Friday, 15 May 2009

चिट्ठाकार समीरलाल : जैसा मैंने देखा -4

चिट्ठाकार समीरलाल : जैसा मैंने देखा -1 चिट्ठाकार समीरलाल : जैसा मैंने देखा -2 चिट्ठाकार समीरलाल : जैसा मैंने देखा -3

बिखरे मोती में एक से बढ़कर एक कुल १४ गजलें समाहित हैं -पहली ही गजल अपनी ओर एक चुम्बकीय आकर्षण के साथ पाठक को आमंत्रित करती है -
"दम सीने में फंसा हुआ ,कमबख्त न निकले
तिरछा सा वार बाकी है इक तेरी नज़र का " (पृष्ट ७३)
अब इधर भी देखिये की क्या ये किसी व्याख्या की मांग करती हैं ?
" फैल कर सो सकूं इतनी जगह मिलती नहीं
ठण्ड का बस नाम लेकर मैं सिकुड़ता गया "(पृष्ठ & 77)

जन स्मृतियाँ दुर्भाग्य से कितनी अल्पकालिक होती हैं इस पर कवि का यह गहरा कटाक्ष तो देखिये -
"कल मरे थे लोग कितने ,रो रही थी ये जमी
महफिले सजने लगेगीं देख लेना शाम से " ( पृष्ठ -८३)
जीवन के एक कटु सत्य और नग्न यथार्थ से साक्षात्कार करती ये पंक्तियाँ मन को सहसा विषणण कर देती हैं मगर किया क्या जाए मानों जनजीवन की यही नियति बन गयी हो ! अब भला कितने लोगों को याद है मुम्बई का आतंकवादी हमला ?

समीर लाल के मुक्तक स्नेह सम्वेदना ,प्यार तकरार ,विछोह विप्रलम्भ से पूरी तरह लबरेज हैं -"जो मुझसे प्यार करती है " शीर्षक मुक्तक की इन पंक्तियों पर जरा गौर फरमाएं -
" कभी इनकार करती है ,कभी इकरार करती है
बड़ी नादान लडकी है , जो मुझसे प्यार करती है ( पृष्ठ -८९)
कवि अपनी या खुद के रचना कर्म की कालजीविता के प्रति कोई मुगालता नहीं पालता -
" आज मैं हूँ कल मेरा ये नाम बस रह जायेगा
वक्त की आँधीं में वो भी इक दिन बह जायेगा
( पृष्ठ -९०)
पर यह नीर क्षीर विवेक /न्याय भी तो काल बली के हाथ ही है ! मगर ये मौलिक रचनाएँ अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त तो करती हैं ! कवि की "तुम " शीर्षक की चार मुक्तक कवितायेँ वर्ड्सवर्थ की ही परम्परा में अपनी गर्विता प्रेयसी ( बोलो कौन ? ) को समर्पित है जो प्रेम और विछोह के उतार चढाव की तासीर लिए हुए हैं ! मुक्तकों के कई अन्य रूप रंग राजनीति ,धर्म और प्यार के प्रभावी अवयव समेटे हुए हैं !

क्षणवाद की फिलासफी भले ही अज्ञेय से गुजर कर आज भी अज्ञेय ही है मगर समीर लाल की क्षणिकाओं का प्रभाव कतई क्षणभंगुर नही है -लाचारी ,आरक्षण ,इंसान शीर्षक क्षणिकाएं गहरा प्रभाव डालती हैं.अन्तिम क्षणिका कवि की रचना प्रक्रिया से अवगत कराती है -
और अंत में
हाथ में लेकर कलम
मै हाले दिल कहता रहा
काव्य का निर्झर उमड़ता
आप ही बहता गया


[समीक्षित पुस्तक:
बिखरे मोती
(काव्य संग्रह )
रचनाकार -समीर लाल 'समीर '
प्रथम संस्करण :२००९
प्रकाशक -शिवना प्रकाशन ,सीहोर, मध्य प्रदेश
मूल्य २०० रूपये मात्र ]

15 comments:

"अर्श" said...

INKA YE SHE'R NAHAAK HI MUJHE PARESHAAN KARTAA RAHTAA HAI AUR MERE DIL-O-DIMAAG PE CHHAYAA RAHTAA HAI..

FAIL KAR KE SO SAKHUN ITNI JAGAH MILTI NAHI...
THAND KA BAS NAAM LEKAR MAIN SIKUDATAA RAH GAYAA...


BADHAAYEE

ARSH

ताऊ रामपुरिया said...

क्षणवाद की फिलासफी भले ही अज्ञेय से गुजर कर आज भी अज्ञेय ही है मगर समीर लाल की क्षणिकाओं का प्रभाव कतई क्षणभंगुर नही है -लाचारी ,आरक्षण ,इंसान शीर्षक क्षणिकाएं गहरा प्रभाव डालती हैं.

आपने बहुत ही सुंदर विष्लेष्ण किया है इस काव्य कृति का. आभार आपका.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया said...

