रविवार, 24 मई 2009

आकाश गंगा को निहारते हुए ....

अभी गाँव जाना पडा और रात आसमान के तारे गिनते और आकाश गंगा को निहारते बीती ! श्रेय बिजली विभाग को है ! गाँवों में पूरी की पूरी रात बिना बिजली के गुजर जा रही है ! बच्चे तो हलकान हुए मगर मेरे लिए यह एक छुपा हुआ वरदान रहा ! शहर की रोशनी की चकाचौध से दूर रात्रि दर्शन का अपना अलग ही आनंद है ! आनंद निशा (नभ ) निहारन का !



इस बार मुझे आकाश गंगा जो गर्मियों में बेहद खूबसूरत दिखती है को निहारने का खूब आनंद मिला ! रात्रि दो बजे से उत्तर और दक्षिण के मध्य रूई के फाहों या हलके महीन बादलों के आवरण की एक पट्टी दिखती है जो जैसे जैसे समय बीतता जाता है और भी फैलती जाती है ! यह एक अद्भुत दृश्य है जो रोमांच उत्पन्न करता है ! कहते हैं की हमारा सूर्य और ख़ुद यह पृथ्वी इसी मिल्की वे -आकाश गंगा की ही एक कण मात्र के सदस्य/सदस्या हैं .इस आकाश गंगा में जो वर्तुलाकार है करीब १० हजार करोड़ तारे हैं ! और ब्रहमांड में ऐसी ही अनेक मिल्की वे हैं ! अभी तो यह आकाश गंगा अर्ध रात्रि के बाद दिख रही है मगर आगामी माहों में यह रात्रि के आरम्भिक पहरों में भी दिखेगी ! भारतीयों ने सचमुच इस मिल्की वे का कितना सुंदर नामकरण किया है -आकाशगंगा ! मतलब धरती की गंगा के ही समांतर आकाश की गंगा जो इन्द्र सरीखे देवताओं की भी पतित पावनी है !

मैंने देखा कि रात्रि तीन बजे तक अपने बृहस्पति महराज भी आकाश गंगा की झीनी चादर में मुंह छुपा कुछ कुछ निस्तेज हो लिए थे ! जरा ढूँढिये तो गुरू महराज को -

www.noao.edu/outreach/aop/digital.html


May is Milky Way month

21 टिप्‍पणियां:

  1. हां गांवो मे अक्सर ही बिजली नही आती है तो वहां ऐसे नजारे दिखाई दे जाते हैं. यहा शहर मे तो भी नही दिखाई देता.

    रामराम.

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  2. आकाशगँगा का पौराणिक नाम क्या होगा ?
    याद नहीँ आ रहा
    - लावण्या

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  3. @ क्या यह पौराणिक नाम नहीं है ? कहीं क्षीर सागर तो ही नहीं ?

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  4. मुझे तो जब भी ये नजारा देखना होता है कोटा से कम से कम दस किलोमीटर दूर रावतभाटा की तरफ जंगल के बीच सड़क पर जा कर गाड़ी खड़ी करनी पड़ती है। बहुत अच्छा लगता है ऐसे देखना। विश्व कितना विस्तृत है, और हम?

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  5. हमें तो रात को बिजली न रहने पर जागने की आदत नहीं, हम तो बिजली रहने पर जागते हैं । कारण साफ है अनेकों रातें बिना बिजली के काट देने का अभ्यास है मुझे ।
    और इसीलिये छत पर सोते तो हैं, पर कुछ परिस्थितिजन्य एकरसता और कुछ खगोलीय जानकारियों का अभाव मुझे नींद में ही जाने को प्रेरित करता है ।
    मैं न पहचान पाउंगा गुरु महाराज को ।

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  6. अच्छा तो यह 'मिल्की वे मंथ' भी है!आपके साथ आकाशगंगा की सैर का अभी भी इंतजार है.

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  7. चित्र में दीखता 'आकाशगंगा 'का दृश्य बहुत ही मनोरम है.
    यहाँ बिजली जाती नहीं कि कभी अँधेरा हो और आकाश के तारे भी देख सकें.आकाशगंगा तो देख पाना दूर की बात है.

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  8. ये वाकई मोहक दृश्य रहा होगा.. मैंने कई बार आसमान में देखते हुए रात बितायी है

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  9. दिल्ली में अब तारे नहीं होते.

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  10. बिजली के मामले मे मध्यप्रदेश से अलग होना छत्तीसगढ के लिये फ़ायदेमंद रहा।कम से कम शहरो मे तो बिजली की आंखमिचौली नही होती।रात को खुले आसमान मे चांदनी की बूटेदारी देखने का मौका तो गांव जाने पर ही मिलता है। अब तो गर्मियों मे छतो पर सोने का सिस्ट्म भी खतम हो गया।बचपन मे रोज़ शाम को अपना बिस्तर छत पर लगाना और रात होते-होते उसका ठंडा होना सबसे ज्यादा खुशी देता था वो खुशी अब ठ्ण्डे कमरों मे कंहा मिल सकती है।

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  11. बिजली जाने का एक फायदा तो पता चला।

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  12. आकाशगंगा बहुत समय बाद सुनने को ही मिला। गजब का अनुभव होता है जो, बड़े शहरों में तो देखने को नहीं मिलता

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  13. गाँव जाने पर ये अनुभव हमेशा ही सुखद होता है !

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  14. मिश्रा जी, निहारते रहिए अन्तरिक्ष को....उम्मीद करता हूं कि शायद किसी दिन इन ग्रहों, तारों के पार भी कुछ दिखाई दे जाए.

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  15. मैं भी पिछले हफ्ते निहार रहा था सप्तर्षि मण्डल को!

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  16. आकाश-गंगाओं की आदत-सी है हमें...जाने कितनी रातें-लगातार रातें इन्हें निहारती बीती हैं, बीतती हैं...

    जानकारियों का शुक्रिया मिश्र जी !

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  17. ब्रह्माण्ड की अनेक आकश गंगाओं में से हमारी एक आकाशगंगा, उस एक आकाशगंगा में हमारा एक सौरमंडल, उस सौरमंडल में हमारी पृथ्वी, उस पृथ्वी में हमारा देश, शहर, मोहल्ला , घर और हम स्वयं. अपनी अकिंचनता का अहसास दिलाने के लिए इतना काफी है.

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  18. kai shehro me bhi milky way ke darshan bahut hote hai...likha bahut achha hai aapne...

    www.pyasasajal.blogspot.com

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  19. तारे देखे एक ज़माना बीत गया ..:) अच्छा लगा इस लिए इसको पढना

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