्ली के गले में घंटी कौन बंधे के चक्कर में किसी ने इसमें नहाने का प्रयत्न/साहस ही नहीं किया!! देखें आगे बिहार कौन कौन से जुलुम धाता है आपके ऊपर!!

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  3. घटनाओं से परिपूर्ण दिन, अन्ततः आपको सफलता मिली।

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  4. यात्रायें कभी-कभी कितनी खतरनाक हो जाती हैं ,यह आप के विवरण से पता चल जाता है !फिर भी,यात्राओं का अपना रोमांच होता है !आपकी मित्र का उद्देश्य तो पूर्ण हुआ उसकी ख़ुशी हमें भी है अब देखना यही बाकी है कि आपके ज्ञान प्राप्त करने का कितना उद्देश्य पूरा हुआ है तब तक हम इंतज़ार ही कर सकते हैं !
    यात्रा-वृत्तान्त में आप अद्भुत लगते हैं !

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  5. आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  6. गिरिजेश जी के दो कमेन्ट ई मेल से प्राप्त हुए हैं -
    १-कर्मों का नाश कर्मनाशा के दोनों ओर हो चुका है और गंगा प्रदूषित है।

    २-गया था कभी मैं भी बोधगया! यात्रा और प्रवास में इतने अनुभव और अनुभूतियाँ हुईं कि पूछिये न!
    लिख नहीं सका। ढेरों फोटोग्राफ्स आज भी मेरे पास हैं। भीत हुआ कि जब होली में गाँव जाने का विवरण नौ पोस्टों का विस्तार ले लेता है तो तथागत बोध भूमि जाने कितना समय लेगी? नहीं लिखा...
    ...अपने पढ़े से बनी सुजाता की छवि आँखों में खिंच आई है। वह सिद्धार्थ गौतम से मौन प्रेम करती थी। मार पीड़ित सिद्धार्थ मार विजयी तथागत बुद्ध बने तो प्रेमिका के हाथों की खीर खा कर! .... कैसे कैसे संयोग। काशी के कबीर की धोबिनिया गुनगुनाने लगी है ...
    साथ के सभी दूसरे वी आइ पी होटल में ठहराये गये और मुझ अकेले को मिल पाया 'सुजाता इंटरनेशनल' - महाबोधि मन्दिर के एकदम पास - रश पीरियड! दो दो बार प्रात: का भ्रमण हुआ जब कि साथ के कई एक बार भी न जा पाये...
    ...पूरी कीजिये। अगर लगा कि मुझे लिखना चाहिये तो मैं भी लिखूँगा। गर्भगृह के द्वार के सामने से लौट आया गिरिजेश, बोधि वृक्ष की छाया सह नहीं सका गिरिजेश और बौद्ध भिक्षु का गीत ... जादू तेरी नज़र... भंते! प्रकाश मोबाइल से आते इस गीत में है या गर्भगृह में या आप के भीतर?
    एक लज्जित मुस्कान ... प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया... ड्रैगन के टैटू सने हाथ...ध्यान में डूबा यौवन...विनय सुत्त ...सब, सब ..उमड़ने लगे हैं। लिखिये, लिखिये।

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  7. @गिरिजेश जी,
    मुझे भी यही लगता रहा कि मैं उफनते भावों और उभरते प्रश्नों की झंझावात में लिख नहीं सकूंगा पोस्ट ...पर यह अब शुरू हो गयी है तो पूरी होनी चाहिए..
    आप जैसी गहन संवेदना से तो बचना होगा!

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  8. @सलिल भाई ,
    बस उतना ही भयावह था ..यह अभीष्ट प्राप्ति के पहले की बाधायें थी -मगर उतनी ही थीं ...बाकी तो बिहार में विहार ही विहार रहा -अनपेक्षित संतुष्टि और आनंद!

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  9. गिरिजेशजी के कुछ शब्दों ने ही अपनी आहट दे दी है...उन्हें ज़्यादा देर तक यह उफान रोकना नहीं चाहिए.....लिखें ज़रूर लिखें !

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  10. अगले भाग की प्रतीक्षा है ....शुभकामनायें आपको !