क्षणवाद की फिलासफी भले ही अज्ञेय से गुजर कर आज भी अज्ञेय ही है मगर समीर लाल की क्षणिकाओं का प्रभाव कतई क्षणभंगुर नही है -लाचारी ,आरक्षण ,इंसान शीर्षक क्षणिकाएं गहरा प्रभाव डालती हैं.

आपने बहुत ही सुंदर विष्लेष्ण किया है इस काव्य कृति का. आभार आपका.

रामराम.

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

समीर लाल में कवि और लेखक का सही ब्लॉगीय संतुलन है। वैसे लेखन में टिप्पणी लेखन ज्यादा मुखर रहा है। और अच्छा भी है अन्य चिठेरों के लिये।

Abhishek Mishra said...

हाथ में लेकर कलम
मै हाले दिल कहता रहा
काव्य का निर्झर उमड़ता
आप ही बहता गया
आपके माध्यम से 'बिखरे मोती' में से कुछ दाने हमारी और भी आ गए. आपका धन्यवाद और समीरजी को शुभकामनाएं.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत बढ़िया समीक्षा की आपने ..हर लफ्ज़ दिल से लिखा है ..शुक्रिया

डॉ .अनुराग said...

.....हमारे लिए तो वो लेखक ओर ब्लोगर से अधिक एक स्नेहमयी ,शानदार मिजाज़ के ऐसे मित्र है जो उम्र के फासलों पे यकीन नहीं करते....

हिमांशु । Himanshu said...

बिखरे मोती की सर्वांगीण समीक्षा कर डाली आपने । बहुत कुछ ऐसा भी अभिव्यक्त होता दिखा जो शायद पहली बार पढ़ते हुए आपने भी न देखा होगा इन कविताओं में, जैसे यह पंक्तियाँ -
"कभी इनकार करती है,कभी इकरार करती है
बड़ी नादान लडकी है,जो मुझसे प्यार करती है"। मुझे नहीं लगता कि संकलन पढ़ते हुए इन पंक्तियों ने अन्य कविता-अनुच्छेदों के समानान्तर आपको प्रभावित किया होगा । पर समीर जी की कविता और शायद उनके व्यक्तित्व का अदृश्य प्रभाव रहा होगा कि यह कवितायें भी अचानक अर्थवत्तापूर्ण हो गयी होंगी ।

इस पूरी श्रृंखला के लिये आभार । बहुत कुछ निखर गया समीर जी का कवि-पक्ष ।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

Bahut achchi jaankari mil rahee hai ...shukriya jee

संजय तिवारी ’संजू’ said...

मेरे तो जीवन का अंग हैं समीर जी, मैं उन्हें प्यार से चाचा और वैसे जीजा कहता हूँ, हर धड़कन उनकी दी हुई है. आप जो कुछ भी कह पायेंगे, मेरे लिए कम होगी. बचपन से मुझे उनका स्नेह हर पल हासिल है, और यह मेरा सौभाग्य है. जीवन धार का उद्देश्य मेरे लिए-उनका अनुसरण.

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

वाह! बड़े अच्छे शायर हैं भाई समीर लाल जी. उनके इस आयाम से परिचित कराने के लिए शुक्रिया.

गौतम राजरिशी said...

एक बेहतरीन समीक्षा के लिये आभार अरविंद जी...

Vijay Kumar Sappatti said...

sir,

namaskar

aapne , bahut hi shaandar tareeke se is kitaab ki samikhsa ki hai ......padhkar bahut jaankari bhi mili aur aanand bhi aaya ..

meri nayi kavita " tera chale jaana " aapke pyaar aur aashirwad bhare comment ki raah dekh rahi hai .. aapse nivedan hai ki padhkar mera hausala badhayen..

http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html

aapka

vijay

महामंत्री - तस्लीम said...

चलिए, अल्लाह अल्लाह करके समीक्षा खत्म तो हुई।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

Bhai ji,aap itni door baithe ho kar apne aaspaas itna drishtibodh rakhtey hai yah tareef ki baat hai.
Thanks for yr comments but pl clear kijiye ki close line par enter dabane se kya hoga ?
guide me accordingly.
Dr.Bhoopendra

My Blog List

  • Feature: Seclusion to inclusion - A new initiative is helping to reduce the practice of secluding psychiatric patients experiencing an extreme crisis.
    2 days ago
  • नदी की तरह - ** *नदी की तरह बहते रहे तो सागर से मिलेंगे, थम कर रहे तो जलाशय बनेंगे, हो सकता है कि आबो-हवा का लेकर साथ, खिले किसी दिन जलाशय में कमल, हो जायेगा जलाशय का रूप...
    6 months ago
  • Terminator Salvations teaser trailer - http://www.youtube.com/watch?v=kXnELk6pZVk a2a_linkname="Terminator Salvations teaser trailer";a2a_linkurl="http://www.scifirama.com/index.php/2008/07/443/";
    1 year ago

Blog Archive

About Me