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  11. सर कमाल का लिखा है आपने |इतिहास ,भूगोल ,समाज ,पौराणिक मिथक ,कर्मकांड ,मौसम ,अपवाह राजव्यवस्था क्या नहीं है इस लघुता में कितनी विशालता है |शीघ्र ही अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी |आभार

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  12. भारी बारिश में घर से बाहर निकलने में जहां सोचना पड़े वहां आप यात्रा कर रहे थे वो भी सड़क मार्ग से, कमाल है।

    बहुत रोचक विवरण है। अगली कड़ी का इंतजार है। और हां, ये बसों, छतों पर चढ़े लोग और भी कई जगह दिख जाते हैं। यहां मुम्बई में भी यदा कदा देखता हूं। लोकल के उपर ऐसे खड़े होकर चलते हैं कही कहीं जैसे कि खुद को बंटी बबली फिल्म का अभिषेक बच्चन समझते हों। कुछ दुर्घटनायें भी हुई हैं करेंट लगने से लेकिन माने तब न।

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  13. लोमहर्षक यात्रा। एक दिन में इतना सब?

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  14. sahi hai jan-jivan ast-vyast hua hai.....

    bakiya kramash: hi me sari mile....


    pranam.

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  15. मजा आ रहा है. आगे बढ़ें? कर्मनाशा के बारे में हम भी इत्ता ही जानते हैं की त्रिशंखु की लार से बनी है.

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  16. हम भी जल्दी ही जाने वाले हैं !
    जारी रखिये.

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  17. अच्छा तो आप बिहार की हालत का एक चित्र दिखा दिए। पंद्रह किमी की यात्रा बारह मिनट में? बड़ा जल्दी और बहुत तेज। कोई कह रहा है कि जल्द ही गया जाएंगे, इसका अर्थ?

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  18. शक्ति-स्वरूपा माँ आपमें स्वयं अवस्थित हों .शुभकामनाएं.रोमांचक यात्रा-वृत्तान्त .

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  19. इस ऐतिहासिक तीर्थ के संस्मरण को हम सबसे साझा करने के लिए धन्यवाद.

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  20. चलिए वक्त के साथ रेस तो आपके पक्ष में रही. बनारस की बारिश का फेसबुक से ही विवरण मिल रहा था. वर्दी वालों के लिए प्रयुक्त मन्त्र हमें भी बता देते तो अच्छा था. आगे के विवरण की भी प्रतीक्षा रहेगी.

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  21. यह रोचक लेख पढ़कर हमें अपनी बिहार यात्रा याद आ गई । कुछ ऐसे ही अनुभव , बल्कि इससे भी ज्यादा दिलचस्प , हमें भी हुए थे बिहार में ।
    ज्ञान प्राप्त हुआ था , लेकिन बोध गया में नहीं ।

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  22. बारिश में एक ऐसी ही यात्रा का हमें भी अनुभव है....सचमुच हिम्मत का काम था,ऐसी बारिश में निकलना ...

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  23. अच्छा अनुभव। पर बोध गया तो ज्ञान कहां से आया:)

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  24. रोमांचक अनुभव ..पर अंत भला तो सब भला.

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  25. बिहार की ऐसी तस्वीरें अब राजस्थान मे भी आम ही हैं ...
    रोमांचक यात्रा!

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  26. Thatz what people call "Hell of a ride"..
    u hooked me till the end by ur narration.

    All n all a fantastic read !!!

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  27. रोमांचक कहा जाएगा ... और ताज्जुब होता है कि आज भी गुंडे तत्व पुलिस के भेष में रंगदारी वसूल करते हैं...

    कर्मनाशा के बारे में पहली बारे सुना है... और आशा है कि शीघ्र ही उस पर और पोस्ट देखने/पढ़ने को मिलेंगी..

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  28. बहुत ख़ूबसूरत ! शानदार प्रस्तुती!
    आपको एवं आपके परिवार को नवरात्रि पर्व की हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें !

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  29. बनारस से बोध गया तक की साहसिक यात्रा का वृत्तांत पढ़ा .जहां आप होतें हैं वहां आपदा आपसे आप चली आतीं हैं .खैर सब कुछ ठीक हो गया .बधाई बिहार गए और सकुशल आ गए नीतीश जी का शुक्रिया कीजिए .

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  30. अगले भाग की प्रतीक्षा है ........

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  31. आप के ब्लॉग पर आई तो देखा गया के यात्रा वृतांत के तीन भाग आ चुके हैं सोचा शुरू से ही पढते हैं । बिहार की अराजकता से तो मैं भी थोडी बहुत परिचित हूँ पर क्या अब भी हालात यही हैं । करमनाश अपवित्र क्यूं है ये तो जानना पडेगा करमों के नाश से (अच्छे बुरे दोनो ) तो मुक्ति मिलनी चाहिये । एक अच्छा हुआ कि आपकी मित्र का पिंडदान का काम समय से हो गया ।

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